रीझि कर एक कहा प्रसंग : रवीन्द्रनाथ टैगोर

Posted by arun dev on मार्च 03, 2011


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प्राणों में छिपा हुआ प्रेम कितना पवित्र होता है
हृदय के अंधकार में वह माणिक्य के समान जलता है,
किन्तु, प्रकाश में वह काले कलंक के समान दिखाई देता है.
व्यक्त प्रेम


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प्राणेश्वरी
रात को तुम प्रेयसी का रूप धरकर आई थीं
प्रभात होते ही
तुम किस क्षण हंसकर देवी के वेश में उदित हो गई ?
मैं संभ्रम से सिर झुकाए
दूर ही खड़ा हूँ.
रात्रे ओ प्रभाते 


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जब तुम गए दोपहरी थी
धूल भरा रास्ता, जलता हुआ मैदान, तेज़ धूप
वट वृक्ष की शाखा पर
घनी छाया में दो कबूतर
केवल बोलते चले जा रहे थे
मेरा शयन – कक्ष सूना था
और मैं अकेली वातायन पर बैठी थी
जब तुम गए दोपहरी थी.
 विरह


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मैं तपस्वी नहीं बनूंगा, नहीं बनूंगा
कोई कुछ भी कहे
निश्चय ही मैं तपस्वी नहीं बनूंगा
यदि मुझे तपस्विनी नहीं मिली
मैंने दृढ प्रतिज्ञा की है
यदि वकुल वन नहीं मिला
यदि मन का धन नहीं मिला
तो मैं तपस्वी नहीं बनूंगा.
प्रतिज्ञा

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हँसते हुए फूल तुम ले लेना
उसके बाद यदि वे फूल सूख जाएँ
तो उन्हें फेंक देना. 
प्राण

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बच्चा माँ को पुकारकर पूछता है
मैं कहाँ से आया हूँ
तूने मुझे किस जगह पड़ा पाया था ?
यह सुनकर माँ ने हंसते – रोते
बच्चे को छाती से चिपटाकर कहा,
तू मेरे मन में इच्छा बनकर बैठा हुआ था.
 जन्म - कथा 
 
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काफी दूर तक साथ – साथ आया
हाथ मिलाकर हम साथ चले थे
यहाँ, दो रास्तों के मोड पर
न जाने किस खुशबू के मारे
एक अनोखी ही वेदना से
कैसा तो कर उठा जी मेरा
अब तो साथ – साथ नहीं जाया जा सकता.
 विदाई


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जीवन में जो पूजाएं पूरी नहीं हो सकी हैं
मैं ठीक जानता हूँ कि वे भी खो नहीं गई हैं
जो फूल खिलने से पहले ही पृथ्वी पर झड़ गया है,
जो नदी मरुभूमि के मार्ग में ही अपनी धारा खो बैठी है
मैं ठीक जानता हूँ कि वे भी खो नहीं गई हैं.
गीतांजलि 


रवीन्द्रनाथ (७,मई १८६१- ७ अगस्त १९४१) की कविताओं से,अनुवाद हजारीप्रसाद द्विवेदी,रामधारी सिंह दिनकर और भवानी प्रसाद मिश्र आदि के हैं.