कथा- गाथा : प्रश्न : प्रचण्ड प्रवीर

(Philadelphia Museum of Art: Maithuna)

प्रचण्ड प्रवीर बीहड़ प्रतिभा के धनी कथाकार हैं. कथा को दर्शन में गूँथ कर दर्शन के समानांतर ‘मर्डर मिस्ट्री’ की कहानी है ‘प्रश्न’. उपनिषदों को आधार बनाकर लिखी जा रही उनकी कहानियों की श्रृंखला की यह नवीनतम कड़ी है.

हिंदी कहानी के समकालीन परिदृश्य को समृद्ध और गहरी करती यह कहानी आदि और आधुनिक को एक जगह मिला देती है.

कहानी प्रस्तुत है. 



प्रश्न                                                    
प्रचण्ड प्रवीर

(प्रश्न उपनिषद अथर्ववेद की पिप्पलाद शाखा के ब्राह्मण भाग से सम्बन्धित है. प्रस्तुत कथा प्रश्न उपनिषद पर कल्पना युक्त टीका जैसी गृहीत की जा सकती है, जो कि महाकवि कालिदास की ‘ऋतुसंहार’ से अनुप्राणित है.)

(सम्बन्ध)
तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया I
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनःII ४.३४II — श्रीमद्भगवद्गीता

उस को साष्टांग दण्डवत्, प्रश्न तथा सेवा करके जानोये तत्त्वदर्शी ज्ञानी पुरुष तुम्हें (उस) ज्ञान का उपदेश करेंगे.



ङ्गा के तट पर, आबादी से दूर, कई एकड़ों में फैला एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय है. यहाँ पर विज्ञान, अभियान्त्रिकी, जैव प्रौद्योगिकी, गणित, दर्शन जैसे कई विषयों में उच्च शिक्षा दी जाती है. विद्यार्थियों में बुद्धिमान और जिज्ञासु को दर्शन के प्रति उनकी अगाध श्रद्धा से पहचाना जा सकता है. इस तरह चार साल के पाठ्यक्रम में तीन साल पूरे हो जाने के बाद सुकेशा, सत्यकाम, गार्ग्य, कौसल्य, भार्गव और कबन्धी के पास दर्शन सम्बन्धी बहुत से प्रश्नों का अम्बार खड़ा हो गया. वहीं, विश्वविद्यालय में एक ऊँचे टीले पर, पिप्पलाद नाम से विख्यात दर्शन के एक अर्द्धविक्षिप्त अध्येता एक आलीशान बंगले में अकेले रहा करते थे, जिनसे आमतौर पर छात्र और सहकर्मी आचार्य किनारा करते थे.
           
इन छह विद्यार्थियों ने गुरु पिप्पलाद की उपलब्धियों के बारे में सुना और इंटरनेट पर उनकी तारीफ में लिखे कसीदों को पढ़ा. उनका दृढ़ विश्वास हुआ कि उनके प्रश्नों का सही उत्तर पिप्पलाद ही दे सकेंगे. यही सोच कर वैशाख पूर्णिमा की संध्या ये विद्यार्थी ऊँचे पहाड़नुमा टीले पर चढ़ कर पिप्पलाद के बंगले पर उनसे मिलने अचानक ही जा पहुँचे. कहा जाता है कि पिप्पलाद ने उन सभी से उनके प्रश्नों को कोरे कागज पर काली स्याही से लिखवाया और बिना देखे ही उन पुर्जों को मोड़ कर छह भूरे लिफाफों में, पूछने वालों के नाम उसके ऊपर लिख कर, मुहरबन्द कर दिया. पिप्पलाद जी ने उन जिज्ञासुओं से कहा- आप सभी एक साल और पढ़िये-लिखिये. तपस्या और श्रद्धा से अपने पाठ्यक्रम का आखिरी साल पूरा कीजिए. और उसके बाद इच्छानुसार प्रश्न कीजिएगा.
           
यदि मैं जानता होऊँगा तो आपको सब बतला दूँगा. यह उनके शब्द थे जो छात्रों के कानों में बहुत दिनों तक गूँजते रहे.

इसके बाद वे सभी छात्र अपने क्रिया-कलापों में व्यस्त रहे, जैसा कि आमतौर पर स्नातक के चौथे साल में विद्यार्थी अक्सर हो जाया करते हैं. मसलन नौकरी की तलाश या उच्च शिक्षा सम्बन्धी प्रक्रियाएँ. दुर्भाग्यवश इस दौरान शरद पूर्णिमा के दिन अस्पष्ट घटनाक्रमों में विश्वविद्यालय के कैम्पस से कुछ दूर एक आलीशान महल में रहने वाली प्रसिद्ध रूपसी की मृत्यु हो गयी. उसका पति अपनी प्रेयसी की सम्भावित (?) हत्या को सह नहीं पाया और कुछ महीनों बाद वह भी कहीं बिना कुछ बताये गायब हो गया. इन अवसाद से भरी घटनाओं के तहकीकात में शक की सुई इन प्रतिभाशाली विद्यार्थियों पर भी गयी जो कि इस दम्पति से परिचित थे. परन्तु हत्यारे का पता अभी तक नहीं चल पाया था.

किंचिद अप्रिय घटनाक्रमों के पश्चात गर्मी के दिनों में इन्होंने तय किया कि साल भर पहले जो प्रश्न थे, उसी बहाने विश्वविद्यालय छोड़ने से पहले प्रोफेसर पिप्पलाद से मिला जाय. सम्भव है कि कुछ प्रश्नों के उत्तर मिल जाएँगे. बबूल के पेड़ को पार कर अपराजिता की झाड़ियों से गुजरते हुए टीले पर रातरानी के महकते पेड़ के पास विराजमान प्रोफेसर पिप्पलाद का दुमंजिला घर, ऊँचाई में आम चार मंजिले घर जितना ऊँचा होगा. घर की छत पर बहुत से एंटीना सरीखे उपकरण दूर से नज़र आते थे. नवाबों के घर की तरह बने पिप्पलाद का घर विश्वविद्यालय समेत स्थानीय सेठ ने दान में दिया था. शायद इसमें सेठ के खास मेहमान आ कर रहा करते होंगे. इस घर में शीशम की लकड़ी से बने महँगे फर्नीचर की  कुर्सियाँ, टेबल, संगमरमर की मेज, दीवारों पर विशाल पेंटिग्स लटकी थीं.

सुबह के आठ बज रहे थे, जब पिप्पलाद उन सभी के प्रश्नों के मुहरबन्द लिफाफे ले कर उनके सामने विराजे. लम्बे टेबल पर दोनों तरफ़ तीन-तीन विद्यार्थी बैठे, कुछ घबराए उन्हें देख रहे थे.





प्रथम प्रश्न: सृष्टि

तब कुछ कम रोशनी में सकुचाए उन सभी छात्रों में सबसे पहले कत्य नाम के विख्यात वैज्ञानिक के पड़पोते कबन्धी ने झिझकते हुए प्रश्न किया,

“सर, यह सारी प्रजा किससे उत्पन्न होती है?”
           
पिप्पलाद की नज़रें कबन्धी पर टिक गयीं. कबन्धी ने खुद ही झिझक पर काबू करते हुए कहा
यह प्रश्न इसलिए पूछ रहा हूँ क्योंकि संसार में सजीव की सृष्टि के लिए कोई सार्वभौमिक नियम होने चाहिए. अगर हम यह कहें कि पशु-पक्षी और मानव जगत की सृष्टि की बात करें, तो यह कह सकते हैं कि सृष्टि के लिए नर-मादा ही कारक होने चाहिए. लेकिन बैक्टेरिया और कुछ पेड़ों के लिए यह लागू नहीं होता. जैसे पपीते के कुछ पेड़ में केवल फूल लगते हैं और कुछ में फल होते हैं. अधिकतर पेड़ों में पराग और फूल दोनों ही होते हैं, जहाँ मधुमक्खियों की सहायता से वे फलते-फूलते हैं. इस तरह हम केवल प्रजा की उत्पत्ति के तरीकों को वर्गीकृत कर सके हैं. यह सारी प्रजा किससे उत्पन्न होती है, यह प्रश्न अभी भी अनुत्तरित हैं.“           

पिप्पलाद ने संक्षेप में कहा
प्रजा उत्पन्न करने की इच्छा वाले प्रजापति ने तप किया. उनके तप से एक जोड़ा उत्पन्न हुआ. रयि और प्राण का यह जोड़ा ही अनेक प्रकार से मेरी प्रजा उत्पन्न करेंगे, प्रजापति ने सोचा.“

रयि का नाम सुनते ही कबन्धी के रोम-रोम सिहर उठे. अचानक उसे याद आ गए साल भर पहले बीते भयंकर गर्मी के वे तपते दिन, जब हॉस्टल में कुछ ही लोग थे. छुट्टियों में अधिकांश छात्र घर जा चुके थे. ऐसी भयंकर गर्मी में कबन्धी कैम्पस से बाहर निकल कर वीराने में भटक रहा था. जलते हुए सूर्य की किरणों से झुलसे हुए जिन जंगली पशुओं की जीभ प्यास से बहुत सूख गयी है, वे धोखे से दूर उन जंगलों की तरफ दौड़ रहे हैं जहाँ नीले आकाश को वे पानी समझ बैठे हैं. धूप से तपा हुआ और गर्म धूल में झुलसा हुआ साँप अपना मुँह नीचे छुपा कर बार-बार फुँफकारता हुआ मोर की छाया में कुंडल मारे बैठा हुआ है, और मोर भी गर्मी के मारे उसे कुछ नहीं कहता. धूप से तपे हुए मेढक, गँदले जल वाले पोखर में से बाहर निकल कर प्यासे साँपों के फन की छतरी में नीचे आ-आकर बैठ रहे हैं. आजकल वन और भी डरावने लगने लगते हैं क्योंकि जंगल की आग की बड़ी-बड़ी लपटों से सब वृक्षों की टहनियाँ झुलस गयीं हैं, सूखे पत्ते आँधियों के साथ ऊपर उड़े जा रहे हैं और सूर्य की गर्मी से चारों ओर जल सूख गया है.
           
उसने सुन रखा था कि कैम्पस के पास वाले जंगल में अन्दर तक धँसने पर दो सौ साल पुराना एक आलीशान बंगला है, जहाँ रवीन्द्रनाथ ठाकुर छुट्टियाँ मनाने के लिए बंगाल से आ कर यहाँ के सेठ के पास बतौर मेहमान रहा करते थे. गर्मी के दिन में शाम के आठ बजे तक भी अंधेरा नहीं हुआ था. ऐसे में कबन्धी भटकते-भटकते उस दो सौ साल पुराने बंगले के पास जा पहुँचा. बंगले के चारो तरफ लोहे की छड़ों से घेरा गया बगीचा भी विशाल था. कबन्धी फाटक खोल कर उस बगीचे में चला आया. अर्जुन, नीम, आम, लीची के पेड़ों से गुजरते हुए उसने करीने से लगे फूलों के पौधे देखे. किसी जानवर की आवाज़ सुन कर वह पलटा और आकाश में सप्तमी का चाँद उगा देखा. चन्द्रमा ने अंधकार दूर करते हुए अचानक चालू हुए फव्वारों को भी रौशन कर दिया. पानी के फुहार से धूल भरी सांध्यबेला मनोहर और रम्य जैसी लगी. उजाड़ वियाबान में यह आलीशान महल और बगीचा, और कहीं दूर से बजते संगीत को सुन कर कबन्धी खिंचा चल गया.
           
महल के पीछे में एक छोटा सा पोखर था, जिसमें अभी भी पानी लबालब भरा था. गुलाबी कमल के फूलों से भरे इस पोखर के पास एक युवती चन्दन का लेप लगाए, कमर पर रेशमी मेखला बाँधे, गले में वैजंयती फूलों की माला पहने वहाँ बैठी अपने लम्बे बालों को गजरे से सँवार रही थी. उसके पाँवों में बंधे नूपुर से उठती हंसों जैसी गूँज, आलते से रंगे लाल तलुवे वाले सावधानी से रखते पाँव, और उसके हिलने से उसके थिरकते स्तनों ने काठ मार गये कबन्धी पर जैसे जादू कर दिया. तभी दूर से एक तीस-बत्तीस साल का आदमी वहाँ आया, जिसे देख कर वह रूपसी मुस्कायी. पसीने से लथपथ हो जाने पर उसने अपने अंगवस्त्र खोल कर गीले सूती कपड़े को अपने स्तनों के ऊपर अच्छे से बाँध लिया.
           
तभी कबन्धी को उसके दोस्त भार्गव का फोन आ गया. कबन्धी ने हड़बड़ा कर फोन उठाया. “कहाँ हो?” इस सवाल पर कबन्धी ने बताया कि उसने अंतत: वह महल ढूँढ निकाला है. भार्गव ने सुन कर आश्चर्य प्रकट किया, “ढूँढ निकाला? अच्छा सुन, वहाँ रयि नाम की बड़ी सुन्दर लड़की रहती है. उसका पति ‘प्राण लाल कुन्दन’ बहुत बड़ा गायक है. वे दोनों बड़े कलाकार हैं, अक्सर टीवी पर आते हैं. लेकिन न जाने क्यों इस वीराने में रहा करते हैं. सुनते हैं यहाँ उनके पुरखों का महल है. तू कब तक आएगा?“ कबन्धी ने ‘आता हूँ’ कह कर फोन काट दिया.  

कबन्धी आम के पेड़ के पीछे छुप कर रयि और प्राण को देखने लगा. वे दोनों किसी गाने का रिहर्सल कर रहे थे. रयि ने अपने सिर पर सात घड़े रखे. अपने नुपुर छनकाती वह दूर जाने लगी. देखते ही देखते प्राण लाल कुन्दन, जैसे बदहवास हो कर बाँहे फैलाए तड़प कर पुकार उठा:

            आधा है चन्द्रमा रात आधी, आधा है चन्द्रमा रात आधी
            रह न जाय तेरी मेरी बात आधी, मुलाकात आधी
            आधा है चन्द्रमा रात आधी
            रह न जाय तेरी मेरी बात आधी, मुलाकात आधी
            आधा है चन्द्रमा...
           
रयि सिर पर घड़े उठाये अपने मेहंदी लगी लाल हथेलियों को दिखा कर नृत्य करती रही.
           
कबन्धी पिप्पलाद की आवाज़ जैसे नीमबेहोशी में सुनता जा रहा था. 
“आदित्य ही प्राण है और रयि ही चन्द्रमा है. जो कुछ मूर्त और अमूर्त है सब रयि ही है....... संवत्सर ही प्रजापति है; दक्षिण और उत्तर उसके दो अयन हैं........ मास ही प्रजापति है. कृष्णपक्ष ही रयि है और शुक्लपक्ष ही प्राण है.... दिन-रात भी प्रजापति हैं. दिन ही प्राण है और रात्रि ही रयि है.....अन्न ही प्रजापति है.... और उससे ही यह सम्पूर्ण प्रजा उत्पन्न होती है.“
           
कबन्धी ने सब सुन कर भी कुछ नहीं सुना, इसलिए उसने कुछ नहीं समझा. बस उसने प्रोफेसर पिप्पलाद की आखिरी बात ध्यान से सुनी- “जो प्रजापति के व्रत का आचरण करते हैं, वे मिथुन को उत्पन्न करते हैं. जिनमें तप, ब्रह्मचर्य और सत्य स्थित है, उन्हीं को यह ब्रह्मलोक मिलता है. जिनमें कुटिलता, झूठ और कपट नहीं होता उन्हें यह विशुद्ध ब्रह्मलोक प्राप्त होता है.“
           
ब्रह्मलोक नाम सुन कर कबन्धी के आँखों के सामने वह रात घूम गयी, जिस गर्मी की ऋतु में कमलों से भरे हुए और खिले हुए पाटल गंधमय जल से स्नान करके निकली अपूर्व सुन्दरी रयि, जिसने मोतियों के हार से लिपटे अपने गोल-गोल स्तन प्राण की छाती पर रखे, वीणा के साथ अपने मीठे गले से गीत गा-गा कर प्राण को जगाये रखा. उस रात कबन्धी हॉस्टल नहीं पहुँच पाया था और बेचैन चाँदनी रात में अवारा भटकता रह गया था. अब भी वह जब गर्मी के बारे में सोचता है, उसे लगता है कि वह जेठ की रात में अपने घर की छत पर चाँदनी में लेटा है, सुन्दरियाँ उसे घेरे बैठी हैं और मनोहर संगीत छिड़ा है. अगर उसे सृष्टि करनी हो तो वह ब्रह्मलोक शायद ऐसा ही रचेगा.


           




द्वितीय प्रश्न: स्थिति


कबन्धी के इस तरह चुप हो जाने पर, विदर्भ के रहने वाले भार्गव ने अपने नाम लिखे लिफाफे को बिना खोले पूछ बैठा,
इस प्रजा को कितने देवता धारण करते हैं? उनमें से कौन-कौन इसे प्रकाशित करते हैं? कौन उनमें सर्वश्रेष्ठ है?”
           
पिप्पलाद ने पहले भार्गव को देखा और फिर शेष छात्रों को. भार्गव ने स्वयं ही अपने प्रश्न को विस्तार दिया,
जैसे कोई प्राणी है, हम इसे ऐसे जानते हैं कि उसका कुछ द्रव्य है, आयतन है, आँख-नाक जैसी इन्द्रियाँ हैं. श्वसन जैसी प्रक्रिया में अग्नि और वायु है. कोई-कोई सजीव चलते हैं. अधिकतर प्राणियों में जल जीवन का आधार है. समझदार प्राणियों में मन है और वाणी है. उसी तरह सजीव को लक्षित करने वाले कौन-कौन से वर्ग हैं और उनमें सबसे प्रमुख कौन हैं?”
           
अपनी शानदार कुर्सी पर बैठे प्रोफेसर पिप्पलाद ने कहना शुरू किया,
सबसे पहला लक्षण तो तुमने कह ही दिया. वह यह कि प्राणी में द्रव्य है जो कि जगह घेरता है, इसलिए आकाश में स्थित है. स्थूल श्रेणियाँ – आकाश, पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु – ये तो हैं ही. इसके अलावा भी इसे मोटे तौर पर समझा जा सकता है – आँखों से देखना, कानों से सुनना, नाक से सूँघना, त्वचा से छूना, जीभ से स्वाद लेना – ये स्थूल तरीके से भौतिक चीजों को जानने के काम आती हैं. इसके अलावा मन है जो इन इन्द्रियों के प्राप्त सूचना को स्मृति की सहायता से चेतना में ज्ञान के रूप में व्यवस्थित करता है. इसके अलावा हाथ से देना, पाँव से चलना, बोलना, उपस्थ और पायु यह भी हैं ही. लेकिन जीवन के लिए सबसे प्रमुख देवता ‘प्राण’ है....“

           
पिप्पलाद की उँगलियाँ हवा में कई नक्शे खींचती जा रहीं थीं कि दुबले पतले भार्गव को स्मरण हो आया बीते साल की बरसात का मेघों से भरा वह दिन – जब वह कबन्धी को जबरदस्ती पकड़ कर रयि और प्राण के बंगले चला गया था, मशहूर टीवी सितारों को पास से देखने के लिए !
           
बहुत मान-मनौवल के बाद यह तय हुआ कि कबन्धी भार्गव को वहाँ ले तो जाएगा, पर कुछ बात नहीं करेगा. भार्गव ही प्राण और रयि से बात छेड़ेगा. भार्गव यह भी नहीं बताएगा कि कबन्धी इस महल में पहले कभी आया भी था. यह सारी शर्तें मंजूर हो गयीं और दुपहर के खाने के बाद कबन्धी के साथ भार्गव जंगल की तरफ निकल पड़ा. रेलगाड़ी की पटरी को पार करते ही सावन के महीने ने अपना रंग दिखाना शुरू कर दिया.
           
मृदंग के समान गड़गड़ाते हुए, बिजली की डोरी वाला इन्द्रधनुष चढ़ाए हुए बादल अपनी तीखी धारों के पैने बाण बरसा कर उनके मन को कसमसा रहे थे. हमेशा मीठी बोली बोलने वाले, गरजते हुए बादलों की शोभा पर रीझ कर मगन हो उठने वाले और अपने पंख खोल कर फैलाने से सुहावने लगने वाले मोरों के झुण्ड, झटपट अपनी प्यारी मोरनियों को गले लगाते हुए और चूमते हुए नाच उठे थे. कदम्ब, सर्ज, अर्जुन और केतकी से भरे हुए जंगल को कँपाता हुआ और उन वृक्षों के फूलों की सुगन्ध में बसा हुआ और चन्द्रमा की किरणों से तथा बादलों से ठंडा हो कर बहने वाला वायु किसे मस्त नहीं कर देता? वन में चारों ओर खिले हुए कदम्ब के फूल ऐसे लग रहे थे  मानों वर्षा के नये जल से गर्मी दूर हो जाने पर जंगल मगन हो उठा हो. पवन से झूमती हुई शाखाओं को देख कर ऐसा लगता है मानों पूरा का पूरा जंगल अपने हाथ मटका-मटका कर नाच रहा हो.
           
मूसलाधार बारिश में अपने रंग-बिरंगी छतरियों को सँभाले जब भार्गव और कबन्धी प्राण लाल कुन्दन के बंगले पर पहुँचे, तब भार्गव ने बगीचे में खिले जूही की नई-नई सफेद कलियाँ, मालती और मौलसिरी के फूलों को देख कर विचारा कि ज़रूर इसकी माला बनायी जाती होगी. हल्के फुहारों के बीच भार्गव और कबन्धी ने महल के दरवाजे पर दस्तक दी. “कौन है”, अन्दर से मधुर नारी स्वर ने दरवाजे के बगल में बने झरोखे से निहार कर पूछा. भार्गव ने जवाब दिया, “यह मशहूर गायक प्राण लाल कुन्दन का घर है न? हम उनसे मिलना चाहते हैं!“

           
वे अभी घर पर नहीं हैं. इस बियाबान में तुम कैसे आए?” झाँकती आँखों ने ठिठक कर सौम्य-सा प्रश्न किया.
           
हम पास के विश्वविद्यालय में पढ़ते हैं. हम सभी जानते हैं कि प्राण लाल कुन्दन और उनकी पत्नी रयि यहाँ रहा करते हैं. आज छुट्टी का दिन था, तो हमने सोचा कि शायद उनसे मुलाकात हो सकेगी.“ भार्गव ने कह कर कबन्धी की ओर देखा. कबन्धी ने भी आँखों-आँखों में हाँ में हाँ मिलायी.

अंदर से दरवाजा खुला. सामने सफेद साड़ी पहने एक पाँच फुट-आठ इंच लम्बी, गोरी और बेहद खूबसूरत औरत खड़ी थी जिसकी उमर सत्ताइस-अट्ठाइस साल की होगी. उसने अपने बड़े-बड़े गोल-गोल उठे हुए सुन्दर स्तनों पर मोतियों की माला पहनी थी और अपने भारी-भारी गोल नितम्बों पर महीन धवल साड़ी पहनी थी. ऐसा लगता था कि वह खुले आँगन से भीग कर दरवाजा खोलने आयी है. उसके पेट पर दिखाई पड़ने वाली सुन्दर तिहरी सिकुड़नो पर वर्षा की फुहार पड़ी थी, जिससे वहाँ के नन्हे-नन्हे रोएँ खड़े हो गए थे.
           
भार्गव एकबारगी सुन्दरी को देख कर भौंचक्का रह गया. उसके होटों से शब्द निकले — “आप तो रयि हैं!“             
रयि ने मुस्कुरा कर कहा, “अन्दर आ जाओ. बारिश हो रही है. प्राण अभी आने वाले हैं.“
           
अपने जूतों को झाड़ कर अन्दर के खुशनुमा सुगंधित कमरे में भार्गव और कबन्धी जैसे ही बैठे, उन्होंने चारों तरफ प्राण लाल कुन्दन की पुरस्कार लेते हुए बड़ी तस्वीरें देखीं. बहुत से पदकों से भरी अलमारियाँ. नृत्य करती रयि की विशाल रंगीन फोटोग्राफ और पेंटिंग. खिलखिलाती रयि की दंत पंक्तियाँ और घुंघराले बाल!  
           
जब रयि गर्म-गर्म कॉफी ले कर लौटी, तब भार्गव ने कहा, “अरे, आपने इतनी तकलीफ क्यों की? वैसे भी हम अजनबी हैं. ये सब....“  
अब मेरे घर आए हो तो अजनबी नहीं रहे न.”  रयि ने हँस कर अपने गीले बाल कानों के पीछे सँवारे. “उफ, आज नौकर भी छुट्टी पर हैं. हम सोचते थे कि इस बियाबान में हमें जानने-पहचानने वाला कोई न होगा. अब लगता है हम गलत थे.“
           
कबन्धी ने कहा, “हमारे हॉस्टल में लगभग सभी जानते हैं कि आप लोग यहाँ छुट्टियों में आया करते हैं. सोशल मीडिया पर लाखों लोग आपको जानते हैं. आप लोग देश के इतने बड़े कलाकार हैं! आप दोनों के बारे में कौन न जानेगा?“
           
रयि सुन कर मुस्कायी. फिर उसने आम सवाल किए. कहाँ के रहने वाले हो? क्या पढ़ते हो?           
भार्गव ने बताते-बताते बात बदली, “एक सवाल था. पूछूँ?”           
रयि ने आँखों-आँखों में कहा कि तुम तो नन्हे बच्चे हो, पूछो क्या पूछना है!           
आप इतना अच्छा नृत्य करती हैं. आपको क्या लगता है कि इसके लिए सबसे महत्त्वपूर्ण क्या है?”        
मैं!” रयि ने कहा और खिलखिला कर हँसने लगी.

           
भार्गव सकपका कर कॉफी का कप सामने मेज पर रखते हुए बोला, “मैं आपको अपना मतलब समझा नहीं पाया.“
           
मैं समझती हूँ. तुमने कभी मधुमक्खी का छत्ता देखा है?” रयि के सवाल पर इस पर कबन्धी ने उत्तर दिया, “हमारे हॉस्टल के बगल में शहतूत के पेड़ पर अक्सर मधुमक्खियों का छत्ता लगा रहता है.“            
अगर मधुमक्खी के छत्ते से रानी मक्खी उड़ जाये तो सारी मधुमक्खियाँ उड़ जाती हैं. “ रयि खोई सी बोली. “मुझे लगता है मेरे नृत्य के लिए सबसे आवश्यक प्राण की उपस्थिति है. उनके रहने से ही मेरी वाणी रहती है, उनके रहने से ही मैं कुछ देख-सुन पाती हूँ. तभी मैं कुछ सोच पाती हूँ. कितनी अजीब बात है कि मेरे प्राण मेरे प्राण में ही रहते हैं.“
           
ऐसे तो आपका कहना हुआ कि प्राण के रहते ही आप नृत्य कर पाती हैं. “ कबन्धी ने बेवकूफों की तरह पूछा, जिस पर भार्गव ने इशारों में उसे लताड़ दिया. उसने फौरन विषय बदलते हुए कहा, “आप प्राण जी का कोई गीत सुनाइए न!”
           
रयि यह सुन कर थोड़ी चौंकी. “क्यों? इंटरनेट पर नहीं सुना?”           
कुछ ऐसा जो आपको पसन्द हो.“ भार्गव ने इसरार किया.           
प्राण दरअसल कुन्दन लाल सहगल के बड़े प्रशंसक हैं. आजकल सहगल साहब को सुनने वाले लोग ही कम बचे हैं.“
           
आप सुनाइए न.“ कबन्धी ने उत्साहित हो कर कहा.           
रयि ने अपने म्यूजिक प्लेयर पर गाना लगाया और साथ ही सुर मिला कर गुनगुनाने लगी:           

           
दो नैना मतवारे तिहारे,     
हम पर जुल्म करे, हम पर जुल्म करे           
नैनों में रहें तो सुध-बुध खोयें          
छिपे तो, छिपे तो चैन हरें  
दो नैना
दो नैना मतवारे तिहारे,     
हम पर जुल्म करे, हम पर जुल्म करे
           
           
भार्गव सोचने लगा कि अगर उसे कभी प्रेम हुआ तो क्या उसकी प्रेयसी की भी ऐसी स्थिति होगी जैसी रयि की है? क्या वह भी उसके लिए ऐसे व्याकुल होगी?
           
जब आधे घंटे तक प्राण नहीं आए तब भार्गव और कबन्धी ने रयि से विदा माँगी. रयि ने उनके साथ फोटो खिंचाने से हँस कर मना कर दिया.
           
वापस हॉस्टल की तरफ लौटते हुए भार्गव ने छतरी बंद कर, पेड़ों के ऊपर, संध्या के आकाश को देखा. कमल के पत्तों के समान साँवले, पानी के भार से झुक जाने के कारण बहुत थोड़ी ऊँचाई पर ही छाए हुए और धीमे-धीमे पवन के सहारे धीरे-धीरे चलने वाले जिन बादलों में इन्द्रधनुष निकल आया है, उन्होंने परदेस में गए हुए लोगों की उन स्त्रियों की सुध-बुध हर ली है जो प्रिय के बिछोह में व्याकुल हुई बैठी हैं.
           
भार्गव ने प्रोफेसर पिप्पलाद की इतनी ही बात सुनी-


“यह सब और स्वर्गलोक में जो कुछ स्थित है वह प्राण के ही अधीन है. जिस प्रकार माता पुत्र की रक्षा करती है उसी प्रकार तू हमारी रक्षा कर और हमें श्री और बुद्धि प्रदान कर.“







तृतीय प्रश्न: संहार


अश्वल सीमेंट के मालिक के बेटे कौसल्य ने, जो कि जैव प्रौद्योगिकी पढ़ रहा था, उस मुहरबंद लिफाफे को खोला जिस पर उसका नाम लिखा था. लिफाफे से पुर्जे को निकाल कर इधर-उधर पलटते हुए उसने बरबस पूछा, “प्राण कहाँ से उत्पन्न होता है? किस प्रकार शरीर में आता है?”
           
इतना पूछते ही कौसल्य को पिछले साल का आश्विन का महीना याद आ गया जब वह सुकेशा के रूम में बैठा बातें कर रहा था. भार्गव और कबन्धी ने रयि के रूप की इतनी तारीफ की थी कि वही सारे लबों की चर्चा का सबब बन गया था. बहुतों ने सोचा कि वे भी रयि और प्राण के महल हो आएँ. कुछ संकोच से, कुछ समय की कमी से यह सम्भव न हुआ. सुकेशा बता रहा था कि एक बार जंगल में खूब भीतर घूम कर हो आया था. सुकेशा की मित्रता हिरण्यनाभ नाम के हमउम्र अमीर लड़के से हो गयी थी. हिरण्यनाभ के पिता का लकड़ियों का कारोबार दूर-दूर तक फैला था. पास के पहाड़ और दूर-दराज के जंगलों की लकड़ियाँ काट कर बेचना उनका पेशा था. हिरण्यनाभ भी जंगलों में, पहाड़ों में, देहातों में बहुत घूमा हुआ था. सुकेशा से मिलने आया हिरण्यनाभ विश्वविद्यालय के लड़कों से दोस्ती करने में अपनी शान समझता था और खुद को बाकी छात्रों में से एक ही मानता था. हिरण्यनाभ ने चेताया था, “जंगल में कैलू यादव नाम के डाकू का आतंक है. उधर जाना खतरनाक है. प्राण और रयि को पिताजी ने मना भी किया, पर फिर भी उनकी बातों को अनसुना कर के वे यहाँ पुरखों के मकान में रहने आ गये.“
           
उस दिन लेकिन अजब ही धूम थी. कौसल्य ने सुकेशा के रूम में बैठे कबन्धी, भार्गव, सत्यकाम, गार्ग्य, सुकेशा और हिरण्यनाभ को बताया कि उसने प्राण लाल कुन्दन को ई-मेल किया था, और आज जवाब आ गया है. कबन्धी ने आश्चर्य से कहा, “सच!” भार्गव ने उसे धता बताते हुए कहा, ”डरपोक कहीं के. तुम तो पहली बार वहाँ जा कर भाग आए.“ सत्यकाम ने कड़े शब्दों में प्रतिवाद किया, “ठीक किया जो चला आया. पहली गलती की कि वहाँ जा कर छुप कर रयि को देखा. वहाँ बात कर के आता तो दूसरी गलती करता.“
           
गार्ग्य ने टोका, “तुम्हारे हिसाब से भार्गव ने भी गलत किया.“
           
एकदम गलत किया. बिना बुलाए किसी के घर चले गए. वो तो रयि जी ने सामाजिक शिष्टाचार में चाय-पानी पूछ लिया. कोई और होता तो भगा देता.“ सत्यकाम ने लताड़ा.
           
गार्ग्य ने देखा कि भार्गव के कान लाल हो गए हैं और वह कुछ क्षोभ में आ गया है. उसने भार्गव का पक्ष लेते हुए कहा, ”भाई, वे बड़े लोग हैं. इतने मशहूर लोग हैं. हम कॉलेज में पढ़ने वाले. ऐसा क्या बुरा कर दिया जो तुम ताना दे रहे हो?”
           
सत्यकाम ने बिदक कर कहा, “मशहूर हैं इसका मतलब यह नहीं है कि वे सब के लिए हमेशा उपलब्ध रहेंगे. तुम हो क्या? ऐसे किसी के घर अकेली औरत से मिलने चले जाओगे?”
           
तुम बात का बतंगड़ बना रहे हो.“  सुकेशा ने बीच-बचाव करने की कोशिश की, “रयि जी एक शादीशुदा औरत और हम बच्चे.“
           
हद है बेहूदगी की. तुमलोग दुनिया-जहान समझते हो कि नहीं?” सत्यकाम आगबबूला हो कर कमरे से तूफान की तरह निकल गया.
           
कौसल्य ने उसके जाते ही ताना मारा, “ये थे हमारे होनहार विचारक! इन्हें चाहिए संन्यास!“ 
           
गार्ग्य ने उबासी लेते हुए कहा, “क्या कहा तुम्हारे ‘प्राण लाल कुन्दन’ ने?”
           
आज शरद पूर्णिमा है. उसने कहा है कि मैं अपने दोस्तों के साथ उनसे मिलने बंगले पर आ सकता हूँ. भाई लोगों, कौन-कौन चलेगा शानदार खाना खाने? अभी ई-मेल का जवाब देना है.” कौसल्य ने मुस्कुरा कर कहा.
           
मैं नहीं जाऊँगा.“ भार्गव मुँह लटकाए हुए बोला. कबन्धी ने भी उसकी तरफ देख कर कहा, “भार्गव नहीं जाएगा तो मैं भी नहीं जाऊँगा.“
           
गार्ग्य ने कहा, “मैं तो ज़रूर जाऊँगा.“ हिरण्यनाभ ने धीमे से कहा, “शरद पूर्णिमा की रात कैलु यादव जंगल में कालीस्थान में पूजा करने पहुँचता है. शायद बलि भी देता है. इस रात तो कभी जंगल में जाना नहीं चाहिए.“
           
सुकेशा ने उसे उकसाया, “तुम्हारे पास तो पिस्तौल भी है. तुम किस बात से डरते हो?”
           
हिरण्यनाभ यह सुन कर अनमना हो गया. “पिताजी की पिस्तौल है अपनी रक्षा करने लिए. उसका लाइसेंस भी नहीं है. तुम क्या सोचते हो कि मैं ऐसे जंगल में कैलु यादव पर फायरिंग कर दूँगा और उसे गोली लग ही जाएगी या बदले में वो हमें नहीं मारेगा. तुम लोग को जाना हो तो जाओ. वैसे भी मैं न तो इस हॉस्टल का हूँ, न ही विश्वविद्यालय का.“
             
सुकेशा ने कहा, “मैं तो आऊँगा और हिरण्यनाभ को ले कर आऊँगा.“ हिरण्यनाभ कमरे से बाहर उठ कर चला गया. उसके पीछे-पीछे आवाज़ लगाते सुकेशा भी बाहर निकल गया.
           
थोड़ी मान-मनौवल के बाद कौसल्य, कबन्धी, भार्गव और गार्ग्य शरद पूर्णिमा की शाम में प्राण और रयि से मिलने को हॉस्टल से निकल पड़े.
           
अन्न भरी बालियों से झुके धान के पौधों को कँपाता हुआ, फूलों से लदे हुए सुन्दर वृक्षों को नचाता हुआ, और खिले हुए कमलों से भरे तालों की कमलनियों को हिलाता हुआ शीतल वायु, युवकों का मन झकझोरे डाल रहा है. आजकल न तो बादलों में इन्द्रधनुष रह गए हैं, न बगुले ही अपने पँख हिला-हिला कर आकाश को पँखा कर रहे हैं, और न मोरों के झुण्ड ही मुँह उठा कर आकाश की और देख रहे हैं. जिन उपवनों में शेफालिका के फूलों की मनभावनी सुगन्ध फैली हुई है, जिनमें निश्चिन्त बैठी हुई चिड़ियों की चहचहाहट चारों ओर गूँज रही है, जिनमें कमल-जैसी आँखों वाली हरिणियाँ जहाँ-तहाँ बैठी पगुरा रही है, उन्हें देख-देख कर लोगों के मन हाथ से निकल-निकल जाते हैं.
           
खिले हुए चन्द्रमा और छिटके हुए तारों से भरा हुआ आजकल का खुला आकाश उन तालाबों के समान दिखाई पड़ रहा है जिनमें नीलम के समान चमकता हुआ जल भरा हुआ हो, जिनमें एक-एक राजहंस बैठा हुआ हो और जिनमें यहाँ-वहाँ बहुत से कुमुद खिले हुए हो. भार्गव ने सोचा, सबकी आँखों को भला लगने वाले जिस चन्द्रमा की किरणें मन को बरबस अपनी ओर खींच लेती हैं, वही सुहावना और ठण्डी फुहार बरसाने वाला चन्द्रमा, उन स्त्रियों के अंग बहुत भूने डाल रहा है जो अपने पतियों के बिछोह के विष बुझे बाणों से घायल हुई घरों मे पड़ी-पड़ी कलप रही हैं.
           
जब फाटक खोल कर चारों विद्यार्थी अन्दर आए, उन्होंने रयि और प्राण को बगीचे में जामुन के पेड़ के पास कुर्सी पर बैठे देखा. पूर्णिमा की किरणें जामुन के पत्तों से छन कर उन पर पड़ रही थीं. प्राण लाल कुन्दन ने हाथ हिला कर पास चले आने का इशारा किया. वे चारों सकुचाए से उन दोनों के पास पहुँचे. कबन्धी ने गौर किया कि रयि की शोभा प्राण के संगति में कुछ और निखर कर आयी हुयी है. अनुपम सुन्दरी कहीं निश्चिन्त, सहज और मोहक लग रही है. बालों में फूल-गजरा और गले में माला, होठों पर गहरी लाली- रयि ने कबन्धी की चोर घबराहट जैसे पकड़ ली और एकदम से हँस पड़ी. कौसल्य ने सब का परिचय दिया फिर हाथ में पकड़ा, रंगीन जिल्द में बन्धा चौकोर फ्रेम उन दोनों की और बढ़ाते हुए बोला, “यह हम लोग की तरफ से आपको उपहार.“ प्राण लाल कुन्दन ने आश्चर्य से पूछा, “क्या है यह?”
           
आप खुद देख लीजिए.“ गार्ग्य ने कहा.

           
रयि ने जिल्द खोल कर देखा- यह प्राण लाल कुन्दन की रंगीन तस्वीर थी. कौसल्य ने शरमा कर बताया, “यह छोटी सी कोशिश आपके लिए.“ रयि ने बहुत प्रशंसा करते हुए कहा, “अरे वाह, यह तो बहुत सुन्दर है.“ फिर प्राण की तरफ देखते हुए बोली, “इसमें आप कुछ ज्यादा दिलकश लग रहे हैं.“ प्राण ने कौसल्य की ओर देख कर पूछा, “आपने बनाया?” भार्गव ने कौसल्य की प्रशंसा में कहा, “यह हमारे बैच का सबसे अच्छा चित्रकार है.“ प्राण लाल कुन्दन ने उठ कर कहा, “आओ, अन्दर से और कुर्सियाँ ले आते हैं. यहीं बाहर बैठते हैं.“
           
जैसे ही प्राण खड़ा हुआ, कौसल्य ने उसकी विशालता का अंदाज लगाया कि ये दुबले पतले श्रीमान छह फीट दो इंच लम्बे हैं. टीवी पर या किसी शो में इनकी खूबसूरती पता नहीं चलती. अगर रयि रति है, तो प्राण कामदेव. चौड़ा सीना, लम्बे हाथ, बलिष्ठ भुजाएँ, सीधा ललाट. एक नज़र किसी को देख ले तो सामने वाला ठिठक जाय. प्राण के साथ सभी कुर्सियाँ ले कर वापस अहाते में आ कर बैठ गए. रयि अन्दर से नमकीन की प्लेट ले कर आयी.
           
इधर-उधर देखते हुए कौसल्य ने बरबस पूछा, “आप कहाँ से आए? यहाँ इस महल में कैसे रहने लगे?”          
यह सुनते ही प्राण ठहाका लगाया. उसने कहा, “मैं आत्मा से आया.“
           
रयि ने प्राण को हँसते देख कर कहा, “यह इनका पुराना मजाक है. इनके पिता का नाम ‘आत्मा लाल’ है. अपने पिता के बहुत दुलारे एकलौते बेटे हैं. मेरे ससुर जी के देहांत के बाद इन्होंने तय किया कि अब यहाँ पैतृक निवास में ही रहेंगे.“
           
दो सौ साल से मेरे पुरखे यहीं रहते आ रहे हैं. मेरे दादा का नाम था – ब्रह्म लाल. उनकी एकमात्र संतान मेरे पिता थे. मेरे दादा जी कुन्दन लाल सहगल के बड़े प्रशंसक थे. न जाने क्या बात थी कि मेरे पिता जी भी दादा जी की तरह ही कुन्दन लाल सहगल के गीतों के दीवाने हुए. इस लिए मेरा उपनाम ‘कुन्दन’ महान गायक कुन्दन लाल सहगल साहेब के नाम पर रखा गया. पिता जी बहुत अच्छा गाते थे. करीब-करीब लगता है मैं भी अपने दिवंगत पिता की तरह ही हो गया हूँ. उनकी एकलौती औलाद. गाने में तो नहीं, बाकी आदतों में.“ प्राण लाल कुन्दन ने कुछ उदासी से कहा, “पिता जी के जाने के बाद मुझे अहसास हुआ कि मैं उनकी छाया से अधिक कुछ नहीं हूँ. जैसे देह के साथ ही छाया होती है, वैसे ही मेरा जीवन उनके जीवन की छाया ही है.“
           
कौसल्य जैसे ही वर्तमान में लौटा, उसने देखा कि पिप्पलाद उसकी ओर देख रहे थे. उसने अपनी झेंप मिटाते हुए कहा
आप जिसे प्राण कहते हैं, जीवन का बल कहते हैं, वह शरीर में कितनी तरह से होता है? और शरीर से कैसे निकलता है? सुनते हैं कि वह दूसरे स्वरूपों को धारण करता है. किस तरह?”
           
यह सुन कर आचार्य पिप्पलाद ने कहा
तुम बड़े कठिन प्रश्न पूछते हो. लेकिन तुम सच में जिज्ञासु हो, इसलिए मैं तुम्हारे प्रश्नों का उत्तर दूँगा.“ पिप्पलाद ने उठ कर कमरे की खिड़की खोल दी. ऊँचे टीले पर जोर से हवा का गर्म, कुछ दर्द देने वाला, तेज़ झोंका अन्दर कमरे में आया. वापस आ कर आचार्य पिप्पलाद ने कहा, “प्राण आत्मा से उत्पन्न होता है. यह मन के संकल्प से शरीर में आता है.“

वे कुछ और भी बोलते रहे, तभी कौसल्य ने खिड़की से बाहर देखा. दूर पेड़ों की झुरमुट में उसने अनुमान लगाया कि वहीं दूर रहा होगा प्राण लाल कुन्दन का आशियाना. क्या कहा था उस दिन प्राण लाल कुन्दन ने?            
           
कौसल्य और भार्गव ने प्राण लाल कुन्दन और रयि से उनके सहगल प्रेम के बारे में कुरेद-कुरेद कर पूछते रहे. कबन्धी ने रयि से पूछा, “आप को सहगल हमेशा से पसन्द थे?” रयि ने कुछ शरमा कर कहा, “नहीं.. मैंने तो रफी साहेब, लता, गीता दत्त, शमशाद बेगम और मुकेश से ज्यादा कुछ सुना ही नहीं था. पहली बार इन्होंने ही मुझे सुनाया था.“
           
गार्ग्य ने पूछा, “कौन सा गाना?”      
सबके जिद करने पर प्राण लाल कुन्दन ने गाना शुरू किया: -

आँखें नींदों के खज़ाने हैं
दो उल्फ़त के पैमाने हैं
आँखें नींदों के खज़ाने हैं
दो उल्फ़त के पैमाने हैं
दिल तेरा शोख जवानी
दिल तेरा शोख जवानी
सपनों की रानी
माथे पे चान्द उतर आये
होंठों पे भँवरा मँडलाये
माथे पे चान्द उतर आये
होंठों पे भँवरा मँडलाये
मुखड़ा फूलों की कहानी
मुखड़ा फूलों की कहानी
सपनों की रानी
           
तभी दूर से गुजरते घोड़े की टाप सुनायी दी. कौसल्य ने कुछ घबड़ा कर कहा, “ऐसे बियाबान में कौन हो सकता है?” प्राण लाल कुन्दन ने शांति से कहा, “मुसाफिर होगा कोई. दुनिया सब की है.“ कबन्धी ने हैरानी से पूछा, “आपको डर नहीं लगता?”          

सारा डर विनाश को ले कर है. मरने को ले कर है. मरना-जीना आदमी के हाथ में नहीं होता.“ प्राण लाल कुन्दन ने कहा, “आदमी के हृदय में आत्मा होती है. उस हृदय में एक सौ एक नाड़ियाँ होती हैं. उनमें से एक-एक की सौ-सौ शाखाएँ हैं और उनमें से प्रत्येक की बहत्तर-बहत्तर हजार प्रतिशाखा नाड़ियाँ हैं. इन सब में एक नाड़ी ऊपर की ओर जाती है. मरने के समय पुण्य कर्म करने वाला इस सुषुम्ना नाड़ी से पुण्यलोक को और पाप कर्म करने वाला पापमय लोक को जाता है तथा पुण्य-पाप दोनों प्रकार के कर्मों द्वारा मनुष्यलोक को प्राप्त करता है.“
           
आपको मरने से डर नहीं लगता?” भार्गव ने पूछा.
           
यह विचारना चाहिए कि कौन मरता है? कौन कहाँ रहता है जो मर सकता है? कभी तुमने उगते सूरज को देखा है? तुम्हें नहीं लगता कि वह भी तुम्हारा प्राण है? वही प्राण नयनों में उदित होता है. एक तरफ सूरज है और दूसरी ओर पृथिवी प्राणों को खींचती हैं. इन दोनों के बीच का आकाश वह क्या है? इनके बीच की वायु — वह सब क्या है?”
           
क्या है?” कबन्धी ने कौतूहल से पूछा.
           
सब प्राण है.“ प्राण लाल कुन्दन ने कहा. रयि ने झिड़कते हुए कहा, “इनकी बहकी-बहकी बातें सुनते रहोगे तो बस सुनते ही रहोगे. आओ, तुम लोग के लिए मैं खाना लगाती हूँ.“ भार्गव और कबन्धी रयि की मदद के लिए पीछे-पीछे किचन में चले गए.
           
कौसल्य ने प्राण लाल कुन्दन से पूछा, “आप लोग नौकर नहीं रखते?”
           
नहीं.“ प्राण लाल कुन्दन ने हँस कर कहा, “भाई, मैं देहाती आदमी हूँ. सारा काम खुद कर लेता हूँ या करना चाहता हूँ. ज़रूरत पड़ी तो खुद को पाँच भाग में बाँट कर काम करता हूँ, पर किसी भी तरह कर लेता हूँ. बागबानी से ले कर सब्जियों की कटाई, घर की सफाई, पेड़ों की कटाई तक. रात-दिन की परवाह नहीं.“
           
गार्ग्य ने बात बदली, “हमने सुना है कि यहाँ निर्जन जंगल में डाकू घूमा करते हैं. आप पत्नी के साथ अकेले रहते हैं. आपको डर नहीं लगता?”
           
ज़रूरत पड़ने पर बन्दूक भी चलायी जाएगी.“ प्राण लाल कुन्दन ने बेपरवाही से कहा, “हमारे पिता जी के जमाने से ही डकैतों की हमसे कभी रंजिश नहीं रही. सोचो, डकैत कौन बनता है? पहला वो जिसके पास खाने-पहनने को कुछ नहीं होता और दूसरा- वह जिसको सीधे रास्ते पर यकीन नहीं रह जाता. होते तो सब इंसान ही हैं. डकैतों को चाहिए – पैसा ! हमारी हवेली से हमेशा उनको कुछ न कुछ मिलता रहता है. डर से नहीं, सद्भावना से. अब प्रशासन भी कुछ चुस्त-दुरुस्त है. उनको भी छुप के रहना होता है. हाँ, किसी से रंजिश हो तो बात और है.“
           
रयि और प्राण ने खूब मेहमाननवाजी की. कबन्धी ने संकोच से कुछ ही खाया. खाने के बाद सारे लड़के प्राण के साथ विशाल बगीचे में आ गए. कौसल्य सोच ही रहा था कि अब वापस लौटने की बात छेड़ी जाय. तभी अंदर से रयि ने आ कर कहा, “आज शरद पूर्णिमा है. मैं छत पर डेकची में खीर-बताशे रख कर आती हूँ. आज रात आकाश से अमृत गिरेगा.“ कबन्धी रयि की मुस्कान और गालों पर पड़ते गड्ढे देख कर कुछ झेंप गया, जिसे रयि भाँप कर मुस्कुरा उठी.
           
प्राण लाल कुन्दन अपनी योजना के बारे में बता रहे थे. रयि के साथ वे नई वेब सीरीज पर काम करना चाहते थे. आज कल थियेटर, सिनेमा हॉल का जमाना लद गया है. इंटरनेट ही भविष्य है. जल्दी ही लोग बेहतरीन की तलाश करेंगे.
           
अभी ऐसी बातें ही चल रही थी कि छत से रयि की डरी हुयी चीखने की आवाज़ आयी. सबने छत की ओर देखा. देखते ही देखते केले के पेड़ पर ऊपर से रयि डरावनी चीख के साथ कटे वृक्ष की तरह गिरती नज़र आयी. पौधौं को कुचलते हुए प्राण और बाकी लड़के उधर बदहवास दौड़े. प्राण जोर से भयभीत हो कर चिल्लाये, “रयि...!“
           
रयि जमीन पर गिरी पड़ी थी. उसका सिर किसी नुकीले पत्थर से टकराया था. सिर से खून बहना शुरू हो चुका था. अभी यह झटका लगा ही था कि तभी वहीं बगल में ही एक और शरीर धम्म से आ गिरा. भार्गव और कबन्धी उधर दौड़े. यह सुकेशा था, जो उनके साथ नहीं आया था. वही नीचे बेहोश गिरा पड़ा था. गार्ग्य झट से अन्दर की तरफ़ दौड़ा. उसके पीछे-पीछे कौसल्य भी छत पर बिना साँस गँवाये दौड़ता हुआ सीढ़ियाँ चढ़ गया. छत पर कोई नहीं था. खीर का बर्तन एक तरफ औंधा पड़ा था और सफेद खीर छत पर बिखर गयी थी.
           
इधर भार्गव और कबन्धी ने फोन करना शुरु किया. पुलिस को सूचना दी. कैम्पस का एम्बुलेंस आने को तैयार नहीं था. नजदीक में और कोई हस्पताल नहीं.
           
प्राण लाल कुन्दन ने रयि के फटे हुए सिर को गोद में ले लिया. गर्म लाल रुधिर से उसका पजामा तर-ब-तर हो गया था. प्राण की आँखों से अनवरत आँसू बह निकलते जा रहे थे. रयि की नब्ज बन्द हो चुकी थी. रयि की खुली आँखें प्राण को एकटक देख रही थी और प्राण उन खुली आँखों को देख रहे थे. प्राण की रुलाई रुक नहीं पा रही थी और कण्ठ से कोई आवाज़ नहीं निकल रही थी.
           
वहीं बगल में बैठ कर भार्गव ने रयि की नब्ज देख कर कबन्धी से कहा, “रयि अब इस दुनिया में नहीं रही.“  
           
प्रोफेसर पिप्पलाद ने कहा
तेज ही उदान है. जिसका तेज शान्त हो जाता है वह मन में लीन हुई इन्द्रियों के सहित पुनर्जन्म को प्राप्त हो जाता है. इसका जैसा संकल्प होता है, उसके सहित यह प्राण को प्राप्त होता है. तथा प्राण तेज से संयुक्त हो आत्मा के सहित संकल्प किये हुए लोक को ले जाता है. जो प्राण को इस तरह जानता है, उसकी प्रजा नष्ट नहीं होती. वह अमर हो जाता है.“
           
कौसल्य ने पिप्पलाद की बातें कुछ सुनी और कुछ नहीं सुनी. उसके कानों में देर तक प्राण लाल कुन्दन का वह गीत गूँजने लगा जब शरद पूर्णिमा की रात को प्राण अपने गोद में रयि के पार्थिव शरीर का सिर लिए उसकी पथरायी आँखों की जड़ हो गयी पलकों को अन्तिम विराम देने के लिए उस पर अपनी हथेली रख कर देर तक गाते रहे:

            सो जा, सो जा
            सो जा राजकुमारी सो जा
            सो जा राजकुमारी सो जा
            सो जा मैं बलिहारी सो जा
            सो जा राजकुमारी सो जा
            सो जा मीठे सपने आयें
            सपनों में पी दरस दिखायें
            सो जा मीठे सपने आयें
            सपनों में पी दरस दिखायें
            उड़ कर रूपनगर में जायें
            उड़ कर रूपनगर में जायें
            रूपनगर की सखियाँ आयें...
            रूपनगर की सखियाँ आयें
            राजाजी माला पहनायें
            चूमे माँग तिहारी सो जा
            सो जा राजकुमारी सो जा






चतुर्थ प्रश्न: तिरोधान

तदनन्तर आचार्य पिप्पलाद से गार्ग्य ने कहा, “मुहरबंद लिफाफे की मुझे कोई ज़रूरत नहीं. मेरे प्रश्न बदल गए हैं.“ पिप्पलाद ने जब गार्ग्य की तरफ पैनी नज़र से देखा, गार्ग्य ने नज़रें नीचे करते हुए पूछा
जब कोई सोता है, उनमें क्या सोता है? कौन जागता है? किस तरह कोई स्वप्न देखता है? किसे स्वप्न के सुख का अनुभव होता है? वे सब कहाँ हैं?”
           
प्रोफेसर पिप्पलाद ने ताम्बे के जग से शीशे के गिलास में पानी उँढेलते हुए कहा
जिस तरह सूरज के अस्त होने पर सम्पूर्ण किरणें उस तेजोमण्डल में ही एकत्रित हो जाती हैं और उसके उदय होने पर वे फिर फैल जाती हैं, उसी तरह सभी इन्द्रियाँ मन में एकीभाव को प्राप्त हो जाती है. तब वह न सुनता है, न देखता है, न सूँघता है, न चखता है, न स्पर्श करता है, न बोलता है, न ग्रहण करता है और न कोई चेष्टा करता है. तब उसे ‘सोता है’ ऐसा कहते हैं.“
           
गार्ग्य ने भी तब खिड़की से बाहर देखा. उसने दूर झुरमुटों में प्राण लाल कुन्दन के महल का अनुमान लगा कर सोचने लगा- यह ज़रूर सपना ही रहा होगा. स्वप्न-सुन्दरी रयि से मिलना और उसी दिन उसकी मृत्यु. बुरा सपना. बहुत बुरा सपना. लेकिन जो प्राण पर गुज़री, वो भी क्या सपना था?
           
पिछले हेमन्त में रयि की मृत्यु या हत्या पूरे विश्वविद्यालय और सारे अखबारों में छाये रहे. रयि की मौत को हत्या मान कर सुकेशा को हिरासत में ले लिया गया. पता चला कि मृत्यु के समय रयि चार महीने की गर्भवती थी. प्राण लाल कुन्दन के बयान पर कबन्धी, भार्गव, गार्ग्य और कौसल्य संदेह से परे थे. विचित्र बात यह हुई कि सुकेशा की कुछ दिनों की स्मृति लोप हो चुकी थी. वह कब कैसे वहाँ पहुँचा यह किसी को नहीं पता.
           
चटखारे ले ले कर इस घटना को मीडिया में प्रचारित किया गया. प्रश्न यह था कि सुकेशा वहाँ क्या कर रहा था? क्या उसने ही रयि को धक्का दे दिया? फिर खुद ही कूद कर स्वयं को निर्दोष साबित करने की जुगत लगायी? क्या विश्वविद्यालय के छात्रों की यह मिलीभगत थी? क्या यह हत्या दुर्घटनावश हुयी? सुकेशा का आखिर इरादा क्या था? चूँकि यह मामला मीडिया में  इतना उछाला गया, पुलिस ने उस समय के कॉल रेकार्ड की तफ्तीश की.
           
दुर्घटना की रात सुकेशा और हिरण्यनाभ के मोबाइल की लोकेशन जंगल जाने तक पायी गयी थी. हिरण्यनाभ ने पूछताछ में इतना ही बताया कि सुकेशा उसे जिद कर के अपने साथ ले जा रहा था पर रास्ते में गेहुँमन साँप दिख जाने के बाद वह सिर पर पाँव रख कर वापस भाग आया. बार-बार पूछने पर भी वह अपने इस  बयान से टस से मस नहीं हुआ —           
वह मनहूस रात थी. मैं जंगल जाने के पक्ष में नहीं था. सुकेशा के बहुत कहने पर मैं जंगल में जाने को तैयार हुआ. रास्ते में ही एक सफेद उल्लू मेरे सिर के पास पँख फैलाए गुजरा. तब से ही मेरी हिम्मत जवाब दे रही थी. थोड़ा और अन्दर जाने पर दूर घोड़े की टाप सुनाई दी. मैं मानता हूँ कि रात में मोबाइल की घंटी से साँप-बिच्छू आदमी के पास जल्दी आते हैं. डर के मारे मैंने अपना मोबाइल फोन बन्द कर दिया. मेरी देखा-देखी सुकेशा ने भी ऐसा ही किया. हम कुछ दूर ही आगे बढ़े थे कि एक लम्बा गेहुँमन साँप आता दिखाई दिया. मैंने सिर पर पाँव रख वापस दौड़ना शुरु किया. सुकेशा भी दौड़ने लगा. उसके बाद जब मैं वापस जंगल से बाहर आया तब मुझे सुकेशा का कोई पता न मिला. लेकिन डर के मारे वापस जंगल जाने की हिम्मत मुझमें नहीं हुयी.“
           
हिरण्यनाभ के बयान से भी कुछ मालूम न हो पाया. मीडिया में यह अनुमान लगाया गया कि सुकेशा उस दिन चुपके से रयि के घर घुस गया और छत पर अकेली रयि को छेड़ने लगा. रयि से हाथापाई हुयी होगी और इसी में रयि छत से गिर गयी. सुकेशा को बचाव का कोई रास्ता न सूझा होगा और वह भी छत से कूद गया होगा.
           
वक़्त के साथ हर ज़ख्म भर जाता है. गार्ग्य इस पूरे घटनाक्रम से, आरोप, प्रत्यारोप, प्राण और रयि के चरित्र विमर्श से बहुत दुखी था. उसने सत्यकाम से कहा कि उन दोनों को प्राण लाल कुन्दन से मिलना चाहिए.
           
हेमन्त ऋतु में शॉल और गर्म चादर ओढ़ कर वे हॉस्टल से जंगल में प्राण लाल कुन्दन के घर की ओर चले. रास्ते में वे सोचते विचारते रहे कि अब हिरण्यनाभ भी लगभग गायब हो गया है. एक अजब-सी उदासी सब को घेर चुकी है. आपस में लोग खुल कर हँसते नहीं. मन ही मन सब खुद को रयि की हत्या का दोषी समझते हैं. हर कोई कहता है इसे सपना समझ कर भूल जाओ, पर क्या भूलना इतना आसान है? सुकेशा ही भाग्यशाली है कि उसकी स्मृति का कुछ हिस्सा पूरा गायब हो गया. उसे प्राण, रयि और उस दिन की कुछ भी याद नहीं. क्या वह झूठ बोल रहा है?
           
प्राण लाल कुन्दन का बाग बेतरतीब सूखे पत्तों से ढँका पड़ा था. बरामदे में धूल ही धूल.
           
गार्ग्य के बहुत बार घंटी बजाने पर अलसाये प्राण लाल कुन्दन ने दरवाजा खोला. दाढ़ी बढ़ी हुयी, बाल बढ़े हुए, आँखें निस्तेज, झुके हुए निढ़ाल कंधे, सूखता शरीर. प्राण लाल कुन्दन के चेहरे पर कोई धिक्कार या क्रोध नज़र नही आया. उसने दोनों को अन्दर आने दिया.
           
जब सारे अन्दर बैठक में कुर्सियों पर बैठे, गार्ग्य की नज़र शराब के गिलास और आधी बोतल पर गयी. प्राण लाल कुन्दन ने गार्ग्य से पूछा, “तुम लोग ठीक तो हो न?”
           
गार्ग्य ने घबरा कर कहा, “हम तो ठीक हैं. आपको क्या हो गया है?”
           
मैं बड़े मज़े में हूँ. आजकल खूब सोता हूँ. यह ठंढ गिराती हुयी हेमन्त ऋतु आ गयी है और अब मेरे पोखर में कमल दिखाई नहीं देते. इन दिनों रयि अपने सीने पर चन्द्रमा के समान उजले और कुङ्कुम के रंग में रंगे हुए मनोहर हार नहीं पहनती. अब न तो वह अपनी दोनों कलाइयों में कंगन ही पहनती हैं, न अपने बदन पर नये रेशमी वस्त्र ही लपेटती हैं और न ही महीन कपड़े ही बाँधती हैं. अब वो अपने कमल-जैसे सुन्दर पैरों में छनकने वाली पायल ही डालती है. लेकिन जानते हो, यह सब सिक्के का एक पहलू है.“
           
और दूसरा पहलू?”
           
दूसरा पहलू बहुत विचित्र है. बहुत दिनों के तड़पने के बाद मैंने एक तरीका पा लिया है रयि से मिलने का.“ भूत की तरह दीख रहे प्राण लाल कुन्दन की हालत से सत्यकाम कुछ डर गया. गार्ग्य ने आँखों में ही उसे शांत रहने का इशारा किया. प्राण लाल कुन्दन अपनी रौ में बोलने लगे, “साँस लेना और छोड़ना एक तरह से आहुति देना है. मन से रयि का ध्यान करने से धीरे-धीरे नींद आ जाती है. और फिर जब स्वप्न शुरू होता है तब मैं जो पहले देख चुका होता हूँ उस देखे हुए को देखता हूँ. सुनी-सुनी बातों को सुनता हूँ और रयि के साथ बिताए हर पल का पुन:-पुन: अनुभव करता हूँ. इतना ही नहीं, हमने जो नहीं देखा, नहीं सुना, नहीं अनुभव किया, वो सब देखते और जीते हैं. वे सारे गीत गाते हैं जो हमें गाने थे. वे सारे नृत्य जो हमें संग करने थे. सब मैं करता हूँ. रयि के तेज से मन आक्रान्त हो जाता है और एक समय ऐसा आता है कि मैं स्वप्न नहीं देखता और उस समय इस शरीर को सुख मिलता है. कभी कभी ऐसा लगता है हम दोनों छोटे बच्चे हो कर पिता जी के शरण में चले गए हैं और उनके घुटनों के पास बैठे हैं. बहुत शांति मिलती हैं.“
           
 गार्ग्य ने हिम्मत कर के कहा, “प्राण जी. हम सब को रयि जी की मृत्यु का  बेहद अफसोस है. लेकिन इस तरह से खुद को शराब में  डुबो लेना ठीक नहीं है. आप गाइए न. लाखों लोग आपके गीत सुनने को बेचैन हैं. आप इस उदासी से बाहर निकलये.“
           
प्राण लाल कुन्दन ने गार्ग्य की बात सुन कर शराब की बोतल से शराब गिलास में उँढेली और एक घूँट में ही गटक लिया. फिर कहा, “तुम मेरा गाना सुनने आये हो. सुनो, मैं तुम्हें गाना सुनाता हूँ:

            पिया बिन नाही आवत चैन
            पिया बिन नाही आवत चैन
            पिया बिन नाही आवत चैन
            का से कहूँ जी के बात
            का से कहूँ जी के बात
            पिया बिन नाही आवत चैन... “
           
प्राण लाल कुन्दन के महल से बाहर आ कर बगीचे से बाहर निकलते ही गार्ग्य ने सत्यकाम से कहा, “कुछ दिनों से मैं एक हिन्दी पुस्तक पढ़ रहा था. उस के एक सौ बारहवें पेज पर मैंने मोरपंख रख छोड़ा है. उस पन्ने पर ग्यारहवीं सदी के भोजदेव के ‘सरस्वतीकण्ठाभरणम्’ से लिया गया प्राकृत भाषा का एक श्लोक उद्धृत है — सुख-दु:ख में प्रगाढ़-प्रेम से समान रूप से विद्यमान रहने वाले जोड़े में से यदि एक मर जाता है तो जो मर गया है वह जीवित रहता है और जीवित रह जाता है वह मर जाता है!”
           
सत्यकाम गार्ग्य की बात सुन कर कट कर रह गया था.
           
           
प्रोफेसर पिप्पलाद ने जो भी कहा, वह गार्ग्य ने नहीं सुना. उनकी बात सुन कर वह सिर झुकाए नीचे कुछ ढूँढता रहा.



पञ्चम प्रश्न: अनुग्रह

दिन चढ़ आया था. इसके बाद सत्यकाम ने निर्भय हो कर गुरु पिप्पलाद से प्रश्न किया
मैंने सुना है अगर कोई प्राणपर्यन्त ओंकार का जाप करता है तो उसे मुक्ति मिलती है. क्या यह सच है? इस तरह ओंकार जाप करने से वह किस लोक को प्राप्त होता है?”
           
पिप्पलाद ने सत्यकाम की तरफ देख कर स्पष्ट कहा
सत्यकाम! यह जो ओंकार है, वह निश्चय ही पर और अपर ब्रह्म है. अत: विद्वान इसी के आश्रय से उनमें से किसी एक को प्राप्त होते हैं.“ 

फिर वह सत्यकाम को देखने लगे. सत्यकाम ने समझा कि वे जानना चाहते हैं या औरों की सुविधा के लिए पूछना चाह रहे हैं कि यह प्रश्न मुझे कैसे सूझा?
           
सत्यकाम को बीती सर्दी याद आ गयी. जब हॉस्टल में जाड़े की छुट्टियों में कोई भी नहीं था. रह-रह कर उसे शराब पीते प्राण लाल कुन्दन का चेहरा याद आता रहा. कभी-कभी सत्यकाम सोचता कि अगर वह भी कौसल्य के साथ उस दिन रयि और प्राण से मिलने डिनर पर जाता तो क्या पता वह इस हादसे को रोक लेता? कभी-कभी सोचता कि यह तक़दीर का लिखा था. जाड़े की शामों को वह लाइब्रेरी में बिताता. सत्यकाम न जाने किस प्रेरणा से सहगल के पुराने गाने सुनता और उसे लगता कि प्राण का दर्द कुछ सहगल की तरह और कुछ उसकी तरह है. कौन सा दर्द? बार-बार म्यूजिक प्लेयर पर यह गाना चलता रहता.

ऐ क़ातिब-ए-तक़दीर मुझे इतना बता दे
ऐ क़ातिब-ए-तक़दीर मुझे इतना बता दे
क्यों मुझसे ख़फ़ा है तू, क्या मैंने किया है?
औरों को ख़ुशी मुझको फ़कत दर्द-ओ-रंज-ओ-ग़म
दुनिया को हँसी और मुझे रोना दिया है
क्या मैंने किया है, क्या मैंने किया है
क्यों मुझसे ख़फ़ा है तू, क्या मैंने किया है?
हिस्से में सबके आई हैं रँगीन बहारें
बदबख़्तियाँ लेकिन मुझे शीशे में उतारें
पीते हैं लोग रोज़-ओ-शब मसर्रतों की मय
मैं हूँ के सदा ख़ून-ए-जिगर मैंने पिया है
क्या मैंने किया है, क्या मैंने किया है
           
सत्यकाम ने विचारा कि यह कितनी साधारण सी बात है कि कुछ घड़ियाँ ऐसी आती हैं जिसमें आदमी कुछ नहीं कर सकता. इसके लिए वह तक़दीर को कोसे, या दीवारों से सिर मारे, या दुनिया में आग लगा दे. कुछ चीजें मन-मुताबिक नहीं हो सकती. इंसान कई बार बेबस हो जाता है और उस समय उसको इंतज़ार होता है किसी के जादू का, किसी दिव्य शक्ति के अनुग्रह का, किसी चमत्कार का. क्या प्राण के किस्मत में भी ऐसा कोई जादू लिखा है?
           
पुस्तकालय में बैठे-बैठे उसने कालिदास की ऋतुसंहार उठा कर पढ़ना शुरु किया. शिशिर के विषय में महाकवि ने लिखा था —
“इन दिनों घने पाले से कड़कड़ाते जाड़ों वाली, चन्द्रमा की किरणों से और भी ठंढी बनी हुई और पीले-पीले तारों वाली रातों में कोई भी बाहर नहीं निकलता था. फूलों के आसव पीने से जिनका कमल जैसा मुँह सुगन्धित हो गया है वे स्त्रियाँ पान खा कर, फुलेल लगा कर और मालाएँ पहन कर, काले अगर के धुएँ से महकने वाले अपने शयन-घरों में बड़े चाव से चली जा रही हैं. अपने मोटे नितम्बों के बोझ से दुखी ओर अपने स्तनों के बोझ से झुकी हुई कमर वाली और थकने के कारण बहुत धीरे-धीरे चलने वाली बहुत सी स्त्रियाँ रात के कपड़े उतार कर दिन में पहनने वाले कपड़े पहन रही हैं.“
           
रयि थी कालिदास की नायिका.‘ सत्यकाम ने सोचा. इसके बाद कोने की अंधेरी अलमारी में से तन्त्र की एक बहुत पुरानी पुस्तक ‘कौल ज्ञान निर्णय’ ढूँढ़ निकाली और पलटने लगा. किताब के कुछ पन्ने पलटने के बाद उसने तय किया वह अकेला ही ‘प्राण लाल कुन्दन’ से मिलने जाएगा.
           
शाम में सुनसान मेस में किसी तरह खाना निगल लेने के बाद सत्यकाम स्वेटर पहन कर, मफलर ओढ़ कर कैम्पस से बाहर निकल गया. शाम में धुँध थी. सभी अपने घरों के भीतर खिड़कियाँ बन्द कर के, आग ताप कर, धूप खा कर, मोटे-मोटे कपड़े पहन कर बैठे थे. सत्यकाम ने सोचा कि इन दिनों किसी को चन्द्रमा की किरणों से ठंढाया हुआ चन्दन ही अच्छा लगता है न ही शरद के चन्द्रमा के समान निर्मल छतें सुहाती है, न घनी ओस ठंढा बना हुआ वायु ही मन को भाता है. सत्यकाम को आश्चर्य था कि उसे जंगल में साँप-नेवला क्यों नहीं दिखते? वह शीशम, सागवान, नीम, आम — सारे पेड़ों से बेधड़क गुज़रता गया.
           
सर्दी की रात धुँध में प्राण लाल कुन्दन का महल भुतहा लग रहा था. बगीचे की दुर्दशा हो चुकी थी. पेड़ों पर जंगली लताएँ चढ़ चुकी थी.  बेरंग हो चुका फाटक आधा खुला पड़ा था. महल की बत्तियाँ बुझी थी. एक बारगी सत्यकाम को शुबहा हुआ कि वहाँ अब कोई नहीं रहता. फिर भी वहाँ तक पहुँचा जा चुका है तो कोशिश करनी चाहिए.
           
सत्यकाम ने महल की घंटी बजायी पर कोई आवाज़ न हुयी, मानों घर में बिजली न हो. दरवाजे पर दस्तक देने पर भी कोई सुनने वाला नहीं. सत्यकाम ने दो-तीन बार जोर से दरवाज़ा खटखटाया और चिल्लाया, “सुनिए. कोई है?”
           
अंदर से किसी की आहट आयी. दरवाज़ा खुला. लालटेन लिए ऊनी चादर ओढ़े प्राण लाल कुन्दन ने दरवाजा खोला. प्राण लाल कुन्दन की हालत पहले से भी बुरी हो गयी थी. दाढ़ी बहुत बढ़ी और बाल रूखे बेजान. सोयी-सोयी आँखों के नीचे काले गड्ढे. कुछ खाँसते हुए प्राण लाल कुन्दन ने पूछा, “कौन हो? क्या चाहिए?”
           
मैं सत्यकाम हूँ. विश्वविद्यालय से आया हूँ. मैं कौसल्य और भार्गव का दोस्त हूँ.“
           
यह सुन कर प्राण लाल कुन्दन लालटेन लिए हुए चुपचाप अन्दर चला गया. सत्यकाम को समझ नहीं आया कि वह घर में अन्दर जाय या वहीं खड़ा रहे. क्या पता प्राण लाल कुन्दन उसके दोस्तों को ही रयि की मौत का जिम्मेदार मानता हो?
           
बैठक में लालटेन रख कर प्राण लाल कुन्दन ने मरी-मरी आवाज़ लगायी, “अन्दर आ जाओ. बाहर बहुत सर्दी है.“
           
सत्यकाम चुपचाप अन्दर आ कर सोफे पर बैठ गया. प्राण लाल कुन्दन ने कुछ भी न कहा. दो मिनट के मौन के बाद सत्यकाम ने हिम्मत जुटा कर कहा, “मैंने एक किताब पढ़ी है. आप को इस दुख से निकालने का यह तरीका है.“ कह कर सत्यकाम ने अपने पतलून की जेब से एक कागज निकाला. प्राण लाल कुन्दन ने सत्यकाम को घूरा पर कुछ न कहा. सत्यकाम ने संजीदगी से कहा, “यह तांत्रिक अनुष्ठान है. आप इसे नहा-धो कर करेंगे तो आपको इस दु:ख से मुक्ति मिल जाएगी.“
           
प्राण लाल कुन्दन चुपचाप सुनते रहे. सत्यकाम बोलता रहा —

 “....आप इस विधि से पूजा करके ॐ का जाप करेंगे तो आप इस दुख के सागर से वैसे ही निकल आएँगे जैसे साँप केंचुली से निकल आता है.“
           
यह सुन कर जब प्राण लाल कुन्दन ने कुछ न कहा तब सत्यकाम को लगा कि वह बेहद मूर्ख है, जो यहाँ आया है. फिर भी भूले से आ गया है तो अब फौरन वापस लौटना चाहिए. उसने कहा, “बस इतना ही कहना था. अब मैं चलूँगा.“
           
प्राण लाल कुन्दन ने चुप्पी तोड़ी, “अच्छा हुआ, तुम आ गए.“  सत्यकाम ने इसके बाद बेहद लम्बी चुप्पी के जवाब में ‘जी’ कहा. प्राण लाल कुन्दन ने कहा, “मेरे पुरखों ने विश्वविद्यालय को जमीन दान में दी. आचार्य पिप्पलाद ऊँचे टीले पर बने जिस बंगले में रहते हैं वहाँ मेरे दादा जी सर्दियों में रहा करते थे. मेरे बाद मेरा वंश खत्म हो जाएगा. अब.... मैंने यह महल और यह सारा जंगल भी विश्वविद्यालय के नाम लिख दिया है.“
           
आप कहीं जा रहे हैं?” सत्यकाम ने घबरा कर पूछा.
           
प्राण लाल कुन्दन ने कुछ हँस कर कहा, “ॐ  का जाप करूँगा तो मनुष्यलोक, सोमलोक या ब्रह्मलोक – कहीं न कहीं तो पहुँच जाऊँगा.“ सत्यकाम ने झिझकते हुए कहा,”मैंने हाल में कुन्दन लाल सहगल के बहुत से गीत सुने. क्या आप मुझे एक गीत सुनाएँगे?”
           
रयि के जाने के बाद अब गाने का दिल नहीं करता. “ प्राण लाल कुन्दन की दुख भरी आवाज़ सुन कर सत्यकाम को अपने आग्रह पर बहुत खेद हुआ. उसने सोचा था कि इस तरह कहने से प्राण लाल कुन्दन अवसाद से बाहर आएँगे. सत्यकाम उठ कर जाने को हुआ, तब प्राण लाल कुन्दन ने उसे ठहरने का इशारा किया.
           
उस सर्दी की रात में प्राण लाल कुन्दन ने सत्यकाम को लालटेन की रोशनी में हारमोनियम बजाते हुए गाना गा कर सुनाया:

चहुँ ओर मेरे घोर अँधेरा
भूल न जाऊँ द्वार तेरा
चहुँ ओर मेरे घोर अँधेरा
भूल न जाऊँ द्वार तेरा
एक बार प्रभु हाथ पकड़ लो
एक बार प्रभु हाथ पकड़ लो
एक बार प्रभु हाथ पकड़ लो
मन का दीप जलाऊँ मैं
प्रभु, नैनहीन को राह दिखा प्रभु ...
           
उस दिन के बाद प्राण लाल कुन्दन को किसी ने नहीं देखा. कोई कहता है कि वे संत हो गए और रेलगाड़ी पकड़ कर हरिद्वार चले गए. कुछ का कहना था कि वे वृंदावन के किसी आश्रम में भिखारी की तरह रह रहे हैं. कुछ का यह मानना था कि उन्होंने नदी में जल समाधि ले ली. लेकिन इतनी बात निश्चित तौर पर सच थी कि उस दिन के बाद प्राण लाल कुन्दन का महल खाली पाया गाया. प्राण लाल कुन्दन के लापता होने की खबर के साथ सत्यकाम चर्चा में आया जिसने उसे आखिरी बार देखा था. इस तरह विश्वविद्यालय के लड़के और रयि की मृत्यु की घटना एक बार फिर सुर्खियों में आ गयी.
           
प्रोफेसर पिप्पलाद ने अपनी बात पूरी की — “तथा उस ओंकार रूप आलम्बन के द्वारा ही विद्वान उस लोक को प्राप्त होता है जो शान्त, अजर, अमर, अभय एवं सबसे श्रेष्ठ है.



षष्ठ प्रश्न: प्रत्यभिज्ञा

अंत में सुकेशा ने अपनी मुहरबंद लिफाफे को बिना खोले दो टुकड़े कर के पूछा
वह कौन है जिसने रयि की हत्या की?” 

यह प्रश्न पूछते ही सभी को मानों साँप सूँघ गया. अभी तक जो सबके मन में था पर जुबान पर नहीं, वह सुकेशा ने बेधड़क पूछ लिया. यह केवल विचार-विमर्श नहीं था, यह था एक अनसुलझे घटनाक्रम का हल!
           
आचार्य पिप्पलाद ने सुकेशा की ओर अपनी पैनी नज़र से देखा. सुकेशा ने बिना डरे कहा, “हिरण्यनाभ जो मेरा दोस्त है, जो यहीं विश्वविद्यालय के बाहर रहता है उसने मुझसे आ कर यह प्रश्न पूछा था. क्या तुम उसको जानते हो जिसने रयि की हत्या की? जिसने भी रयि को मारा, वह बहुत सी कलाओं में निपुण होगा. तभी तो पकड़ा नहीं गया.” तब मैंने उससे यही कहा — ‘मैं इसे नहीं जानता. यदि जानता होता तो तुम्हें क्यों न बतलाता? जो झूठ बोलता है वह सब ओर से मूलसहित सूख जाता है, अत: मैं झूठ नहीं बोलता.‘ तब वह यह सुन कर चुपचाप वापस चला गया. अब मैं आपसे उस विषय में पूछता हूँ, वह कौन है और कहाँ है?”
           
आचार्य पिप्पलाद ने कहा, “इससे पहले तो हमें यह जानना चाहिए कि इस प्रश्न की पृष्ठभूमि क्या है?”
           
कुम्हलाये चेहरे वाले सुकेशा ने कलप कर कहा, “यह बड़े विषाद का विषय है. रयि की मौत के दिन मैं वहाँ कैसे पहुँचा, मुझे सच में याद नहीं. मेरी स्मृति कैसे लोप हो गयी, यह मेरे लिए बड़े शर्म और क्षोभ का विषय है. इसके कारण मुझे बहुत बदनामी उठानी पड़ी है. पुलिसिया कार्यवाही में मेरा एक साल बरबाद हो चुका है. मैं फिर से चौथे साल को पढूँगा. उससे भी अधिक शर्म की बात यह है कि मैं भी खुद को रयि की मौत का कारण समझता हूँ. अगर ऐसा है तो मुझे जेल में होना चाहिए. और ऐसा नहीं है तो मुझ पर लगा यह कलंक हट जाना चाहिए. पुलिस के रेकार्ड के अनुसार हिरण्यनाभ भी उस रात मेरे साथ जंगल में था. लेकिन साँप से डर कर वह वापस आ गया और मैं रयि के महल में कैसे पहुँच गया? मुझे कुछ भी क्यों नहीं याद?”
           
प्रोफेसर पिप्पलाद अपनी कुर्सी से उठ कर चहलकदमी करने लगे. उन्होने कहा, “धीरज रखो. इसका भी कोई न कोई उपाय होगा. यह बताओ कि हिरण्यनाभ से तुम्हारी आखिरी मुलाकात कब हुयी?“
           
सुकेशा के चेहरे पर पसीना आने लगा. “कुछ महीने पहले वसन्त ऋतु में. पुलिस को बयान देने के बाद वह सर्दियों में बाहर चला गया था. वापस आ कर उसने मुझसे कई बार पूछा कि रयि का कातिल कौन है. मैं क्या जवाब देता? उसी संध्या घूमने के बहाने हम दोनों कैम्पस से बाहर गये थे. चलते चलते हम प्राण लाल कुन्दन के महल की ओर निकल पड़े. वसन्त के दिनों में पवन के झोंके से हिलती हुई पलाश के वृक्षों की फूली हुई शाखाएँ जलती हुयी आग के लपटों के समान दिखाई देती हैं. ऐसे पलाश के जंगलों से ढकी हुई पृथ्वी ऐसी लग रही थी मानो लाल साड़ी पहने कोई नयी दुलहिन हो. मंजरियों से लदी आम की डालों को हिलाने वाला और कोयल के संदेशों को चारों और फैलाने वाला सुन्दर वसन्ती पवन लोगों का मन हरता हुआ बह रहा है. मैं भी मन ही मन सोच रहा था कि शायद मुझे भी कुछ याद आ जाय.“
           
कहते-कहते सुकेशा अचानक चुप हो गया. कौसल्य ने उसे टोका, “फिर क्या हुआ? यह तुमने हमें क्यों नहीं बताया?”
           
सुकेशा ने कौसल्य को अनसुना कर दिया. उसने कहा, “जंगल में एक जगह पहुँच कर मुझे बड़ी तेज़ सी गंध आयी. मैंने देखा हिरण्यनाभ वहीं रुक कर एक पौधे को उखाड़ रहा था. उसकी गंध से ही मेरे सिर में भारी दर्द होने लगा. हिरण्यनाभ ने मेरी हालात देखी और वह चिन्तित हो कर पूछने लगा – ‘तुम्हें क्या हुआ.‘ अचानक मेरे आँखों के आगे अंधेरा छाने लगा. हिरण्यनाभ की आवाज़ गूँजने लगी — ‘तुमने ही रयि को मारा है.‘ मैं बदहवासी से चीखने लगा – ‘नहीं, नहीं. मैं खूनी नहीं हूँ.‘ इतना कह कर मैं बेहोश हो कर वहीं गिर गया. उसके बाद हिरण्यनाभ कभी न मिला. वहीं जंगल  में जब कुछ देर बाद मुझे होश आया तो मैंने उस पौधे को अपनी जेब में रख लिया और वापस आ गया.“
           
क्या वह पौधा तुम्हारे पास है?” आचार्य पिप्पलाद ने पूछा. सुकेशा ने चुपचाप अपनी जेब से वह सूखा पौधा निकाल कर मेज पर रख दिया. पिप्पलाद ने उस पौधे को देख कर कहा, “अच्छा. तो इसकी जड़ ही तुम्हारे सवाल की जड़ है.”
           
कबन्धी और भार्गव ने चौंक कर एक साथ पूछा, “इसका मतलब?”
           
यह हत्थाजोड़ी का पौधा है. यह एक विशेष प्रकार का पौधा है. इसकी जड़ आदमी के हाथ के जैसी होती है इसीलिए इसे हत्था जोड़ी कहते हैं. इसके सिर पर पंजा जैसा बनता है. दरअसल, वह पंजा ऐसा लगता है जैसे कोई मुट्ठी बांधे हो. यह पौधा यहाँ के जंगलों मे ही मिलता है. इसमें यह औषधीय गुण है कि इसे कोई स्वस्थ आदमी खा ले तो उसकी तात्कालिक स्मृति लोप हो जाती है.“ आचार्य पिप्पलाद ने बताया.
           
आपके कहने का अर्थ हुआ कि हिरण्यगर्भ ने पूरा सच नहीं कहा है.“ गार्ग्य ने उत्तेजित हो कर कहा.
           
हम अभी नहीं कह सकते.“ आचार्य पिप्पलाद ने कहा.
           
फिर हमें क्या करना चाहिए?” कौसल्य ने पूछा.
           
पहले तो इसकी प्रतिऔषधि ढूँढनी पड़ेगी.“ आचार्य पिप्पलाद ने कहा, “उसके बाद इसकी स्मृति वापस लानी पड़ेगी. सुकेशा ही पूरी तरह सच जानता है और वही बता सकता है.“
           
फिर?” सत्यकाम ने अधीरता से पूछा.
           
तुम लोग खाना बनाना जानते हो तो खाना बना कर खा लो. मुझे थोड़ा समय चाहिए. आज शाम तक इसका निदान मिल जाना चाहिए.“
           
आचार्य पिप्पलाद की बात मान कर सभी भोजन करने के बाद वहीं उनकी प्रतीक्षा करते रहे. दुपहर के बाद आचार्य पिप्पलाद ने छात्रों को बुला कर अपने साथ टीले पर एक जड़ी-बूटी ढूँढने लगे.
           
विष्णुकांता नाम के पौधे की पत्तियां पीस कर खाने से खोई याददाश्त वापस आ जाती है. शायद सुकेशा की भी याद वापस आ जाए.“ पिप्पलाद ने संक्षेप में विष्णुकांता पौधे के लक्षण बताये और इंटरनेट से ली गयी उसकी तस्वीर दिखाई. सभी भरी गर्मी में उस पौधे को ढूँढने लगे. दो घंटे की खोज के बाद आचार्य पिप्पलाद ने टीले के ढ़लान पर विष्णुकान्ता के पौधे को ढूँढ कर सबको दिखाया.
           
विष्णुकान्ता पौधे की पत्तियाँ तोड़ कर ओखली में पीस कर उसमें शहद और कुछ भस्म मिला कर आचार्य ने सुकेशा को औषधि चटायी. इसके बाद सुकेशा को नींद आ गयी. वह सोफे पर लेट गया.
           
रात घिर आयी. सभी छात्र बेसब्री से सुकेशा के होश में आने की प्रतीक्षा कर रहे थे. इधर आचार्य ने अपने घर में गुग्गुल और धूमने से धुआँ कर दिया. काले अगर की खुशबू से पूरा घर भर गया.
           
आचार्य पिप्पलाद ने एक विशेष मुहूर्त में सुकेशा के गाल थपथपाए और पूछा, “बताओ सुकेशा. हिरण्यनाभ से कब मिलना हुआ.“
           
वसन्त में.“ सुकेशा की उनींदी आवाज़ आयी.
             
क्या देख रहे हो तुम?”
           
वसन्त के आते ही सब वृक्ष फूलों से लद गए हैं, जल में कमल खिल गए हैं, स्त्रियाँ मतवाली हो गई  हैं, वायु में सुगन्ध आने लगी है, साँझे सुहावनी हो चली है और दिन लुभावने हो गए हैं. लाल-लाल कोपलों के गुच्छे से झुके हुए और सुन्दर मंजरियों से लदी हुई शाखाओं वाले आम के पेड़ पवन के झोंकों से हिलने लगे हैं. अशोक के वृक्षों में कोंपलें फूट निकली हैं और जिनमें मूँगे जैसे लाल-लाल फूल नीचे से ऊपर तक खिल आए हैं. मैं जंगल में चलता जा रहा हूँ.“
           
याद करो उससे पहले तुम हिरण्यनाभ से कब मिले थे?” आचार्य पिप्पलाद ने पूछा.
           
मुझे याद नहीं आ रहा है.“ सुकेशा ने कहा.
           
तुम तो सोलह कलाओं वाले पुरुष हो. जैसे समुद्र की और बहती हुई ये नदियाँ समुद्र में पहुँच कर अस्त हो जाती हैं, उनके नाम-रूप नष्ट हो जाते हैं और वह ‘समुद्र’ नाम से पुकारी जाती हैं. उसी तरह सारी कलाएँ तुम में हैं. रथ के पहिये की नाभि में सारे अरे सहारा पाते हैं, उसी तरह तुम उस खुद को जानो.“ कहकर आचार्य पिप्पलाद ने सुकेशा के सिर पर हाथ रख दिया.
           
मैं खूनी नहीं हूँ.“ सहसा सुकेशा जोर से चीख उठा. आचार्य ने उसका मस्तक दबाए रखा. किसी पीड़ा से सुकेशा छटपटा उठा. सभी उसकी तरफ ध्यान लगाए देखते रहे. “मुझे सब याद आ गया. याद आ गया. मैं निर्दोष हूँ.“ सुकेशा बड़बड़ाया और उसकी नयनों से गरम आँसू छलक पड़े. इसके बाद वह फिर बेहोश हो गया. आचार्य पिप्पलाद ने कहा, “एक घंटे में होश में आ जाएगा. हम प्रतीक्षा करते हैं.“
           
इतना सुन कर कौसल्य और सत्यकाम ने राहत की साँस ली. सत्यकाम ने म्यूजिक प्लेयर पर प्राण लाल कुन्दन की आवाज़ में गाना चलाया, और अपने दोस्तों को सुनाने लगा. उसकी तान से मानो सारा टीला गूँज उठा:

मन पूछ रहा है अब मुझसे
नैनों ने कहा है क्या तुझसे
मन पूछ रहा है अब मुझसे
नैनों ने कहा है क्या तुझसे
जब नैन मिले नैनों ने कहा
नैनों ने कहा
जब नैन मिले नैनों ने कहा
अब नैन बसेंगे नैनों में
मैं क्या जानूँ क्या जादू है, जादू है, जादू है
इन दो मतवारे नैनों में
जादू है, जादू है, जादू है,
मैं क्या जानूँ क्या जादू है...
           
रात के नौ बजे सुकेशा सोफे पर एकबारगी उठ बैठा. उसे जागा देख कर सभी उसे घेर कर बैठ गए. आचार्य पिप्पलाद बीच में बैठे उसे सुनने लगे. पसीने से लथपथ सुकेशा ने एकदम से कहना शुरू किया, “उस दिन मैंने हिरण्यनाभ को रयि और प्राण से मिलने को राजी किया. न जाने वो क्यों बहुत डर रहा था. जब तक हम जंगल में पहुँचे, मैं समझता हूँ कि सारे बहुत पहले पहुँच चुके होंगे. अब मुझे भी शर्म आ रही थी कि ऐसे में फिर जा कर क्या मिलना? वह बहुत सुन्दर पूर्णिमा की रात थी. जंगल में ऐसे भी घूमना बुरा नहीं था. मैंने हिरण्यनाभ को समझाया कि चल कर देखते हैं. क्या पता वे अभी पहुँचे ही हों. हमें फोन कर के पूछना चाहिए. तभी रेलगाड़ी की पटरी पर एक मालगाड़ी सीटी बजाती जंगल से गुजरी. देखते ही देखते हमारे सामने उसी मालगाड़ी के खाली, बिना दीवारों वाले डिब्बे से उस पर सवार एक सफेद घोड़ा कूदा. अभी मैंने फोन निकाला ही था कि घोडे की टाप हमारी तरफ़ ही आती सुनाई दी. हिरण्यनाभ ने डर के मारे मेरा हाथ थामा और हम दोनों जल्दी से एक बहुत पुराने मोटे बरगद के पेड़ के पीछे छिप गये. मैं समझ ही नहीं पाया कि क्या हुआ. हिरण्यनाभ ने मुझे मोबाइल बंद करने को कहा. खतरा समझ कर मैंने भी मोबाइल बन्द कर दिया. तभी मैंने देखा कि पूर्णिमा की चाँदनी में सफेद घोड़े पर काली कमीज, काली पगड़ी, सफेद धोती पहना, माथे पर लाल तिलक लगाए एक घनी मूँछों वाला भयानक शख्स कंधे पर लम्बी राइफल टाँगे गुज़र रहा है.
           
मैंने हिरण्यनाभ से पूछा - ‘कौन है ये?’ हिरण्यनाभ ने बताया कि यह कैलु यादव नाम का खूँखार डकैत है जो उसके पिता और उसके खून का प्यासा है. रंगदारी वसूलने वह कई बार उसके दूकान पर आ चुका है. वह उसे पहचानता है. मौका मिला तो बिना प्राण लिये वह न छोड़ेगा. क्योंकि एक बार पिताजी ने उसे जेल भिजवा दिया था. तब से वह मौके की फिराक में है. इसलिए हिरण्यनाभ यहाँ आने से डर रहा था.
           
हमारा दुर्भाग्य यह था कि कैलु यादव ने इसी पेड़ के पास घोड़ा रोका और पेशाब करने एक तरफ चला गया. हम दोनों वहाँ दम साधे छुपे खड़े थे. हिरण्यनाभ ने मुझे इशारे से जमीन की ओर दिखा कर कहा - ‘वह देखो. वह है हत्थाजोड़ी का पौधा.‘ उसने नज़र बचा कर उस पौधे को उखाड़ा. फिर मुझे जड़ समेत पौधे को पकड़ा कर बोला, ‘कहते हैं इससे बुरी बला दूर हो जाती है. इसकी पत्तियों का रस किसी की आँखों में मल दिया जाय तो वह अंधा हो जाता है.‘
           
मैंने वह पौधा अपनी शर्ट की जेब में रख लिया. हिरण्यनाभ और मैं कैलु यादव के जाने का इंतजार करने लगे. थोड़ी देर बाद वह घोड़े पर चढ़ कर आगे चला गया. हम दोनों काफी डर चुके थे. रयि और प्राण के घर जाने का खयाल हम भूल चुके थे. अब यह जुगत थी कि कैसे वापस हॉस्टल पहुँचा जाय? मैं भी घबरा चुका था. मैंने अपने पैंट के पॉकेट में पत्थर भर लिए. हम दोनों वापस जाने को निकले.
           
अभी कुछ दूर ही वापस गये होंगे कि घोड़े की टाप वापस आती सुनाई दी. हम दोनों बदहवास दौड़ने लगे. कैलु यादव ने शायद दूर से यह देख लिया. वह तेजी से घोड़ा दौड़ाने लगा और देखते ही देखते हमारे ठीक सामने आ कर ऐड़ लगा कर घोड़ा रोका. “कौन हो तुम दोनों?” उसने गरज कर पूछा.
           
मुझे लगा कि वह अभी चाँदनी में हिरण्यनाभ को नहीं पहचान पाया है. मैंने सोचा कि अगर इससे दुश्मनी मोल लूँ तो कम से कम यह हिरण्यनाभ को जान से नहीं मारेगा. मैं चिल्लाया –‘तेरी मौत.‘ कह कर मैंने बड़ी फुर्ती से जेब में रखा पत्थर उसकी आँखों की तरफ लक्ष्य कर के मारा. पत्थर शायद निशाने पर लगा. वह हड़बड़ा कर घोड़े से गिर पड़ा. यह देखते ही हिरण्यनाभ बड़ी तेजी से भागा और मैं दूसरी तरफ. जब तक वह सँभलता, मैं वापस जंगल में दूर और बड़ी दूर भागता गया. देखते ही देखते मैं भी प्राण लाल कुन्दन के घर के करीब पहुँच गया. वहाँ पहुँच कर मैंने राहत की साँस ली ही थी कि मैंने फिर सफेद घोड़े पर काल के समान कैलु यादव को अपनी तरफ आते देखा.
           
डर के मारे मैं फौरन प्राण के महल में पीछे की तरफ से, पोखर वाली तरफ से, अन्दर घुस गया. घर का पिछला दरवाजा खुला था. डर के मारे मैं फौरन सीढ़ियाँ चढ़ गया. और छत पर जा कर एक कोने में छुप गया. मैंने नीचे देखा कि उस समय प्राण लाल कुन्दन बाकियों के साथ बगीचे में बातें कर रहे थे. मैंने सोचा कि अब मैं नीचे जा कर सब से मिल लूँ. इस तरह कैलु यादव से बच जाऊँगा. तभी अपूर्व सुन्दरी रयि छत पर चमचमाते चाँदी के बर्तन में खीर-बताशे लिए ऊपर आ गयी. छुपे होने के कारण मैं डर गया कि कहीं वह मुझे चोर न समझे. चाँदनी में सुराहीदार गर्दन वाली, उन्नत उरोजों वाली, भरे नितम्बों वाली, बालों में फूल लगाये रयि से सुन्दर स्त्री मैंने कभी नहीं देखी. उसकी जुल्फें हवा में किसी लय पर थिरक रही थी. बार-बार उसका रेशमी आंचल महकती हवा में उड़ता जा रहा था. मैं उसके रूप पर ऐसे ही मोहित हुआ देख रहा था कि कैलु यादव मुझे ढूँढते ऊपर आ पहुँचा. जैसे वह कुत्ते की तरह सूँघता हो, उसने मुझे छत के उस कोने पर ढूँढ निकाला. रयि को अहसास हुआ कि छत पर कोई और भी है. उसने पीछे मुड़ कर देखा और वह जोर से चीख पड़ी.
           
कैलु यादव उसकी तरफ बढ़ा, जैसे कोई शेर हिरण की तरफ़ बढ़ता है. तब तक मैंने रयि को बचाने के लिए कैलु यादव पर झपट्टा मारा और उसकी पीठ पर चढ़ गया. लेकिन मेरे झपट्टे से उस पर कोई फर्क न पड़ा. मुझे हिरण्यनाभ का दिया पौधा याद आया. मैंने शर्ट की जेब से पौधे निकाल कर पत्ते उसकी आँखों में मलना शुरु किया. वह मुझे लिये-दिये रयि की तरफ बढ़ा और रयि लड़खड़ा कर छत के किनारे से गिर गयी. कैलु यादव ने मुझे उठाकर वहीं छत पर पटक दिया. मेरे हाथ से पौधा छीन कर मेरे ही मुँह में ठूँस दिया. मिट्टी और जड़ के कसैले स्वाद से मुझे कुछ मितली सी आने लगी. कुछ देर की हाथापाई के बाद मुझे बेहोशी-सी आ गयी. नीमबेहोशी जैसी याद है कि उसके बाद उसने मुझे वहीं से नीचे फेंक दिया.“
           
यह कह कर सुकेशा चुप हो गया.
           
           
स्मृति वापस आने के बाद छात्रों ने पुलिस में सुकेशा का नया बयान दर्ज़ कराया. इस आधार पर कैलु यादव को गिरफ्तार किया गया. उसकी आँखों की आधी रोशनी उसी मनहूस रात जा चुकी थी. उसे इसका अहसास तब हुआ जब वह किसी तरह सबकी नज़रों से बच कर अपने वफादार घोड़े पर सवार हो कर कालीस्थान पहुँचा, किन्तु वहाँ पहुँच कर आँखों के तेज और असहनीय जलन से छटपटाता वहीं मंदिर के सामने गिर कर सारी रात तड़पता रहा. उसने दावा किया कि वह भी रयि का कातिल नहीं था. रयि की मौत एक दुर्घटना थी, इसका उसे भी बेहद अफसोस था.
           
आखिरी प्रश्न यह रह जाता है कि प्राण लाल कुन्दन इन दिनों कहाँ हैं?
           
इस प्रश्न की उपेक्षा कर हम गुरु पिप्पलाद को धन्यवाद देते हुए इस कहानी को यहीं विराम देते हैं. उनको हमारा नमस्कार है, नमस्कार है.



प्रश्नों के उत्तर देने के चार तरीके हैं.
कौन से चार?

कुछ प्रश्न ऐसे हैं जिनका श्रेणीगत उत्तर दिया जाना चाहिए (जैसे कि - हाँ, , यह, वह ). कुछ प्रश्न ऐसे हैं जिनका विश्लेषित उत्तर देना चाहिए (जैसे प्रश्नों को परिभाषित या पुनर्व्याख्यायित कर के). कुछ प्रश्न ऐसे हैं, जिनका उत्तर प्रतिप्रश्न से देना चाहिए. कुछ प्रश्न ऐसे हैं जिनकी उपेक्षा करनी चाहिए. प्रश्नों के उत्तर देने के यही चार तरीके हैं.
: सूत्त पिटक
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इति श्री
(आषाढ़ कृष्ण प्रतिपदा, विक्रम संवत् २०७७)
prachand@gmail.com

इस श्रंखला की पहली कहानी 
 ईश 

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  1. Pankaj Chaudhary7/7/20, 7:39 am

    प्रचंड की कहानियों पर अच्छी टिप्पणी की है आपने। प्रचंड मेरे भी प्रिय कथाकार हैं। उनकी कहानियों को पढ़ना एक बीहड़ अनुभव से गुजरना है।

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  2. Shashi Sharma7/7/20, 7:39 am

    प्रचंड का दूसरा नामकरण हो गया है बीहड़ प्रतिभा। उनकी कहानियों की क्लास ही अलग है। कहानी लेखन का बिलकुल जुदा सा प्रारूप रचती हैं ये कहानियाँ।

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  3. वाकई बीहड़ प्रतिभा हैं, प्रचंड जी!

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  4. "जिस तरह सूरज के अस्त होने पर सम्पूर्ण किरणें उस तेजोमण्डल में ही एकत्रित हो जाती हैं और उसके उदय होने पर वे फिर फैल जाती हैं [...]" --ऐसा कहने वाले प्रोफेसर से किसी प्रश्न/जिज्ञासा के समाधान की उम्मीद? प्रचंड प्रवीण जी, ये सब क्या है? आप क्या सोचकर इस तरह की चीज़ लिखते हैं, कभी सीधे-सीधे बताइए। मैं सचमुच जानना चाहता हूँ। मुझे टुकड़ों में आपके विवरण-वर्णन इतने पसंद आए कि इस विचित्रता को समझने के लिए और जिज्ञासु हो चला हूँ।

    वैसे प्रश्न का उत्तर देने के चौथे तरीक़े को अपनाने के लिए तो आप स्वतंत्र हैं ही!

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  5. Jeewan Kumar8/7/20, 8:38 pm

    उपनिषदों पर लिखी गयी कहानी एकदम नया प्रयोग है। मर्डर मिस्ट्री बना देने से यह और चौंकाती है।

    यह लेखक के लिए बेहद शर्मनाक स्थिति होगी कि उसे लिखे हुए से अधिक अपना आशय स्पष्ट करना पड़े या उसकी व्याख्या करनी पड़े।
    जिज्ञासुओं को चाहिए कि वह तत्त्वदर्शी ज्ञानीपुरुषों के पास जा कर ज्ञान को साष्टांग दण्डवत्, प्रश्न तथा सेवा करके जाने। यही श्रीमद्भागवद्गीता का उपदेश है जो पहले ही कह दिया गया है।

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    1. आप तो मेरे सवाल को भी नहीं समझ पाए, प्रचंड लेखन को तो आपने भला क्या ही समझा होगा!

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