1/20/2016

हस्तक्षेप : एकलव्यों की शहादत और रोहित वेमुला





हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी के ‘सायंस टेक्नोलॉजी एंड सोसायटी स्टडीज' के पीएच.डी. छात्र रोहित वेमुला की ख़ुदकुशी ने समाज, छात्र-राजनीति और शिक्षा-तन्त्र पर सवाल खड़े कर दिए हैं. 
विश्वविध्यालयों की स्थापना के मूल में ही यह निहित है कि वे सभी तरह की सीमाओं (धर्म, समाज,राज्य) और वर्जनाओं से परे एक स्वायत्त और स्वतंत्र क्षेत्र बनेंगे जहाँ ज्ञान का संवर्धन सुनिश्चित किया जा सके.  क्यों ये आधुनिक गुरुकुल एकलव्यों की कब्रगाह बनते जा रहे हैं?  

एकलव्यों की शहादत की परम्परा रही है. इस सवाल को बड़े सन्दर्भ में देख रहे हैं युवा समाजशास्त्री संजय जोठे.



एकलव्यों की शहादत और रोहित वेमुला                                          
संजय जोठे



लित अस्मिता के लंबे संघर्ष और ज्ञान सहित ज्ञान की ऐतिहासिक राजनीति के सन्दर्भ में चार बहुत महत्वपूर्ण प्रतीक हैं जो बहुत गहराई से ध्यान में रखे जाने चाहिए. ये चार प्रतीक चार दिशाओं की तरह हैं जो इस सन्दर्भ विशेष में आज तक उभरी चार आत्यंतिक संभावनाओं को उनकी प्रेरणाओं और सफलताओं/असफलताओं के साथ उजागर करते हैं. दलित अस्मिता के संघर्ष के भूत, वर्तमान और भविष्य को इन चार प्रतीकों के आईने में रखकर देखिये आप न सिर्फ कारणों और प्रक्रियाओं को देख पाएंगे बल्कि समाधान को भी देख पाएंगे.
ये चार प्रतीक कौनसे है? ये चार प्रतीक ऐतिहासिक क्रम में इस प्रकार हैं: एकलव्य, विवेकानन्द, अंबेडकर और हाल ही में उभरे रोहित वेमुला.

इन चारों में कुछ हद तक वैचारिक संगति है लेकिन थोड़ी ही दूर चलकर वह संगति भंग हो जाती है और चारों के मार्ग अलग अलग हो जाते हैं. अब कई लोगों को इन चारों में संगति या विसंगति की खोज और इस खोज से निकलने वाले विमर्श से कष्ट हो सकता है और वे इस पूरे प्रयास को एक प्रक्षेपण या आरोपण भी कहेंगे. लेकिन इसके बावजूद इस तरह के विमर्श को विकसित करके चर्चा में लाने का समय आ चुका है.

इन चार व्यक्तियों में - जो विचार और कर्म यात्रा के चार प्रतीक या चार दिशाएं हैं - उनमें क्या समानता या संगति है? ध्यान से देखें तो पता चलेगा कि ये चारों शूद्र या उससे भी नीचे माने गए दलित और आदिवासी हैं. एकलव्य एक आदिवासी जनजातीय समाज से आते हैं जो हिन्दू वर्ण व्यवस्था से बाहर का समाज है. विवेकानन्द कायस्थ यानी शूद्र हैं. लेकिन अंबेडकर और रोहित वेमुला दलित हैं, जो कि फिर से वर्ण व्यवस्था से बाहर के समाज से आते हैं. इनमे से कालक्रम में शुरुआती दो प्रतीक ज्ञान की राजनीति में गुरु भक्ति, दासता और इनसे उभरने वाले शोषण और व्यक्तिगत या सामूहिक पराजय से जुड़े प्रतीक हैं और बाद के दो प्रतीक विद्रोह और उससे उभरने वाले भविष्य के पुनर्निर्माण के प्रतीक हैं.

आइये इन प्रतीकों में प्रवेश करें. सबसे पहले एकलव्य को लेते हैं. एकलव्य एक जनजातीय समाज के महान धनुर्धर और योद्धा हैं जो उस समाज के सत्ताधीशों के लिए और धर्म के ठेकेदारों के लिए एक संभावित खतरा बन गए थे. एक ज्ञान का रसिक और प्रतिभाशाली धनुर्धर जो अपनी धुन का पक्का है और एकांत में जंगल में गुरु द्वारा दुत्कार दिए जाने के बावजूद अपनी लगन से धनुर्विद्या का महान कौशल अर्जित कर लेता है. इस बात को देखकर निश्चित ही शोषण पर जीवित परजीवियों को डर लगता है कि इस बालक ने अगर भविष्य में इस विद्या का उपयोग सत्ताधीशों के खिलाफ किया तो उनकी खैर नहीं. यह एक व्यक्ति के विद्रोह सहित उसके पूरे समुदाय की तरफ से उठ खड़े हो सकने वाले विद्रोह की संभावना से भय था. इस भय का निवारण दो तरह से किया गया, पहला तरीका था गुरुभक्ति के भावनात्मक जाल में फंसाकर एकलव्य को गुरुदक्षिणा के लिए राजी करना और इस तरह उसका अंगूठा मांगकर उसे अपंग बना देना. सभी भावुक और सरल एकलव्य सदा ही इस जाल में फंसते आये हैं. यहाँ गौर करनेकी बात ये है कि गुरु द्रोण ने एकलव्य को शिष्य बनाने से बहुत पहले ही इनकार कर दिया था और किसी भी रूप में वो एकलव्य से गुरुदक्षिणा लेने के अधिकारी नहीं थे, लेकिन यह एकलव्य की भावुकता थी जो उन्हें गुरु मानकर उनके लिए अपंग होने को प्रस्तुत हो गया. 

दूसरा तरीका था इस गुरुभक्ति को एक नैतिक आदर्श की तरह प्रस्तुत करना और एकलव्य के समाज के साथ भविष्य में इस बात की पुनरावृत्ति को न्यायसंगत ठहराना, इस घटना की ऐसी व्याख्या करना जिससे कि गुरु द्रोण और उनकी षड्यंत्र रचने वाली घोर अनैतिक मानसिकता पर प्रश्न न उठाये जाएँ. फिर हमेशा की तरह आस्था और गुरुभक्ति की चाशनी में लपेटकर यह जहर एकलव्य की संतानों को भी सदियों तक पिलाया गया. इन दो तरीकों ने एकलव्य सहित उसके समुदाय में उठ सकने वाली समानता की पुकार और मांग को नष्ट कर दिया गया.

दूसरा उदाहरण या प्रतीक स्वामी विवेकानन्द का है. विवेकानंद कायस्थ यानि शूद्र हैं. वे अपने ब्राह्मण गुरु रामकृष्ण के अनन्य भक्त हैं और सच में ही एक आध्यात्मिक प्रज्ञा से सम्पन्न महापुरुष हैं. उनके सचेतन व निर्णय पूर्वक किये गए समाज सुधार आंदोलनों और धर्म प्रचारों से ऊपर ऊपर बहुत फायदा हुआ नजर आता है. लेकिन बहुत गौर से देखें तो वे एकलव्य की तरह ही शोषक मानसिकता के प्रति समर्पित नजर आते हैं. वे अपनी तीक्ष्ण बुद्धि और गहरे सामाजिक सरोकार के कारण अपने काम के दौरान उसकी निस्सारता की संभावना को भी अनुभव करते रहे हैं. इसी कारण वे जानते रहे हैं कि जब तक समाज की संरचना में मूलभूत बदलाव नहीं होता तब तक उनके या अन्य किसी के भी धर्म प्रचार या अध्यात्मिक जागरण का कोई मूल्य नहीं हो सकता. यह जानते हुए वे बहुत बार निराश हुए हैं और इसी निराशा में उन्होंने अनेकों बार चेतावनी दी है कि शूद्र बहुसंख्यकों को उनके वैध अधिकार अगर नहीं दिए गए तो एक दिन वे हिन्दू समाज को फूंक मारकर उड़ा देंगे.

विवेकानंद स्वयं एक शूद्र कुल की संतान होने के नाते शोषण और दमन को बहुत करीब से देख सके थे. लेकिन जिस तरह एकलव्य एक झूठी गुरुभक्ति में फंसकर अपने अंगूठे सहित अपने जीवन की तमाम सृजनात्मक संभावनाओं को दान में दे चुके थे उसी तरह विवेकानंद भी एक झूठे और परलोकवादी अध्यात्म में फंसकर अपनी तार्किक और क्रांतिकारी संभावनाओं को दान कर चुके थे. यहाँ गौर करना होगा कि परलोकवादी अध्यात्म की गुलामी एक व्यक्ति या आदर्श की गुलामी की तुलना में बहुत अधिक भयानक होती है, यह शोषित व्यक्ति की पूरी प्रतिभा सहित उसके जीवन भर के कर्तृत्व को ही अपह्रत कर लेती है और शोषक सत्ता को बनाए रखने में उसी की शक्ति का इस्तेमाल कर लेती है. विवेकानंद वो एकलव्य हैं जिनसे उनका अंगूठा नहीं माँगा गया बल्कि इससे कहीं आगे बढ़कर उन्हें इस बात के लिए प्रशिक्षित किया गया कि वे लाखों एकलव्यों को ऐसा पाठ पढाये जिससे कि वे  समानता और अधिकार की बात ही न उठा सकें. वे एक मासूम कठपुतली की तरह शोषक व्यवस्था द्वारा अपने ही बहुसंख्य बंधुओं के खिलाफ इस्तेमाल कर लिए गए नजर आते हैं. और यह काम उन्होंने आत्मा परमात्मा भक्ति और पुनर्जन्म के शोषण भरे सिद्धांत को प्रचारित करके किया.

यह एक सच्चाई है कि इन्ही सिद्धांतों में फंसे होने के कारण दलितों और स्त्रियों ने हजारों साल की लंबी अमानवीय यातना के बावजूद व्यवस्था के खिलाफ कोई विद्रोह नहीं किया. विवेकानंद स्वयं में एक ईमानदार और मानवतावादी चिंतक रहे हैं लेकिन वे जिस भक्ति के प्रभाव में फंस गये वहां उनके तर्कपूर्ण चिंतन के लिए काम करने की कोई सुविधा न थी. शिकागो वक्तृता के नतीजे में पश्चिमी समाज से उन्होंने जो कुछ सीखा उसे लागू करते हुए वे एक महान क्रांतिकारी की मुद्रा अपना लेते हैं लेकिन एक धर्म पुरुष या सन्यासी होने के मोह या पहचान से बाहर नहीं निकल पाते. इस द्वंद्व से गुजरते हुए वे बहुत ही रेडिकल कदम उठाते हैं और उन्ही के समकालीन ब्राह्मण उनके शूद्र होने का ताना मारते हुए उन्हें परेशान करते हैं. लेकिन वे अपने धार्मिक और आध्यात्मिक आदर्शों से मुक्त नहीं हो सके. इसीलिये उनकी व्यक्तिगत इमानदारी के बावजूद उनके मन में बैठ गए आदर्श ने उनसे शोषितों के खिलाफ ही एक बड़ा काम करवा लिया. यह असल में ऐसी बात है कि एकलव्य का अंगूठा नहीं काटा गया बल्कि एकलव्य को उसके समस्त कौशल और क्षमताओं के साथ उसी के लोगों के खिलाफ खड़ा कर दिया गया.

अब हम अंबेडकर पर आते हैं. अंबेडकर शुरुआत से ही ज्ञान और सत्ता की राजनीति सहित धर्म और अध्यात्म के खेल को भी बहुत गहराई से समझ लेते हैं. चूँकि उनका सामना किसी भारतीय शैली के द्रोण से या गुरुकुल परम्परा से नहीं होता बल्कि वे ब्रिटिश राज में लोकतांत्रिक ढंग से रची गयी इंग्लिश माध्यम की शिक्षा प्रणाली से गुजरते हैं इसलिए निष्पक्ष, वैज्ञानिक और तटस्थ प्रज्ञा की धार उनमे शुरू से ही आकार ले लेती है. ब्रिटिश सेना में सूबेदार रहे उनके पिता उन्हें जैसे संस्कार और निडरता सिखाते हैं उनके प्रभाव में बालक अंबेडकर गुरुभक्ति और धर्मान्धता से आजाद हो चुके होते हैं. इसीलिये वे न एकलव्य बनते हैं न विवेकानंद, वे संविधान निर्माता और भारत में सामाजिक बदलाव के सबसे बड़े प्रेरणा स्त्रोत बन जाते हैं.

अंबेडकर को इस अर्थ में देखना एक नया अनुभव है. उनके जीवन और कर्तृत्व की सार्थकता को कई कोणों से देखा जा सकता है लेकिन ज्ञान और सत्ता की ऐतिहासिक राजनीति के अर्थ में उन्हें इस तरह देखना एक प्रेरक अनुभव है. अंबेडकर जिस तरह से अपने ज्ञान को गुरु और धर्म की सब तरह की भक्तियों से मुक्त करते चलते हैं वो बात बहुत ही सूचक और प्रेरक है. उनके ज्ञान और इस ज्ञान को अर्जित करने में किये गए संघर्ष में लेशमात्र भी स्वार्थ न था वे अपने समुदाय अपने लोगों के लिए संघर्षरत थे और अंततः इसी ज्ञान से उन्होंने भारतीय सामाजिक आर्थिक और राजनीतिक इतिहास की वो इबारत लिखी जो सबके लिए प्रेरणास्त्रोत बन चुकी है.

अंबेडकर स्वयं बहुत लोगों से सहायता लेते हैं. न सिर्फ नैतिक समर्थन और प्रेरणा वे कई सवर्ण प्रगतिशीलों से लेते रहे हैं बल्कि कईयों से आर्थिक सहायता भी उन्होंने ली हैं. लेकिन एकलव्य और विवेकानंद से अलग जाकर उन्होंने गरीबों और अपने दलित वंचित समुदाय के हित से कभी समझौता नहीं किया. यहाँ यह बात गहराई से नोट करनी चाहिए कि वे धर्म और व्यक्ति दोनों की गुलामी से आजाद थे इसलिए इतना सार्थक निर्णय ले पाए और उस पर आजीवन अमल कर पाए. ये दलितों, आदिवासियों और शूद्रों (ओबीसी) के लिए भविष्य निर्माण के लिए सबसे बड़ी सीख है जो इस तुलना में उभरती है.

अब अंत में रोहित वेमुला को लेते हैं. एक गरीब किसान परिवार में जन्मे रोहित शुरुआत से ही अभावों और अकेलेपन में जीते रहे. आर्थिक कठिनाइयों से गुजरते हुए ज्ञान के प्रेम ने उन्हें आकर्षित किया और तमाम मुश्किलों से गुजरते हुए उन्होंने एक कठिन राह चुनी. इस देश में पीएचडी करना और ज्ञान को अपना व्यवसाय बनाना वैसे भी एक कठिन चुनाव है. और अगर आप दलित या आदिवासी समाज से आते हैं तो ये बहुत हद तक एक आत्मघाती निर्णय है. लेकिन रोहित अपने रुझान से बुद्धिजीवी थे और उन्होंने यह मार्ग चुना. वे भी अंबेडकर के रास्ते पर हैं और तर्क और तटस्थ वैज्ञानिक चिंतन को आधार बनाकर अपना विचार जगत रचते हैं. वे एक प्रकृति विज्ञान के लेखक बनना चाहते थे लेकिन सामाजिक विज्ञान की विद्रूपताओं के लिए भी पर्याप्त जागरूक व सक्रिय थे. अगर वे एकलव्य या विवेकानंद की तरह किसी व्यक्ति या परलोकवादी विचार के गुलाम होते तो वे भी कहीं अंगूठा गँवा चुके होते या अपने कौशल को अपने ही लोगों के खिलाफ इस्तेमाल कर रहे होते. लेकिन सौभाग्य से वे सब तरह की भक्तियों से मुक्त थे. इस तरह वे एकलव्य और विवेकानंद के मार्ग पर नहीं गए. लेकिन वे अंबेडकरी रुझान और क्षमता होने के बावजूद अपनी यात्रा बीच में ही क्यों छोड़ गए, ये बड़ा प्रश्न है. इसका उत्तर अंबेडकर की जीवन यात्रा से गुजरते हुए मिलता है.

अंबेडकर की ही तरह रोहित अभाव में जन्म लेते हैं और उन्ही जातिगत भेदभाव कुंठा और अकेलेपन से गुजरते हैं. जीवन और विचार यात्रा की शुरुआत में ही वे भी किसी कुटिल या शोषक व्यक्ति सहित शोषक धर्म के प्रभाव में नहीं आते. लेकिन औपचारिक शिक्षा व्यवस्था में प्रवेश करने के बाद शिक्षा के तन्त्र में फंसकर वे बहुत कमजोर हो जाते हैं. अंबेडकर जिस तरह अपनी शिक्षा के लिए धन और समर्थन जुटा सके थे वैसा समर्थन रोहित न जुटा सके. साथ ही एक संगठित षड्यंत्र ने जिस तरह रोहित के खिलाफ मोर्चा खोला और उन्हें मानसिक रूप से परेशान व अकेला कर दिया वह भी अपने आप में एक बहुत बड़ा कारक रहा है उनके आत्मघात के चुनाव का. अपने करियर, अपनी पढ़ाई और परिवार सहित अपने लोगों के लिए अपनी प्रतिबद्धता के बीच वे संतुलन नहीं बैठा पाए और अपनी जीवन और चिन्तन यात्रा पर स्वयं ही पूर्ण विराम लगा दिया. उनपर विश्वविद्यालय के महत्वपूर्ण स्थानों पर जाने पर जो पाबंदी लगाईं गयी, जिस तरह से छात्रावास से निकाला गया, उनके लिए वह सब बहुत ही निराश और अकेला कर देने वाला अनुभव था. उन्ही के पत्र से यह भी स्पष्ट होता है कि पिछले सात महीनों से फेलोशिप न मिलने के कारण वे भयानक आर्थिक तंगी से गुजर रहे थे. रोहित के मामले अपर विचार करते हुए हम पाते हैं कि कहाँ पर उनकी यात्रा अंबेडकर की यात्रा की दिशा से भिन्न हो जाती है.

अब इस पूरे प्रसंग में हमारे लिए क्या ग्रहणीय है? भारत के बहुसंख्य गरीब, ओबीसी दलित आदिवासी सहित स्वयं सवर्ण बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए हमें क्या करना होगा? बहुत साफ़ शब्दों में कहा जाए तो हमारे लिए एक ही ग्रहणीय है. हमें अगर शोषण और अवैज्ञानिक आदर्शों से मुक्त होना है तो हमें गुरु (व्यक्ति) और धर्म के सम्मोहन से अपने बच्चों को आजाद करना होगा. यह एक अन्य सच्चाई है कि सवर्ण बच्चे भी अगर वैज्ञानिक चिंतन से दूर रहेंगे तो उनका भविष्य भी अच्छा नहीं है, वे भी विज्ञान, तकनीक और समतामूलक समाज की रचना करने में पश्चिमी बच्चों से पिछड़ते जायेंगे.


हमे गुरुभक्त एकलव्य या धर्मभक्त विवेकानंद नहीं चाहिए. हमें वैज्ञानिक चिन्तन से भरे रोहित और अंबेडकर चाहिए, वह भी इस विनम्र आग्रह के साथ कि आगे कोई रोहित भविष्य में अंबेडकर हुए बिना बीच में ही न रुक जाए. इसके लिए यह जरूरी है कि वर्तमान और भविष्य के रोहितों को कंगाल और अकेला बनाने वाले षड्यंत्रों को बेनकाब किया जाए. दलित, आदिवासी और ओबीसी (शूद्र) छात्रों को आर्थिक सहयोग के अलग से इन्तेजाम किये जाएँ और छात्र राजनीति की गुंडागर्दी को रोका जाए. यह न केवल इस देश के बहुसंख्य शूद्रों, दलितों, आदिवासियों के हित में है बल्कि यह तथाकथित सवर्ण लोगों के भी हित में है. कोई भी समाज या देश अपने बहुसंख्य गरीबों का तिरस्कार करते हुए स्वयं सुख से या स्वतंत्रता से नहीं जी सकता. भारत की लंबी गुलामी और पराजय इस बात का सबूत है. 



जिन लोगों को भारत से प्रेम है उन्हें इस बात पर सहानुभूति से और गहराई से विचार करना चाहिए. अगर वे अपने बहुसंख्य भाइयों को उनका वैध अधिकार देने की सुविधा जुटाते हैं तो यही उनकी तरफ से इस देश की सबसे बड़ी सेवा होगी.
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संजय जोठे  university of sussex से अंतराष्ट्रीय विकास में स्नातक हैं. संप्रति टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ़ सोशल साइंस से पीएचडी कर रहे हैं.
sanjayjothe@gmail.com

10 टिप्‍पणियां:

  1. बेनामी20/1/16, 10:54 am

    रोहित वेमुला की मौत त्रासद है। पर इससे भी अधिक त्रासद है उसकी मौत पर राजनीति शुरू कर देना, उसकी मौत को भी मोदी को गरियाने के एक और अवसर में बदल देना ... शरद पवार, मायावती, रामविलास पासवान आदि जैसे तमाम दिग्गज दलित नेताओं ने भी दलितों के नाम पर अब तक बस राजनीति ही की है! इन तमाम दलित नेताओं ने भी दलितों का भला करने की न कभी सोची और न कभी सच्ची कोशिश ही की ! उन लोगों ने भी दलितों को महज वोट बैंक से अधिक कुछ नहीं समझा ! पिछले दस वर्षों में पंद्रह से अधिक छात्रों की मौत हुई, लेकिन इनमें से किसी ने भी चूँ तक नहीं किया ! क्या सिर्फ़ इसलिए कि तब मोदी को गरियाने के अवसर नहीं थे? क्या इसलिए कि तब कांग्रेस की सरकार थी?? कोई बताएगा कि खुद को दलितों का मसीहा मानने वाली वामपंथी पार्टियों में भी दलितों का कितना प्रतिनिधित्व है? वहाँ कितने दलितों को कोई महत्वपूर्ण पद दिया गया है? तथाकथित प्रगतिशील और जनवादी लेखक संगठनों में कितने आॅफिस बियरर दलित हैं?? तथाकथित समाजवादी मीडिया में दलितों का कितना प्रतिनिधित्व है??? यकीनन हर जगह बहुत कम या लगभग नगण्य !!! फिर वहाँ कौन लोग काबिज हैं???? पर इन मुद्दों की तरफ़ किसी का ध्यान नहीं जाता ! न ही कोई इन असली मुद्दों को उठाना और सामने लाना चाहता है ! जिस सरकारी तंत्र को सब कोसते नहीं थकते, उसी सरकारी तंत्र की सरकारी नौकरियों में दलितों का प्रतिनिधित्व सबसे बेहतर है और यह दिनों दिन बढ़ेगा भी। इस बात पर किसी का ध्यान नहीं जाता ! इस बात को कोई नहीं स्वीकारता ! किसी भी गलत बात का विरोध करना उचित है पर विरोध के आवेग में असल मुद्दों को गुम कर देना एकदम अनुचित। और विरोध करने की धुन में विश्लेषण करने की क्षमता खो देना एकदम दुर्भाग्यपूर्ण !!!

    - राहुल राजेश।

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    1. पता हैं हैदराबाद युनिवर्सिटी के उन 5 विद्यार्थीओं को होस्टल से निलंबित क्यों किया था ?

      उन 5 दलित विद्यार्थीओं ने आतंकी याकूब मेमन के फांसी के विरोध में कैंपस के अंदर आंदोलन किया था ... बडे बडे पोस्टर पर लिखा था , घर घर से तयार होंगे और याकूब मेमन .
      जिनमे आत्महत्या करने वाला छात्र रोहित वेमुला हैदराबाद युनिवर्सिटी में पढ़ता था .. जहाँ वामपंथी और मुस्लिम नेताओ ने दलित छात्रों को अपनी राजनितिक रोटी सेकने का एक माध्यम बना रखा हैं ..

      रोहित वेमुला हैदराबाद युनिवर्सिटी में गौमांस भोज आयोजन करने के सबसे आगे था ..जबकि गौमांस भोज के पीछे दिमाग ओबैसी का था ..
      फिर इसने मुंबई ब्लास्ट के खूंखार आतंकी याकूब मेमन को फांसी देने का खूब जोर शोर से विरोध किया .. और फांसी के बाद इसने अपने होस्टल के कमरे को "याकूब मेमोरियल हाल" बनाकर पेश किया .. और लोगो को याकूब को श्रधान्जली देने के लिए अपने कमरे में बुलाता था ...

      इसके सगठन "अम्बेडकर स्टूडेंट्स एसोसिएशन" ने मुस्लिम संगठनो के साथ मिलकर याकूब की फांसी के विरोध में एक डाक्यूमेंट्री "मुजफ्फरनगर बाकी है " बनाई इस डाक्यूमेंट्री में मुस्लिमो को हिन्दुओ पर हमले करने के लिए उकसाया गया था ..

      अम्बेडकर स्टूडेंट्स एसोसिएशन के ऐसे कार्यो का जब एबीवीपी और पुलिस ने भी विरोध किया ..तब युनिवर्सिटी प्रसाशन ने छात्रों को तीन बार चेतावनी दी ..और उनके अभिभावकों को पत्र लिखकर चेतावनी दिया गया की आपका बच्चा पढाई में नही बल्कि नेतागिरी और राष्ट्रविरोधी कार्यो में लिप्त रहता है .. फिर भी जब सुधार नही हुआ तब पांच छात्रों को होस्टल से निकाल दिया गया ...

      रोहित इतने प्रतिभाशाली थे कि, अपने ४०-५० साथियों के साथ अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् (ABVP) समर्थक छात्रो को भी पीटा था... रोहित वामुला का लिखे सुसाइड लेटर लिंक -http://www.bbc.com/

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  2. बेनामी20/1/16, 11:37 am

    संजय जी का आलेख सही मुद्दों की तरफ इशारा करता है यानी सबको बराबरी का हक, सबके साथ बराबर का व्यवहार और इसकी पुख्ता व्यवस्था करना। पर एक बात समझ में नहीं आई कि कायस्थ कब से शूद्र हो गए? स्वामी विवेकानन्द के परिचय में तो सर्वत्र उन्हें कुलीन बंगाली कायस्थ परिवार में जन्मा बताया जाता है जिनके पिता विश्वनाथ दत्त कोलकाता हाईकोर्ट के बड़े वकील थे!

    - राहुल राजेश।

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  3. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 21-01-2016 को चर्चा मंच पर चर्चा - 2228 में दिया जाएगा
    धन्यवाद

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  4. बेनामी20/1/16, 6:53 pm

    बाबा साहब अंबेडकर, जिनके नाम पर ये छात्र संगठन बना है, हिंदू कट्टरता के जितने विरोधी थे उससे कम इस्लामिक कट्टरता के नहीं थे जिसका एक जघन्य रूप याकूब मेनन था और जिसकी फांसी का विरोध रोहित और उसका संगठन कर रहा था. यहां तो बाबा साहब की आत्मा भी कहीं बुद्ध-लोक में बैठकर आंसू बहा रही होगी. बाबा साहब ने मुस्लिम कट्टरता के बारे में भी कुछ विचार अपने साहित्य में भी व्यक्त किए हैं, सुधीजन उसे भी पढ़ लें. समान नागरिक संहिता पर बाबा साहब के विचार अभी तक ठीक से प्रचारित नहीं हुए हैं-नेहरू से उनका एक मतभेद ये भी था.

    इतिहासकार पेट्रिक फ्रेंच अपनी किताब 'इंडिया: ए पोर्ट्रेट' में कहते हैं कि जब उन्होंने दलित विषयक सामग्रियों पर शोध शुरू किया तो वे आश्चर्य में पड़ गए. आधुनिक काल के अधिकांश प्राथमिक और द्वीतीयक लिखित स्रोत जो उन्हें मिले वे छद्म इसाई संगठनों द्वारा दलित नामों से चलाए जा रहे थे. ऐसे में उन्होंने सीधे आम दलितों से साक्षात्कार लेना ज्यादा मुनासिब समझा. इस आलोक में फिर से एक बार फॉरवर्ड प्रेस, बीफ पार्टी और अंबेडकर स्टूडेंट्स एसोशिएशन को याद कीजिए.

    बाबा साहब अंबेडकर आधुनिक काल में समाज में भेदभाव के विरोधी और समानता के संभवत: सबसे बड़े समर्थक थे. हिंदू धर्म की जातीय कट्टरता का विरोध उनका लक्ष्य था लेकिन भारत विरोध नहीं. सबसे बड़ी बात वे वामपंथी नहीं थे, उन्हें इस देश की माटी से और इसकी संस्कृति के उत्तम अंशों से प्यार था.

    दिक्कत ये है कि जो अंबेडकर कभी वामपंथी नहीं रहे, जो मुक्त बाजार व्यवस्था के समर्थक रहे, राष्ट्रवाद के प्रति समर्पित रहे, मजबूत विदेश-नीति के उद्घोषक रहे, उनके अनुयायियों के बीच छद्म रूप से वामपंथी तत्व घुसपैठ कर गया है जिसका एक बड़ा हिस्सा सायास या अनायास रूप से राष्ट्रविरोधी है. हैदराबाद विश्वविद्यालय के छात्र रोहित की मासूम लेखनी उसके निर्दोष व्यक्तित्व को दर्शाती है, लेकिन अंबेडकर स्टूडेंट्स एसोशिएशन के तमाम कृत्य ऐसे ही हैं जैसे JNU के अतिवादी वाम-संगठनों के होते हैं.
    http://www.ichowk.in/politics/suicide-of-dalit-student-rohith-vemula-in-hyderabad-university-and-roll-of-left/story/1/2507.html

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  5. इस पूरे लेख मे वामपंथ की कहीं प्रशंसा नही की गयी है। वो कोई मुद्दा ही नही है यहां। मुद्दा इतना ही है कि शूद्र दलित और आदिवासी क्यों अपनी लड़ाई ठीक से नहीं लड़ पा रहे हैं। क्यों वे व्यर्थ की भक्तियों में उलझे रहते हैं। मैंने अपनी बात बहुत स्पष्ट शब्दों में रखी है। कन्फ्यूजन कहाँ है?

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  6. बेनामी20/1/16, 11:18 pm

    मुझे तो शुरू से ही शक था लेकिन अब तक के चौतरफा खुलासों से यह एकदम साफ़ हो गया है कि रोहित वेमुला की मौत का मामला वैसा नहीं है जैसा दिखता है या दिखाया जा रहा है! या दिखाने की सायास कोशिश की जा रही है! रोहित के परिवार वालों ने भी संदेह जताया है कि रोहित की मौत के पीछे साजिश हो सकती है! और यह भी कि यह अन्दरूनी साजिश भी हो सकती है! और यह भी कि रोहित का अंतिम पत्र भी क्या सच में रोहित ने ही लिखा था या किसी और ने? अगर रोहित ने वह पत्र लिखा था तो उसमें अपने ही संगठन के नाम के अलावा किसी भी अन्य व्यक्ति या संस्था का जिक्र क्यों नहीं है? उसने किन some bad elements की तरफ इशारा किया था?? और इस पत्र के इस अहम तथ्य को अबतक जानबूझकर क्यों छिपाया जाता रहा??? क्या कहीं ऐसा तो नहीं कि रोहित अपने ही लोगों का शिकार हो गया या उसके अपनों ने ही उसे ऐसा करने को मजबूर कर दिया और अब उसके अपने ही अपनी करतूतों पर परदा डालने के लिए उसकी मौत का मातम मना रहे हैं???? यह भी कहा जा रहा है कि बंगारु दत्तात्रेय यादव हैं! जबकि उन्हें ब्राह्मण बताकर इस घटना को दलित बनाम ब्राह्मण का मामला बताया जा रहा है! यह भी कि दलित प्रोफेसरों ने भी उन पाँच दलित छात्रों को हास्टल से बाहर निकालने की सिफारिश क्यों की थी? कहा तो यह भी जा रहा है कि खुद रोहित भी दलित नहीं थे! वैसे वे किसी भी जाति या वर्ग के हों, उनकी मौत दुखद है और इसके पीछे की सच्चाई का यथाशीघ्र सामने आना बहुत जरूरी है। और जो कोई भी इसके पीछे है उसे तत्काल दंडित करना निहायत जरूरी है।

    पर इससे भी कहीं ज्यादा जरूरी है उन सभी विषधर वामपंथियों, दल्ला दरबारियों और अराजक आपियों आदि आदि को बेझिझक बेनकाब करना जो तथ्यों, कारणों, पृष्ठभूमियों आदि की सही पड़ताल और निष्पक्ष विश्लेषण किए बिना ही विरोध करने के नाम पर विरोध करने कूद पड़ते हैं, तथ्यों को अपने छुद्र फायदों के लिए तोड़मरोड़ कर पेश करने लगते हैं और समाज में जानबूझकर वैमनस्य पैदा कर अपनी अहमियत साबित करने के अमानवीय अवसर तलाशने लगते हैं!

    -राहुल राजेश।

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  7. हो सकता है की रोहित इस सिस्टम की जातिगत से त्रस्त था और कई बातें सामने आई है ,
    एक सवर्ण होते हुए मैंने जाती में न पड़ कर इंसानी भावनाओं के साथ वही न्यूज़ पोस्ट की है , जो तथ्यों से सामने आई है ,
    कृपया अवलोकन करें - http://naukri-recruitment-result.blogspot.com/2016/01/blog-post_21.html

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  8. Aklesh Jareda22/1/16, 7:41 am


    हम एक दोहरे मापदंड वाले समाज में रहते हैं ....हम लोग किन्हीं भी मुद्दों की व्याख्या अपने सुविधानुसार करते हैं ...हमारे देश में ऐसे कई मुद्दे हैं जिनकी व्याख्या सोचने पर मजबूर कर देती हैं ....हम सभी जानते और मानते भी हैं कि महिलाओ को पुरुषवादी सोच का शिकार ,शोषण ,अधिकारों से वंचित सदियों से होना पड़ा हैं ....और उनको आरक्षण देने की बात पर शायद हम सहमत भी होते हैं और कुछ हद तक दिया भी गया हैं ....लेकिन क्या उनको जितना उनका हक़ हैं उतने आधिकार देते है.....? ...इसी तरह हिंदी -अंग्रेजी माध्यम की शिक्षा की बीच की खाई, न्यायालयों में अंग्रेजी का वर्चस्व , आईएएस की परीक्षा में हिंदी माध्यम वालो के साथ भेदभाव सभी समाजो में समान रूप से क्यों महसूस किया जाता हैं ? ....जब आप विदेश जाते हैं तो वहां दिए गए आरक्षण का फायदा क्यों उठाते हैं ...? वैश्विक संस्थाओं में अपने विकासशील और तकनीक का रोने क्यों रोते हैं...? ....अंतर्राष्ट्रीय समुदाय में अपने साथ होने वाले भेदभाव को क्या प्रत्येक भारतीय अनुभव नहीं करता ?.....यदि करता हैं तो फिर महिलाओं और SC - ST ....समुदाय के साथ आपको क्यों सद्भावना नहीं हैं ?......ये बात आपको क्यों परेशां नहीं करती ....? या फिर आप इंसान ही नहीं हैं ?

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  9. बेनामी12/2/16, 10:41 am

    संजय जी आपकी विवेचना बहुत ही महत्वपूर्ण। इस आलेख में हमारे समय को चिन्हित करनेवाले विमर्श और सवाल उठ रहे हैं। जो पाठक को समृद्ध करते हैं। बहुत बधाई। - प्रदीप मिश्र

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