सहजि सहजि गुन रमैं : सुशील कुमार

Posted by arun dev on अप्रैल 14, 2016

पेंटिग : Avishek Sen
(OH GOD I'M AFRAID TO CRY)



















सुशील कुमार के तीन कविता संग्रह प्रकाशित हैं, वे अपनी कविताओं में ऐसे काव्य-पुरुष को लाते हैं जो तमाम घात – प्रतिघात के बीच, अपने निविड़ निराशा में भी संघर्ष रत है जैसा कि आम जन. ‘मानुष मारने की कला’ का इधर जैसा विकास हुआ है उसे देखकर उनका लोक आहत है, उसकी अंतिम उम्मीद अब भी उस गड़ेरिये पर है जो अपने देशज में इसे कहेगा. 




सुशील कुमार की कविताएँ                  





पचास की वय पार कर
(परिवार को टूटने से न बचा पाने के सदमे से आहत होकर)

पचास की वय पार कर 
समझ पाया मैं कि 
वक्त की राख़ मेरे चेहरे पर गिरती हुई  
मेरी आत्मा को छु गई है  


उस राख़ को समेट रहा हूँ अब दोनों हाथों से 
और उनमें
अपने होने का अक्स ढूंढ कर रहा हूँ 


डरा मत मुझे,
मेरे पास खोने को कुछ नहीं बचा  
समय उस पर भारी होगा 
जो समय का सिक्का चलाना चाहते हैं 

आने दो अनागत को
उसके चेहरे पर वह राख़ मलूँगा 
(जिसे दोनों हाथों से बटोरी है)  

जितने दृश्य दर्पण ने रचे थे 
वे सब उसके टूटने से बिखर गए 
रेत पर लिखी कविताएँ भी
लहरें अपने साथ बहाकर ले गईं
अब जो रचूँगा, सहेजकर रखूँगा 
हृदय के कागज पर अकथ लिखूंगा 
  
पचास बसंत के पार करने का उत्सव नहीं यह
जीवन के बीचो बीच एक रेखा है
एक चुप-सी छटपटाहट है  
हद से अनहद की ओर एक कदम है
कविता की नई संकेत-लिपि है
अथवा कहूँ तो,
टूटकर फिर जुडने का उन्मेष.
                       


छूटती चीजों का बीतराग



हमारे गाँव, घर, नदी, जल, जनपद और रास्ते
कितने बदल गए देखते-देखते इस यात्रा में
कपड़े, फैशन और लोगों से मिलने-जुलने की रिवाज़ की तरह

कितनी ही अनमोल चीजें रोज़ छूटती गईं हमसे
यादों के भँवर में समाती गईं  
किसी का बचपन
किसी का प्यार
किसी की देह-गंध
किसी के चेहरे का आब
बाबा की ऐनक और गीता
किताब के पन्ने में साल-दर-साल सँजोकर रखा-
पीपल का एक पत्ता

कोई अपना सबसे अजीज़ दोस्त
तो कोई अपना सबसे अच्छा समय
खो चुका चलते-चलते इस यात्रा में

अपनों का दिया दर्द कोई साल रहा बरसों से अब तक अपने सीने में
कोई बीत चुके रंगों की उछरी लकीरें गिन रहा अपने ललाट पर अब भी

इस यात्रा में कई वक्ता अपनी आवाज़ें खो बैठे और हकलाने लगे
धरती को सोहर की तरह गाने वाले कई कोकिल-कंठ गूंगे हो गए
कई कवि-लेखक अपनी मूर्धन्य रचना की पंक्तियाँ तक भूल गए
पर सबसे बड़ा दु;ख है कि बुढ़िया की लाठी खो गई इस यात्रा में

गोधूलि की बेला आने को है..
दिन इस कदर डूबने को है इस यात्रा में कि
साँझ जैसे-जैसे गिर रही धरती पर,
धरती अपना सबसे प्यारा राग भूलती जा रही

न जाने किस दे, किस महासागर से उठी यह आग है कि
(कि कौन सी समय की मार है कि)
उसकी लपटों में भूसी की आग की तरह जल रहे
गाँव-घर, पगडंडियाँ, नदी, जल और जनपद सब-ओर
और धुआँ के गुबार-सा फैल रहा पूरब में

सुबह जहाँ से सूरज पृथ्वी के लिए अपने शौर्य की लालिमा,
आशा, ओस, नमी और दूब की ताजगी लेकर उठा था,
वहाँ साँझ ढलते ही उसकी शलजमी आँखें डबडबा गईं
इस यात्रा में.







लौटूँ फिर

शाख से गिरा हुआ एक सूखा पत्ता हूँ

जब तक जुड़ा था,
धरती ने सींचा 
सूर्य ने हरा रखा 
ऋतु ने प्यार किया 
पंछी ने घोंसले बनाए 
पथिक ने छाँव ली 
हवा ने अठखेलियाँ की 
मेघ ने नहलाया मुझे

यौवन था मस्ती थी भरपूर 
यूँ समझो..
सरसराहट-सा बजता था
जीवन-संगीत मेरी नस-नस में


अपने प्रारब्ध पर किंचित दुःख नहीं मुझे
बस, एक ही इच्छा से भरा हूँ
कि मिट्टी में गर्त हो
लौटूँ फिर टहनी पर वापस
नए रूप में 
उजड़ते जंगल की हरियाली बनकर.




मानुष मारने की कला

बाज़ार जब आदमी का
आदमीनामा तय कर रहा हो

जब धरती को स्वप्न की तरह देखने वाली आँखें
एक सही और सार्थक जनतंत्र की प्रतीक्षा में
पथरा गई हों

सभ्यता और उन्नति की आड़ में
जब मानुष को मारने की कला ही
जीवित रही हो
और विकसित हुई हो

जब कविता भी
एक गँवार गड़ेडिया के कंठ से निकलकर
पढे-लिखे चालाक आदमी के साथ
अपने मतलब के शहर चली गई हो
और शोहरत बटोर रही हो
तब बचा क्या एक लोक-कवि के लिए   ?

टटोल रहा हूँ
अपने  अंदर  प्रतिशब्दों  को  -
तमाम  खालीपन के बीच
गूँथ रहा हूँ एक-एक कर  उन्हें
करुणा और क्रोध के बीच तनी डोरी से
उन कला-पारंगतों और उनके तंत्र के विरोध में
जिसने धरती का सब सोना लूट लिया.


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सुशील कुमार
(13 सितंबर, 1964 पटना)

कितनी रात उन घावों को सहा है, तुम्हारे शब्दों से अलग, जनपद झूठ नहीं बोलता
कविता संग्रह प्रकाशित
रांची में शिक्षा विभाग में कार्यरत

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