परख : पृथ्वी को हमने जड़ें दीं (नीलोत्पल) : सरिता शर्मा

Posted by arun dev on जून 23, 2015









पृथ्वी को हमने जड़ें दीं 
(कविता संग्रह)
नीलोत्पल
बोधि प्रकाशन,जयपुर
मूल्य: 99 रु.


समीक्षा 
भीतर की ओर खुलती कवितायें       
सरिता शर्मा

विता और जीवन के बीच संबंध के बारे में बेन ओकरी ने कहा है- ईश्वर जानता है कि किसी भी समय के मुकाबले हमें कविता की जरूरत आज कहीं ज्यादा है. हमें कविता से प्राप्त होने वाले दुष्कर सत्य की जरूरत है. हमें उस अप्रत्यक्ष आग्रह की जरूरत है, जो 'सुने जाने के जादू' के प्रति कविता करती है. हमें उस आवाज की जरूरत है, जो हमारी खुशियों से बात कर सके, हमारे बचपन और निजी-राष्ट्रीय स्थितियों के बंधन से बात कर सके. वह आवाज जो हमारे संदेहों, हमारे भय से बात कर सके; और उन सभी अकल्पित आयामों से भी जो न केवल हमें मनुष्य बनाते हैं, बल्कि हमारा होना भी बनाते हैं - हमारा होना, जिस होने को सितारे अपनी फुसफुसाहटों से छुआ करते हैं. कविता सिर्फ वही नहीं होती जो कवि लिख देते हैं. कविता आत्मा की फुसफुसाहटों से बनी वह महानदी भी है, जो मनुष्यता के भीतर बहती है. कवि सिर्फ इसके भूमिगत जल को क्षण-भर के लिए धरातल पर ले आता है, अपनी खास शैली में, अर्थों और ध्वनियों के प्रपात में झराता हुआ.

नीलोत्पल को कविता के लिए ज्ञानपीठ का  नवलेखन पुरस्कार मिला है. उन्हें विनय दुबे स्मृति सम्मान भी प्रदान किया गया है. भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित प्रथम संग्रह अनाज पकने का समयके बाद उनका कविता संकलन पृथ्वी को हमने जड़ें दींआया है. नीलोत्पल अपनी रचना प्रक्रिया के बारे में प्रकाश डालते हुए कहते हैं- मेरे लिए कविता का चुनाव कोई घटना या उपलब्धि नहीं है. यह जीवन की तरह सहज और बेहतर मनुष्य की तलाश है. वह जीवन से आती है और व्यक्तिगत स्तर पर उसके बिखराव देखने को मिलते हैं. कई तरह की कसौटियॉ और शर्तें है जीवन में, राजनैतिक, सामाजिक स्तर. कवि का पक्ष और उसकी प्रतिबद्धता हमेशा स्पष्ट होनी चाहिए. कविता बहुत खामोशी और विनय से अपना काम करती है. भीतर वह झरने की तरह गिरती है और अनेक रूपों में बिखरकर नदी बन जाती है. साहित्य खुली जमीन से देखा गया आकाश है. कविता अपने भीतर एक क्रांति है. जीवन जहाँ अदब, प्रेम, रिश्ते छूटते जा रहे हैं, ऐसे में कविता की भूमिका और बढ़ जाती है. समाज के बुनियादी ढ़ाँचे की तरह कविता बहुत बड़ा विचार और हमारी ऐसी जरूरत है, जो हर बार हमारे अंतिम होने पर खुलने वाला विश्वस्त विकल्प है.

नीलोत्पल की कवितायें भीतर की ओर खुलती हैं जैसा कि हम खड़े हैं कटे पेड़ों के नीचेकविता में परिलक्षित होता है -स्वर्ग और नरक में/ सिर्फ़ इतना-सा अंतर है कि/ एक का द्वार भीतर की ओर खुलता है/ एक का बाहर की ओर. पृथ्वी को हमने जड़ें दींसंकलन की कविताओं में मन के साथ- साथ समय और समाज के परिवेश को गूढ़ भाषा और शिल्प से अभिव्यक्त किया गया है. इनमें प्रेम, प्रकृति, उम्मीद, औरतों, कवियों, समाज, मानवता, अनकहे, अकेलेपन और अधूरेपन पर बहुत डूब कर लिखा गया है. ये कवितायें जीवन से उपजी हैं और अपने आसपास की स्थितियों का सटीक वर्णन करती हैं. उनमें समाज की विद्रूपता और मनुष्यता में हो रहे क्षरण पर सवाल उठाया गया है. कविताओं के शीर्षक बहुत काव्यात्मक और गूढ़ हैं  जिन पर पाठक देर तक सोचता रहता है जैसे- मेरी छाती धड़कती है निर्वस्त्र मन को छूने पर,’ ‘मैं बताना चाहता था फ़सलों की अनंत स्मृतियां,’ ‘आग की इबारत,’ ‘चुनी हुई मौतों के साथ,’ ‘जब इल्लियाँ नाच उठेंगी,’ ‘वे चेहरे जो गिरे मेरे अंधकार मेंऔर कविता एक मुक़ाम है.

संकलन की शीर्षक कविता पृथ्‍वी को हमने जड़ें दीं एम.एफ. हुसैन की मृत्यु पर लिखी गयी है जिसने संकीर्ण सोच वाले लोगों की नफरत को रंगभरे कैनवास में बदल दिया था. एकांत में जख़्म सिलता रहा/ स्मृतियां सारी रंगों भरी थीं/ प्रेम के विपरीत जितनी कैंचियां थी/ रंगों ने उन्हें चींटियां बना दिया. जड़ के बिम्ब को कई कविताओं में इस्तेमाल किया गया है. जड़ का अर्थ बहुत गूढ़ है और वह अव्यक्त होते हुए भी जीवन प्राण है. नरक में आग ढ़ोने वाली कविताएंकविता में हम आख़री बार कब मिले थे?/ क्या कविता का वह घर हमें याद है?/ जहां हम जड़ों की गहराई तक उतरे थे. पेड़ को काट दिये जाने के बावजूद जड़ अपने स्थान पर टिकी रहती है. मैं उस पत्थर की बात नहीं कर रहा जोमें नहीं होना भी जगह देना है/ उन असम्बद्ध चीज़ों को/ जो अपने भीतर जड़ों की तलाश में गुम हैं. जड़ें सु़नती हैंमें- ज़मीन में पिछले छोड़े हु़ए/ कागजों, माचिस की जली तीलियों,/ लकड़ी के बु़रादे, चींटियों के बु़रे दरों की/ हल्की मद्धम आवाज़ें हैं/ जड़ें सु़नती हैं इन्हें. बारिश उतार रही थी अपनी जड़ेंमें- हवा ले आई उस सौंधी गंध को/ गड़ी थी ज़मीन के भीतर और महमूद दरवेश की याद में’- धरती चूम रही तुम्हारा माथा/ सुनो, सुनो उसका जाना/ मिट्टी के भीतर/ जड़ों में.

संग्रह की कविताओं में प्रेम रूमानी होने के अतिरिक्त साथ जीये गये जीवन की अभिव्यक्ति हैं. प्रेम निराशा खत्म करता है, संघर्ष में सहारा देता है. प्रेमियों के बीच बहुत कुछ अनकहा और अधूरा रह जाता है. हमें गढ़ा नहीं जा सकतामें- तुम वह हो जिसे मैं नहीं जानता/ मैं वह हूं जिसे तुम लोप करती रही हो. मैं तुम्हें बिना शब्दों और बिना नींद के देखता हूँ एकटक/ मैं तुम्हें आवाज़हीन सुनता हूँ’. जीवन संगिनी अनेक बार बलिदान करके कठिन समय में साथ देती है- कुछ चीज़ें जो नहीं हैं हमारे पास/ उनके मुताबिक ढाला  तुमने ख़ुद को/ ख़ामोशी से. तुम्हारे सहारे ही जीता आया हूँ अंधेरामें- उतर रही हो तुम/ मेरे अंधेरे में/ उदास मन और ज़ख़्मों को सहलाते हुए. तुम धरती-आकाश होमें प्रेम मन की गहराई में जड़ें जमा लेता है-- तुम ऐसी बेचैनी हो जो/ छूटती नहीं आदि से अंत तक/ मिट्टी की तरह प्रवेश करती हो/ अपनी जड़ें भीतर फैलाती हुई. अनुपस्थिति में भी प्रेमिका गंध की तरह व्याप्त रहती है- हर जगह तुम नहीं हो./ लेकिन चींटियों की तरह निशब्द/ तुम्हारी मौजूदगी छोड़ती जाती है अपनी गंध/ जो भरती है धरती और आकाश की तरह/ हमारे बीच का ख़ालीपन. प्रेम के ऐन्द्रिक पक्ष को बहुत कोमलता से छुआ गया है- मेरी छाती धड़कती है/ निर्वस्त्र मन को छूने पर/ यहां नहीं होता किसी तरह का मान या अपमान.

औरतों के जीवन संघर्ष के प्रति लेखक की संवेदनशीलता अनेक कविताओं में दिखाई देती है. माँ, प्रेमिका, पत्नी, दुखियारी बुजुर्ग महिला, मजदूर की बीवी और बर्तन मांजने वाली बाई- कवि का नजरिया इन सबके प्रति करुणामय है. समाज में महिलाओं पर हो रहे अत्याचारों को इंगित करते हुए क्या होगी इस वक़्त की सही आवाज़में लिखा है- औरतें तो अमूमन वही होंगी/ लेकिन वे पंचायतें/ जिनमें गौत्र, जाति, धर्म की रस्म अदायगी टूटी नहीं/ वे कितनी औरतों के मालिक होंगे, कितनों के भक्षक. नमक का पानी आंसुओं का प्रतीक है- घंटे भर से रो रही है / वह औरत .. मिट्टी सोख रही है नमक का पानी/ सुखा देगी हवा उसके गालो पर ठहरे दुख को/ एक औरत का संघर्ष/ किसी तरह दुख के ढलान से लौट जाता है.  जिंदगी की ढोई मैली रंगतमें- इन मैले झूठे बर्तनों में कितनी चमक बाकी है/ कोई नहीं जानता सिवाए उसके/ जो अंधेरे घरों से निकल रही है. सुखिया मौसी ऐसी अभागी है- सुख जैसे उसके लिए रिक्त स्थान की तरह रहा/ जिसे वह कभी नहीं भर पाई .
    
वह जीवन को जीवन देती आवाज़में चक्की चला कर घर का निर्वाह करने वाली माँ के संघर्ष को उजागर किया गया है. कबीर के दोहे चलती चाकी देखि के दिया कबीरा रोय/ दो पाटन के बीच में, साबित बचा न कोय में चक्की के दो पाट जीवन और मृत्यु के प्रतीक हैं. यह कविता लेखक के जीवन से अभिन्न रूप से जुडी हुई है. चक्की की आवाज में जीवन संगीत गूंजता है- मैं अंतर नहीं कर पाया / ज़िंदगी और चक्की में/ लेकिन जब गेहूँ, मक्का, बाजरा, दाल या ज्वार/ पिसी जाती / मुझे अहसास होता कि / मैं अपनी भेड़ें चराता/ सुन रहा हूँ पहाड़ी संगीत.../ मैं कभी नहीं जान पाया / माँ और चक्की किस तरह अलग हैं / एक-दूसरे से. चक्की चलते रहना आश्वस्त करता है और घर में खुशहाली का कारण है- इसकी घर्र-घर्र करती मशीनी आवाज़ ने/ टूटने नहीं दिया भीतरी इंसान को  और इसके चलते रहने से/ घर र्की इंटें नाचने लगती थीं/ जैसे गा रही हों सदियों से कोई गीत/ जैसे नदी की सतह पर तैरता हुआ पत्थर.  लेखक को थोड़ा सा अनाज पिसवाने के लिए आने वाले गरीब लोगों की फ़िक्र है. जिन्हें छोटा और नीच कहा/ उन लोगों के दानों और जीवन में/ कोई अंतर नहीं था.
    
इस काव्य संकलन का प्रमुख आकर्षण पुराने और समकालीन कवियों को समर्पित कविताएँ हैं. अपने आदर्श कवियों में लेखक को अपनत्व महसूस होता है और वे उसे परिवार जनों से भी अधिक अपने बन जाते हैं. इन कविताओं में हमें कवियों के व्यक्तित्व और लेखन के सूक्ष्म संकेत मिलते हैं. कुछ भी प्रत्यक्ष न कहते हुए कवियों के अमूर्त स्केच बनाये गये हैं. शुक्रियामें कवि अपने मार्गदर्शक कवियों का आभारी है. शुक्रिया सारे कवियों का / जिन्होंने जीवन को नए अर्थों से भर दिया / ऐसे अर्थ जो हमें मालूम नहीं थे. मुक्तिबोध के लिए रंदे से अग्नि की छिलपटें उतारतेकविता में उनकी बेचैनी और छटपटाहट को महसूस किया जा सकता है- चुप रहो और सुनो/ भीतर पकी हुई दीवार से पलस्तर का गिरना/ ढहना हमारी चेतना का. सुशोभित सक्तावत के लिए लिखी खाली आकाश खाली नहींमें- मैं तुम्हें देखता हूं/ जैसे ख़ाली आकाश/ ख़ाली नहीं/ वहां बारीश है,/पत्थर है, कपास है. हम दे रहे हैं जीवन को/ नाख़ूनों के काटे जाने की मियाद तक/ हम अपने शब्दों की मुहर हैं. महमूद दरवेश के लिए शब्द ज़ख़्मी हैं तुम्हारी ज़िद के कारणकविता में मानो उनके समूचे परिवेश को उभारा गया है- पुकारता हूँ/ तुम्हारी कविता के ज़रिए.../ यह एक उजाले वाली शाम.../ मेरी साँसों की गिरफ़्त में / एक छटपटाता हुआ स्वर/ समुंदर किनारे, रेत के धँसाव में. अंगूर की धार-सा तीखा और तेज़/ तुम्हारा आज़ादी और मुक्ति का सपना/ देख रही है यह दुनिया.
   
नीलोत्पल ने कई कविताओं में अदृश्यता और अनकहे को आवाज दी है. नहीं कहे को आवाज देनामें- बहुत मुश्किल है मैं अपने नहीं कहे को जानूँ/ मैं एक  विपरीत दिशा वाला व्यक्ति/ कहूँ कि मेरी वह छिपी आवाज का प्रस्फुटन/ कविता की तरह है. रास्ते वहां भी हैंमें- यदि तुम नहीं दिखे समुद्र की तलाश में हो तो/ खुदाई शुरू करो/ समुद्र तुम्हें तमाम रास्तों के बारे में/ अपने अनुभव बताएगा. दिखता नहीं चिड़ियों का प्रेम ’- में तरक़्क़ी की इमारत भले नष्ट हो जाए एक दिन/ बचेगा यही जो अनकहा रह गया. शब्द इतने प्रभावशाली होते हैं कि कल्पना को जीवंत कर देते हैं. कवि शब्दों के घर में रहता है जिसे उसने खुद बनाया है. मैंने शब्दों के भीतर उतरकर देखा/ वे ज़िंदा थे. इन्हीं शब्दों ने मछलियों की तरह./ मेरे उदास समुंदर में रंगीनियाँ भरीं/ यही मेरा घर है/ यही दुनिया. इसी तरह कविता एक मुक़ाम हैमें कवि अपनी मंजिल की बात करता है.-शब्दों का एक लम्बा हाईवे है/ जो कहीं ख़तम नहीं होता/ कविता एक मुक़ाम है/ जहाँ घिरी बातों के साथ/ हम पहुँचते हैं. कुछ कविताओं में आत्मकथन और लेखन के उद्देश्य पर भी प्रकाश डाला गया है. मैं लिखता हूं/ समय, नियम, संविधान के बाहर/ यह मेरी आज़ादी नहीं, मर्यादा भी. मैं एक अधूरे से पहाड़ परमें- मैं तैरता हूं अधूरे से पहाड़ पर/ वहां से गिरना भी लगभग अंसभव. स्मृतिहीनमें उदासी का स्वर है - मैं बैठा हूं छत पर/ स्मृतिहीन/ नहीं नक्षत्रों की बरसती रोशनियां/ उजाले और अंधेरे के मुखौटे नहीं/ भीड़ नहीं, दखल नहीं/ यंत्रणा, संताप नहीं.  एक आदमी की प्रकृतिमें कवि अपने मनचाहे जीवन की इच्छा करता है. मैं अपने भीतर कई स्त्रियां देखता हूं/ रचता हूं एक घर/ चाहता हूं एक इंसान जो यक़ीन करे/ मेरे लफ़्ज और सुंदरता पर. मेरी एक जगह थी’  कवि के अंतर्मन की हलचलों को प्रतिबिम्बित करती है. ज़मीन मेरे लिए शवों को ढोती / बनी रही तप्त चट्टान.. मैं जुड़ता चला गया सपनों से/ लोगों ने मुझे बहुत दुलारा/ उनकी आवाज़ मेरी आवाज़ में/ घुलती चली गई.  
 
इन कविताओं में राजनीति, समाज, बाजार जीवन, प्रकृति, परिवेश और मानवीय मूल्यों के प्रति कवि का सरोकार नजर आता है. अब के रक्तबीज पनपेमें अव्यवस्था और साम्प्रदायिक दंगों के प्रति चिंता व्यक्त की गयी है.- क्यों भड़का हुआ-सा इंसानों का हुजूम?/ कहीं मांग, कहीं आंदोलन/ उत्पात, हड़ताल, तोड़फोड़, आगज़नी/ इंसान कहीं नहीं/ अब के रक्तबीज पनपे/ मैं निकला हूँ जड़ें कुरेदता/ कौन-सा धर्म बड़ा ?/ पूछता हूँ अंधेरे भरे कोनों से / कितनी लाशें हमारे कंधों पर. राजनीतिज्ञ जिन्हें प्यार नहीं वोट चाहिए,/ वैज्ञानिक जिन्हें सूत्र और सूत्रधार,/ धार्मिक अनुष्ठान जिन्हें पाखंड और कट्टरता/ मेले और सभाएं जिन्हें भीड़ और तमाशबीन.  धूमिल के अनुसार-  कविता का एक मतलब यह है कि आप आज तक और अब तक कितना आदमी हो सके हैं.

कविता की असली शर्त आदमी होना है .’ ‘अनगिनत जिंदगियांमें ज़िंदगी को हमने वहां पाया/ जहां दुकानें, सम्बन्ध, मठ, मंदिर और गिरिजाघर नहीं थे/ हम उन पुराने बैरकों से लौटते रहे/ मैं सिर्फ़ इंसानों को जानता हूँ.../ जिनके अपने मिटाए कई इतिहास हैं . कवि निराशाजनक स्थितियों में भी उम्मीद का नहीं छोड़ता है. हमने कभी फ़ातिहा नहीं पढ़ा ज़िंदगी की हार परकविता का स्वर बहुत आशावादी है. पत्थरों पर कई गीत लिखे/ जो मिटाये नहीं जा सके/ न्याय के लिए अदालतें नहीं/ गवाही भीतर होती थी. कोरे शब्द नहीं रहे कभी हमारे पास/ उनमें सच्चाइयाँ थीं हमारे ख़ून की. मैंने अपने दिनों को उम्मीदों से सराबोर रखामें कवि कल्पना करता है- मेरे मरने के बाद भी/ इस दुनिया को सुंदर बनाने की कोशिशं जारी रखना/ मैं जो खटता और खपता रहा हँ तुम्हारी ही तरह. जब इल्लियां नाच उठेंगीमें कवि ने किसानों की खुशहाली की कल्पना की है. तितलियां और भौंरे/ पक चुकी ज्वार और मकई की बालियों पर/ बेसुध मंडराएंगे/ कलम स्वतः बंद हो जाएगी/ तुम्हारे चेहरे, हथेलियों और पीठ की खुरच से/ लहक उठेगी/ जिंदगी जानेगी नमक का स्वाद.

संकलन की अनेक कविताओं में प्रकृति के बिम्बों का प्रतीकात्मक उपयोग किया गया है. समुद्र और बरसात के बिम्ब मन और जीवन के द्योतक हैं- यहां कोई अचानक पार करता है/ सदियों से रीते समु़द्र को/ कोई उतरकर रख देता है/ सड़कों पर/ अपने नंगे पैर/ उनके गीले होते ही भर जाती है लहर/ दिमाग में जंगलों में भींगी जड़ों की. हमें गढ़ा नहीं जा सकतामें प्रेम के जटिल रिश्ते को प्रकृति के साथ जोड़कर कलात्मक ढंग से दर्शाया गया है- तुम पृथ्वी के हरेपन से आती/ एक आवाज़/ एक आवाज़ ख़ामोशी से हो रही बारिश की/ एक आवाज़ घास में उतरती रोशनी की/ जो बीज ज़मीन पर बिखरे पड़े थे / वे उग आए एक दिन. एक आदमी की प्रकृतिमें बुल्ले शाह की तरह मानव देह को मिटटी बताया गया है- मिट्टी का लोच, मिट्टी की गात/ वह रुप जो बाहर नहीं भीतर होता है/ उस तरह से तो मैं मिट्टी ही हूं/ ढलने और बिखरे जाने के लिए.

नीलोत्पल की कवितायेँ जमीन के भीतर बहते जल की तरह पाठक को तरंगित करती हैं. मौलिक बिम्बों
के माध्यम से निजी और बाहर की दुनिया में बहुत कोमलता से समन्वय स्थापित किया गया है. उथल- पुथल भरे माहौल में साहित्य और सकारात्मक सोच कवि की आस्था की डिगने नहीं देते. कवि अपने आसपास घट रही सब घटनाओं के प्रति सजग है. कुछ कवितायें बहुत गूढ़ हैं जिनके अर्थ तक पहुंचना पाठक के लिए श्रमसाध्य है समकालीन कवियों में नीलोत्पल एक  महत्वपूर्ण हस्ताक्षर हैं जो हर कविता के साथ अनूठे बिम्बों और विचार जगत से परिचय कराते हैं. इस संकलन में मन की सूक्ष्म अनुभूतियों और सामाजिक सरोकारों को बहुत खूबसूरती से पिरोया गया है.                                         
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