सहजि सहजि गुन रमैं : नरेन्द्र पुण्डरीक

Posted by arun dev on मार्च 21, 2016



ll विश्व कविता दिव ll  की 
शुभकामनाओं के साथ 





नरेन्द्र पुण्डरीक की इन कविताओं में हमारे समाज का वह चेहरा दिखता है जिसे अब हिंदी के कवि कहना नहीं चाहते. मध्यवर्गीय आभिजात्य में डूब रही कविता की दुनिया में नरेन्द्र पुण्डरीक की कविताएँ स्थानीयता के बदरंग और विद्रूप को उठाती हैं. इनमें शिल्प और बिम्बों की कौंध नहीं पर सच्चाई की चमक जरुर है. यह हिंदी का सबाल्टर्न प्रसंग है.

आज हिंदी की समकालीन कविता पढ़ जाइए ऐसा लगता है जैसे जातिवाद जैसी कोई विषैली चीज अस्तित्व में ही नहीं है. अंतिम कविता ‘वे नाखूंन थे’ में कवि ने उस सभ्यतागत अनुकूलन का चित्रण किया है जिसमें एक गैर दलित का किसी दलित से पराजित होना सबसे बड़ा अपमान हो जाता था. कवि यह भी देखता है कि अब ये दोनों किसी ‘और’ से पराजित हो रहे हैं.  


  

नरेन्द्र पुण्डरीक की कविताएँ                          




पढ़ानें वाले मास्टर गद्दार थे 

हरे कांच की चूंडियांपहली फ़िल्म थी जो मैनें
अपने शहर के  टाकीज में  देखी थी
नाम तो याद नहीं आ रहा लेकिन
बहुत खूबसूरत थी उसकी हीरोइन
महिनों आंखों के आगे नाचती रही थी उसकी सूरत.

उसके पांवों के तलुवे बहुत मुलायम और खूबसूरत  थे
तब शायद हीरोइनें हाथ और पांवों से ही
अपने खूबसूरत होनें का अहसास कराती थीं
सो उसके पांवों को फ़िल्म का नायक सहला रहा था
इस सहलानें को लेकर
मुझे उस वक्त नायक के भाग्य पर ईष्या हो रही थी.

इस वक्त मैं कुछ दिन
उन लोगों की तलाश में रहा
जो मुझे मुंबई पहुंचा दें
इसके बाद इतना जिन्दा दिल
दिल कभी नही रहा.

इसके पहले अपने स्कूल में
एक फ़िल्म देखी थी दोस्ती
लगा था मेरे घर के सामने यदि
लगा होता ऐसा ही लैम्पपोस्ट तो
किरोसिन की चिन्ता में
हमारे पढ़नें की लौ धीमी न होती.

दोस्तीदेखनें के बाद
लम्बे समय तक दोस्तों का दोस्त बना रहा था
यह वह समय था
जो हम देखते थे वह हमें बनाता भी  था
कोर्स की  किताबों के बीच में
गुलशन नंदा, प्रेमबाजपेई, रानू
इब्नेसफी और ओमप्रकाश
मन में सटने लगे थे
इस सटनें और रमने के दौरांन ही
गांव के पंचायती पुस्तकालय में
देवकीनंदन, कुशवाहाकांत, दादाकामरेड
चित्रलेखा, सेवासदन, और गोदान ने
अपने गांव घर के बंद पट ऐसे खोल कर रख दिये कि
सडांध से जी भन भना कर रह गया था.

इन्हीं दिनों के कुछ दिन बाद
जब मैं कालेज में आया तो
सुनीता और शेखर से मुलाकात हुई
द्वीप की तरह नदी में
हिलुरनें का मन हुआ
प्रेम में तो नहीं लेकिन
गुनाह करनें के बाद
गुनाहगारों के देवता बननें की
शुरुवात हो गई थी.

पढ़नें लिखनें के बाद हर कहीं
बेरोजगारों की लम्बी लाइनें बननें लगी थी
स्कूल में पढ़ते हुये
यह गुमान में नहीं आया था कि
आनें वाले दिनों में इनमें
हमारा अपना भी चेहरा शामिल होगा.

कालेज से निकल कर जब हम
बाहर आये तो देखा कि
बेराजगारों की यह लाइन और लम्बी हो चुकी थी
जहां मैं अपने साथियों सहित
निचाट लपलपाती धूप में खड़ा था
निचाट धूप में खडे़ हुये
मुझे पहली बार लगा कि
जो किताबों में पढ़कर आये थे
वह एक धोखा था और
पढ़ानें वाले मास्टर गद्दार थे
जो लिखे को उल्था करते हुये
हमें कभी समय की इस धूप के बारे में नहीं बताया था
जो हमारें सपनों के रंगों को सुखानें के लिए
बाहर तैयार हो रही थी.

हमारी आंखों में हमारे सपनों के रंग ही नहीं
पिता की आंखों के सपनों के भी रंग थे
जो हमारी फजीहत को देख
उनकी अपनी आंखों में वापस लौट रहे थे.
                  



कपास के फूल की चिन्ता में                   

किताबों में पढ़ा था और
पुरानें पुरखों की बतकही में सुना था कि
हर एक के जीवन में
गुलाब के फूल का मौसम आता है.

मुझे याद नही है
अपने जीवन में गुलाब का मौसम
शायद गुलाब के फूल के मौसम के दिनों में
हमें कपास के फूल की चिन्ता
इस कदर सवार रहती थी कि
हम इन्तजार करते थे हमेशा
परिवार या किसी रिश्तेदार की शादी का
जब कहीं से जुगत लगा कर
पिता बनवाते थे कपडे़
सो हमारा गुलाब के फूल का मौसम
कपास के फूल की चिन्ता में गुजर गया.

कभी कभी दो दो साल
कपास के फूल की चिन्ता में गुजर जाते थे
फिर ऐसी सकीनीं में
कहां से पाते जीवन में गुलाब के फूल.

फिर मन तो आखिर मन है
उसकी क्या कहें
कभी वह हुलसा जरुर होगा
ऐसे वक्त में जरुर
दर्रा दे गई होगी पीछे से अपनी निक्कर
जिसे छुपाते हुये चुपके से
पीछे को सरक लिये होंगे हम.

समय भी क्या चीज है
जब कपास की कुछ चिन्ता कम हुई
तो पता लगा हमारे लेखे
गुलाब का मौसम ही चला गया
हमारे हिस्से में जो जुट जुटा कर मिली
वही हमारे लिये गुलाब थी
वही चमेली.



कविता की लौ                  

पहले पिता गये
फिर गई मां
जब मां गई तो लगा
आंगन से उखड़ गई गुलमेंहदी.

मां गई तो लगा
बोली चली गई
शब्द चले गये
जिनसे रोज बनती थी भाषा.

मां गई तो आंगन में
आंगन में आनें वाली चिडि़यां चली गई
उड़ गये पाहुन को बुलानें वाले कौवे.
           

(दो)
स्मृति में पिता की आवाज है
स्मृतियों की धुन्ध में सिर टकराता हॅू मैं
पेटेंन्ट नहीं हो पायी पिता की गई गाई महाभारत
उनके उठे हुये हाथ नहीं खिंच पाये कैमरे में.

खालिस आवाज से कहां कुछ बनता उखड़ता है
कल ही तो मैंने पढ़ी थी मैंने
एकल काव्य पाठ में अपनी कवितायें
जहां मैं ही श्रोता था
मैं ही वक्ता
जहां मैं ही हिला रहा था अपना सिर
घूमा रहा था अपनी आंखें कि
किसी की आंखों में
दिखाई दे कविता की लौ.




उसे कम से कम दिखे                 

खुशी इतनी कम बची है और
दुख इतने ज्यादा हैं कि
जब देखों तब टप्प से आकर
पूरे घर में फैल जाते हैं.

यह इतनीबार होता है  कि
घर में खुशी आने पर
दुख का धोखा होता है
क्योंकि दुख घर से जाने का
नाम ही नहीं लेते  हैं.

खुशियां बांटनें बंटने का तो
अपना एक तरीका होता है
सो वह कब चुक गई पता ही नहीं चलता
और दुख की स्थिति तो यह  है कि
वह बांटे नही बंटता
अपनी ही उगलियों के पोरों में
फंसा रह जाता है.

अपनी ही उंगलियों में फंसे दुख से
कम से कम इतना तो चाहता हूँ कि
वह नहीं जाना चाहता है तो बना रहे
लेकिन इतना तो करे कि
यदि कोई घर में आये तो
उसे कम से कम दिखे और
उसके जाने के बाद चाहे
मुझे झिझोड़ कर खा जाये.





इन हाथों के बिना                       

यह उन दिनों की बात है
जब मां चांद के लिए
झींगोला सिलवानें की बात सोचा करती थी
इन दिनों अक्सर मेरी
निक्कर पीछे से फटी और
बुशर्ट के बटन टूटे रहते थे.

इस मायनें में मां से अधिक
मास्टर बाबा की याद आती है
जो हमारे गुरबत के दिनों में
बार बार मेरी फटी निक्कर सिलते थे
और टांक देते थे बुशर्ट में बटन.

जब आंखों में आगे का कुछ सुझाई नहीं देता
तब अंधेरें में लौंकते
दिखाई देते हैं यह चेहरे
अक्षय पात्र की तरह.

जिनकी निस्पृहता कई गुना
बड़ी दिखती है पिता से
पिता की तरह दिखते हैं इनके हाथ
मां की तरह दिखती हैं इनकी आंखें
इन आंखों और इन हाथों के बिना
अनाथ सी दिखती है यह दुनियां.




लुक्कू पड़ाव 

पहले पहल जब शुरु
हुआ होगा लुक्कू पड़ाव
जो सबसे पहले लुका होगा
और जिसनें सबसे पहले
लुके हुये को ढूढ़ा होगा
निश्चय ही उन दोनों की जरुरत से
पैदा हुआ होगा लुक्कू पड़ाव.

निश्चय ही यह
लड़के लडकियों के बीच
रसायन बननें की शुरुवात रही होगी
सो हजारों वर्षों से
लड़के लड़कियों के बीच
चल रहा है लुक्कू पड़ाव.

तमाम नये नये अत्याधुनिक
खेलों के सचरनें के बावजूद
आज भी सही मायनें में
जीवन की एक सही शुरुवात
लुक्कू पड़ाव से ही होती है.

जब बढ़ती हुई उमर के साथ
दुनियां की तमाम चीजें
साथ छोड़ देती हैं
तब कही न कही याद में
बना रहता हैं यह लुक्कू पड़ाव.



घर मर जाते हैं                    

कितना सच है
महमूद दरवेश का यह कहना
जब रहने वाले कहीं और चले जाते हैं तो
घर मर जाते हैं.

मैं सोच रहा हूँ
ऐसे ही बिना किसी युध्द के
एक भी कतरा खूंन का गिराये
हमनें छोड़ दिया
मरनें के लिए घर को.

मुझे लगता है जीवित नहीं बचे हम
उसी दिन से शुरु हो गया था
टुकड़ो टुकड़ों में हमारा मरना ,

न यहां बेरुत है
न इज़़राइल
न ताशकन्द
न तेहरान
न बगदाद
पर चालू है घरों का मरना
बिना टूटे दीवारें उसांसें लेती हैं
बंद ताले लगें दरवाजों को देख
बिल्लियां देती हैं बददुआयें
कुत्ते नाम को लेकर रोतें हैं
जब घर मरते हैं.

युध्द से लड़े जूझे घरों में
लोग लौट आते हैं
हाथों से पोछते हुये
बन्द खुले किवाड़ों के आंसू,

जिन घरों को दीवालें
मान कर छोड़ दिया जाता है
उन घरों में कभी नहीं लौटते लोग
कितनी भयानक होती है घर की मौत
छूटते घर की गोहार सुन
सबसे पहले उसकी दीवारें हदसियाती हैं
जिनसे कभी तनी थी छाती.



वे नाखूंन थे                        

जब वे हमारे साथ पढ़ते थे
तब वे हमें अपने नाखूंन के
बराबर छोटे लगते थे
जैसे ही बढ़ते थे उनके नाख़ून
हमारे बाप-दादाओं को
असुविधा होनें लगती थी
इस पर वे उन्हें उनके हाथ पैर से नहीं
सीधे सीधे सर से काट लेते थे
यह देख कर हमें अजीब सा लगता था
क्योंकि वे हमें अपने जैसे ही दिखते थे
पर ऐसा करते हुये
हमारे बाप-दादाओं को राहत महंसूस होती थी
कुछ दिन तक हमारे बाप-दादा
बेखटके आराम से रह लेते थे.

पर वे नाखूंन थे
उन्हें तो बढ़ना ही था
और वे बढ़े.

जब वे खेल के मैदान में
हमारे साथ खेलते थे
हमारे बाप-दादा भय की तरह
उनके आस पास डोलते रहते थे
और वे हार जाते थे
हमारे अकुशल और कमजोर हाथो से
बार बार पिटते थे
क्योंकि उनका पिटना हमारे
बाप -दादाओं को  अच्छा लगता था.

खेल के मैदान में हारते हुये जब वे
पढ़ाई के मैदान में आगे होते दिखाई देते
तो हमारे बाप -दादा हम पर
खीझते हुये कहते हम सब की
नाक कटा लओ
यह चमरे ससुरे  आगे बढ़ गओ

यह वह दिन थे जब वे
स्कूल में भूखे रहने पर भी
पेट को हवा से फुलाये रखकर
हमारे साथ दिन भर पढ़ते थे
तब इन्हें अपनी भूख मारनें की
कई कलाये आती थी
अक्सर पानी से पेट फुला कर
पहुंचते थे घर
कभी हवा से
कभी पानी से
पेट फुला कर बढ़ते हुये
इन्हे देख कर अक्सर लगता था

कितने बेवकूफ और बेसहूर थे
हमारे  बाप -दादा जो
दीप की लौ को
अंधेरे की चादर से ढ़कनें में ही
गवां दी अपनी सारी अक्ल.

यह सब और इस समय को देखकर
मुझे विष्णु नागर की कविता की
यह लाइनें याद आ रही है
दया राम बा
नंगे रहो और करो मजा
यानी अब हमारे लिए और
उनके लिए कुछ नहीं बचा
यह नंगों का समय है
नंगे मजा कर रहे हैं.
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(सभी पेंटिग्स : K. P. REJI)
नरेन्द्र पुण्डरीक
(15 जनवरी, 1958) 
कविता संग्रह : नगे पांव का रास्ता, सातों आकाशों की लाडली, इन्हें देखने दो इतनी ही दुनिया,इस पृथ्वी की विराटता में 
सचिव : केदार शोध पीठ न्यास, (बाँदा) 
मो. 8948647444
pundriknarendr549k@gmail.com