परख : फाँस (संजीव): राकेश बिहारी

Posted by arun dev on अक्तूबर 29, 2015














वरिष्ठ कथाकार संजीव का उपन्यास ‘फाँस’ भारतीय कृषक समाज की वर्तमान दारुण दशा पर केन्द्रित है. बड़ी संख्या में किसानों की आत्महत्या पूरे तंत्र पर सवालिया निशान है. समस्या जितनी विकट है सहित्य में उसका अंकन उतना ही कम दीखता है. फाँस के माध्यम से संजीव ने इसके सभी पहलुओं को देखने की कोशिश की है. आलोचक राकेश बिहारी की समीक्षा.    



प्रगति के सरकारी सूचकांकों के विरुद्ध…                                     
राकेश बिहारी 



नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो द्वारा प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार 1995 के बाद हमारे देश में आठ लाख से ज्यादा किसानों ने आत्महत्या की है, जिसमें महाराष्ट्र के कपास-किसानों की संख्या सर्वाधिक है. यह सिलसिला अब भी जारी है. ताजा जनगणना आंकड़ों के अनुसार पिछले कुछ वर्षों में किसानी छोड़ चुके किसानों की संख्या भी एक करोड़ से कुछ ही कम है. उल्लेखनीय है कि चीन दुनिया में सर्वाधिक कपास पैदा करनेवाला देश है. पूरे विश्व में होने वाले कपास उत्पादन का एक चौथाई भारत के हिस्से आता है. विश्व पटल पर खास कर चीन की तुलना में कपास उत्पादन और किसानों की समृद्धि/बदहाली से संबन्धित भारतीय आंकड़े चिंतनीय हैं. आखिर क्या कारण है कि इसी कपास की खेती करने वाला चीनी किसान लगातार समृद्ध होता जाता है और भारतीय किसान लगातार आत्महत्या को मजबूर है? रेखांकित किया जाना चाहिए कि पिछले कुछ वर्षों में सांप्रदायिक हिंसा-प्रतिहिंसा की घटनाओं में जितने लोग मारे गए हैं उनकी तुलना में आत्महत्या करने वाले किसानों की संख्या कई गुणा ज्यादा है.

संजीव


संख्या के हिसाब से इतनी बड़ी आबादी द्वारा आत्महत्या किए जाने के बावजूद यह मुद्दा सांप्रदायिकता की तरह भारतीय राजनीति का केंद्रीय मुदा क्यों नहीं बन पाता है? उद्योग-व्यापार के साथ परस्पर कदमताल करती हुई एक ठोस कृषि-नीति बनाने और उस पर अमल कर इस समस्या को समूल खत्म करने के बजाय सिर्फ आर्थिक-पैकेज के दिखावटी टोटकों के सहारे इस समस्या को जिंदा रखते हुये कृषि-व्यवसाय को लगातार हाशिये पर धकेलते जाने वाली तथाकथित विकासवादी आर्थिक नीति का सच क्या है? सरकारी बैंकों की पंजिकाओं में दर्ज किसान-कर्ज के आंकड़ों के मुक़ाबले महाजनी व्यवस्था के चंगुल में बिलाआवाज़ कराहते कृषक समूह की त्रासद हक़ीक़तें कहाँ दर्ज होती हैं? इन और इन जैसे  कई अन्य महत्वपूर्ण और ज्वलंत प्रश्नों को केंद्र में रख कर लिखा गया प्रख्यात कथाकार-उपन्यासकार संजीव का नवीनतम उपन्यास फांस इस पूरे प्रकरण की आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनैतिक पेंचीदगियों की सूक्ष्म पड़ताल करता है.

सभ्यता-विकास के आरंभिक प्रस्थानों में से एक कृषि, समय के साथ कैसे सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनैतिक संरचना का अनिवार्य हिस्सा बन गया यह अपने आप में एक बहुत बड़े आख्यान-प्रतिआख्यान का विषय है. संजीव का यह उपन्यास सामाजिक संरचना की तमाम जटिलताओं के बीच खेती-किसानी की त्रासद हकीकतों को परत-दर-परत भेदते हुये सभ्यता और विकास के नाम पर जारी उपक्रमों की एक मारक समीक्षा करता है. महाशक्ति, प्रगति और आधुनिकता की दौड़ मे शामिल राष्ट्र-राज्य की भावी कार्ययोजना की निर्मिति में इस सभ्यता-समीक्षा की  बड़ी भूमिका हो सकती है.

अपनी रचनाओं के प्रतिपाद्य के छोटे से छोटे अवयव की खोज में गहन से गहनतर शोध करना संजीव के कथाकार की बड़ी विशेषता है. एक ऐसे समय में जब जानकारियाँ और सूचनाएँ हमारी उँगलियों के पोरों और माउस की एक क्लिक पर अपनी पूरी भाव-भंगिमाओं के साथ उपस्थित हो जाती हों, अपनी रचनाओं के लिए जरूरी रेशों-उपरेशों की खोज में सीधे उसकी जमीन तक जाकर उसकी बारीकियों में धंसने का यह गुण, जो लगातार दुर्लभ होता जा रहा है, संजीव को न सिर्फ अपने समकालीनों में बल्कि हिन्दी कथा-लेखकों की पूरी परंपरा में अलग से ला खड़ा करता है. संजीव के कथाकार-उपन्यासकार की इस खास खोजी वृत्ति के गुण-सूत्र इस उपन्यास में भी आद्योपांत मौजूद हैं. इंटरनेटी शोध प्रविधि और जमीनी शोध प्रविधि का रचनात्मक अंतर भी उपन्यास में हर कदम बोलता मालूम होता है. गौर किया जाना चाहिए कि संजीव की यह शोध-प्रविधि एकरैखिक न हो कर बहुपरतीय है, जिसे हम अंतर-अनुशासनिक भी कह सकते हैं.

संजीव अपनी औपन्यासिक कृतियों में सिर्फ समस्या या उसकी विडंबनाओं की ही बात नहीं करते, उसके समाधान का विकल्प या मॉडेल भी प्रस्तुत करते हैं. एक लेखक या किसी भी कला विधा के सर्जक की भूमिका की कोई निश्चित परिधि तो तय नहीं की जा सकती पर किसी समस्या का समाधान प्रस्तुत करना उसके कार्यक्षेत्र का अनिवार्य हिस्सा है या फिर व्यवस्था को समाधान खोजने की दिशा में उद्यत करना यह एक विचारणीय प्रश्न है. संजीव द्वारा अपनी कृतियों में समस्या का समाधान प्रस्तुत करने के आग्रह का मूल कारण उनके शोध की यह अंतर-अनुशासनिक प्रविधि ही है. सुदीर्घ रचना प्रक्रिया के दौरान अंतर-अनुशासनिक शोध की सभी या कि अधिकतम प्राप्तियों के रचना में उपयोग कर लेने का लेखकीय लोभ कई बार कृति के कलात्मक रचाव में कुछ दिक्कतें भी खड़ी करता है.  किसी बड़ी कथा-कृति के कुछ हिस्सों का अत्यधिक विवरणात्मक या सूचनात्मक हो जाना हो या कि समाधान प्रस्तुत करते हुये कृति का किसी खास खांचे के रूमान की जद में आ जाना, ऐसी ही दिक्कतों के कुछ उदाहरण हैं, जिन्हें इस उपन्यास में भी यत्र-तत्र देखा जा सकता है. लेकिन बावजूद इसके संजीव ने जिस तरह इस उपन्यास के कथा-परिवेश की लोमहर्षक त्रासदियों को घटनाक्रम की सम्पूर्ण सामाजिक विडंबनाओं के साथ शब्दबद्ध किया है, वह न सिर्फ हमारी संवेदनाओं को झकझोरता है बल्कि उपन्यास को एक कलात्मक ऊंचाई भी प्रदान करता है. परिणामत: पात्रों के सुख-दुख, राग विराग, उत्साह-हताशा एक सीमा से आगे बढ़ने के बाद पात्रों की काया से निकल कर पाठकों की संवेदना का हिस्सा बन जाते हैं. पात्रों की संवेदना को पाठकों की संवेदना से जोड़ देने का ही यह नतीजा है कि छोटी, सिंधु ताई, शकुंतला, अशोक, विजयेन्द्र, सुनील आदि पात्र अपने पाठ के दौरान और उसके बाद भी देर तक हमारे भीतर सांसें लेते हुये मालूम पड़ते हैं.

पिछले लोकसभा चुनाव के अभी बहुत दिन नहीं बीते हैं, जब आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल ने गुजरात सरकार के विकास की बहुप्रचारित अवधारणा को चुनौती देते हुये 2003 के बाद गुजरात में 5874 किसानों की आत्महत्या का मामला बहुत ज़ोर-शोर से उठाया था, जिसका खंडन करते हुये, गुजरात सरकार ने आत्महत्या करने वाले किसान की संख्या सिर्फ एक बताई थी. किसानों की आत्महत्या संबंधी परस्पर विपरीतधर्मी आंकड़ों के इस सच से भी यह उपन्यास बहुत बारीकी से पर्दा उठाता है. आत्महत्या के बाद मुआवजा बांटने के लिए पात्र और अपात्र के संधान का सरकारी उपक्रम किस हद तक मनुष्यविरोधी और अपनी प्रकृति में हिंसक है, उसे इस उपन्यास में बहुत आसानी से समझा जा सकता है.

बैंक का कर्ज चुकाने में अपनी पूरी ज़िंदगी की कमाई लुटा देने के बाद मौसम और सरकारी नीतियों की मार झेलते किसी किसान की आत्महत्या सिर्फ इस आधार पर सरकारी दस्तावेजों में किसान की आत्महत्या के रूप में दर्ज नहीं होती कि बैंक के लेजर्स में  उसके विरुद्ध कर्ज की कोई रकम बाकी नहीं है. ज़िंदगी की महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों के बीच बार-बार हानि उठाने के बाद आत्महत्या को मजबूर हुये किसी नवयुवक किसान की आत्महत्या एक किसान की आत्महत्या नहीं मानी जाती क्योंकि सरकारी दस्तावेजों में भू-स्वामी के नाम के सामने उस किसान-पुत्र का नाम न हो कर उसके पिता का नाम अंकित होता है. आंकड़ों के गणित के आधार पर अपने राज्यों की छवि और सरकारी कोषों की निधि बचाने की सरकारी कवायदें अंतत: किसान-विरोधी ही साबित होती हैं. जब मृत्यु के बाद परिवार जनों की सारी ऊर्जा पात्र-अपात्र निर्धारण प्रक्रिया से जूझने में ही खर्च हो जाती हो, जब आत्महत्या का सिलसिला इतना अबाध और अनवरत हो कि परिवार के एक सदस्य के बाद लोग दूसरे की अत्महत्या की आशंका से ग्रस्त रहते हों, तो फिर मृत्यु के बाद का माहौल स्वाभाविक शोक से ज्यादा चिंता और आशंका का होता है.

एक ऐसी चिंता और आशंका जो हम से हमारे परिवार जनों की मृत्यु के बाद ठीक से आँसू बहाने या शोक मनाने तक का अवसर भी नहीं देतीं. मृत्यु की खबर सुनते ही रोने-पीटने की मर्मभेदी चीख के स्वाभाविक वातावरण का एक ढंडी आशंका के माहौल में रूपांतरित हो जाना मानव सभ्यता के इतिहास की सर्वाधिक क्रूर और संवेदनहीन परिणति है, जिसे इस उपन्यास में घटित होनेवाली हर   आत्महत्या के बाद पसरे बेचैन-ठंडेपन में महसू किया जा सकता है. सच! कितना भयावह है हमारे समय का यह भूगोल जहां किसी की मृत्यु के बाद उसके प्रियजनों को दो बूंद आँसू बहाने का इत्मिनान भी मयस्सर नहीं होता.

भारतीय समाज अपनी संरचना में खासा जटिल है. वर्ग, वर्ण, लिंग और धर्म के तन्तु यहाँ इस कदर आपस में आबद्ध हैं कि बिना एक को समझे दूसरे को नहीं समझा जा सकता. यह उपन्यास किसानों की आत्महत्या पर बात करते हुये भारतीय समाज के इन सभी घटकों के अंतर्संबंधों पर भी बहुत बारीक नज़र रखता है. अंतरजातीय प्रेम हो या कि ब्राह्मणवादी हिन्दू आचार संहिताओं का पीढ़ियों से शिकार रहे दलितों का धर्मांतरण, अपने संदर्भों की सभी द्वन्द्वात्मक जटिलताओं के साथ उपन्यास के कथानक में आबद्ध हैं. उपन्यास के मुख्य प्रसंग और भिन्न अनुषंगों का इस कदर नाभिनालबद्ध होना इस कृति की औपन्यासिक संरचना को तो मज़बूत करता ही है,  पूरे प्रकरण को सामाजिक संरचना और मानवीय संवेदना के सघनतम संधिस्थल पर  विन्यस्त कर देता है.  

महाराष्ट्र की कृषि-समस्या का एक छोर कपास से जुड़ा है तो दूसरा गन्ने की खेती से. कपास की खेती करनेवाले किसान जहां अनुचित मूल्य निर्धारण, मंहगे और धरती की उर्वरा शक्ति का दोहन करने वाले बीज, महाजनों और साहूकारों के रक्तचूसक ब्याज दर और बिगड़ते मौसम चक्र के प्रतिकूल आघातों के बीच पारिवारिक जिम्मेवारी और सामाजिक प्रतिष्ठा के निर्वहन में नाकामयाब हो कर आत्महत्या करनेको मजबूर हैं तो वहीं गन्ना-किसानों का सुख-चैन प्रदेश की राजनीति में महत्वपूर्ण दखल रखने वाले चीनी मिल मालिकों की आंतरिक उठापटक और राइवलरी की भेंट चढ़ जाता है. यह उपन्यास हालांकि मुख्य रूप से कपास किसानों की समस्या पर केन्द्रित है, लेकिन कुछ आनुषांगिक उपकथाओं के माध्यम से यहाँ गन्ना किसानों की समस्याओं पर भी विचार किया गया है.  

उपन्यास पर लिखी गई यह संक्षिप्त टिप्पणी अधूरी होगी यदि इसके स्त्री पात्रों खास कर शकुन और छोटी की सकारात्मकता और जिजीविषा पर बात न की जाये. तमाम विपरीत परिस्थितियों के बीच शकुन और उसके समानान्तर छोटी जिस तरह समय की तमाम प्रतिकूलताओं के विरुद्ध उम्मीद और बदलाव का संघर्ष जारी रखती हैं, वह काबिले तारीफ है. छोटी के चरित्र के बहाने उपन्यासकार ने देह से जुड़ी पारंपरिक आचार संहिताओं को नकारते हुये स्त्री-पुरुष सम्बन्धों के संदर्भ में जो नैतिकता प्रस्तावित की है, वह देह के लिए प्रेम को अनिवार्य रूप से आवश्यक नहीं मानती. देह को लेकर इस आधुनिक नैतिकता की प्रस्तावना के समानान्तर छोटी और अशोक के परस्पर प्रेम को सामाजिक स्वीकृति न मिल पाना दो तरह की आधुनिकताओं के द्वंद्व के बीच से झाँकती सामाजिक जटिलताओं की व्यावहारिक तस्वीर दिखा जाता है. लेकिन उपन्यास के लगभग अंत में अशोक को एक खास खांचे का महान प्रेमी बना कर पेश करने की परिघटना आधुनिकता और आदर्शबोध के द्वंद्व के बीच एक ऐसी नियति को रेखांकित करती है जो हमेशा से एक खास तरह के फार्मूले की शरण में जा कर ही तुष्ट होता रहा है.

उपन्यास की चिंता के केंद्र में स्थित समस्याओं की बारीक विडंबनाओं के विश्लेषण के  समानान्तर संजीव  छोटे-छोटे जनांदोलनों और स्थानीय प्रतिभाओं की वैज्ञानिक सोच और शोध के आधार पर एक वैकल्पिक समाज की प्रस्तावना भी करते हैं. लेकिन विकल्प रचने का यह प्रस्ताव अपनी एकरैखिकता के कारण व्यावहारिक कम और रूमानी ज्यादा लगता है. उपन्यास का यह हिस्सा जिसकी पृष्ठभूमि में कई शोध-पत्रों का योगदान है, अपनी तमाम वैज्ञानिकताओं के बावजूद उपन्यास की कलात्मकता में कोई अभिबृद्धि नहीं करता बल्कि इसकी रचनात्मक सुंदरता को कुछ हद तक विखंडित ही करता है. आश्रमों, गैर सरकारी संस्थानों और जनांदोलनों की जरूरतों से इंकार नहीं किया जा सकता लेकिन किसानों की समस्या के व्यावहारिक हल के लिए एक बेहतर और ईमानदार कृषि-नीति की जरूरत है जिसकी विनिर्मिति में कृषि और उद्योग दोनों का सम्यक ध्यान रखा जाना चाहिए.

अपनी इन सीमाओं के बावजूद यह उपन्यास प्रगति के सरकारी सूचकांकों के विरुद्ध संवेदनाओं के प्रतिरोध की जिन अनुगूंजों को दर्ज करता है, वह उदारीकरण की आर्थिक राजनीति पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न है. विकास के तमाम दावों और सपनों की मार्केटिंग के समानान्तर महाराष्ट्र, गुजरात और आन्ध्र्प्रदेश जैसे तथाकथित विकसित राज्यों में जारी आत्महत्या, नहीं, हत्या और सरकारी आंकड़ों की वीभत्स जुगलबंदी के गुण-सूत्रों को रेखांकित करता यह उपन्यास निःसन्देह हमारे समय का एक जरूरी दस्तावेज़ है.
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(यह समीक्षा हंस के नवम्बर,  २०१५ अंक में भी प्रकाशित)
राकेश बिहारी 
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