सहजि सहजि गुन रमैं : मुसाफ़िर बैठा (२)

Posted by arun dev on जून 23, 2016


पेंटिग : rachel cross

कविताओं की जटिलता को समझने से बचने का सुविधाजनक तरीका है उन्हें वर्गीकृत कर लेना. जैसे ही आप कुछ कविताओं को ‘स्त्री –चेतना’ या ‘दलित – चेतना’ या ‘जनवादी’ वगैरह डिब्बों में बंद करते हैं उनकी तमाम दूसरी विशेषताओं से आपका ध्यान हट जाता है. बड़ी कविता हमेशा इन विशेषणों को चुनौती देती है.

मुसाफ़िर बैठा की कविताओं को पढ़ते हुए अक्सर मुझे लगता है कि इस मुकम्मल कवि को किसी विशेषण में कैद करना उसके साथ अन्याय है. उनकी कविताओं में  हाशिए के जीवन की वास्तविकताएं हैं पर वह कहीं से दयनीय नहीं हैं. उनमें एक बल है और एक दृष्टिवान उम्मीद भी, उन्हीं के शब्दों में कहा जाए तो – ‘नव सोच, नई विरासत, रचने करने का माद्दा’ रखती हैं. 

उनकी कुछ कविताएँ आप यहाँ पढिये. 


मुसाफ़िर बैठा की कविताएँ                                   






डर का घर

जिसे तुम कहते हो देवालय
वह है फकत 
डर का घर.




कवि एवं पारम्परिक ऋतु छवि

कवियों ने ऋतु बसंत के गीत असंख्य गढ़े हैं
पढ़े हैं लहराते परचमी कसीदे निर्बंध अनंत उसके 
की हैं कसरतें तमाम सुख शांति आनन्द आह्लाद
ढूँढ लाने की महज इसी मौसम में

जैसे पंडित अपने पतरा से बांधते हैं 
दिवस माह के अच्छे बुरे चरित्र को गढ़ मनमर्जी
किसी ने वीरों का बसंत ढूंढ रखा है
तो कइयों ने प्रेम की पेंगें बसंत में ही 
बढ़ाने की कड़ियाँ जोड़ी हैं वैसे ही

हरफनमाहिर नागरी ललनाओं ने तो 
क्लबों होटलों की पार्टियों तक में सावन बसंत को 
बाजबरदस्ती ले जा पटक पहुँचाया
जैसे इस माह और ऋतु के प्राकृत-पाँव
हमारे बनावटी वसूलों के साथ भी हम जैसे
सहज ही कर सकते हों अनगढ़ ताल

सावन-बसंत को तमाम लकीर के फ़क़ीर कवियों द्वारा
अलग से दुलारा सहलाया गया 
और दूजे माहों व ऋतुओं से सौतेला किया गया बर्ताव
वर्षा जैसी जीवनदायिनी ऋतु को भी कवियों ने 
कौड़ी के मोल तौल दिया नहीं दिया बहुत भाव
जैसे कि हरियरी की नींव धरने वाली
बसंत और सावन को कोख देने वाली इस ऋतु से
कवि नातेदारी की कोई जरूरत ही न हो।

नित नित जिंदगी जीने की जद्दोजहद करते 
गरीबों मजदूरों मजलूमों सामान्य जनों का
कोई तय महीना नहीं होता सुख का
बारहों मास समान दुःख सुख का होता है उनका 
न ही सावन न ही इतर तिथि कोई 
निर्धारित होती है मज़े के उनके
बसंत तो अलग से बिलकुल ही नहीं.
                                




दादा का लगाया नींबू पेड़

कहीं दूर से किसी गांव के अपने एक आत्मीय से
मांग लाए थे दादा नींबू पौध   
और लगाया था उसे अपनी बाड़ी में

दुख की घड़ी में एक टुकड़ा साथ क्या मांगा
इस नींबू मांगकर बीमार दादी के लिए
पड़ोसी नकछेदी साव को लगा था कि
दादा ने जान ही मांग ली उसकी

जबकि नकछेदी के सांवरे बदन पर
लकदक साफ शफ्फाफ धोती कुर्ता
जो शोभायमान देख रहे हैं आप
उसकी बरबस आंख खींचती सफाई
दादा के कारीगर हाथों की
करामात ही तो है

गांव-जवार सभा-समाज दोस-कुटुम भोज-भात
हर कहीं नकछेदी के धोती-कुर्ते पर
सम्मोहित आंखें जो टंगी होती हैं
पूछने पर दादा के हुनरमंद हाथों का बखान
झख मारकर उसे करना पड़ता ही है

दादा ने यह नींबू पौध नहीं लगाया
गोया लगाया अपने ठेस लगे दिल को
सहलाता एक अहं अवलंब
अपने खट्टे अनुभवों को देता एक प्रतीक

अब दादा की दुनियावी गैरमौजूदगी में
उनका यह अवलंब तब्दील हो गया है
एक अस्मिता स्मृति वृक्ष में
और नया अवलंब नये घर की नींव डालने के क्रम में
है अभिशप्त यह समूल अस्तित्वविहीन हो जाने को

अगर दादा मौजूद होते इस दुनिया में
तो अपने उत्तराधिकारियों से जरूर पूछते
कि किसी पुरा प्रतिगामी थाती की
छाती पर चढ़
नव सोच नई विरासत रचने करने का माद्दा
तुममें क्यों नहीं आया ?                          

                                                                                                 
        

पिता की निर्ब्याज याद

बचपन में गुजर गए पिता की
याद का कोई ठोस मूलधन भी
नहीं है मेरे पास
जिस पर
यादों का कोई ब्याज
जोड़-अरज पाऊं मैं

पिता के बारे में अलबत्ता
मां के बयानों को कूट-छांटकर
मेरे मन ने
जो इक छवि गढ़ी है पिता की
उसमें पिता का
जो अक्स उभरता है झक भोरा
उस हिसाब से
उन जैसों के लिए
इस सयानी दुनिया का कोई सांचा
कतई फिट नहीं बैठता
जहां वे रह-गुजर कर सकते

मां की कभी भूल से भी
पिता की डांट-डपट खाने की
हसरत नहीं हो पाई पूरी
और मेरा बाल-सुलभ अधिकार
जो बनता था
पिता की डांट-धमक का
चेतक धन पाने का
उसके दैनिक हिसाब का एक हर्फ भी
नहीं लिख सके थे पिता मेरे नाम
और इस मोर्चे पर
साफ कर्तव्यच्युत सा रह गये थे वे

अब जबकि
मेरी डांट-धमक से
मेरे बच्चों की दैनन्दिनी
और पत्नी की
अनियतकालिक बही-खाते के पन्नों को
भरा-पूरा देखती हैं
मेरी जर्जर काय स्मृतिपूरित पचासी वर्षीया मां
तो उनका हिय जुरा जाता है

मानो उस डायरी और बही-खाते के
हर एक अक्षर का
खुद भी एक हिस्सा बन गई हों वे.

                                   



बुढ़ाते बालों के पक्ष में

सिर पर एक दो सफेद बालों की
बोहनी ही हुई थी जब
तभी ठनका था मेरा माथा
कि तीस बत्तीस बीतने के साथ ही
उठान की एलास्टिक लिमिट पार कर
बुढ़ाने लगी है मेरी काया

जब तक बीनने लायक ही पके थे बाल
तो दोनों बिटिया पुष्पा व रश्मि
सिर से मेरे उलझी रहती थी जब तब

खेत बाहर किए जाने योग्य
चांदी बालों की फसल उन दिनों
उन बाल मनों को उकताने उचाटने के लिए
बहुत नाकाफी थे

अगला साल दो साल और बीतते बीतते
जब पके बालों की आमद बढ़कर
पहुंच गई कोई बीस पचीस प्रतिशत
तो बाल बिनवाने के दिन भी
लदने प्रतीत हुए
लगा कि अब मेरे बाल दिनानुदिन
हजाम की कैंची के लिए भी
बेशक कम पड़ते जाएंगे

हालांकि
तब भी मैं खुशफहमी पालता
अपने में गाफिल रहा बेफिक्र
कि अपनी बाल बाड़ी में अभी तो
बाल मजदूरों को खटाकर
बखूबी काम चलाया जा सकता है

छुटकी को लगाया काम पर एक दिन
तो उसने भेदक प्रश्न किया--
    पापा, उजलाए बालों को निकालूं
    या कि काले कजरारे बाल

अब मैं जमीन पर था

अब तक पकने लगी थीं
निगोड़ी मूंछे भी इतनी
कि उनकी सफेदी आनुपातिक रूप से
सिर के बालों से होड़ करने लगी
कि मूंछों की चिंता
पत्नी तक को सताने लगी
कि अब बालों मूंछों को
खिजाब के हवाले से
अलग रूप देकर सहज रूप देकर
सभा सोसाइटी में
पचने खपने लायक बनाना
हो गया था नितांत आवश्यक
मेरी बीवी मेरे बच्चों
मेरे सेहत फिक्रमंदों की नजर में

जब पकते बालों ने
पचास फीसदी से टपकर
स्पष्ट बहुमत के आंकड़े में
अपनी घुसपैठ बना ली
तो कॉलेज उम्र के लड़के लड़कियां भी
अंकल संकल से मेरी पहचान कर
मेरी घड़ी का समय पूछने लगे

उम्रजर्जर सफेद सन से बालों वाली
मेरी मां का दर्द भी
अपने इस नौनिहाल के लिए
एक दिन यों फूटा-

      असमय ही पक रहे हैं तेरे बाल
      तेरी उम्र ही अभी क्या हुई है
      तुम्हारे जैसे कितने तो अभी
      कांच कुंवारे ही बैठे हैं
      बेटे
      तू बहू बच्चों के
      खिजाब वाले मशवरे पर
      क्यों नहीं गौर फरमाता


मां
पत्नी
बच्चे
यार दोस्त
यहां तक कि मेरे प्रति
ईर्ष्या डाह रखने वाले
कई खिजाबी लोग-
सभी
मेरे बालों के इस सवाल पर
अजीब इत्तिफाक रखते थे

मुझे इन अपने परायों की खातिर
अपनी बाल-रक्षा के पक्ष में
आखिरी दाव ब्रह्मास्त्रा भी आजमा कर
देख लेने में
कोई बुराई नजर नहीं आई

मैंने चार छह महीने
काली खिजाब चपोती
और स्वाभाविक दिख दिख कर
बोर हो गया
फिर अगले दो चार माह तक
वक्त के असहजकर निवेश की कीमत पर 
मेंहदी का डीसेंट रंग दे दे कर
अपने बालों की
उघड़ती असलियत छुपाता रहा

और अंततः
स्वाभाविकता ओढ़ते तलाशते आजमाते
असहज हो
थक हार कर बैठ गया

जबकि मेरी सहज बुद्धि
अब दे रही है गवाही
कि प्रकृति के अनिवार हस्तक्षेप जनित
अपने स्याह बालों पर
चढ़ी धवल पिचकारी से
मैं कहीं श्रीहत हतकांति
कहां होता हूं.

                                                                    




अरर मरर के झोपरा

बचपन की बारिश का यादों में दखल
अब भी जीवन में बचा बसा है इतना
कि भीग जाता है जब तब
उसकी गुदगुदी से सारा तनमन

मेरे समय के नंग धड़ंग बचपन में
बारिश का भीगा मौसम
गांव भर के कमउमरिया या कि
मेरे हमउमरिया बच्चों के लिए
बेहिसाब मस्ती का उपादान बन आता था

उन दिनों टाट मिट्टी और फूस के ही
घर थे अमूमन सबके और
फूस व खपरैल की बनी होती थी छप्पर
गहरी तिरछी ढालों वाली
छप्परों की ओरियानी से फिसल कर
जो मोटी तेज जलधार बहती थी छलछल धड़धड़
उसके नीचे आ बच्चों का नहाना आपादमस्तक
मौजों के नभ को छू लेना बन जाता था जैसे

छुटपन की उस गंवई मस्ती पर
टोक टाक या पहरा भी नहीं होता था कोई
ऐसा निर्बंध आवारा मेघ आस्वाद पाना
उन नागरी बच्चों को कहां नसीब
जिनके बचपन के प्रकृतिभाव को
हिदायतों औमनाहियों की बारिश ही
सोख लेती है काफी हद तक
और कुछ बूंद बारिश से भी संग करने को
ललचता मचलता रह जाता है शहरी बचपन

हमारे बचपन में हमारी गंवई माएं भी
होती थीं हर मां की तरह फिक्रजदा जरूर
मगर हम बच्चों के भीगने पर नहीं
बल्कि तब
जब कई कई दिनों तक
लगातार होती आतंक में तब्दील हो गई बारिश
थमने थकने का नहीं लेती थी नाम

मां की चिन्ता भी तब
चावल के उफनाए अधहन की तरह
बेहद सघन और प्रबल हो आती थी
जब घर का छप्पर बीसियों जगह से रिसने लगता
और सिर छिपाने को बित्ता भर जगह भी
नहीं बचती घर के किसी कोने अन्तरे में

जर जलावन चूल्हे तक की
ऐसी भींगा पटाखा सेहत हो जाती
कि हमारे घर भर की सुलगती जठराग्नि को
बुझाने की इनकी खुद की ज्वलन शक्ति ही
स्थगित हो जाती

मां मेरे जैसा महज खुदयकीनी नहीं थी
दुख एवं सुख की हिसाबदारी में
ऊपरवाले का हाथ होने में
भरठेहुन विश्वास था उनका भी
हर परसोचसेवी इंसान की तरह

बेलगाम आंधी पानी से
बरसती इस आफत की बेला में
मां भी जलदेवता का गुहार लगाती-

      अरर मरर के झोपरा
      अब न बरसा दम धरा    
      हे गोसाईं इन्नर देबता
      तू बचाबा हम्मरा

और भी न जाने क्या क्या बदहवास
गंवई देसी जुबान में बुदबुदाती
इस आई बला को टालने का
कोई और टोटका भी करती जाती

हम बच्चे बड़े कौतूहल और आशा संचरित निगाहों से
मां के इन संकट निरोधक उपचारों के
बल और फलाफल का
रोमांच आकुल हो बेकल इंतजार करने लगते

तब मुझे कहां मालूम था कि
मौसमविज्ञानी की भविष्यबयानी और
कथित वर्षा देवता की कृपा अकृपा
दोनों ही साबित हो सकते हैं अंततः
सिर्फ मनभरम और छलावा

बारिश से अब भी है साबका
पर बचपन की बारिश में
केवल भींगता था उमगता मन
अबके होती बारिश में
भीगता है अंतर्मन भी
मथती जब बारिश की बाढ़.

(एकलव्य के साथ मुसाफ़िर बैठा)
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मुसाफ़िर बैठा

‘बीमार मानस का गेह’ कविता संग्रह प्रकाशित
'अंडरस्टैंडिंग बिहार' (डा. ए. के. विश्वास) का हिंदी अनुवाद शीघ्र प्रकाश्य
सभी प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में कविता, कहानी लेख आदि प्रकाशित

बिहार सरकार के राष्ट्रभाषा परिषद का नवोदित साहित्य सम्मान.
भारतीय दलित साहित्य अकादमी, नई दिल्ली द्वारा डा. अम्बेडकर फेलोशिप सम्मान

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