सहजि सहजि गुन रमैं : नन्द भारद्वाज




















आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने अपने प्रसिद्ध निबन्ध, ‘कविता क्या है?’ की शुरुआत इन पंक्तिओं से की है- ‘कविता से मनुष्य-भाव की रक्षा होती है’ (आचार्य शुक्ल जीवन भर इस लेख से जूझते रहे, इस लेख के कई संस्करण मिलते हैं).

नन्द भारद्वाज के कविता संसार को गहते हुए सांद्र जीवन–रस का अनुभव होता है. वह आज के यथार्थ पर नहीं टिकते. मानुष भाव के मूल को विन्यस्त करने की कोशिश में वह पीढियों से संचित आदिम–उर्जा को कृतज्ञता से देखते हैं. यही उर्जा उन्हें जीवन की कोख से विकसने का हौसला देती है अंधरे के ठीक सामने भी.     

आदिम बस्तियों के बीच शीर्षक से नन्द भारद्वाज का नया कविता संग्रह प्रकाशित.

van-gogh-vincent
पीढ़ियों का पानी

इस सनातन सृष्टि की
उत्पत्ति से ही जुड़ा है मेरा रक्त-संबंध
अपने आदिम रूप से मुझ तक आती
असंख्य पीढ़ियों का पानी
दौड़ रहा है मेरे ही आकार में

पृथ्वी की अतल गहराइयों में
संचित लावे की तरह
मुझमें सुरक्षित है पुरखों की आदिम ऊर्जा
उसी में साधना है मुझे अपना राग

मेरे ही तो सहोदर हैं
ये दरख्त  ये वनस्पतियाँ
मेरी आँखों में तैरते हरियाली के बिम्‍ब
अनगिनत रंगों में खिलते फूलों के मौसम
अरबों प्रजातियां जीवधारियों की
खोजती हैं मुझमें  अपने होने की पहचान.

आदिम बस्तियों के बीच

एक बरती हुई दिनचर्या
अब धीरे धीरे
छूट रही है आंख से बाहर
उतर रही है आसमान से गर्द
                 बेआवाज,
दूर तक दिखने लगा है
रेत का विस्तार
उड़ान की तैयारी से पहले
जैसे पंछी फिर से दरख्तों की डाल पर!

जानता हूं,
ज्वार उतरने के साथ
यहीं किनारे पर ही
छूट जाएंगी किश्तियां
      शंख-घोंघे-सीपियों के खोल
अवशेषों में अब कहां जीवन ?

जीवनदायी हवाएं
बहती हैं आदिम बस्तियों के बीच
उन्हीं के आगोश में रचने का
               अपना सुख
अपनी रागिनी,
कोसों पसरे थार के आकाश में
रंग-बिरंगे पंछियों का गूंजता कलरव
ये दरख्‍तों की हरियाली में
विकसता जीवन।

इससे पहले कि अंधेरा आकर
ढाँप ले फलक तक फैले
दीठ का विस्तार,
मुझे पानी और मिट्टी के बीच
बीज की तरह
बने रहना है इसी जीवन की कोख में!

होगी कोई और भी सूरत

अभी अभी उठा है जो अलसवेरे
रात भर की नींद से सलामत 
देख कर तसल्ली होती है उसे
कि दुनिया वैसी ही रखी है
उसकी आँख में साबुत
जहाँ छूट गई थी बाहर
पिछले मोड़ पर अखबार में !

किन्हीं बची हुई दिलचस्पियों
और ताजा खबरों की उम्मीद में
पलटते हुए सुबह का अखबार -
          या टी.वी. ऑन करते
कोई यह तो नहीं अनुमानता होगा
कि पर्दे पर उभरेगी जो सूरत
                 पहली सुर्खी
वही बांध कर रख देगी साँसों की संगति

फिर वही औचक,
अयाचित होनियों का सिलसिला:
सड़क के ऐन् बीचो-बीच बिखरी
अनगिनत साँसें  बिलखता आसमान
हवा में बेरोक बरसता बारूदी सैलाब
सहमी बस्तियों में दूर तक दहशत

दमकलों की घंटियों में
डूब गई चिड़ियों की चीख-पुकार
सनसनीखेज खबरों की खोज में
भटक रहे हैं खोजी-छायाकार
दृश्‍य को और भी विद्रूप बनाती
            सुरक्षा सरगर्मियां -
औपचारिक संवेदनाओं की दुधारी मार !

हर हादसे के बाद
अरसे तक डूबा रहता हूं
इसी एक संताप में –
होगी कोई और भी सूरत
इस दी हुई दुनिया में
        दरकती दीठ से बाहर ?
           
बाकी बची जो मैं                     

जब से होने का होश संभाला है,
अपने को इसी धूसर बियाबान में
जीने की जिद में ढाला है! 

बरसों पहले
जिस थकी हुई कोख में
आकार लिया था मैंने
नाभि-नाल से निर्बंध हुई थी देह,    
कहते हैं, मां की डूबती आंखों में
फकत् कुछ आंसू थे
और पिता की अधबुझी दीठ में
                गहराता सूनापन,
सिर्फ दाई के अभ्यास में बची थी
एक हल्की-सी हुलसती उम्मीद
कि जी लेगी अपना जोखिम
और बदहवासी में बजते बासन
जचगी की घुटती रुलाई पर
देर तक बजते रहे थे
गांव के गुमसुम आकाश में!

दिनों जैसे दिन थे
और रातों जैसी रात
जीवन का क्या है
वह तो गुजार ही लेता है
अपनी राह -
जो मिला सो गह लिया
कौन जाने कहां हो गई चूक
उल्टा-सीधा जो हुआ बरताव
             बेमन सह लिया,

जैसा भी बना-बिखरा-सा घर था अपना
उसी को साधा     सहेजा
गांव-गली की चर्चाओं से रही सदा बेसूद
अपने होने के कोसनों को नहीं लिया मन पर
गिरते-सम्हलते हर सूरत में
अपना आपा साध लिया!

गांव-डगर में
कहीं नहीं थी मोल-मजूरी 
कहीं नहीं था कोई अपना बल

मंझला भाई बरसों पहले
निकल गया परदेस
और नहीं लौट पाया
सलामत देस में।
बाकी बची जो मैं
इसी दशा के द्वार
मात-पिता पर जाने कब तक
रखती अपना बोझ

बस उलट-पलट कर देखसमझ ली दुनिया
उनकी टूटन, उनके सपने - उनका बिखरापन
और जान लिया है
ताप बदलता अपना अंतर्मन.

अपने आंसुओं को सहेजकर रखो माई!

अपने शाइस्ता आँसुओं को यहीं सहेजकर थाम लो माई !
मत बह जाने दो उन बेजान निगाहों की सूनी बेबसी में
जो देखते हुए भी कहाँ देख पाती है
रिसकर बाहर आती धारा का अवसाद 
कहां साथ दे पाती है उन कुचली सदाओं का
जो बिरले ही उठती है कभी इन्साफ की हल्‍की-सी उम्मीद लिये

उन बंद दरवाजों को पीटते
लहू-लुहान हो गये थे हाथों को
और जख्मी होने से रोक लो माई
इन्हीं पर एतबार रखना है अपनी आत्मरक्षा में

ये जो धड़क रहा है न बेचैनी में
अन्दर-ही-अन्दर धधकती आग का दरिया
उसे बचा कर रखो अभी इस बहते लावे से

अफसोस सिर्फ तुम्हीं को क्यों हो माई
सिर्फ तुम्हारी ही आँख से क्यों बहे आँसू
कहाँ हैं उस कोख की वे जिन्‍दा आँखें
जिसमें किसी नाबदान के कीड़े की तरह
आकार लिया था वहशी दरिन्दों ने
शर्मसार क्यों न हो वह आँगन
वह देहरी
जहाँ वे पले बढ़े और लावारिस छोड़ दिये गये,
जहाँ का दुलार-पानी पाकर उगलते रहे जहर
क्‍यों शर्मसार न हुई वह हवा
अपनी ही निगाहों में डूब कर मर क्‍यों
वे इन्‍सानी बस्तियाँ ?

(पाकिस्तान में सरेआम बदसलूकी और जुल्‍म की शिकार उस मजलूम स्त्री के लिए जिसे मुल्क की सब से बड़ी अदालत भी इन्साफ न दिला सकी)

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  1. प्रकृति और जीवन से जुड़ी ये कविताएँ सहज ही मन में उतर जाती हैं . नन्द सर को पढ़ना जितना अच्छा है उतना ही उन्हें सुनना . अरुण इस सुन्दर पोस्ट के लिए आपको बधाई .

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  2. शब्दों में संचित एक और भाव, कभी किसी समय मन को स्वस्थ रखने में प्रयुक्त होंगे।

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  3. जिन कविताओं में नन्द भारद्वाज का पुरुष मुखर है उनमें,पगलाई हवाओं से झंझोड़े जाते दरख़्त की अपनी जड़ों को और कस कर पकड़ लेने की जिजीविषा दिखाई देती है ,और कवि के भीतर जो स्त्री है (वह मुझे बहुत अच्छी लगी ) वह आलोचक है ,तीखी निंदा करती है ,मशवरा देती है ,अपने भीतर उम्मीद भरा एक सपना अपनी छाती से लगा कर रखती है !
    कुल मिलाकर नन्द जी की ये रचनाएँ बड़ी सहजता से पाठक -मन को अपनी गोद में बिठा कर उसका मुहँ धो देती हैं ,बाल संवार देती हैं ! अरुण देव जी का आभार !

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  4. इससे पहले कि अंधेरा आकर
    ढाँप ले फलक तक फैले
    दीठ का विस्तार,
    मुझे पानी और मिट्टी के बीच
    बीज की तरह
    बने रहना है इसी जीवन की कोख में!

    बहुत ही गहरी-गहन अनुभूति..नंद जी की इन कविताओं को पढना एक नए अनुभव से गुजरना है..साझा करने के लिए समालोचन का आभार!

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  5. srishti se ekrasta aur aatmeeyta sthapit karti kavitaaye. bhavo me bikhri peeda jaise hamare hee aangan se beeni kar le gaya hai koi jaise ki दिनों जैसे दिन थे
    और रातों जैसी रात
    जीवन का क्या है
    वह तो गुजार ही लेता है
    अपनी राह -
    जो मिला सो गह लिया
    कौन जाने कहां हो गई चूक
    उल्टा-सीधा जो हुआ बरताव
    बेमन सह लिया, kitan sahaj kitna sach.. naman nand ji. arunji dhanyavad.

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  6. जीवनदायी हवाएं
    बहती हैं आदिम बस्तियों के बीच

    vaah Kya khoob likha hai. Nand ji shreshth kavi hain..jab samvedana ki bat karen to. Manisha kulshreshtha

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  7. सुमन केशरी7/7/11, 11:09 am

    इससे पहले कि अंधेरा आकर ढाँप ले
    फलक तक फैले दीठ का विस्तार, मु
    झे पानी और मिट्टी के बीच
    बीज की तरह बने रहना है
    इसी जीवन की कोख में!
    आशा का संचार करती कविता...नंद जी की कविताएं मनुष्य को आदि से अनंत तक जोड़ती हैं...मन का विस्तार करती हैं

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  8. Prabhat Ranjan7/7/11, 11:55 am

    पाँचों कविताओं को पढकर नन्द जी के संग्रह का इंतज़ार बढ़ गया है. बहुत अच्छी प्रस्तुति.

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  9. सभी कविताएं एक से बढकर एक.
    क्या बात है

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  10. Sheeba Rakesh7/7/11, 6:39 pm

    Beautiful poems,,,kahin insaaniyat ka dard,,to kahin Naritv ke hone bhar ki antheen chubhan,,,Muktar Mai ho ya peediyon ko dhoti ek stri aur saath hi Maanvi anubhav,,,Yah sabhi kavitayein,,gahan pakshon ko chhooti hain aur "jeevan ke kokh" main ek naye janm ki aasha karti dikhti hai,,,bahut khoob!!

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  11. ये जो धड़क रहा है न बेचैनी में
    अन्दर-ही-अन्दर धधकती आग का दरिया –
    उसे बचा कर रखो अभी इस बहते लावे से sunder rachnaye.

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  12. Paritosh Mani7/7/11, 8:52 pm

    हिन्दी में बहुत अच्छे कुछ कवि हैं पर दुर्भाग्य से उनको इतना नोटिस नहीं किया जाता ,नन्द भारद्वाज ऐसे ही कवियों में से हैं ,बहुत ही अच्छी कविताएं हैं .

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  13. गहरी अंतर्दृष्टि से भरी और भर देने वाली कविताएं... बधाई...

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  14. Sheeba Rakesh10/7/11, 6:59 am

    Atyant madhur aur good,,, insaani shakti aur kamzori ke adbhut sammishran ko darshati hain yah kavitayein,,bahut badhayee!

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  15. Smita Shukla10/7/11, 7:00 am

    waah!!!!!issea pehle, ki andhera aakar dhanp lea..falak tak failea deeth ka vistaar....mujhea paani or mitti kea bech BEEJ ki tarha benea rehna hai jeevan ki KOKH me ....behut khoob....

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  16. Manisha Jain10/7/11, 7:01 am

    ‎''बस उलट-पलट कर देख–समझ ली दुनिया
    उनकी टूटन, उनके सपने - उनका बिखरापन
    और जान लिया है
    ताप बदलता अपना अंतर्मन...'' Nand sir..aapko pranaam..main is se zyada kuch keh nahin sakti..

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  17. Om Nishchal10/7/11, 7:02 am

    कविताऍं लिखी तो जा रही हैं बेशुमार,पर छूने वाली कम। नंद जी में छूने वाले तत्‍व हैं।

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  18. अरुण भाई का आभार इतनी अच्छी पोस्ट के लिए। सीखने को बहुत है इन कविताओं में।

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  19. namaskar !
    nand sir ko badhai ek sunder kaavya sngrah ke liye hume pratiksha hai . ki ye naye aayam sthapit kare.
    punah badhai sunder kavitaon aur chintan ke liye .
    sadar

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