मंगलाचार : विशाखा राजुरकर

Posted by arun dev on फ़रवरी 13, 2016











बसंत है और इजहारे मोहब्बत का चलन भी. जश्ने–बसंत और बसंत-उत्सव नाम से इसे  मनाने  की लम्बी परम्परा भी है. आइये प्रेम की धीमी आग में सुलगती युवा कवयित्री विशाखा राजुरकर की इन कविताओं को पढ़ें. 



विशाखा राजुरकर  की कविताएँ                                   


(एक)

मैंने जाना है
कि तुम तक आने के लिए
मुझे अपने ही हिस्से आना होगा

मैं सबके हिस्से आई हूँ
पर उतनी ही
जितना आसमान आता है किसी के हिस्से
कमरे की खिड़की से

कहा तो था मैंने तुम्हें
कि मैं पूरी की पूरी
तुम्हारे हिस्से ही आना चाहती हूँ
पर तुम्हारी खिड़की भी बहुत छोटी थी
और मैं तो आसमान न थी,
चिड़िया थी
सो, उड़ गई

उड़ जाना
छूट जाना नहीं है
बल्कि अपना हिस्सा लेकर
अपने आसमान के पास जाना है...

तुम आसमान हो
और मेरी खिड़की फैल कर
पृथ्वी हो गई है!



(दो)

मैं चाहती हूँ
तुम रहो
जब सूरज जन्म ले रहा हो
मैदान के अंतिम छोर से.
जब खड़ा हो वो ठीक मेरे सामने
तुम रहो इतने नजदीक मुझसे
कि तुम्हारे होने का अहसास
मेरी रूह को हो जाए
और मैं जान सकूँ
सुबह कितनी सुंदर होती है!



(तीन)

लौटूंगी फिर मैं
बीते वक़्त के गलियारे में
और चुरा लाऊँगी हवा वहाँ से
थोड़ी सी धूप वहाँ की
थोड़ी सी शाम भी
और आसमान का वो टुकड़ा
जहां से तारे देखते थे हमें

उस गीत की धुन भी
ले आऊँगी वक़्त के उस पार से
जिसे थोड़ा और जीना बाकी रह गया था..
फिर जिये हुए वक़्त को
थोड़ा और जी कर
समेट लूँगी सब कुछ
तुम्हारी मुस्कुराहट पर
जो किसी झोपड़ी के कोने में रखे
दिये सी चमकती है

अभी के चुराये इस वक़्त को
अपनी कागज़ की डिबिया में
सहेज लिया है मैंने



(चार)

तुम शून्य हो,
शून्य मेरे!

शून्य शायद स्थिति है तुम्हारी
जहाँ मैं अपना गणित लगाती हूँ।
घटा देती हूँ दूरी, जोड़ देती हूँ छुअन 
और तुम शून्य से अपनी स्थिति बदल देते हो
घट जाते हो तुम भी मेरे साथ, वक्त में,
तुम और मैं जुड़ कर हम हो जाते हैं..

पुड़िया भर जितने
'हमारे' वक्त में से
निकल आती हूँ मैं बाहर,
तुम भी अंकों को घट जाने देते हो
और फिर अपनी स्थिति पर खड़े हो जाते हो
अचल, शून्य भाव से, शून्य बनकर...

लेकिन मैं अकेली नहीं आ पाती वापस!
तुम्हारे शून्य का प्रभाव
लग जाता है मेरे पीछे,
मैं एक से दस हो जाती हूँ!

सुनो,
मैं तुमसे प्रेम करती हूँ,
कितना, पता नहीं,
पर तुम हर बार मुझमें बढ़ते जाते हो
एक और शून्य के साथ...



(पांच)

मंदिर में खड़े तुम
देवता लगते हो

डूबते सूरज को ताकते 
अपनी संरचना को याद करते
शाम के बदलते रंग में
स्थिर खड़े तुम
ध्यान में लीन
चेहरे पर शांत भाव लिए
सारी व्याकुलता आँखों में समेटे
देखते हो क्षितिज के उस पार
ढूंढते हो कोई छोर पिछले जन्म का
जो तुम में अब भी जीवित है

मुस्कुराहट तुम्हारी शून्य से शून्य तक
कहती है न जाने कितनी कहानियाँ

कहानियां, जो तुम में दबी रहीं
डूब गयी झील के पार
सूरज के साथ,
पंछी उड़ा ले गए जिन्हें
दूसरे देश,
बादल बरसा आए जिन्हें
किसी और शहर

तुम्हारी कहानियों से
महक उठी होगी धरती वहाँ की
जहां किसी की प्रेमिका रहती होगी
सुबह के इंतज़ार में!
वो सुबह जो यहाँ हुई, इस शाम
इसी जगह पर
जहां से तुम
देवता लगते हो!



(छह)

बांसुरी पर प्रेम धुन
और ठीक उस वक्त 
मन से लड़-झगड़ने के बाद
मुड़कर तुम्हें न देखना..

ऐसे ही रह जाती है मेरे पास
तुम्हारी कई-कई यादें,
अधूरी ख्वाहिशों के साथ..

जीवन में तुम्हारा होना
बंद पलकों के पीछे दबे
गुनगुने आँसुओं का सा है
जो बह जातें हैं आँख खुलते ही,
जैसे तुम कोई ख़्वाब हो
उड़ जाते हो हवा के साथ,
और हवाओं में घुला
अधूरा संगीत
निशानी बन जाता है
मेरे अधूरे प्रेम का!

सुनो,
मेरा अधूरा प्रेम तुम पूरा नहीं कर पाओगे
पर मैं इसे छोड़ जाऊँगी थोड़ा सा
तुम्हारे पास...

  

(सात)

"जानते हो न,
मैं तुमसे प्रेम करती हूँ?"

हर बार शब्द पिघल जाते हैं
जब वो इंकार में सर हिला देता है,
ठोस रह जाती है सिर्फ देह
जिनके बीच आत्माओं का मिलन होता है
और पुनर्जीवित होता है उसका सत्य
कि वो उससे प्रेम करती है

वो फिर भूल जाता है सब कुछ
अगले पुनर्जीवन तक के लिए
_________________

#H.S. 3, Uddhav Das Mehta Parisar, Nehru Nagar, Bhopal (M.P.)