मंटो का उपन्यास : बग़ैर उनवान के : विनोद तिवारी



सआदत हसन मंटो ने एक उपन्यास भी लिखा था, यह बहुत कम लोग जानते हैं. इस उपन्यास के हिंदी में छपने की भी एक कथा है और उपन्यास की अपनी तो है ही. आलोचक विनोद तिवारी ने मंटो के जन्म दिन पर यह ख़ास लेख लिखा है जिसमें इस उपन्यास को समाज-मनोविज्ञान की दृष्टि से विवेचित किया गया है.


मंटो पर बातें भी उनकी कहानियों और शख़्सियत की तरह ही दिलचस्प हो जाती हैं और विनोद तिवारी ने इस दिलचस्पी को बनाये रखा है. आलोचना में ऐसा कम होता है.


लेख प्रस्तुत है.



ll तारीख़-ए-पैदाइश पर ख़ास ll


सआदत हसन मंटो
हम मर्ज़ बताते हैं लेकिन दवाखानों के मुहतमिम[1] नहीं
विनोद तिवारी




"मैं तहज़ीबो-तमद्दुन की और सोसायटी की चोली क्या उतारूँगा, जो है ही नंगी. मैं उसे कपड़े पहनाने की कोशिश भी नहीं करता, इसलिए कि वह मेरा काम नहीं दर्जियों का है. लोग मुझे सियाह-कलम कहते हैं लेकिन मैं तख़्ता-ए-सियाह पर काली चाक से नहीं लिखता, सफेद चाक इस्तेमाल करता हूँ कि तख़्ता-ए-सियाह की सियाही और ज़्यादा नुमायाँ हो जाए."
मंटो


फ्रांसीसी दार्शनिक और लेखक ज्यां पॉल सार्त्र ने कहीं लिखा है कि लेखकों को अपने घर ज्वालामुखी के मुहाने पर बनाना चाहिए. सार्त्र का यह कथन दुनिया के मशहूर अफ़साना-निगार सआदत हसन मंटो पर सौ फीसद लागू होती है. मंटो ने जिस दम पर जीवन जिया वह साधारण जीवन नहीं था. इस असाधारण जीवन का चुनाव उन्होंने जानूझकर किया हो यह तो नहीं, पर जिस बुर्जुवा समाज के वे हिस्से थे उस समाज के दोगलेपन पर जब वह अपनी जीनियासिटी और साहस के साथ कलम उठाते हैं तो अधिकांश लोगों को ऐसा लगता है कि मंटो जानबूझकर सुर्खियाँ बटोरने के लिए यह सब करता है. काश ! सचमुच अपने लेखन में मंटो उतना चालाक और उतना रणनीतिक रहा होता, जितना उसके समकालीन बहुत सारे लेखक थे.

मुखौटा मंटो का आभूषण कभी नहीं रहा. इसलिए मंटो के जीवन और साहित्य में कोई दोहरापन, किसी तरह की फाँक, चालाकी और धूर्तता की कोई वर्णमाला या उसको शासित करने वाले व्याकरण आपको नहीं मिलेंगे. बाज़दफ़ा नहीं हरदफ़ा जो कुछ भी है बेबाक और बेलौस. मंटो की मंटोईयत यही है. इस मंटोईयत के बारे में जो बात सबसे अधिक मायने रखती है, वह यह है कि मंटो के प्रशंसक हों या निंदक दोनों उन पर फ़िदा रहते हैं. यह मंटो की कलम का ही जादू है. सचमुच, बिना कलम के मंटो सिर्फ सआदत हसन है और मंटो की शख्शियत के बिना सआदत हसन की क्या हैसियत.
  
दुनिया भर में मंटो की पहचान एक विलक्षण अफ़साना-निगार के रूप में है. मंटो अपने समय से बहुत आगे के रचनाकार हैं. वे औरत-मर्द की जाती ज़िंदगी के रिश्ते और उन रिश्तों की पाक-नापाक सलाहियतों और दुश्वारियों को सामाज-मनोवैज्ञानिक विश्लेषणों के सहारे वि-रचित करते हुए जिस तरह से समाज, राजनीति और मज़हब के झूठे किन्तु चमकदार रेशमी ताने-बाने का रेज़ा-रेज़ा उधेड़ते हैं वह बुर्ज़ुवा समाज के बीच कैसे उचित माना जाता. पर मंटो तो मंटो, अपनों के बीच भी अकेला अडिग.

हिंदी के कम लोगों को पता है कि मंटो ने एक उपन्यास भी लिखा है. एक छोटा उपन्यास, जिसे अँग्रेजी वाले नावेला (Novella) कहते हैं. कभी-कभी हल्के-फुल्के अंदाज़ में नावेलेट (Novelette). यह उपन्यास बगैर किसी उनवान (शीर्षक) के लाहौर से ही निकलने वाली पत्रिका कारवाँ में किश्तवार शाया हुआ था. बाद में, मंटो के देहांत के एक साल पहले सन 1954 ईस्वी में, वह पुस्तकाकार प्रकाशित हुआ. चूँकि, कारवाँ में यह बिना किसी उनवान के छपता रहा था, मंटो ने इसका नाम रख दिया बगैर उनवान के.
  
इस उपन्यास का उर्दू से हिंदी में तर्जुमा किया था कवि, कथाकार, नाटककार, संपादक, प्रकाशक और अनुवादक सतीश स्याल उर्फ सतीश जमाली ने. सतीश जमाली (17 अगस्त, 1940-20 जून 2016) पठानकोट के रहने वाले थे. पंजाब में एटलस साइकिल की अपनी नौकरी छोड़कर वे 1968 ईस्वी में इलाहाबाद आ गए. दरम्यानी कद, इकहरी काया, गोरा रंग और सपाट चेहरा. उस सपाट चेहरे पर गड्ढे में धँसी खोजी घुच्ची आँखें और उभरती ऊँची खुदगर्ज नाक, दोनों जैसे परस्पर एक दूसरे को संतुलित करते हों. यह नाक ही थी कि, जिसे सतीश जमाली ने ताजिंदगी बचाए बनाए रखा. वगरना, ज़िंदगी ने सतीश जमाली को कौन-कौन से रंग नहीं दिखाये. पर, उस आदमी ने कभी भी हार नहीं मानी.

सतीश जमाली ने प्रथम पुरुष’, थके हारे’, ठाकुर संवाद’, नागरिक’, जंग जारी थके हारे’, सहपाठी तथा अन्य कहानियाँ और बच्चे और अन्य कहानियाँ जैसे कहानी संग्रह दिये और प्रतिबद्ध’, तीसरी दुनिया और छापपर टोला जैसे उपन्यास लिखे. आदमी आज़ाद है नाम से उन्होंने एक नाटक भी लिखा था. सतीश जमाली ने श्रीपत राय, उपेंद्रनाथ अश्क, भैरव प्रसाद गुप्त जैसे लोगों के साथ काम किया. कहानी पत्रिका के बाद नयी कहानी नाम से खुद की पत्रिका निकाली. चित्रलेखा नाम से प्रकाशन शुरू किया. बाद में और भी कई छोटे-छोटे प्रकाशन शुरू किए. ज़िंदगी को जीना और चलाना तो होता ही है. वह इतनी भी आसान नहीं जितना उसे माना या कहा जाता है.  
  
चित्रलेखा प्रकाशन से ही मंटो के उपन्यास बगैर उनवान के का हिंदी अनुवाद सन 1985 ईस्वी में प्रेम कहानी नाम से प्रकाशित हुआ. अनुवाद खुद सतीश जमाली ने किया है. सतीश जमाली एक छोटे प्रकाशक थे. प्रकाशन उनके लिए जीविकोपार्जन हेतु निजी उद्यम था. इस अनुवाद का हिंदी में जिस तरह से स्वागत होना चाहिए वह तो दूर लोगों को पता तक नहीं कि मंटो के उपन्यास बगैर उनवान के का हिंदी में अनुवाद हो चुका है. कोई चर्चा नहीं, कोई पहल नहीं. 

अभी, इसी साल (ईस्वी सन 2020) में वाणी प्रकाशन से पेपर बैक में मंटो के उक्त उपन्यास का हिंदी अनुवाद प्रकाशित हुआ है. अनुवाद पत्रकार, लेखक, फिल्म समीक्षक और अनुवादक राजकुमार केसवानी ने किया है. मुझे नहीं पता कि राजकुमार केसवानी को, आज से 35 साल पहले किए गए सतीश जमाली द्वारा उपर्युक्त अनुवाद की जानकारी थी या नहीं. अगर होती तो प्रस्तवाना में उनका जिक्र जरूर किया गया होता (हालाँकि, हिंदी में इस तरह का रिवाज़ नहीं के बराबर है). अब थोड़ा राजकुमार केसवानी की उस प्रस्तावना की इस बात को “...लेकिन बदकिस्मती से हिंदी में यह आधी-अधूरी शक्ल में ही पेश हुई है” समझने की कोशिश की जाय.


इस वाक्य से ऐसा प्रतीत होता है कि राजकुमार केसवानी को हिंदी के कुछ अनुवादों की जानकारी जरूर है. क्या पता उन्होंने सतीश जमाली वाले अनुवाद को भी देखा हो? पर, यहाँ यह बताना जरूरी है कि सतीश जमाली का अनुवाद आधी-अधूरी शक्ल में नहीं है, बल्कि, मुकम्मल शक्ल में ही है– कुल 96 पृष्ठों में, बिना किसी प्रस्तवाना के और भूमिका के. वाणी से प्रकाशित अनुवाद में कुल 102 पृष्ठ हैं, जिसमें से 4 पेज राजकुमार केसवानी की प्रस्तावना और 8 पेज उपन्यास के दीबाचा  (भूमिका) को निकाल दिया जाय तो मुकम्मल उपन्यास 90 पृष्ठ का ही ठहरता है. मंटो ने नेहरू को लिखे एक पत्र को इस उपन्यास का दीबाचा  बनाया है. वह पत्र कई मायनों में बहुत ही महत्व का है, पर उपन्यास से उसकी कोई संगति नहीं, यह केसवानी जी स्वयं ही प्रस्तावना में लिख चुके हैं. सही भी है, अगर इस दीबाचा  के बिना भी उपन्यास पढ़ा जाय तो कोई फर्क नहीं पड़ता. वैसे भी, एक उपन्यास के लिए भूमिका कोई बहुत जरूरी चीज नहीं होती.

ऐसे में, यह कहना कि मुकम्मल शक्ल में पहली बार यह उपन्यास प्रकाशित हो रहा है, का अर्थ क्या हो सकता है? सिवाय सुर्खी पाने वाले उस चौंकाऊ वाक्य के जिसे पत्रकारिता में यूं ही उपयोग में लाया जाता है. इसे राजकुमार केसवानी ज़्यादा बेहतर जानते होंगे. उन्होंने लंबे समय तक अच्छी पत्रकारिता की है. वह एक अच्छे पत्रकार रहे हैं. बहरहाल, आइए मंटो के इकलौते उपन्यास बगैर उनवान के (अनु. प्रेम कहानी) से इश्क-मुहब्बत की कुछ बातें की जाएँ.


मैं तुमसे मुहब्बत करता हूँ, इसलिए कि तुम नफरत के काबिल हो :

ऐसी लड़कियों से जो  प्रेम का नाम सुनकर यह समझें
कि एक बहुत बड़ा पाप उनसे हो गया, वह प्रेम नहीं कर सकता था.

मंटो ने औरत-मर्द के सामाजिक और मनोवैज्ञानिक रिश्ते को लेकर कई कहानियाँ लिखीं हैं. उनके अफसानों में प्रायः औरत को लेकर मर्द जात की मानसिक और सामाजिक बनावट और व्यवहार का जो दोगलापन दिखता है और वे जिस बेरहमी से उसका पोस्टमार्टम करते हैं वह बूर्जुआ समाज का वह आईना है जिससे लोग बचना चाहते हैं. मंटो की ताकत (और यह ताकत ही उनकी खासियत है) यह है कि वे मज़हब, ईमान, इलाहियत[2], दीनियात[3], आखिरत[4] आदि के बहु-परतीय चेहरे को बेपर्द करते हुए उनके सामने इस आईने को रखते चले जाते हैं. यह उनका बहुत ही प्रिय विषय रहा है यह उपन्यास एक ऐसे व्यक्ति की जाती ज़िंदगी की कहानी कहता है जो मुहब्बत करना चाहता है पर समाज क्या कहेगा इस भय-ग्रंथि से छूट नहीं पाता है. हालाँकि, हम जिस समाज में रहते हैं इसकी चिंता मर्द उतना नहीं करते जितना औरतें करती हैं कि समाज क्या कहेगा. लेकिन, यहाँ पर मंटो ने एकदम नया विषय और प्लाट लिया है. एक मर्द कैसे मुहब्बत करना चाहता है पर कैसे करे, किससे करे?

उपन्यास का नायक सईद सोचता है कि प्रेम के बिना आदमी कैसे सम्पूर्ण हो सकता है?’ वह अपने बारे में सोचता है कि उसका दिल प्रेम करने लायक है फिर भी कोई उससे प्रेम क्यों नहीं करता ? या वह किसी से प्रेम क्यों नहीं कर पाता ? क्या लड़कियां भोंदू और भोले और मासूम लोगों से ही प्रेम करना चाहती हैं उस जैसे समझदार और ईमानदार आदमी से कोई लड़की प्रेम क्यों नहीं करती है? उसे भी लतीफ़ और अपने अन्य दोस्तों की तरह किसी न किसी लड़की को प्रेम करने के लिए फाँसना चाहिए. उपन्यास अपनी प्रस्तावना में सईद की इस तड़प से शुरू होता है कि सईद की समझ में नहीं आता था कि प्रेम कैसे पैदा हो जाता है, बल्कि यह कहिए कि पैदा हो सकता है. वह जिस भी समय चाहे उदास और क्रुद्ध हो सकता है और अपने आप को खुश भी कर सकता है, परंतु वह प्रेम नहीं कर सकता, प्रेम जिसके लिए वह इतना बेचैन रहता था.

यह प्रस्तावना इसलिए महत्वपूर्ण है कि इसमें मंटो प्रेम हो जाने के उस हर चलन और समझ का परिहास करते हैं जिसे नौजवान प्रेम करना कहते हैं. जिसे लव एट फ़र्स्ट साईट कहा जाता है, सईद का उस पर कोई भरोसा नहीं. वह कहता है कि वह लोग झूठे हैं जो कहते हैं कि प्रेम चुटकियाँ बजते हो जाता है. क्या सचमुच, इश्क़ करना इतना आसान है. फिर, कबीर ने जो कहा है या जिगर मुरादाबादी ने जो फ़रमाया है उसका मानी क्या है ? परंतु, उन लोगों के लिए इसका क्या मानी जो एम. असलम[5] और बहज़ाद[6] के भद्दे और छिछोरे मोहब्बत के अफ़साने पढ़कर और गीत गाकर मुहब्बत करते हैं – दीवाना बनाना है तो दीवाना बना दे.
  
सईद इस भद्दे और छिछोरे प्रेम से अलग तरह का कोई प्रेम करना चाहता है. लोगों से उसने यह सुन रखा था कि सबके जीवन में एकबार प्रेम का अवसर अवश्य आता है. हम हिंदी वाले भी जयशंकर प्रसाद के एक पात्र[7] के हवाले से यह जानते हैं कि सबके जीवन में एकबार प्रेम की दीपावली जलती है. इस प्रेम के अवसर की तलाश में सईद लड़कियां खोजने और उन्हें फांसकर उनसे मुहब्बत करने की मंशा से निकलता है. वह लतीफ़ की दरी की दुकान पर कई दिनों तक बैठता है कि वहाँ से आने-जाने वाली लड़कियों में से किसी से कह सके कि वह उससे मुहब्बत करना चाहता है. लेकिन, वहाँ कुछ दिन बैठ कर ही उसे महसूस होता है कि जितने लोग बाजार में चलते-फिरते हैं सब के सब जैसे सफ़ेद चादर की तरह हैं.

यह वाक्य एक पूरी कविता है, जो बहुअर्थी है. मंटो के किस्सागोई की यह क़ाबिलियत बहुत ही कम लोगों में दिखती है. इस वाक्य का यहाँ अर्थ करना उसकी हदें तय करना होगा. आगे, उपन्यास के कुछ प्रसंगों और चरित्रों से जुड़कर यह वाक्य स्वतः अर्थ से भर उठेगा. वह यहाँ से ऊबकर, दूसरी कोशिश करता है. लड़कियों के स्कूल के सामने कंपनी बाग के पास रेलवे फाटक के पास कई दिनों तक मँडराता है. इस उपन्यास का लोकेल अमृतसर और लाहौर हैं. समय बीसवीं सदी का तीसरा दशक है. जिस कंपनी बाग का ऊपर जिक्र आया है वह अमृतसर का कंपनी बाग है. मंटो लुधियाना में पैदा जरूर हुए थे पर पले-बढ़े अमृतसर में थे. उनके पिता एक बैरिस्टर थे, बहुत ही कड़क और अनुशासनप्रिय. ध्यान देने वाली बात यह है कि मंटो की तरह इस उपन्यास का नायक सईद भी वकीलों के परिवार से है. मंटो की अपने पिता कभी बनी नहीं. मंटो को शुरू से ही साहित्य, संगीत, थियेटर आदि कलाओं में दिलचस्पी थी. नौजवानी के दिनों में उन्होंने अपने कुछ दोस्तो के साथ मिलकर एक क्लब बनाया था जहाँ वह नाटक, संगीत आदि के लिए लोगों को एकत्र कर सकें. उनके बैरिस्टर पिता को यह सब नाच-गाना बिलकुल पसंद नहीं था. वही, एक बुर्ज़ुवा समाज में हर मध्यवर्गीय पिता की चिंता कि कहीं उसके बच्चे बिगड़ न जाएँ. पर, मंटो ने कभी इसकी परवाह ही नहीं की.

सईद मुहब्बत करने की चाहत लिए रेलवे फाटक के पास कई दिनों तक खड़ा रहा कि स्कूल आती-जाती लड़कियों में से किसी को अपने प्रेम के लायक चुन सके– 

“वह दस दिनों तक लगातार फाटक पर जाता रहा, शुरू-शुरू में दो-तीन दिन वह इन लड़कियों की तरफ ध्यान देता रहा, मगर अगले दिन जब सुबह की ठंडी हवा चल रही थी, जिसमें कंपनी बाग के तमाम फूलों की खुशबू बसी हुई थी, उसने अचानक अपने आपको इन लड़कियों के बजाय पेड़ों को बड़े ध्यान से देखते पाया जिनमें अनगिनत चिड़ियाँ चहचहा रही थीं, सुबह की खामोशी में चिड़ियों का चहचहाना कितना अच्छा लगता था. इसलिए जब उसने ध्यान दिया तो उसे पता चला कि वह एक सप्ताह से लड़कियों के बजाय इन चिड़ियों, पेड़ों और फ़्रंटियर मेल में दिलचस्पी ले रहा है.”

ऐसा आदमी भला क्या खाकर वैसा प्रेम कर पाएगा जैसा उसके हमउम्र कर रहे थे. प्रेम शुरू करने की उसने और भी बहुतेरी चेष्टाएँ कीं, पर असफल रहा. एक आखिरी कोशिश उसने करने की कोशिश की. तय किया कि शोहदों की तरह इधर-उधर भटकने से अच्छा है कि अपनी गली में ही किसी लड़की से मुहब्बत क्यों न की जाय ? उसने फटाफट गली की आठ-नौ लड़कियों की सूची बना डाली. फिर, एक-एक कर सब नामों पर विचार करने लगा. सागरा और नईमा. नहीं, ये दोनों तो कट्टर मौलवियों की लड़कियाँ हैं. उनसे प्रेम के बारे में सोचना भी बेकार था. उनको केवल खुदा से प्रेम करना सिखाया गया था.

पुष्पा, विमला और राजकुमारी– तीनों हिंदू लड़कियाँ. इनमें से किसी से भी प्रेम करना मतलब, हिंदू-मुस्लिम फ़साद. फ़ातिमा का नाम आते ही सईद का मन बिचक गया, फातिमा एक साथ दो लोगों से मुहब्बत कर रही थी. जुबेदा से तो कोई मुहब्बत करने की सोच हे नहीं सकता था. उसका भाई ख़ानदान की इज्ज़त के नाम पर किसी की भी जान ले सकता है. बाकी बची वह कश्मीरी लड़की जिसका नाम नहीं मालूम, जो पश्मीना शाल का व्यापार करने वाले चार भाइयों के यहाँ घर का सारा काम करती थी– नौकरानी थी.

सईद की इस सूची और लड़कियों के बारे में जो उसकी समझ है उस पर गौर किया जाय तो साफ हो जाता है कि मुहब्बत निजी चाहत का मसला होते हुए भी निजी नहीं है. वह मज़हब का मसला है, वह समाज का मसला है. उसके पार, उससे इतर मुहब्बत की कोई नागरिकता कोई पहचान नहीं. मंटो इस उपन्यास में, एक व्यक्ति के निजी प्रेम और काम सम्बन्धों को समाज और मज़हब की इस घेरेबंदी के बरक्स, आमने-सामने रखकर, उसका बहुत ही संजीदगी के साथ एक क्रिटिक तैयार करते हैं.
  
उपन्यास के उपर्युक्त शुरू के प्रसंग कथानक के लिए प्रस्तावना भर हैं. वास्तव में मंटो उस कश्मीरी लड़की राजो तक पाठक को ले आने के लिए यह प्रस्तावना बुनते हैं. जैसा कि ऊपर कहा गया कि राजो चार व्यापारी भाइयों के घर नौकरानी थी और वहीं उनके घर पर, साथ रहती थी. पूरे मोहल्ले में राजो को एक चालाक और बदचलन लड़की की तरह देखा जाता था. लोगों की धारणा बन गयी थी कि यह लड़की पश्मीना की शाल का व्यापार करने वाले उन चारो भाइयों के लिए जाड़े में शाल का काम देती थी– “गली के सब समझदार लोग राजो के बारे में जानते थे. मौसी मख्तो गली की सबसे बूढ़ी औरत थी. उसका चेहरा ऐसा था कि जैसे पीले रंग के सूट की अंटियाँ बड़ी असावधानी से नोंचकर एक दूसरे में आसवधानी से उलझा दी गयी हों. यह बुढ़िया भी जिसकी आँखों को बहुत कम दिखाई देता था और जिसके कान लगभग बहरे थे, राजो से चिलम भरवाकर उसके पीठ पीछे अपनी बहू से या जो कोई उसके पास बैठा हो, कहा करती थी, "इस लौंडिया को इस घर में ज़्यादा न आने दिया करो, वरना किसी दिन अपने ख़सम से हाथ धो बैठोगी.”

जबकि, राजो अपनी मुस्कुराहट, अपनी मेहनत से खाली समय में सबका कुछ न कुछ काम कर ही जाती. कभी किसी की चोटी गूँथ दिया, कभी बच्चों के पोतड़े बदल दिये, कभी किसी के सिर से जूएँ निकाल दिए. कभी गँठिया की बीमारी से दर्द के मारे कराहती बुढ़िया के पैर दबा दिए. वह हर समय इसकी चेष्टा करती कि वह सबको खुश देख सके.
  
वेश्याओं के जीवन पर मंटो कई अच्छी कहानियाँ लिख चुके हैं. मंटो की खासियत यह है कि वे मनुष्य जीवन के उन गड्ढों, दरारों, स्याह कोनों-अंतरों को भी दिखाने और रौशन करने की हिमाकत करते हैं जिन पर सभ्य समाज कूड़ा-करकट डालकर, पर्दे की ओट देकर ओझल कर दिये जाने की कोशिश करता है. पर, क्या इससे मर्ज़ ख़त्म हो जाएगा या नासूर बनता चल जाएगा? मंटो इसी सवाल को अपने लेखन में बार-बार उठाते हैं. इस उपन्यास में सईद सोचता है कि
“यह कितना कष्टदायी जीवन है. किसी को अनुमति नहीं कि वह अपने जीवन के गड्ढे दूसरों को दिखाए. वह लोग, जिनके कदम मजबूत नहीं उनको अपनी लड़खड़ाहटें छिपानी पड़ती हैं क्योंकि इसी का रिवाज है. हर व्यक्ति को एक जिंदगी अपने लिए और एक दूसरे के लिए गुजारनी होती है. आँसू भी दो तरह के होते हैं, ठहाके भी दो तरह के. एक वह आँसू, जो जबर्दस्ती आँखों से निकालने पड़ते हैं और एक वह जो पाने आप निकलते हैं....वह सोचता था कि राजो की सदा मुसकुराती आँखों में आँसू नजर आए और वह इन आँसुओं को सभ्यता की दीवारें तोड़ कर अपनी उँगलियों से छुए. वह अपने आँसुओं का स्वाद अच्छी तरह जानता था, परंतु वह दूसरों की आँखों के आँसू भी चखना चाहता था. विशेष रूप से किसी औरत के आँसू. उसकी यह इच्छा तेज हो गई.”


तुम बीमार हो...तुम्हें एक नर्स की ज़रूरत है

सईद को ऐसा महसूस हुआ कि
औरत के संबंध में उसके तमाम भाव अपने कपड़े उतार रहे हैं.

यह उपन्यास बहु-परतीय सामाजिक-ग्रंथियों के दबाव से संचालित एक पुरुष की प्रेम और काम संबंधी  भय-ग्रंथि को लेकर खुद से जद्दोजहद और संघर्ष का उपन्यास है. यह संघर्ष समाज की सामूहिक चेतना (Collective Consciousness) और उस समाज में एक नागरिक की हैसियत रह रहे व्यक्ति की वैयक्तिक चेतना (Individual Conscious) के बीच के संघर्ष को बहुत ही सृजनात्मक तरीके से सामने लाता है. उपन्यास का नायक सईद एक पुरुष है, जिसको समाज में निश्चित ही एक स्त्री की तुलना में अधिक सामाजिक और आर्थिक अधिकार हासिल हैं फिर भी वह राजो से अपनी मुहब्बत का इज़हार क्यों नहीं कर पाता है? क्यों राजो से मुहब्बत करते हुए भी वह उससे दूर भागना चाहता है? उपन्यास अपने आखिरी हिस्से में एक व्यक्ति की इसी कशमकश और छटपटाहट को दर्शाता है. यही इस उपन्यास का नयापन है. एक नए विषय के साथ एक नया कथानक. बुर्जुवा सामज में यह छटपटाहट, यह जद्दोजहद, यह संघर्ष जितना सईद का है उससे ज़्यादा खुद मंटो का. इस उपन्यास में सईद, मंटो का आल्टर इगो (Alter Ego) है. इसको उपन्यास के प्रसंगों और उदाहरणों के हवाले से आगे चलकर विश्लेषित करने का प्रयास किया जाएगा.
  
मंटो की तुलना डी. एच. लॉरेंस, आस्कर वाइल्ड, ग्वे दि मोपासाँ जैसे दुनिया के महान लेखकों से की जाती है. मंटो, मोपासाँ की तरह एक व्यक्ति की वासनाओं और समाज की वर्जनाओं के बीच के मानसिक और सामाजिक द्वंद्व को जिस खूबी के साथ रचते हैं वह दुरूह मनोवैज्ञानिक सिद्धांतों और दार्शनिक स्थापनाओं को व्यावहारिक धरातल पर समझने की बेहतरीन कुंजी है. मंटो व्यक्ति-मन की जटिलताओं और गुत्थियों को मनोविश्लेषणवाद के सिद्धांतों के सहारे सुलझाने और दिखाने की कोशिश के रचनाकार नहीं हैं. वह तो बहुतों के यहाँ मिल जाएगा. मंटो, बुर्ज़ुवा समाज के समाज-मनोवैज्ञानिक साँचे में एक व्यक्ति की स्वतंत्र नागरिकता क्या होनी चाहिए, इसकी तलाश और समझ के व्यावहारिक कथाकार हैं. जिस तरह डेविड एमिल दुर्खीम[8] के यहाँ  समाज की सामूहिक-चेतना (कलेक्टिव कांसियसनेस) द्वारा बनाए गए और निश्चित किए गए व्यक्ति के अधिकारों और कर्तव्यों और उसके अनुसार उसमें रहने वाले एक व्यक्ति की वैयक्तिक-चेतना (इंडिविजुअल कांसियसनेस) के बीच द्वंद्व में समाज और व्यक्ति के रिश्ते को समझने वाले सिद्धान्त (जिसे युंग और फ्रायड ने आगे चलकर मनोविज्ञान के सिद्धांतों द्वारा मानव-मन की जटिलताओं के चिकित्साशास्त्र के रूप में विकसित किया) के बीज-तत्व मिलते हैं, उसी तरह से भारतीय उपमहाद्वीप के कथा साहित्य के संदर्भ में, समाज-मनोवैज्ञानिक धरातल पर समाज और व्यक्ति के बीच के द्वंद्व और संघर्ष के बीज मंटो के यहाँ प्राप्त होते हैं. 

सामूहिक चेतना के चलते व्यक्ति समाज के तथाकथित नैतिक, मूल्यगत और आदर्शात्मक मान्यताओं और वर्जनाओं के द्वारा संचालित और नियंत्रित होने के लिए बाध्य किया जाता है, अगर कोई व्यक्ति इनसे मुक्त होने की कोशिश करता है तो उसका समाज के साथ-साथ खुद से जो संघर्ष होता है, यह उपन्यास इसी विषय को लेता है. उपन्यास में सईद का चरित्र इसी उद्देश्य को ध्यान में रखकर बुना गया है.
  
उपन्यास अपने दो-तीन अध्यायों में जिस प्रस्तावना के साथ शुरू होता है (जिसका जिक्र ऊपर आया है) वह आगे के अध्यायों में अपने उद्देश्य की ओर एक मजबूत कथानक के साथ उपस्थित होता है. उपन्यास के नायक सईद के अंदर जिस शिद्दत से मुहब्बत करने की तड़प बनी हुई थी वह अब पूरी होती दिखती है. जिस राजो को पूरा मोहल्ला उसके संदिग्ध चरित्र और रहन के चलते तरह-तरह की नजरों से देखता है और अपने घर की बहू-बेटियों को उससे ज़्यादा घुलने-मिलने से बरजता है उसी राजो से सईद को मुहब्बत हो जाती है. क्योंकि, 

“राजो गिलाफ़-चढ़ी औरत नहीं थी. वह जैसी भी थी, दूर से नजर आती थी. वह बिलकुल साफ थी.”


प्रसंगतः, अब हमें ऊपर आए उस काव्यात्मक वाक्य की अर्थगर्भिता के सिरे खुलते हुए दिखने लगते हैं जिसमें यह कहा गया है कि, जितने लोग बाज़ार में चलते-फिरते हैं सब के सब सफ़ेद चादर की तरह हैं. राजो सफ़ेद चादर नहीं है, गिलाफ़ चढ़ी औरत नहीं है. जिसे सभ्य समाज कहते हैं, उसका कोई आवरण वह नहीं ओढ़ती है. हम सब जानते हैं कि मंटो ने एक ही जीवन जिया, एक ही चरित्र जिया. वे दोहरे जीवन और चरित्र को बर्दाश्त नहीं करते थे. वे दोस्ती, दुश्मनी, प्रेम, काम सबमें एक चरित्र के हिमायती थे इसीलिए दोगलेपन को नापसंद करते थे, उससे चिढ़ते थे. इसीलिए उनकी कहानियों में, आवरण ओढ़े, मुखौटा पहने बुर्ज़ुवा समाज की बार-बार धज्जियां उड़ाई गयी हैं. इन कहानियों में वे उन सभी स्त्री-चरित्रों के समर्थन में खड़े होते हैं जिनको भोगते हुए, भोगने की लालसा पाले हुए सभ्य समाज के अधिकांश लोग नफ़रत करते हैं. मंटो को यह नाकाबिले-बर्दाश्त है. तभी तो वह बेहिचक कहते हैं –

“अगर आप जमाने की हक़ीक़त से नावाकिफ़ हैं तो मेरे अफ़सानों को पढ़िये. अगर आप इन अफ़सानों को बर्दाश्त नहीं कर सकते तो इसका मतलब कि यह ज़माना भी नाकाबिले-बर्दाश्त है.” 
सुगंधी, सुल्ताना, मोजेल, कुलवंत कौर जैसे नायाब स्त्री-चरित्र मंटो ने दिये हैं वह कहीं और नहीं मिलेंगे. नंगी आवाजें, काली सलवार, शिकारी औरतें, सरकंडों के पीछे, दो क़ौमें जैसी कहानियाँ औरत-मर्द के रिश्ते के फ़रेब और दोगलेपन के साथ समाज के अनगिनत मुखौटों और साँचों को जिस तरह से तोड़ती हैं, वैसी कहानियाँ दुनिया में किसी अफ़साना निगार के पास नहीं हैं. इस उपन्यास में राजो और मिस फारिया का चरित्र भी जिस तरह से औरत-मर्द के रिश्ते की परिभाषा बदलते हैं, वह नायाब है.
  
एक दिन एक ऐसी घटना घटती है कि उपन्यास जिस कथानक को बुनना चाहता है उसका प्रसंग उपस्थित हो जाता है. दिसंबर का आखिरी दिन. सर्द जाड़े की रात. सईद की अपने कमरे में सोने की तमाम कोशिशें नाकाम होती जा रही हैं. अत्यधिक ठंड के मारे उसे नींद नहीं आ रही है. आधी रात हो चुकी है. अचानक बाहर से कुछ आवाजें सईद के कानों में पड़ती हैं, किसी की मिन्नतें करने जैसी काँपती सी आवाज. वह खिड़की के दराज़ों से बाहर झाँकता है तो देखता है कि “वही...वही लड़की यानी व्यापारियों की नौकरानी बिजली के लैंप के नीचे खड़ी थी, एक सफेद बानियान में. उस बानियान के नीचे उसकी छातियाँ नारियलों की तरह लटकी हुई थीं. वह इस तरह से खड़ी हुई थी, जैसे अभी-अभी कुश्ती खत्म की हो....इतने में किसी पुरुष की भिंची हुई आवाज आई – खुदा के लिए अंदर चले आओ...कोई देख लेगा तो आफत ही आ जाएगी. जंगली बिल्ली की तरह गुर्रा कर लड़की ने कहा – नहीं आऊँगी, बस एक बार जो कह दिया, नहीं आऊँगी....मुझे मेरे कपड़े ला दो. बस, अब मैं तुम्हारे यहाँ नहीं रहूँगी. मैं तंग आ गयी हूँ. मैं कल से वकीलों के घर नौकरी कर लूँगी...समझे.” और अगली सुबह जब नया साल धूप सेंक रहा था तो सईद ने पाया कि राजो सचमुच उसके घर काम करने चली आई है. उसकी उदार और कृपालु माँ ने उसे नौकरी पर रख लिया है.
  
अब यहीं से सईद की मुश्किल शुरू हो जाती है. उसे राजो से मुहब्बत तो है पर वह उसे बताना नहीं चाहता, वह राजो को ही क्या किसी को भी नहीं बताना चाहता. लोग अगर जान गए तो उसके बारे में क्या सोचेंगे कि मियाँ गुलाम रसूल क बेटा, जो ज़्यादा किसी से बातें नहीं करता, सारा दिन बैठक में मोटी-मोटी किताबें पढ़ता रहता है, ऐसा निकला. व्यक्ति के चेतन और अवचेतन का द्वंद्व यहाँ शुरू हो जाता है. समाज की सामूहिक चेतना (कलेक्टिव कांसियसनेस) और व्यक्ति की चेतना (इंडिविजुअल कांसियसनेस) के बीच संघर्ष शुरू हो जाता है. सईद के चरित्र के इस भीतरी और बाहरी द्वंद्व को मंटो ने जिस तरह से एक व्यक्ति की मानसिक दशा, उस स्थिति से उत्पन्न दबाव, तनाव और बेचैनी के जरिए सृजित किया है, वह अत्यंत ही सच्चा और खरा है. सईद, राजो से मुहब्बत करता है, पर ज़ाहिर नहीं होने देना चाहता. उसकी इच्छा है कि राजो किसी न किसी बहाने से उसके सामने रहे पर पास आने पर, सामने आने पर वह उसे फटकार कर दूर भगाता रहता है – 

“वह इस औरत को बर्दाश्त नहीं कर सकता था. उसे देखकर उसका कुछ ऐसा ही हाल हो जाता, जो पहले कभी महसूस नहीं हुआ था. इसमें कोई संदेह नहीं कि वह उसके प्रेम में बुरी तरह जकड़ गया था. परंतु वह इस प्यार को बिलकुल दबा देना चाहता था.”


सईद की मानसिक चाहना और सामाजिक नैतिकता का संघर्ष इस भयानक स्तर तक पहुंचता है कि वह बीमार पड़ जाता है. उसे तेज़ बुखार हो जाता है, यह बुखार 105 डिग्री तक पहुंचता है. मंटो ने स्वाभाविक से लगने वाले, किन्तु एक युक्ति (डिवाइस) की तरह से इस बुखार वाले प्रसंग को उपस्थित किया है. यह बुखार ही है जिसमें सामूहिक चेतना के दबाव से मुक्त होकर सईद की व्यक्ति-चेतना उसका अवचेतन मुखर होकर बाहर आ पाता है – 

“इधर मेरे तरफ देखो ! जानती हो, मैं तुम्हारी मुहब्बत में गिरफ़्तार हूँ. बहुत बुरी तरह मैं तुम्हारी मुहब्बत में फँस गया हूँ, जिस तरह कोई दलदल में फँस जाय. मैं जानता हूँ, तुम मुहब्बत के काबिल नहीं हो, मगर मैं यह जानते-बूझते तुमसे मुहब्बत करता हूँ. लानत है मुझ पर...लेकिन छोड़ो इन बातों को...इधर मेरी तरफ देखो. खुदा के लिए मुझको तकलीफ न दो. मैं बुखार में उतना नहीं फुंक रहा...राजो।राजो...मैं...मैं...। उसके विचारों का सिलसिला टूट गया और उसने डाक्टर मुकुंदलाल भाटिया से कोनीन की हानियों पर बहस शुरू कर दी.”
  
बक रहा हूँ जुनूँ में क्या क्या कुछ, कुछ न समझे खुदा करे कोई. पर, पाठक समझ जाते हैं. राजो समझ कर भी अपनी परिस्थित अनुसार नासमझ बनी रहती है. बुखार कम होने पर सईद को डबल निमोनिया हो जाता है. इस हालत में उसे अस्पताल में भर्ती होना पड़ता है. वह सोचता है कि चलो यह अवसर भी अच्छा बन पड़ा. अस्पताल में रहूँगा तो राजो की छाया नहीं परेशान करेगी. पर, अस्पताल में उसकी सेवा और टहल में लगी मिस फ़ारिया उसे बहुत अच्छी लगने लगती है. मिस फरिया भी सईद के सलीके और औरत के प्रति उसके व्यवहार के चलते उसको पसंद करने लगी है. दोनों में मुहब्बत भले न हो पर एक इंसानी जज्बाती रिश्ता बन जाता है– “नर्स, मैं तुम्हारा शुक्रगुजार हूँ. तुमने मेरी बहुत खिदमत की है. काश, मैं उसका बदला तुमसे मुहब्बत करके दे सकता. एंग्लो-इंडियन नर्स के होंठो पर एक बारीक सी मुस्कान फैल गयी. आँखों की पुतलियाँ नचाकर उसने कहा, तो क्यों नहीं करते...करो.’...मुझे इसका अफसोस है. तुम इस काबिल हो कि तुमसे आइडोफार्म की तेज़ बू समेत मुहब्बत की जाए...मगर इट इज टू लेट.”

मंटो के दिल में औरतों के लिए बहुत अधिक ईमानदारी और इज्ज़त थी. उन पर लिखने और काम करने वाली उनकी तीसरी पीढ़ी की रिश्ते में भतीजी-नातिन (ग्रैंड-नीस) आयशा जलाल और अँग्रेजी लेखिक और पत्रकार प्रीति तनेजा को पढ़ने से इस बात की तस्दीक होती है. मंटो के अंदर कहीं न कहीं एक औरत का हिस्सा मौजूद है, जो सामान्यतः मर्दों की सोच से अलग हटकर औरतों की बारे में सोचता है. इसी उपन्यास में सईद का दोस्त मिस फरिया के बारे में जिस तरह की सोच रखता है, प्रायः सभी मर्द उसी सोच से औरत को देखना-पाना चाहते हैं. वह कहता है कि मैं इश्क-विश्क में बहुत विश्वास नहीं करता. औरत से बहुत देर तक मैं चिपट कर नहीं रह सकता. मैं उस कहावत पर विश्वास करता हूँ कि मिश्री की मक्खी बनो, शहद की मक्खी नहीं. पर, सईद इसके उलट सोचता है. वह औरत को केवल शारीरिक भूख मिटाने मात्र की वस्तु भर नहीं मानता. उसकी नज़र में मुहब्बत का दर्जा बहुत ही ऊँचा है –

“मैं यह नहीं कहता कि मुहब्बत एक निहायत ही एक साफ़ खयाल का नाम है. मुझे ऐसा मालूम होता है कि मुझे पता है, मुहब्बत क्या है...मगर...मैं साफ़-साफ़ बता नहीं सकता. मैं समझता हूँ, मुहब्बत हर शख्स के अंदर एक खास खयाल लेकर पैदा होती है. जहां तक उस खास हरकत का ताल्लुक है, एक ही रहता है. अमल भी एक ही है. नतीजा भी आमतौर पर एक ही जैसा निकलता है.”

सईद के लिए मंटो के आल्टर ईगो की जो बात ऊपर लायी गयी थी, वह यहाँ तालमेल बिठाती हुई दिखती है. पर सईद के मुहब्बत संबंधी इसी ख़्याल के तारतम्य में ही एक बात और निकल कर आती है कि अगर मुझे किसी से इश्क हो जाए तो मैं उस पर अपनी मल्कियत चाहता हूँ. वह औरत सारी की सारी मेरी होनी चाहिए. सईद की यह यह ख़्वाहिश आधुनिक समाजों में पैदा हुई, पली-बढ़ी एक औरत के लिए शायद मंजूर न किया जा सके. मंटो, बहुत ही ऊँचे दर्जे के कलाकार हैं. सईद के अंदर इस किस्म की उधेड़-बुन के सहारे वे मर्द और औरत के बीच हर तरह के सामाजिक और मानसिक साँचे और ढाँचे को प्रस्तुत करना चाहते हैं जिसे सामंती समाज और आधुनिक समाज का अंतर और विकास कहा जाता है. मिस फारिया को लेकर अब्बास और सईद की बातचीत वाले इस प्रसंग से मंटो इस अंतर और प्रगति को सही मायनों में रखकर देखने की माँग रखते हैं. वास्तव में, यह दो तरह की सामाजिक संरचनाओं, दो तरह के मानसिक साँचों को जिस सूक्ष्मता से वे इस बातचीत के प्रसंग में सामने ले आते हैं वह दरअसल, सामंती समाज में पुरुष की स्त्री को  भोगने वाली वृत्ति और आधुनिक समाज में पुरुष की स्त्री पर सम्पूर्ण अधिकार वाली वृत्ति को एक ही सिक्के के दो पहलू के रूप में देखना है. यहाँ आकर मंटो की एक औरत के प्रति जो समझ और सोच का दायरा है वह अपने समय से बहुत-बहुत आगे चला जाता है. उपन्यास का यह प्रसंग, इस उपन्यास को आज की बहस का उपन्यास बना देता है.
  
धीरे-धीरे सरकते हुए उपन्यास अपने क्लाईमेक्स पर पहुँचता है. सईद, अस्पताल से ठीक होकर घर लौटता है पर उसकी भय-ग्रंथि बार-बार उसे उकसाती है कि वह राजो से दूर रहे. हो सके तो उससे बचने के लिए यहाँ से कहीं दूर चला जाए– 

“जिस तरह लोग भूत-प्रेत से डरते हैं, इसी तरह वह इस प्रेम से डरता था. उसको हर समय डर रहता था कि एक वक्त ऐसा आएगा, जब उसके जज़्बात बेलगाम हो जाएँगे और वह कुछ कर बैठेगा. क्या कर बैठेगा...यह उसको मालूम नहीं था. परंतु, वह उस तूफान की प्रतीक्षा कर रहा था, जिसके चिह्न उसे अपने अंदर दिखाई दे रहे थे. इस प्रेम ने उसे डरपोक बना दिया था...”

अपने इसी डर से बचने के लिए वह अमृतसर से लाहौर चला आता है. पर, लाहौर पहुँचने पर एक दूसरा ही संयोग घटित होता है. उपन्यासकार ने जैसे जानबूझकर यह संयोग उपस्थित किया है. क्योंकि, सईद के अंदर जिस सामूहिक चेतना और वैयक्तिक चेतना की जीत-हार का भयानक संघर्ष चल रहा है, यह संयोग उसका क्लाईमेक्स है. मुहब्बत और शादी के झूठे वादे में अपना सब कुछ गँवा चुकी लुटी-पिटी सी अस्पताल की नर्स मिस फारिया से उसका सामना हो जाता है. मिस फारिया उसको देखते ही उससे लिपटकर फफकने लगती है. वह सईद को सबकुछ बताना चाहती है जो कुछ इस बीच उसके साथ घटा है. सईद उसे अपने कमरे पर चलने का प्रस्ताव देता है. एक मर्द से धोखा खाई हुई फारिया को सईद पर पूरा विश्ववास है. दोनों साथ चल देते हैं. कमरे पर आकर अपनी पूरी आपबीती फारिया सईद को बताती है. सदा हँसती-मुसकुराती रहनी वाली मिस फारिया को पूरी हमदर्दी जताते हुए सईद उसके आँसू पोंछकर उसे चारपाई पर बिठाता है. बड़े होने पर यह किसी भी औरत को छूने का यह उसका पहला अवसर है. इस समय वह जो महसूस होता है उसे छिपाता नहीं है बल्कि प्रकट कर देता है – 

'“तुम हमारी सोसायटी से लगता है वाकिफ नहीं हो. हम लोग अपनी माँ बहन के सिवा किसी औरत को नहीं जानते. हमारे यहाँ औरतों और मर्दों के बीछ एक मोटी दीवार पड़ी है...अभी-अभी तुम्हारी बाँह पकड़कर मैंने तुम्हें उस चारपाई पर बिठाया था. जानती हो, मेरे जिस्म में एक सनसनी दौड़ गई थी. तुम इस बंद कमरे में मेरे पास खड़ी हो, जानती हो मेरे दिमाग में कैसे-कैसे ख्याल चक्कर लगा रहे हैं...मुझे भूख महसूस हो रही है, मेरे पेट में हलचल मच रही है...तुमने अपने उस आशिक की बातें कीं और मेरे दिल में यह ख्वाहिश पैदा होती है कि उठकर तुम्हें सीने से लगा लूँ  और इतना भिचूँ, इतना भिचूँ कि खुद मैं बेहोश होकर गिर पड़ूँ...लेकिन मुझे अपने पर काबू पाने का गुर हासिल हो चुका है, इसलिए कि मैं अपनी कई ख्वाहिशें अब तक कुचल चुका हूँ...मैं...मैं हमदर्दी के काबिल हूँ.”

यह है उस सामूहिक-चेतना का सायास-अनायास एक व्यक्ति के ऊपर दबाव और नियंत्रण.
  
मिस फारिया, जो ख़ुद का दुःख से भारी थी, अपना दुःख भूलकर वह सईद के दुःख को सहलाने लगी. उसकी ट्रेनिंग यही थी. वह एक नर्स जो थी. सईद की पीठ पर  सहानुभूति से हाथ फेरते हुए वह कहने लगी–

“यह अजीब बात है, तुम एक औरत से मुहब्बत करते हो और साथ ही मुहब्बत जताना भी नहीं चाहते, वहाँ से भाग आए हो...और किसी दूसरी औरत से भी मुहब्बत करना नहीं चाहते...” फिर वह थोड़ी देर रुककर वह सईद से कहती है तुम बीमार हो...तुम्हें एक नर्स की जरूरत है.”

क्या सचुमुच, सईद बीमार है? उसको फरिया जैसे एक नर्स की जरूरत है जो उसकी बीमारी का इलाज़ कर सके ? क्या यह इलाज़ इतना आसान है ? इस बीमारी के लक्षणों को पहचाने बिना, उसके मूल कारणों को खोजे बिना और मिल जाने पर उसे काटकर अलग किए बिना ऐसी बीमारी का इलाज़ आसान नहीं. पर, मंटो तो मंटो हैं. वे आसान काम भला क्यों करें. इस उपन्यास में भी उन्होंने सामूहिक-चेतना के आगे एक व्यक्ति को हारते हुए नहीं बल्कि उससे विजित होकर बाहर निकलते हुए दिखाया है. सईद के अंदर से जिस सामूहिक-चेतना का भय नहीं निकल रहा था, उसे वह अंतत: निकाल फेंकते हैं. इसे अविश्वसनीय और असामान्य व असाधारण परिणाम के रूप में कुछ लोग देख सकते हैं. इसे, सामाज की वास्तविकता और चलन के विरूद्ध माना जा सकता है क्योंकि, समाज में रहकर व्यक्ति सामाजिक मान्यताओं से अलग कैसे जा सकता है. लेकिन मंटो इसकी परवाह नहीं करते हैं. नर्स मिस फरिया, पीठ सहलाते-सहलाते आगे बढ़कर सईद को चूम लेती है.


“फारिया के होठों की छुअन ने झिंझोड़कर सईद की रूह को आज़ाद कर दिया. तुरंत ही उसने ज़ोर से फारिया के सख्त सीने को अपनी छाती के साथ भींच लिया और दूसरे ही क्षण वे दोनों पलंग पर एक दूसरे में गुम थे.... फरिया ने अपने को उसकी बांहों में सौंप दिया.”

पर, सईद के अंदर जिस भय-ग्रंथि ने दृढ़ता से अपना घर बनाया हुआ है वह इतनी आसानी से कैसे नेस्तनाबूत हो. उसने तुरंत सईद को धर दबोचा. अकस्मात, सईद हाँफते हुए फारिया से अलग हट कर यह कहते हुए दूर खड़ा हो जाता है कि मैं तुम्हारे काबिल नहीं हूँ. फारिया मुसकुराते हुए उसके पास आती है और उसके गले में अपनी बाँह डालती हुई कहती है – बेवकूफ मत बनो. सईद कहता है, “मैं ख़ुद नहीं बनता, बेवकूफ या जो कुछ भी हूँ यह मेरे माहौल की वजह से है....तुम्हारी सोच आज़ाद है, लेकिन मेरी सोच माहौल की जंजीरों में जकड़ी हुई है. तुम मुकम्मिल हो, लेकिन मैं अधूरा हूँ...” लेकिन मंटो, उपन्यास को यहीं खत्म नहीं करते. अगर उपन्यास  यहीं खत्म हो जाता तो व्यक्ति-चेतना पर समूहिक-चेतना विजित हो जाती.

सईद के अकस्मात फारिया से अलग हट जाने के प्रसंग से मंटो समाज और व्यक्ति के बीच आज़ादी और परिपूर्णता (फुलफिलमेंट) का जो द्वंद्व है, जो संघर्ष है उसे और गहरा, और तीव्र और कठिनतर दिखाने की कोशिश करते हैं. जो सईद समाज की बनाई नैतिकताओं, वर्जनाओं, स्वीकृति-अस्वीकृति के नियमों से पूरे उपन्यास में डरता, जिरह करता ख़ुद से लड़ता है, उपन्यास के अंत में जीत जाता है. राजो की तरह फारिया से बचने के लिए वह भाग खड़ा नहीं होता. वह लौटता है और आखिर में उपन्यास इस वाक्य से समाप्त होता है – 

“...उसने सुर्ख आँखों से फारिया को देखा और आगे बढ़कर अपने जलते हुए होंठ उसके होंठों पर जमा दिए. एक बार फिर लोहे के पलंग पर वे एक-दूसरे में गुम हो गए थे.”
  
मंटो समाज में फैली ऐसी अनेकों बीमारियों के मूल कारणों को खोजते हैं, उनकी शिनाख़्त करते हैं और बेहिचक, निर्भय होकर उनकी नश्तरजनी करते हैं. यही कारण है कि तथाकथित सभ्य-समाज की नजरों में वे फ़ोहश-निगार हैं, विकृति के रचनाकार हैं. हम हशमत[9] कहते हैं –

“कोई भी इंसान की रूहों पर चढ़े, गिलाफ़ों को उतारेगा, उघाड़ेगा, दिल-दिमाग की लगी कनातों में झाँकेगा, वह बदले में खुद भी झिंझोड़ा जाएगा. नंगा किया जाएगा. नाप लिया जाएगा. मंटो के साथ ऐसा ही हुआ.”
  
यह उपन्यास हर उस व्यक्ति का उपन्यास है, जिस पर ऊल-जलूल, बेकार, सड़े-गले सामाजिक उसूलों का इतना गहरा और व्यापक सामाजिक व मनोवैज्ञानिक असर रहता है और वह जीवन भर उससे टकराता और उससे छूटने का संघर्ष करता रहता है. मंटो, धर्म और समाज के नीति-नियामक विधि-विधानों, भाग्य, नियति, रीति आदि के दुष्चक्र में फाँसे गए व्यक्ति की वैयक्तिक आज़ादी के समर्थक लेखक हैं. वह अपने पात्रों के व्यक्तिगत/चरित्ररगत गुण-दोष को सामाजिक-साँचों और उसकी निर्मितियों के मूल कारणों से जोड़कर परिभाषित और विश्लेषित करते हैं. ये सामाजिक-धार्मिक साँचे एक व्यक्ति को ताजिंदगी किसी न किसी तरह भाग्य, नियति, पाप, पुण्य, लोक-परलोक, नैतिक, अनैतिक और भी न जाने कितनी श्रेणियों में दबाकर, नियंत्रित कर रखते हैं. मंटो, इस तरह के किसी भी साँचे को आरोपित मानते हैं, जो व्यक्ति के स्वाभाविक और नैसर्गिक निर्माण, विकास और अधिकार में बाधक होते हैं. 

यह उपन्यास इस विषय का बहुत ही महत्वपूर्ण पाठ है. लोगों की नजरों से इतना महत्वपूर्ण उपन्यास अचर्चित कैसे रह गया ? हिंदी में अब तक इस पर बात तो दूर, अधिकांश लोगों को इसकी जानकारी तक नहीं है, आश्चर्य होता है. पर, आश्चर्य भी क्योंकर हो.
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[1] प्रबन्धक, व्यवस्थापक
[2] देवत्व
[3] धर्मज्ञान की शिक्षा
[4] परलोकवाद
[5] मंटो, राजेंद्र सिंह बेदी, कृश्न चंदर, इस्मत चुगताई, ख्वाज़ा अहमद अब्बास आदि के दौर के अफ़साना-निगार. बक़ौल मंटो इन्होंने प्रेम और यौन मनोविज्ञान पर बेहद भद्दे और छिछोरे अफ़साने लिखे हैं.  
[6] बहज़ाद लखनवी (मूल नाम – सरदार अहमद खाँ). शायर और गीतकार.
[7] ध्रुवस्वामिनी
[8] सोशियोलोजी एंड फिलासफ़ी (1954) नामक पुस्तक
[9] कृष्णा सोबती, हम हशमत – 2.
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विनोद तिवारी
आलोचक और संपादक

‘आलोचना की पक्षधरता’, ‘राष्ट्रवाद और गोरा’  आलोचना-कृतियाँ इसी वर्ष प्रकाशित.
‘नई सदी की दहलीज़ पर’ आलोचना पुस्तक के लिए ‘देवीशंकर अवस्थी सम्मान’ और ‘वनमाली कथालोचना सम्मान’ से सम्मानित.‘पक्षधर’ पत्रिका के संपादक.
दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली में हिंदी का अध्यापन
सम्पर्क:  C-4/604, ऑलिव काउंटी, सेक्टर-5, वसुंधरा, गाज़ियाबाद-201012
 मो. : 09560236569/vinodtiwaridu@gmai.com

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  1. सूंदर विवेचना . मैं भी नहीं जानता था कि मंटो ने कोई उपन्यास भी लिखा है . इतनी विस्तृत व विशद चर्चा के लिए आलोचक का अभिनंदन .

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  2. सतीश जायसवाल11/5/20, 9:35 am

    हिन्दी आलोचना को रचना के साथ संवेदनशील होना पड़ेगा।विनोद तिवारी यह काम बखूबी कर रहे हैं। यह संवेदना तभी सही तौर पर मानवीय हो सकेगी जब उसमें इतिहास-बोध भी हो।विनोद तिवारी की आलोचना दृष्टि में वह भी दिखाई पड़ता है।

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  3. राहुल द्विवेदी11/5/20, 9:52 am

    विनोद! तुम्हें क्या बधाई दूँ ।सतीश जमाली वाली पुस्तक यदि तुम्हारे पास हो तो मुहैया कराना मुझे ।रही बात राज कुमार केसवानी की ,तो ये तो फिल्मी गल्पकार हैं और फिर क्या कहना इन्हे ... सन्सेशन पैदा करना आदत मे शुमार जो है ...

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  4. यह उपन्यास किसी ज़माने में 'राजो और मिस फिरिया ' नाम से भी छप चूका है , शायद सरस्वती प्रेस , इलाहाबाद से . बहुत खस्ता अखबारी कागज़ पर . दीमक खा गयी इसे . बहुत बचा बचा कर रखता आया था . अब खत्म हो गया . मैंने बहुत पहले इसका ज़िक्र फेसबुक पर किया था . अब तो मैं सिर्फ शर्मिन्दा हूँ इसे खो देने पर . om globalaaya namah

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  5. Swapnil Srivastava11/5/20, 11:27 am

    माशाअल्लाह , क्या लिखा है विनोद जी । मंटो की भाषा में मंटो को पहचानना हँसी खेल नही हैं ।
    मंटो के अफसानों गर विदेशी भाषाओं में तरजुमा हुआ होता तो वह विश्व स्तर के लेखको में शुमार होते । जिंदगी की तल्ख हकीकतों को उन्होंने बहुत करीब से देखा था ।

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  6. Anuradha Gupta11/5/20, 11:28 am

    बहुत अच्छा लेख है। मंटो के लिखे को समझने के लिए एक ख़ास दृष्टि की जरूरत है। उस दृष्टि के न होने पर और अपने ऊपर ढकी सफ़ेद चादर के उघाड़ के भय से सभ्य बुर्जुआ समाज तिलमिलाता रहा है। उपन्यास का नाम भर बहुत पहले कहीं पढ़ा था। आज फिर से जीवित हो गया। Vinod Tiwari सर हमेशा बेहद बारीकी से चीज़े देखते हैं..उससे अधिक वे रचना को उस जगह से भी देखते हैं..जहाँ रचनाकार ख़ुद खड़ा होता है।

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  7. आशुतोष11/5/20, 1:04 pm

    'बग़ैर उनवान के' उपन्यास का नाम पहली बार पढ़ा। विनोद तिवारी जी का शुक्रिया कि उन्होंने इस उपन्यास की संवेदना को बहुत सुलझे तरीके से हमारे सामने रख दिया । उपन्यास पढ़ने की इच्छा हो आई।

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  8. यह उपन्यास मेरे पास है। मंटो ने नेहरू को एक खुला खत लिखा जो भूमिका के रूप में इस उपन्यास में हैं।केसवानी जी को फोन किया था लेकिन उनको जानकारी नही घी।प्रकाशक ने भी नही बताया जमाली ने आनुवाद किया था।हमने खबर भी दी थी लेकिन हिंदी में गलत जानकारी दी जाती है

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  9. सरल शब्दों में लिखा गया उम्दा लेख।

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  10. रवि रंजन11/5/20, 2:18 pm

    मरहबा ! मरहबा !
    मंटो के लगभग गुमनाम-से इस उपन्यास का बारीकी से विवेचन करते हुए इसकी प्रासंगिकता पर प्रकाश डालने के लिए विनोद जी को धन्यवाद और इसके प्रकाशन के लिए अरुण जी को साधुवाद।
    जाहिर है कि मंटो समाज और खास तौर पर अपने समुदाय में वर्जित माने जानेवाले विषयों पर लिखने के हौसले के लिए जाने जाते हैं। इस्लाम में यज़ीद का नाम बहुत घृणा और क्रोध से लिया जाता है।पर मंटों को इस त्याज्य नाम को भी अपनी एक कहानी का उनवान बनाकर सकारात्मक बातें कहने में कोई हिचक नहीं हुई।

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  11. पंकज चौधरी11/5/20, 3:30 pm

    मंटो मेरे प्रिय कहानीकार रहे हैं। विनोद तिवारी जी ने जिस तरह से उनके उपन्‍यास का भी जिक्र किया है और पूरे मन से उसकी विचेचना की है, उसको पढ़ने की उत्‍कंठा बढ़ गई है। आलोचक की यह महती जिम्‍मेदारी है कि वह रचनाकार के उस पक्ष को पाठकों के सामने रखें जिसको तोड़-मरोड़कर पेश किया जाता रहा है। मंटो के उजले पक्ष को भी उर्दू और हिंदी में स्‍याह करके पेश किया जाता रहा है। जबकि मंटो ने अपने समय और समाज के पाखंड एवं दोगलेपन को खंड-खंड करने का काम किया है। उर्दू में मंटो और हिंदी में राजकमल चौधरी को अराजक लेखक के रूप में पेश करने की रवायत रही है। उर्दू में ज्‍यादा। खैर, विनोद जी को मंटो का इतना सुंदर विश्‍लेषण करने के लिए बहुत-बहुत धन्‍यवाद। उनसे उम्‍मीद है कि वे मंटो जैसे एक बड़े सभ्‍यता समीक्षक का आलोचनात्‍मक विश्‍लेषण आगे भी प्रस्‍तुत करते रहेंगे।

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  12. आशीष मिश्रा11/5/20, 3:32 pm

    मैंने मंटो का यह उपन्यास नहीं पढ़ा। दरअसल मुझे पता ही नहीं था कि मंटो ने कोई उपन्यास भी लिखा है। लेकिन इस आलेख को पढ़कर 'सईद' को समझ सकता हूँ। शायद सईद से ज़्यादा स्वयं को। लेख पठनीय है। उपन्यास भी खोजूँगा।

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  13. राकेश बिहारी11/5/20, 3:34 pm

    मुझे भी मालूम नहीं था कि मंटो ने उपन्यास भी लिखा था। Vinod Tiwari जी ने उपन्यास के मर्म को जिस बारीकी से उद्घाटित किया है, वह उपन्यास पढ़ने के लिए प्रेरित करनेवाला है। मंटो के इस उपन्यास के संदर्भ में व्यक्ति चेतना और सामूहिक चेतना के द्वंद्व को यह आलेख ठीक से परखता मालूम होता है। अब तो यह उपन्यास पढ़ना ही होगा।

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  14. चित्रलेखा प्रकाशन से छपा मण्टो का यह उपन्यास कभी सतीश जमाली ने इलाहाबाद में मुझे उपहार में दिया था। दिल्ली में रखी मेरी किताबों की किसी अलमारी में वो आज भी रखा होगा। लेकिन विनोद तिवारी का यह लेख कमाल का है। धन्यवाद !

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  15. सतीश जमाली के अनुवाद से पहले भी इसका हिन्दी अनुवाद हो चुका था । बचपन में किसी पॉकेट बुक से मंटो की अश्लील कहानियाँ और मिस फारिया नामक दो पुस्तकें पढ़ी थीं । हिन्दी में बेईमानी बहुत है । राजकुमार केसवानी को सतीश जमाली का ज़िक्र करना चाहिए था और सतीश जमाली को उस पॉकेट बुक वाले अज्ञात अनुवादक का । बहरहाल आपने अच्छा लिखा । किताब और अनुवाद का इतिहास तो ठीक है लेकिन विश्लेषण आपका अपना है । मंटो ने एक कहानी लिखी थी - तरक्कीपसंद क़ब्रिस्तान । मंटो के सारे किरदार हाशिये के थे । नीचा नगर जैसे । जिन्हें पूंजीवादी व्यवस्था ने किनारे पर फेंक दिया है । राजो और फारिया भी ऐसे ही किरदार है उन्हें केवल लिबिडो से नहीं समझा जा सकता । उनका वर्ग निर्धारण भी ज़रूरी है । बहरहाल इस लेख के लिए लेखक और समालोचन का आभार !

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  16. मंटो के बारे में समझदारी और जानकारी बढ़ाने के लिए विनोद तिवारी जी को साधुवाद।
    वैयक्तिक चेतना और सामूहिक चेतना के द्वन्द्व को केन्द्र में रखकर आपने अच्छा विश्लेषण किया है।
    इस निबंध की शुरुआत जिस शैली में की गई है उसे पढ़कर मन आशंकित हो उठा था-
    "फ्रांसीसी दार्शनिक और लेखक ज्यां पॉल सार्त्र ने कहीं लिखा है..."
    हिंदी आलोचना के बड़े हिस्से को इस "कहीं लिखा है" शैली ने घेरा हुआ है।
    राजकुमार केसवानी का मसला भी इस शैली से संबंधित है-

    "मुझे नहीं पता कि राजकुमार केसवानी को, आज से 35 साल पहले किए गए सतीश जमाली द्वारा उपर्युक्त अनुवाद की जानकारी थी या नहीं. अगर होती तो प्रस्तवाना में उनका जिक्र जरूर किया गया होता (हालाँकि, हिंदी में इस तरह का रिवाज़ नहीं के बराबर है)."

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  17. मंटो के इस उपन्यास से परिचय करवा कर विनोद तिवारी ने सराहनीय काम किया है. उन्हें हार्दिक साधुवाद.

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  18. ग़ज़ब लाजवाब बेहतरीन लिखा है। खासतौर पर इंसान का पर्सनल और सोशल द्वंद्व काबिले तारीफ़ है। मंटो की इस शानदार पेशकश के लिये विनोद तिवारी जी व समालोचन भी बधाई का पात्र है।

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