सहजि सहजि गुन रमैं : पवन करण

Posted by arun dev on मार्च 04, 2017


पेंटिग : Rekha Rodwittiya 
 
 पवन करण २१ वीं सदी की हिंदी कविता के मुख्य स्वरों में हैं. ‘स्त्री मेरे भीतर’ संग्रह का कई भारतीय भाषओं में अनुवाद हुआ है और उनकी स्त्री विषयक कविताओं को लेकर बड़ी ज़ोरदार  बहसें हुई हैं, अभी भी चल रही हैं.
उनकी कविताओं की स्त्री वह बदली हुई स्त्री है जिसे अपने विचार और संस्कार से लड़ता और खुद को बदलता हुआ पुरुष प्यार करता है.
उनकी कुछ कविताएँ आपके लिए.   




पवन करण की कविताएँ                       





गुस्सा

इधर मेरा तुम्हें प्यार करना शुरू होता
उधर उसका तुम्हें भड़काना

प्यार करने के दौरान ही वह तुम्हें
मेरे किये वह वादे याद दिलाने लगता
जो मैं तब तक नहीं कर सका था पूरे

वह तुम्हें ठीक उसी समय, जब हमारे बीच
बस हमें ही होना चाहिये था,
इस बात के लिये कुरेद देता कि
बहुत चालाक मैं बस तुम्हें प्यार करने से
मतलब रखता हूं, तुमसे नहीं

तुम्हें प्यार करते हुए हर बार
थकने की स्थिति में पहुंच चुका हूं मैं
जब तुमसे कहता अरे यार ये सब
बाद में कह लेना अभी प्यार तो कर लो
मेरी कही इस बात पर वह तुम्हें
इतना भड़का देता
कि तुम मुझे परे धकेल देतीं

तुम्हारा दिल तो मैंने घेर रखा था,
तब तुम्हें, मेरी तरह प्यार करने वाला
तुम्हारा गुस्सा कहां जाता, तो उसने
तुम्हारे दिमाग पर कब्जा कर लिया

तुम्हें प्यार करते हुए मुझे
बराबर लगता रहा जैसे तुम्हारा गुस्सा
तुम्हें मुझसे भी ज्यादा प्यार करता है.





तुम मानने से तो रहीं

छांव को जलाकर रख देने वाली धूप में
मां जब तुम्हारे घर से बाहर निकलने पर
खीज रही होती
घर के दरवाजों को भी लगता
कि वे इस हद तक
लग जायें कसकर कि खुले हीं नहीं

मगर यह सोचकर कि तुम घर में
रूकने से तो रहीं वे चुपचाप खुल जाते

पानी को झुलसाकर रख देने वाली धूप में,
जब पिता तुम्हारे घर से बाहर
निकलने पर बड़बड़ा रहे होते
तुम्हारे स्कूटर को लगता कि वह
शुरु होने से ही इंकार कर दे

मगर वह भी यह सोचकर
कि तुम घर से बाहर निकले बिना
मानने से तो रहीं, वो तुम्हारे
किक मारते ही शुरू हो जाता

धूप में सड़क पर डामर का पिघलना
और मुझसे मिलने के लिये तुम्हारा
घर से बाहर निकलना साथ-साथ होता

जिन्हें तुमने हर बार झटक दिया
तुम्हें मुझसे मिलने को रोकतीं उन बेडि़यों को
धूप ने भी तुम्हारे पैरों में पहनाने की
कोई कम कोशिश नहीं की.






भूलना

भूलना तुम्हारी आदत में
ठीक उसी तरह शामिल था
जैसे मेरी आदत में याद रखना

तुम्हारे भूलने की आदत पर
मैं अक्सर तुमसे कहता
शुक्र है कि शरीर में तुम्हारे हाथ-पांव जड़े हैं

सोचो, यदि वह किसी मशीन के
हिस्सों की तरह होते तो तुम अब तक
उन्हें रखकर कहीं भूल या खो चुकी होतीं
और सबसे ज्यादा संभावना तो
उनके चोरी जाने की होती

तब मेरी बात सुनकर हंसते हुए
तुम मुझसे कहतीं, तुम्हारे रहते
मुझे कुछ याद रखने की
क्या जरूरत है, तुम किसलिये हो
तुम्हारी इस बात पर मैं खीजकर रह जाता

मगर तुम्हारे जाने के बाद
मैं अपने भीतर कहीं
अपना वह प्रेम जो मैंने तुम्हें किया
रखकर भूल गया हूं
वह मुझे मेरे लाख ढूंढने पर भी
नहीं मिल रहा कहीं

अब मैं इस चिंता में हूं
कि जब तुम आओगी और मुझसे
मेरा तुम्हें किया हुआ वह प्रेम
जिसे जाते हुए तुम मुझे
संभालकर रखने की हिदायत दे गईं थीं
दिखाने को कहोगी तो
मैं तुम्हें क्या बताउंगा

सच कहूं तो तुम्हारे जाने ने
मुझे अपना प्रेम ही भुला दिया
क्या तुम जाते-जाते
अपनी भूलने की आदत भी मुझे संभलवा गईं थीं.






हमे ऐसा करते देख 

हम जिस भी पेड़ के नीचे बैठते
उस पर उगीं पत्तियां
उसके कान बन जातीं
और वे अपनी सांसें रोक-रोककर
हमारी गुटुर-गूं सुनतीं
उनमें से कई तो टूटकर
हमारे ऊपर गिर ही पड़तीं

उसके आस-पास की मिट्टी में
घूमतीं चीटियां हमें छेड़ती
वे हमारी ठीक उसी तरह
चिकौटी काटकर भाग जातीं
जैसे बैठे-बैठे एक-दूसरे को
चुपके से नोच लेते हम

तना जिससे पीठ टिकाए
बैठ जाते हम वह हमारी पीठों पर
इस तरह उभर आता
जैसे वह हमारी पीठ के कांच में
खुद पर इतराते हुए
अपना चेहरा देख रहा हो

डालियां अपने हाथों से
छोटे-छोटे फल हम पर उछालतीं
जिनमें से कुछ
तुम्हारी गोद में गिरते
कुछ मेरे कंधों पर
हमारी तन्मयता बिगाड़ते
उनमें से एक-दो तो हमारे
बालों में फंसकर रह जाते

उसके नीचे बैठे हम
हम अक्सर उसकी ओट लेते हुए
एक-दूसरे को चूमते
और जब भी हम ऐसा करते
हमें हमेशा लगता जैसे
उसने मुंह फेर लिया हो अपना

हमें याद नहीं उसके नीचे बैठे-बैठे
हम ऐसा कितनी बार करते
मगर अब हम सोचते हैं
कि हमे ऐसा करते देख 
हर बार उसे अपना मुंह फेरते हुए
कितनी तकलीफ होती होगी.



ये तेरी ये मेरी

बहती हुई हवा में एक-दूसरे से
बार-बार टकराते
या यों कहें कि एक-दूसरे को
छूते और चूमते
गुलाब के दो फूलों को
डाल से बिना तोड़े
एक मैं तुम्हें भेंट करता
एक तुम मुझे

हमारी आंखों के सामने
साथ-साथ और पास-पास
लगे पले और बढ़े और हमारी तरह
एक-दूसरे की आंखों में आंखें
डालकर देखते दो किशोर पेड़ों में से
एक को मैं तुम्हारा नाम देता
और एक को तुम मेरा

कमरे की खिड़की पर
हमारे रखे खाने के लिये
बिला नागा आने वालीं
गिलहरियों कि तरफ से
मैं तुम्हें चूमता
और चिडि़याओं की तरफ से
तुम चूमती मुझे 

सड़क पर जाती
कुत्ता-कुतिया की जोड़ी को
देखकर एक-दूसरे की तरफ
मुस्कराते हुए मन ही मन
एक-दूसरे से ये कहे बिना
कि देखो हम जा रहे हैं
नहीं मानते हम

यहां तक कि बुरी तरह लड़ते
दो लोगों की एक-दूसरे को
दी जा रहीं गालियां भी
ये वाली तेरी और ये वाली मेरी
कहकर हंसते हुए हम
आपस में बांट लेते





छत

छत पर एक दूसरे को काटते हुए बंधी
अलगनियों पर बाल्टी भर कपड़े
सूखने डालते हुए तुमने एक बार भी
आंख उठाकर इस तरफ नहीं देखा

मेरी कटी हुई पतंग और उससे जुड़ी
डोर पड़े-पड़े बदरंग हो गयी
मगर तुमने उन्हें न तो
उठाकर एक तरफ रखा और नहीं
छत से नीचे गली में फैका फाड़कर

मैं ट्रांजिस्टर पर बिना रुके
बजाता रहा गाने पर गाने
मगर किताब पर निगाहें जमाये
तुम्हारे हाथों की उंगलियों में
फंसी कलम अपने पसंद के गाने पर
एक बार भी नहीं थिरकी

भला ऐसे भी कोई मुंह फेरता है
जैसे उस छत की तरफ से
फेरा तुमने, उस छत की तरफ से
जिसे एक समय मेरे लिये लिखकर फैके
खतों से तुमने भर दिया था

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पवन करण   
18 जून 1964

कविता संग्रह :  इस तरह मैं, स्त्री मेरे भीतर, अस्पताल के बाहर टेलीफोन, कहना नहीं आता
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