सहजि सहजि गुन रमैं : नरेंद्र पुण्डरीक

Posted by arun dev on दिसंबर 02, 2016

पेंटिग : लाल रत्नाकर


नरेंद्र पुण्डरीक की इन कविताओं  में गाँव घर है. माँ, पिता, भाई, बेटी, पत्नी और स्त्रियाँ हैं.
कविताएँ कथ्य से बहुत मजबूत हैं.
अनुभव पर विचारों का सेंसर एक सीमा तक ही है.  
जो सच्चाई है वह बयां है.  
हमारे परिवारों में खुद छुपी हुई हिंसा है जिसका शिकार स्त्रियाँ होती हैं. कवि के शब्दों में -

‘हर आदमी की आंख में
एक सूअर का बाल होता है
जो औरत के दिल में अक्सर गड़ता रहता है.’

नरेंद्र पुण्डरीक अपनी इन कविताओं से सीधे चोट करते हैं. 
उनकी पांच कवितायें आपके लिए.

नरेंद्र पुण्डरीक की कविताएँ                                                    




पुल बनी थी माँ


हम भाइयों के बीच
पुल बनी थी माँ
जिसमें आये दिन
दौड़ती रहती थी बेधड़क
बिना किसी हरी लाल बत्ती के
हम लोगों की छुक छुक छक छक

पिता के बाद
हम भाइयों के बीच
पुल बनी माँ
अचानक नहीं टूटी
धीरे धीरे टूटती रही
हम देखते रहे और
मानते रहे कि
बुढ़ा रही है माँ ,

माँ के बार बार कहने को
हम मान कर चलते रहे
उसके बूढे़ होनें की आदत और
अपनी हर आवाज में
धीरे धीरे टूटती रही माँ ,

हाथेां हाथ रहती माँ
एक दिन हमारे कंधों में आ गई
धीरे धीरे महसूंस करनें लगे हम
अपने वृषभ कंधों में
माँ का भारी होना,

जब तक जीवित रही माँ
हम बदलते रहे अपने कंधें
माँ आखिर माँ ही तो है
बार बार हमें कंधे बदलते देख
हमारे कंधों से उतर गई माँ
और माँ के कंधों से उतरते ही
उतर गये हमारे कंधे.



बेसूरत होती औरतें

पत्नी से एक दिन पूछा  कैसी रही अब तक की ?

उसने कहा
निभा लिया मैनें
दूसरी होती तो पता चलता

मैनें कहा दूसरी होती तो
तुम जैसी तो नहीं ही होती
नहीं होती तो भी निभ जाती
उससे भी जैसे तुमसे निभ गयी,

औरतों से निभना उसके  आदमी से अच्छा कौन जानता है
आदमी निभता है
और औरत निभाती है
निभने निभानें के इस बारीक अन्तर को जब तक औरत समझे
समझे तब तक उसकी दुनियां ही निपट जाती है,

ज्यादातर औरतें  आदमी की लंपटई को
उसके हाल में छोड़
अपने को बचती बचाती हुयी
लड़के लड़कियों से होती हुई
नाती पोतों से लग जाती हैं ,

वे अच्छी तरह जानती हैं कि
हर आदमी की आंख में
एक सूअर का बाल होता है
जो औरत के दिल में अक्सर गड़ता रहता है
कोई भी औरत उसको उसकी आंख से निकाल नहीं पाती,

जब भी निकालनें के  लिए  उसकी आंखों में देखती है
तो उसे उसमें अपनी सूरत दिखाई देती है
और
हमेशा वह अपनी ही सूरत के झांसें में आ जाती है ,

अपनी सूरत के झांसें में
आती हुई यह औरतें
उसकी आंखों में कब बेसूरत हो जायेंगी समझ नहीं पातीं.



चलने वाले पांवों में

चलनें वाले पांवों में ही  फटती हैं बिवांइयां
चलनें वालें पांवों में ही  लिपटती है चंदनवर्णी धूल
चलनें वाले पांवों में ही लद कर आते हैं शब्द,

अक्सर चलनें वाले पांवों को देखकर
मुझे अपने पिता के पांव याद आते हैं
जिनकी बिवांइयों में पिता
बसंत के दिनों में
पिलाते थे रेड़ का तेल ,

पिता के पांवों केा देखकर
याद आये थे मुझे त्रिलोचन के पांव
जो पिता की तरह चलते थे तेज तेज
सागर की सड़कों में चलते हुये उनके साथ
मुझे पिता के पांव याद आ रहे थे ,

अब जब मैं चलनें वाले पांवों की चर्चा कर रहा  हूँ.
तों मुझे बमियान में खडे़ बुध्द के
उन पांवों की याद आ रही है
जिनमें अभी कुछ दिन पहले ही
तालिबानियों ने लगाई थी आग
क्योंकि उन्हें निश्चित हो गया था कि
इन्हीं पांवों में चल कर आये थे वे शब्द
जो हजारों साल बाद भी
उनकी नींद को हलाकान करते हैं ,

हालाकि शब्दों से तालिबानियों को
कोई खास परिचय नहीं रहा है
जो अब भी नहीं है लेकिन
यह अंदाजा उनको हैं कि
पैरों की एक भाषा होती है
जो छटा में बेजोड़ और
अनुभव के शीरे में इतनी सीझी होती है कि
जहाँ जाती है उसके
अपने होनें का विश्वास होता है ,

चलते हुये पांव हर
घेरे को तोड़ते और रचते हुये
चलते हैं अपनी इबारत
जिस पर सृष्टि अपना पहिया रखती है.
 


साबका

सबसे पहले मेरा साबका
उन स्त्रियों से पड़ा
जो हवा-धूप के
होते हुये भी
अपने अंधेंरे और सड़न में खुश थी ,

जिनके पति साल के तीन सौ पैसंठ दिन
देवता बने रहते थे
इन्हीं स्त्रियों में मेरी माँ थी
जो हमसे अधिक
शालिग्राम की बटिया के
भोजन और पहनावे के लिए
चिन्तित रहती थी ,

इसके बाद मेरा साथ
उन स्त्रियों से रहा
जो दिन भर चरेर धूप में
रहते हुये भी अपने दुखों को
तनिक भी नहीं काट पा रही थीं ,

हवा-धूप -पानी के
स्वाद के साथ
चढ़ी धोतियों और पानी से उपजा इनका सौन्दर्य
अब भी कहीं
मेरे भीतर सुरक्षित है,

चालीस साल बाद भी जिसे
नहीं व्यक्त कर पाये शब्द
बिंब नहीं उठा पाये
जिसका बोझ
प्रतीक नहीं ठहर पाये
जरा भी जिसके सामने
कुछ भी कहे मर्मज्ञ

मैं इसे कविता में
रख रहा हूँ जस का तस.


बिटिया को देख कर

शादी के बाद पहली बार
घर आयी बिटिया को देखकर
मैं भांप लेना चाहता था कि
जिस घर में बिटिया गई है
घर का आंगन इतना तो है न कि
वह अपने गीले बालों को धूप दिखा सके ,

मै जान लेना चाहता था कि
घर की दीवारे इतनी
उंची तो नहीं हैं कि
चार पाई खिसका कर दरवाजों की
सिंटकनी न खोली जा सके,

और खिडकियों के परदे इतने
भारी तो नहीं हैं कि
बाहर की हवा भीतर न आ सके
किसी के माँ बाप हमेशा तो नहीं रहते
किसी के याद दिलानें पर ही न
उसे याद आयेंगें हम ,
और मेरे बाद
मेरा नाम लेते हुये
नहीं आयेगी अपने भाई के घर ,

न चाह कर भी
मैं यहां यह सब लिख रहा हूँ
क्योंकि बेटी का सुख सीधे
पिता तक पहुंचता है.

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नरेन्द्र पुण्डरीक
(15 जनवरी, 1958) 
कविता संग्रह : नगे पांव का रास्ता, सातों आकाशों की लाडली, इन्हें देखने दो इतनी ही दुनिया,इस पृथ्वी की विराटता में 

सचिव : केदार शोध पीठ न्यास, (बाँदा) 
मो. 8948647444
pundriknarendr549k@gmail.com