कथा - गाथा : ज्योत्स्ना मिलन

Posted by arun dev on मई 05, 2014










श्रद्धा - सुमन


प्रख्यात साहित्यकार ज्योत्स्ना मिलन के अवसान की दुखद सूचना कल रात पीयूष दईया से मिली.ज्योत्स्ना मिलन  का लिखा उपन्यास  'अ अस्तु का' का चर्चित रहा है. उनके दो कविता संग्रह, तीन उपन्यास, पांच कहानी संग्रह और  एक संस्मरण प्रकाशित हैं.  वरिष्ठ कवि-कथाकार, आलोचक रमेशचंद्र शाह की सहयात्री मिलन का जाना न केवल शाह और उनके परिवार के लिए बल्कि हिंदी के लिए भी उदास कर देने  वाली अनुपस्थिति  है. उन्हें याद करते हुए उनकी अंतिम प्रकाशित कहानी.

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ऊपर           से        यह            भी               
ज्योत्स्ना मिलन

वह हमारी दूसरी मुलाकात थी जो कई दिनों तक चली थी. दिन में बहुत सारा समय हम साथ साथ होते थे, रात में भी कई बार देर तक.

उससे पहली मुलाकात अभी दो दिन पहले ही हुई थी, हमारी बैठक में, जो दिन में भी अॅंधेरे के हवाले रहती थी. यानी मैंने उसे पहली बार बिजली की रौशनी में देखा था. बल्ब ऐन उसके सिर के ऊपर था और उसका मॅुंह अपनी छाया में था.

हम साथ साथ चल रहे थे. पहाड़ी इलाका था. बल्कि जंगल और पहाड़ इतने साथ थे कि उसे इसी तरह जंगल का इलाका भी कहा जा सकता था. पहाड़ी इलाका होने से, कभी भी, कहीं भी, आपके अगल-बगल एक न एक कगार हो सकती थी. होने को वहॉं की सड़कों पर वाहनों की आमद-रफ्त न के बराबर थी फिर भी उन पर बेहोशी में चलते चले जाना संभव नहीं था. हालॉंकि दृश्य में होश के उड़े-उड़े फिरने का पूरा प्रबंध था.

जब भी हम कहीं भी जाने को निकलते वह कगार की ओर बढ़ लेती थी. अगर पहले से मैं कगार पर न चल रही होती तो वह उसे खाली मिल जा सकती थी. उस वक्त मैं सड़क की कगार पर चल रही थी और वह कुछ दूरी पर साथ साथ चल रही थी. कगार के नीचे ढलान थी पेड़ों से आच्छादित, फिर भी धूप के चकत्ते जब, तब ढलान पर उड़ते रहते.

चलते चलते जिस वक़्त वह ज़ोर से चीख़ी उस वक़्त मैं कगार पर थी और उससे दो कदम पीछे थी. इससे पहले मैंने किसी को इतना चुपचाप चलते चलते अचानक इस तरह चीख़ते नहीं सुना था. देखा भी पहली बार ही था. मैं चकित थी कि हॉं कभी ज़रूरत पड़े तो इस तरह चीख़ा भी जा सकता था. इससे पहले यह बात कभी सूझी भी नहीं थी.
उसके चीखने की वजह को मैं आसपास ढूँढने लगी

- सामने या अगल-बगल कोई खड्ड नहीं था
- सरसराता हुआ न कोई सॉंप ही गुज़रा था
- न वह किसी पेड़ या चट्टान से टकराई थी
- न वही गिरी थी
- ठोकर लगी हो ऐसा भी नहीं था

उसके चीखने की कोई वजह अगर थी भी, बाहर तो कहीं दिखाई नहीं दे रही थी. मैंने अपने से पूछा क्या मैं उसकी चीख़ की वजह हो सकती हूँ? इसकी भी कोई संभावना नज़र नहीं आ रही थी. फिर भी इतना तय था कि वह चीख़ी थी.

उसकी इस चीख़ को छोड़ दें तो रास्ते भर हम दोनों में से कोई भी कुछ नहीं बोला था. हम लोग कोई आधे घंटे से साथ चल रहे थे. साथ के लोग आगे या इधर-उधर किसी न किसी तरफ निकल चुके थे. जहॉं जाने को चले थे वहॉं का रास्ता मालूम नहीं था. हम उस सड़क के हवाले थे जिस पर चल रहे थे. सड़क कहॉं तक जाएगी, कुछ पता नहीं था. हो सकता है यह किसी दूसरी सड़क में जा मिले. या सोनमुड़ा जाने के बजाय सड़क प्रपात की ओर चली जाए. सारे लोग सोनमुड़ा जाने को साथ साथ चले थे. हम पता नहीं कब और कैसे पूरे समूह से बाहर हो गए थे. दृश्य में हम जंगल में घूम रही दो स्त्रियों की तरह थे. अपनी तरफ से हम साथ साथ नहीं थे मगर देखनेवाले को साथ होने की तरह दिखाई दे सकते थे.

वह चीखी इससे पहले मैं कभी कगार पर उससे कुछ आगे चल रही थी, कभी कुछ पीछे मेरी दाहिनी तरफ वह थी और बाईं तरफ तेज़ ढलान! चीख़ते समय वह अगर चीख़ की तेज़ी से अपने हाथ फैलाती ..... मैंने सोचा और सोचते हुए खड्ड जैसी ढलान की ओर झॉंका और अपने को गिरते देखा! गिरते-गिरते हाथ बढ़ाकर झट से जंगल को और आसमान को पकड़ लिया था. अब वे भी मेरे साथ साथ खड्ड की ओर लपके चले जा रहे थे.

उसके फैलते हाथों की ठपक से अगर मैं गिर जाती तो उसे इस बात पर यकीन न आता कि मैं उसकी ठपक से गिर जा सकती हूँ. वह घूम घूमकर अपने चारों तरफ मुझे ढूँढने कि हो सकता है मैं इधर-उधर कहीं हो गई होऊॅं, किसी पेड़, चट्टान या पहाड़ की ओट. तब वह हवा को ऐसे घूरती जैसे मैं उसमें गुम गई होऊॅं और उसके हवा को इस कदर घूरने से प्रकट हो जाने वाली होऊॅं.

फैलते-फैलते अचानक लौट आए अपने हाथों को वह देखती. किसी को गिरा देने वाली कोई जुंबिश उसे उनमें न मिलती. उसके हाथ को पता भी न चलता कि उसने किसी को गिरा दिया है.

उसका हाथ अगर चाहता तो मुझे गिरा सकता था. हाथ के ऐसा चाहने की वजह इस बीच पैदा हो चुकी थी. उसके हाथ को ऐसी किसी वजह का पता न हो यह एकदम संभव था. उसकी चीख़ को हो सकता है इसका पता रहा हो. यों तो मुझे गिराने के लिए उसकी अचानक निकली चीख़ भी काफी हो सकती थी, अगर वह पहली बार चीख़ी होती.

कल शाम कुछ दूर की जगह पर जाना था. पैदल जाया तो जा सकता था, समय मगर उतना नहीं था कि पैदल जाकर लौट भी आया जा सके. इसलिए बिना किसी हिलोहुज्जत के हम लोग चुपचाप गाड़ियों में समा गये. एम्बेसेडर थी पुरानी, उसमें हम छह लोग थे.

जंगल उन दिनों जंगल जैसा नहीं दिखाई दे रहा था. पेड़ पास पास थे, डगालें लगभग खाली थीं. ऑंख गड़ाकर देखने से डगालों के नामालूम, हल्के तांबई रोए दिखते थे, जैसे पूरा जंगल रोमांचित हुआ पड़ा हो. मैं जंगल को ढूँढती रही थी जंगल में, असूचीभेध्य जंगल को, जो पेड़ों की डगालों में दुबका बैठा हो सकता था. खुल जा सिमसिम की तरह वह समूचा बाहर की सतह पर आकर उसके चारों ओर इस तरह फैल नहीं जा सकता था कि वह बार बार उसमें खो या भटक जाए और बाहर न निकल पाए.

चीख़ इतनी अचानक और इतनी तेज़ थी कि उसने मुझे जंगल से एम्बेसेडर में ला पटका. चीख़ गाड़ी से आई थी. ड्राईवर सहित गाड़ी में हम सात लोग थे. चीख़ की आवाज़ स्त्री की थी. गाड़ी में कुल दो स्त्रियॉं मौजूद थीं मैं और वह. मैं पीछे की सीट पर थी, खिड़की के पास. वह ठीक मेरे आगे वाली सीट पर. चीख़ अगर मेरी नहीं थी, जो कि नहीं थी यानी वह उसकी हो सकती थी. वह इतनी चुप थी अपने समूचे होने में कि एकाएक यकीन नहीं हो रहा था उसके चीख़ने पर. हो सकता है उसके समूचे वजूद में चीख़ के बाद का सन्नाटा हो.

तुम क्या दावे से कह सकती हो कि चीख़ तुम्हारी नहीं थी? हो सकता है तुम मन ही मन चीख़ी होओ!

वह गड़बड़ा गई, हो सकता है वह चीख़ी हो और उसे पता भी न चला हो!
फिर भी उसने कहा ऐसा होता तो किसी और को वह सुनाई न देती जो कि सभी को सुनाई दी थी. इसके अलावा यह भी कि चीख़ को सुनने के बाद लगभग सभी ने उसकी दिशा में घूरा था.
चीख़ते समय उसका मॅुंह खिड़की की तरफ था, जैसे जंगल पर चीख़ी हो.
जब से हम गाड़ी में बैठे, तब से अभी तक हम में से कोई कुछ बोला नहीं था. यह एक वजह हो भी सकती थी उसके चीख़ने की.

यों भी अगर वह साथ हो तो आपको बोलने की ज़हमत शायद ही उठानी पड़े.

हमारी टू टॉं के सहारे वह घंटों बतियाती रह सकती है और जब देखो तब अपने प्रेम में पड़ी मिल जा सकती है. बात में से बात और कथा में से कथा, यानी अंतहीन कथा जो अपने में से निकलती चली जा सकती थी. जब चाहो शुरू जब चाहो खत्म. उसकी कहानी से किस्सा हो सकता है सिरे से नदारद हो. बोलना वह अगर शुरू करे तो बातों और बातों के सिरों का टोटा उसे शायद ही पड़े. पता नहीं कौन कब कथा में चला आए या कथा से चला जाए, कितनी देर रहे दृश्य में या आते आते ही गायब हो जाए. कथा का स्थल-काल लगातार बदलता चल सकता था या फिर ठहर जा सकता था, सामने फैले समुद्र की तरह ओर अपने ही भीतर गोते लगाता रह जा सकता था.

वह अपने को दॉंव पर लगाए रखती थी. कब वह खुद किस्सा हो जाए और कब किस्सा उसका रूप धर ले, इसका कोई ठिकाना नहीं था.

साथ तो हमारे वह उस वक़्त भी थी और ऐसी किस्सागो चुप लगाए थी, बावजूद छह छह श्रोताओं के, अलावा ड्राईवर समेत. श्रोताओं के लिए भी यह एकदम नयी घटना थी और चुप्पी को तो उसे साधे रखना पड़ता था, कथा की तरह वह अपने आप सधी नहीं रख सकती थी. उसके अगल-बगल आगे-पीछे जो भी लोग उसके साथ थे, उनमें से वह किसी को भी देख नहीं रही थी. ऐसे जैसे कहीं कोई हो ही नहीं उसके आसपास या कहीं भी और वह कुछ भी कर सकती हो चीख़ने से लगाकर किसी को भी न देखने तक.

जान-बूझकर उन्हें न देखना और उनका न दिखना, सिरे से दो अलग बातें थीं. जान-बूझकर उन्हें न देखने के लिए हरदम यह याद रखना ज़रूरी था.
कि
वे हैं,
वहॉं,
आसपास.

वह उन्हें नहीं देख रही थी, पर वे थे और बिना देखे भी उसे दिख रहे थे. न देखकर वह उन्हें अनहुआ नहीं कर सकती थी. यह भी एक वजह हो सकती है उसके यों चीखने की.

मैं उसे जानने लगी तब से यह पहला मौका था जब चुप्पी हमारे बीच आकर हनुमानजी की पूंछ की तरह बैठ गई थी कि हटा दो जिससे बने. वह हिलने का नाम नहीं ले रही थी. हालॉंकि एक-दूसरे को जानने का अभी एक छोटा सा दौर ही गुज़रा था हमारे बीच. बल्कि तो दौर कहलाने लायक लंबा भी वह नहीं था. मुश्किल से दो-तीन दिन लंबा दौर.

और अगर अंतर्मुहूर्त मात्र में किसी को केवल ज्ञान हो जा सकता हो तो उतनी ही देर में निशी को भी जाना जा सकता था.

फिर भी उसे केवलज्ञानी की तरह जानना कहा जा सकता था या नहीं उसे पता नहीं था.
उसे जानने के लिए उसका एक अधूरा वाक्य या उसकी हॅंसी काफी हो सकती थी. उसका वाक्य हमेशा अधूरा ही अधर में झूलता छूट जाता.

बीच में अनेकांत आया था, तुम्हें याद कर रहा था.
कौन अनेकांत? उसने ऐसे पूछा जैसे इस नाम वाले किसी आदमी से उसका कभी कोई पाला न पड़ा हो.

अच्छा?....ऊपर से यह भी कि कौन अनेकांत?
वह हॅंसी. अपनी वाली हॅंसी.
उसकी हॅंसी में सब कुछ दिख जाता. सब कुछ यानी सब कुछ जो है वह भी जो नहीं है वह भी. उसके झूठ और उसके सच एक साथ, एक दूसरे में उलझे-पुलझे.
कौन क्या? वही चैन्नई वाला चित्रकार!
ओ हॉं! यहीं तो मिला था.

यहीं नहीं, यहॉं भी. यहॉं मिलने से पहले भी तो मिला था कुछ बार, कुछ जगहों पर. बाद में भी कुछ बार कुछ जगहों पर. न तू उसे पहले पहचानती थी न बाद में. बीच के कुछ दिन जान-पहचान के दिन हो सकते हैं. उसका तेरे पीछे पड़ना यहीं शुरू हुआ था.
बेचारा चित्रकार ढूँढ रहा था निशी को.
जहॉं-जहॉं वह उसे ढूँढता हुआ पहॅुंचता वह पहले ही वहॉं से लापता हो चुकी होती जैसे उसे पहले ही भनक मिल चुकी हो उसके आने की.
वह भी ढूँढने में जुटा रहा लगातार.

संग्रहालय के मीलों लंबे-चौड़े परिसर में. वहॉं बने अलग अलग प्रदेशों के विशेष घरों में झॉंकता चलता. उन घरों के नीम अंधेरों में क्या पता चमकती हुई वह दिख जाए. होने को वह कहीं भी हो सकती थी. इन घरों के अलावा पूरी मुक्ताकाश प्रदर्शनी फैली थी, परिसर भर में. तालाब के किनारे, केन्टीन में, मचान पर बने आसाम के घर में या मिथक वीथि में जनगढ़ के शिल्पों के सामने ध्यानमग्न बैठी हुई. यों ध्यान-मग्न तो वह बोलते हुए भी हो सकती थी, संवाद चाहे अपने से हो चाहे किसी दूसरे से.

अनेकांत उन दिनों तुम्हें इस तरह खोजता फिरता था जैसे इसके सिवा करने को कोई और काम न हो उसके पास. यहॉं तक कि एक दोपहर तुम्हें ढूँढता हुआ वह मेरे घर भी आ चढ़ा था. वर्ना तो उसके मेरे घर आने की दूर दूर तक कोई वजह नहीं हो सकती थी. दरवाज़ा खोलने पर न दुआ-सलाम, न कुछ और जो कि यों कहीं भी मिल जाने पर वह करता था.

दरवाज़े के उस पार से उसने सीधे सवाल पूछ डाला था,क्या निशी आपके यहॉं है? कि अगर निशी वहॉं न हो तो भीतर आकर वक़्त जाया क्यों करे? उसे ढूँढने कहीं और चल पड़े. तुझे ढूँढने की जगहों के क्रम में मेरा घर भी पड़ा था. जिस किसी से उसने निशी का पता पूछा होगा, उनमें से किसी न किसी ने उसके होने की संभावित जगहों के तौर पर मेरे घर का हवाला दे दिया होगा.

तुम मेरे यहॉं बैठक के कमरे में ही थीं, मेरे साथ बाहर बरामदे में नहीं निकली थी. अचानक मेरे भीतर एक असंभव लालच सुलग उठा और हॉं हैकहने के लिए खुले मेरे मॅुंह से नहीं, यहॉं तो नहीं है निशीनिकल गया. इस पर मैं भी चकित थी और वह भी. मुझे याद आया,‘‘जैसे एक झूठ ने दूसरे झूठ पर कूदना ही अपने में सच हो.’’

वह सीढ़ियॉं उतरने लगा. उसकी चाल में अभी भी वही उम्मीद थी जो तुम्हारे मिलने तक उसी तरह बरकरार रहने वाली थी. उसके सीढ़ियॉं उतरने को बीच में ही लोकते हुए मैंने कहा, अनेकांत ऊपर आ जाइये, वह आने वाली है.

वह पलटा. मुझे देखते हुए ठिठका. हं, तो मैं नीचे सड़क पर ही इंतज़ार कर लेता हूँ मैंने अभी भी सच नहीं बोला था. यह झूठ तो था ही मगर एक झूठ से दूसरे झूठ पर छलांग का दर्ज़ा इसे नहीं दिया जा सकता था.

उसे समझाना मुश्किल था कि आने वाली तो वह है मगर एक तो यह कि वह कब आएगी? और दूसरे यह कि जाने किस सड़क से आए? अगल-बगल, आगे-पीछे से चार-पांच सड़कें गुज़रती थीं और उनके बीच बीच से गलियॉं भी कई. तीसरे यह भी कि उस मुहल्ले में ऐसी कोई जगह नहीं थी जहॉं खड़े होकर इनमें से किसी भी सड़क से आती हुई उसे देखा जा सके. हो सकता है जब वह पीछे की सड़क पर जाए और निशी किसी एक गली से इस सड़क पर प्रकट हो जाए और इस तरह दिन भर छुपन-छुपाई का खेल चलता रहे.

वह फिर सीढ़ियॉं उतरने लगा बल्कि आखरी सीढ़ी भी उतर चुका था. इससे पहले कि वह श्रवणसीमा से बाहर निकल जाए मैंने लगभग चिल्लाने जितनी जोर से कहा, निशी यहीं है अनेकांत!

मुझे पहली बार पता चला कि झूठ बोलने को मैं जितना आसान समझती थी उतना आसान वह नहीं निकला. बल्कि एक झूठ के बाद दूसरा झूठ बोलना ज़रूरी हुआ जा रहा था.
वह आ रहा है कि नहीं यह देखे बिना ही दरवाज़ा खुला छोड़कर मैं भीतर चली गई. इससे अधिक मैं कुछ नहीं कर सकती थी.

वह सीधे भीतर चला आया था, जहॉं तुम हम सभी थे.
वह फिर हॅंसी अपनी वाली हॅंसी. देर तक हॅंसती रही.
वह भी एक दौर था’- वह बोली.
मैं भी हॅंसी अपनी वाली हॅंसी. बस एक दौर न आगे कुछ न पीछे कुछ.
और, वह चिन्मय कहॉं है आजकल?
क्या पता! होगा कहीं न कहीं.
कहीं न हो यह भी तो हो सकता है?

उॅंहूं, ऐसा इसलिए नहीं हो सकता कि एक बार होने के बाद, किसी के भी लिए न होना संभव नहीं. चाहे कोई दृश्य में शामिल हो या दृश्य से बाहर हो. मगर उसका होना निश्चित है.
चलो मान लिया, होगा कहीं न कहीं. अगर अपने रूप में नहीं तो भी किसी न किसी रूप में.
गरीब बेचारा!
हो सकता है अब गरीब न हो और बेचारा भी न हो.
हो सकता है. तब लेकिन वह दोनों था. तब का वह हो सकता है अभी भी कुछ न कुछ बचा हो.

कितनी मिन्नतें की होंगी उसने तुझ से. हो सकता है ढेरों मन्नतें भी मानी हों. यह भी संभव है कि चितई के मंदिर में ढेरों घंटियों में से किसी एक के साथ उसका लिखित प्रमाण भी नत्थी हो, आवेदन या अर्जी की शक्ल में.

गोल्ले देवता की बाहरी परिक्रमा में, उन्हें घेरे ये अर्जियॉं रात-दिन फड़फड़ाती रहती हैं और अपने कतार में मौजूद होने की याद गोल्ले देवता को दिलाती रहती हैं. चिन्मय की ऐसी किसी अर्जी पर कार्रवाई होने का कभी कोई प्रमाण तो नज़र नहीं आया.

वह तुझसे मॉंग ही क्या रहा था? तुम्हारे लंबे-चौड़े पूरे जीवन का सिर्फ एक दिन ही तो मांग रहा था. कुल जमा चौबीस घंटे!

करने को तो जीवन भर के साथ की मॉंग तुझसे करने की जुर्रत कर तो वह अवश्य सकता था, की मगर उसने नहीं. इसकी असंभवता का पता इधर उसे चल चुका था और उधर तो उसे एक दिन के ही लाले पड़े हुए थे.

वह तुझसे शादी करके जमा जमा एक दिन तेरे साथ समुद्र किनारे बिताना चाहता था, इतना ही न! हो सकता है वह भी अम्बरटो इको का मारा हुआ हो और इसकी वजह भी तू ही हो.
तेरे जीवन के अगणित कहे जा सकने लायक दिनों में का एक दिन.

केवल एक!
केवली दिन!!
वह हॅंसने लगी जैसे भीतर कहीं सरसराया हो वह दिन.
यार तू भी न...! बात जब एक या कितने भी दिन की थी ही नहीं. मेरा मतलब था कि अभी बच्चा ही तो था वह!
अच्छा? पता था यह, फिर भी बर्गलाया उसे?
मैंने बर्गलाया? चिन्मय को? कमाल है यार, मुझे तो पता तक नहीं था.
क्या पता नहीं था, यह कि वह बच्चा है?

इस बात पर वह चीख़ भी सकती थी, चीख़ी मगर नहीं. चीख़ने के ऐवज में हॅंस पड़ी, बल्कि ठहाका सा लगाया उसने! ओहो! यार पता था, तभी तो पहले ही दिन बढ़कर सिर चूम लिया था उसका कि ठीक है बच्चे, खुश रहो!

ऊपर से यह जुलम भी! न वह इतना छोटा न तू इतनी बड़ी. छोटा तो था, मगर उतना छोटा भी नहीं कि तू उसे बच्चा कहे! वैसे तो यों भी क्या फर्क पड़ता है बड़ा हो कि बच्चा हो?
एई नहीं!... कोई बच्चा-वच्चा नहीं. कहता हुआ सुमित भी मेरे साथ मैदान में उतर आया था!
काहे का बच्चा?

तुम बच्चा कहोगी उसे और हम मान लेंगे? ईमानदारी की बात तो इतनी सी है कि न तुम उसे बच्चा मानती हो न वह तुम्हें अम्मा! मान लो कल को वह तुम्हें अम्मा कहने लगे तो तुम पलटकर खड़ी हो जाओगी ऐसे जैसे जाने किसको पुकार रहा हो. चिन्मय का बच्चा होना तुम्हारा झूठ है, चिन्मय का नहीं. चिन्मय तो जो है, है सिर्फ चिन्मय. न बच्चा न कुछ और. कहने को सुमित ने यह सब कहा तो निशी से, मगर मज़ा यह कि निशी जब जब भी हमारे शहर में होती वह उसकी चिंता में ऐसे जुटा रहता जैसे निशी कोई बच्चा हो, बच्चा ही नहीं पागल बच्चा हो, जिसके साथ कभी भी कुछ भी घट जा सकता हो और यह ऐन संभव हो कि उसे इसका पता भी न चले.

अभी परसों ही आया था उसकी चिंता से लदा-फॅंदा. बता रहा था, कल शाम निशी के साथ था. हम लोगों ने बियर पी और ढेर सारी बातें कीं?

वह परेशान है और उसकी परेशानी से मैं अलग परेशान. उसे जमकर लिखना होगा वरना वह तो एकदम तबाह हो जाएगी. तीव्र संवेदन और बुद्धि की प्रखरता उससे जो कुछ भी मॉंगती है, उसे देना चाहिए.

पागल तो वह है, लेकिन अब करें तो क्या करें. उसे अपने पागलपन से इतना प्यार है, कि हमें भी हो जाता है. इतनी पागल अगर वह न होती तो उसके लिए मेरे पास क्या भाषा होती.
आज, शायद अभी, आती ही होगी.

कहो रात भर ठीक से सो न पाई हो और अपनी थकान को झोले में डाले सामने आ बैठे और ऊपर से हॅंसने लगे.

आधे से अधिक काम तो उसका हॅंसी से ही चल जाता था, बकाया उसकी बतकही से. बात वह कहती जाए और आपके गले से नीचे उतरती चली जाए बिना इस पड़ताल के कि बात बड़ी है या छोटी, झूठी है या सच्ची, गहरी है या उथली. सच के पाये का झूठ क्या सच में बदल जा सकता होगा?


अगर वह राघवेन्द्र को दद्दू कहना चुने तो उसी के साथ राघवेन्द्र हमेशा के लिए दद्दू हो जाए यह एकदम तय था. जैसे वे अभी तक राघवेन्द्र इसलिए थे कि उन्हें अभी तक किसी ने भी दद्दू कहा ही नहीं था. अब वे अकेली निशी के दद्दू थे. वे उसके इतने दद्दू थे कि अब उसके लिए वे राघवेन्द्र नहीं बचे थे. अब बस दद्दू थे. उसके लिए दद्दू शब्द उनके नाम की तरह था.

भरी बस में उसी उसी दिन वे उससे पहली बार मिले थे और पहली बार में ही दद्दू का पद पा गए थे. दद्दू के कंधे को अगर निशी अपने सोने के लिए चुने तो इसमें दद्दू कर भी क्या सकते थे? निशी ने उनसे पूछा तो था नहीं.
जैसे अगर वह पूछती तो तुम मना कर देते!

तुम यह भी कह सकते थे, नेकी और पूछ-पूछ! लेकिन इसका तो कोई मौका ही उपस्थित नहीं हुआ.

वह राघवेन्द्र की बगल में जगह खाली होने की वजह से नहीं बैठी थी. जगहें तो कई और भी थीं खाली. खिड़की वाली एक भी खाली नहीं थी.

दद्दू का कंधा उसने चुना था. उस दिन के बाद उसका पूरा आसपास दद्दू से बस गया था, जैसे दुनिया पूरी दद्दू से भर गई हो या दद्दू में समा जाने जायक छोटी हो गई हो, फुद्दू सी.

अगर निशी आपकी दोस्त हो और दद्दू उसके जीवन में आए हों तो आपके जीवन में आने से उन्हें रोका नहीं जा सकता. उन दिनों वह जिस किसी के भी बारे में बात करना शुरू करती वह जाकर दद्दू में उलझ जाती. न दद्दू से बाहर निकलती, न आगे बढ़ती, पूरी तो कभी होती ही नहीं. उसके बोलने से पहले हो सकता है दद्दू शब्द को किसी ने इतने निहोरे के साथ न बरता हो.

दद्दू से अगर वह पूछती, जो कि वह पूछ सकती थी कि क्या मैं आप को दद्दू बुला सकती हूँ? या क्या आप दद्दू कहलाना पसंद करेंगे? या क्या आपको मेरे दद्दू होना मंजूर है? तो राघवेन्द्र सोच में पड़ जाते जैसे बंदूक की नोक पर पूछा गया हो. दद्दू होना चाहने जैसी तो कोई बात नहीं थी, वजह भी नहीं थी. चुनाव होता तो वे दद्दू होना खुद न चुनते, चाहे बंदूक की नाक पर ही क्यों न पूछा जाता.

दद्दू तो अपने दोनों हाथों को एक दूसरे में फॅंसाकर अपनी गोद में धरे बैठे थे, ऑंखें मूंदे चुपचाप. जब उसने अपना सिर टिकाया उनके कंधे पर तो उन्होंने ऑंखे खोलकर गरदन घुमाई और अपने कंधे पर टिके उसके सिर को देखा. फिर मॅुंह सामने करके ऑंखें मूंद लीं, जैसे उन्हें कुछ भी पता न हो, उसके सिर के अपने कंधे पर होने के बारे में.
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यह कहानी 'दीप भव' में दो साल पहले प्रकाशित हुई थी. सौजन्य पीयूष दईया