आजादी और विवेक के हक़ में प्रतिरोध सभा

Posted by arun dev on अक्तूबर 21, 2015














आजादी और विवेक के हक़ में              

ज (20/10/15)) प्रेस क्लब में देश के सात प्रमुख लेखक संगठनों जन संस्कृति मंच, जनवादी लेखक संघ, प्रगतिशील लेखक संघ, दलित लेखक संघ, प्रेस क्लब आफ इंडिया, साहित्य संवाद, विमेंस प्रेस कार्प की ओर से देश में अभिव्यक्ति की आजादी के दमन और बढ़ती हिंसा के खिलाफ प्रतिरोध सभा का आयोजन किया गया.

सभा को संबोधित करते हुए वरिष्ठ आलोचक विश्वनाथ त्रिपाठी ने कहा कि साहित्यकार इस समय मौजूद लोकतंत्र के संकट को पहचान रहे हैं. यह व्यक्ति के स्तर पर भले ही शुरू हुआ लेकिन इसकी जड़ इतिहास में छुपी हुई थी. इस देश की विविधता हमारी ताकत है. एकता एकरूपता का नाम नहीं है . एकरूपता तानाशाही की पहचान होती है. एकता विविधता को स्वीकार करने से पैदा होती है. यह एक सांस्कृतिक आन्दोलन है. स्वतंत्र विचारकों और लेखकों की हत्या लोकतंत्र के लिए खतरनाक है. हम आशा करते हैं कि इस साहित्य अकादमी अपनी चुप्पी तोड़ेगी.

साहित्य अकादमी के अध्यक्ष विश्वनाथ प्रसाद तिवारी को संबोधित साहित्यकार कृष्णा सोबती का पत्र संजीव कुमार ने पढ़कर सुनाया और प्रतिरोध सभा को संबोधित के. सच्चिदानंदन का भी पत्र पढ़ा गया.

जनवादी लेखक संघ के चंचल चौहान ने कहा कि इस आन्दोलन की अलग-अलग व्याख्या की जा रही है. यह प्रतिरोध दो चीजों के बारे में है- झूठ के खिलाफ और हिंसा के खिलाफ. यह प्रतिरोध ऐतिहासिक घटना है.

आनंद स्वरुप वर्मा ने कहा हम अँधेरे समय से गुजर रहे हैं. इस देश के अल्पसंख्यक डरे हुए हैं. लेखक होने के नाते मैं भी अल्पसंख्यक हूँ और डरा हुआ हूँ .

पंकज सिंह ने कहा कि यह एक अँधेरे समय की शुरुआत भी है. इसके खिलाफ लम्बी लड़ाई की जरुरत है. जिन लोगों ने पुरस्कार वापस नहीं किया वे भी हमारे साथ हैं और प्रतिरोध में शामिल हैं.


आलोचक प्रो. मैनेजर पाण्डेय ने कहा कि जिन लोगों ने पुरस्कार,पद और तरह-तरह के सम्मानों का त्याग किया है उनका अभिवादन करता हूँ. उन्होंने साहस, समझदारी और सामाजिक सरोकारों का परिचय दिया है. विचारों की विविधता ही भारतीय संस्कृति की पहचान रही है.

नीलाभ ने कहा कि फासीवादी शक्तियों के पास विचारों की कोई सम्पदा नहीं है. हम क्या खायेंगेक्या पियेंगे, क्या पहनेगे पर प्रतिबन्ध लगाना इस देश को परतंत्र बनाना है.

प्रगतिशील लेखक संघ के अली जावेद ने कहा कि दाभोलकर, कुलबर्गी, पानसरे ने किसी की आस्था पर चोट नहीं पहुँचाया. उन्होंने सवाल करना सिखाया.

जन संस्कृति मंच के आशुतोष कुमार ने कहा कि यह प्रतिरोध अखिल भारतीय है. आजादी के लिए भारतीय जनता के संघर्ष से ही भारतीयता की पहचान निर्मित हुई है. आज कुछ लोग भारतीयता को गाय और चाय तक सीमित कर देना चाहते हैं. ऐसे लोग भारतीयता के और हिन्दू संस्कृति की वसुधैव कुटुम्बकम की भावना के भी विरोधी हैं. आज लेखक सच्ची भारतीयता को बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं.

ओम थानवी ने कहा कि उन लेखकों का आभार जिन्होंने हमें एक होने का मौका दिया. यह एक जुटता बनी रहनी चाहिए.

कवि मनमोहन ने कहा कि यह सिर्फ लेखकों का मसला नहीं है. वंचित तबकों के लोग रडार पर आ गये हैं. निरंकुशता का माहौल उभर रहा है.

इब्बार रब्बी ने कहा कि लेखक कबीर और तुलसी के ज़माने से आजादी और सामाजिक समरसता के लिए लड़ते रहे हैं. प्रेमचंद ने समाज को रास्ता दिखने के लिए लेखकों का आह्वान किया था. लेखक प्रतिरोध करते हुए अपने स्वाभाविक रास्ते पर चल रहे हैं.

बजरंग बिहारी तिवारी ने कहा कि लेखकों की हत्या की अनदेखी करने वाले अँधेरे के वाहक हैं. इनका चरित्र चित्रण करते हुए तुलसीदास कह चुके हैं कि ये हिंसा से प्रेम करने वाले प्राणी हैं. बजरंग बिहारी ने साहित्य अकादमी के सदस्य राधा वल्लभ त्रिपाठी का लिखित वक्तव्य भी पढ़ा . इस वक्तव्य में कहा गया कि आज-कल बहुत से लोग धर्म और धर्मान्धता में अंतर करना भूल गए हैं. धर्म के नाम पर किए जा रहे अत्याचार सबसे पहले धर्म को ही नुकसान पहुंचता है. मैं साहित्य अकादमी की स्वायत्तता को महत्वपूर्ण समझता हूँ और उसे बचाना चाहता हूँ. मैं इसी कारण साहित्य अकादमी से त्यागपत्र नहीं दिया है लेकिन अगर अकादमी प्रभावशाली कदम उठाने में असमर्थ रहती है तो मैं अकादमी के चारो पद छोड़ सकता हूँ.

विष्णु नागर ने कहा कि असहिष्णुता की विचारधारा को चुनौती देने का जो काम विपक्ष की राजनीतिक पार्टियाँ नहीं कर पायीं उसकी जिम्मेदारीलेखकों ,कलाकारों पर आ पड़ी है. लेकिन इस प्रतिरोध को जनांदोलन का रूप देने की जरुरत है.

जनवादी लेखक संघ की रेखा अवस्थी ने कहा कि मौजूदा राजनीतिक निजाम के पास लेखकों से बात करने की भाषा ही नहीं है. उनके पास केवल अपशब्द और धमकी की भाषा है. जो लोग लेखकों के इतिहास की बात उठा रहे हैं वे अपने इतिहास की तरफ भूल कर भी देखना नहीं चाहते. राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की आजादी की लड़ाई में कोई भूमिका नहीं थी. उनकी किसी भी प्रगतिशील आन्दोलन में कोई भूमिका नहीं रही है.

कवि मंगलेश डबराल ने कहा कि पुरस्कार वापसी लेखकों का सांकेतिक प्रतिरोध है. देशभर के लेखक एक स्वर से कह रहे हैं कि वे धर्मान्धतासाम्प्रदायिकता और असहिष्णुता की विचारधारा को नामंजूर करते हैं जिस विचारधारा को कुछ लोग अपनी हिंसक गतिविधियों से और कुछ लोग अपनी चुप्पी से बढ़ावा दे रहे हैं. लेखकों ने इस चुप्पी को छिन्न-भिन्न कर दिया है.

सभा में कथाकार संजीव और चिन्तक सुभाष गाताडे के आलावा अन्य कई वक्ताओं ने भी अपनी बातें रखी. मुरलीमनोहर प्रसाद सिंह, मदन कश्यप, Aflatoon Afloo, Balendu Swami , Purnendu Goswami , Ajit Rai Sanjay Joshi Sanjeev Kumar Abhishek Srivastava Kavita Krishnapallavi Vaibhav Singh Ranjit Verma Leena Malhotra केसाथ सभा में भारी संख्या में लेखक, कलाकार, पत्रकार, शिक्षक और छात्र मौजूद थे. सभा का संचालन प्रेस क्लब के सचिव नदीम ने किया .

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 राम नरेश / विजय गुप्ता