सहजि सहजि गुन रमैं : महेश वर्मा

Posted by arun dev on मई 27, 2014




































जैसे की जीवद्रव्य

अपनी उंगलियों से मेरी हथेली पर लिखे वह शब्द
कोई नाम लिखो
फिर मुझे एक कूटशब्द लिखने दो अपने हाथ पर
या पीठ पर
कहीं भी
फिर एक चुंबन लिखो एकाकी चांद पर ताकि मैं
फिर से उसी जगह पर उन्हीं अक्षरों पर दोहराकर लिख
सकूँ अपना चुंबन

आकाश कहाँ लिखा है ?
मेरे या कि तुम्हारे वक्ष पर ?

अब इस आकाश पर एक सूर्य लिखो
अनगिनत तारे,  बादल और हवा लिखो
और मुझे आंकने दो अपने हिस्से की आकाश गंगा

फिर मेरे माथे पर अपना भाग्य लिखो
मैं तुम्हारे माथे पर पढूंगा अपना भाग्य

लेकिन सबसे पहले मेरे लिए एक जीवन लिखो.
शुरूआत में मेरी पहली कोशिका लिखो
और इसमे तीर से
महत्वपूर्ण हिस्सों को नामांकित करो : जैसे की जीवद्रव्य.




कहना

और जबकि टुकड़ा टुकड़ा संकेतों से भरा है
वह आकाश जहाँ मेरा बेअक्ल सिर मंडरा रहा है
ज़मीन से साढ़े पांच फीट उपर
मैं कुछ भी समझ नहीं पा रहा हूँ

एक संकेत से दूसरे पर
दूसरे से फिर तीसरे, अनंतवें पर बेचैन ततैया जैसी
कूदती मेरी निग़ाह

मैं समझ नहीं पा रहा हूँ

मेरा ह्दय भरा है टुकड़ा टुकड़ा और अलहदा संकेतों से

कई बार तो मैं जनरेटर जैसी ठस मशीन और
सायकिल जैसी शर्मिंदा संरचना के सामने भी  खड़ा रह जाता हूँ देर तकः
किसी मुंह से करूँगा धूल और पत्तियों और पानी की बात.




किनारे

कोई नदी नहीं थी एक जर्जर पुल था

उस रात वहां नीचे बह रहा था अन्धकार
और एक दोस्त था कुछ कहता हुआ लगातार
कि बस एक नदी बची है हमारे शहर में
यहीं आ जाता हूँ किसी किसी रात
और चुपचाप देखता रहता हूँ इसका धीमे धीमे बहना
बरसात में इसका पानी मटमैला हो जाता है

अभी इतने बीते हुए समय
और इतनी बीती हुई दूरियों की सड़कें पार करके भी
आवाज़ में फंस रही है रेत यह कहने में
कि नदी की याद के किनारे बैठे थे
नदी कोई नहीं थी एक जर्जर पुल था

नीचे बह रहा था अन्धकार.



जाना

एक पुराना समझौता है मृतकों के बीच
शोक के विरुद्ध अपरिचय की मुखमुद्रा

मृतक किसी को नहीं पहचानते
सीने पर पछाड़ खाती स्त्री से लेकर
असमंजस के पिंजरे में बैठे पालतू तोते तक: किसी को नहीं

थोड़ा भुलक्कड़ तो वो पहले से थे
यह वाक्य बहुत सुनाई देने लगा है अंतिम यात्राओं में

यह अभेद्य भुलक्कड़पन,
यह चुप्पी भी उसी समझौते का पूर्वाभ्यास
जिसके बारे में पहले कह चुके

थोड़ी ढीली बंधी अर्थी
हाँ ना में सर हिलाते जा रहे हैं वीतराग
भजन-निरगुन ,
लाई -ब्राह्मण
सिक्का-छुरी,
घृत और नाई
सबके सिर के ऊपर छत्र सा तन जायेंगे धुंआ होकर
फिर एक ओर चल पड़ेंगे अचानक
जैसी उनकी आदत थी बिना बताये
कि उधर पुराने पार्क में कुछ दोस्त प्रतीक्षा कर रहे हैं.



बुनना

यह तुम्हीं हो जो बारम्बार मुझे देह की तरह बुनती हो
इसीलिये मुझमें यह सिफत आ गई है कि मुझे
अंतिम गांठ तक उधाड़ा जा सकता है

(अजीब बात है हाथ की बुनाई में कि इस गठान को कहीं फंदा कहते
हैं कहीं घर. बच्चे का स्वेटर अस्सी का घर का, एक सौ बीस फंदे का  स्त्री का कार्डिगन.
मोजे और दस्ताने कम घरों में)

रति में और विलाप में
कहीं भी मुझे बुनकर मुकम्मल कर देती हो,
बस में बैठी हुई
उदासी में बैठी हुई

बाकी के समय
जैसे खाली दोपहर भी मुझे तजना नहीं
अपनी उधेड़बुन में रखना कि जैसे कुछ घर बुनना
कुछ फंदे खोल देना.



हरा रंग

हमने साझा कमज़ोरियों पर देर तक बात की.
अपना चिरा हुआ वक्ष लेकर हम आमने सामने बैठे रहे देर तक.
मैंने उसके कठोर ह्दय की शिकायत की
जो मेरे दुःख समझने से इंकार करता आया है
उसकी शिकायत शायद मेरी भाषा को लेकर थी.

बीच में हम अटपटेपन के कारण एक दूसरे की बात समझ नहीं पाते थे.
तो भी मैं कहूंगा बातचीत विद्वेष पर खत्म नहीं हुई हमने शायद सब
कुछ समय पर छोड़ने का निश्चय किया  
शायद अफसोस में हाथ मिलाये च् की आवाज़ की.
जब मेरी कविता जाने को उठी
तब मैंने उसके लबादे पर ध्यान दिया
उस पर अलंकारपूर्ण ढंग से कढ़ाई की गई थी
उसमें कीड़ों ने बारीक छेद कर दिये थे

वह जैसे सफ़ेद काग़ज़ के मैदान पर चलकर अंधेरे में खो गई

बीच में मुड़कर जब उसने मुझे देखा तो
मैंने खिड़की से
अपना हरा हाथ हिलाया.




भाषा 

इस विशाल पुल के पायों के नीचे भी
नरबली की किम्वदंतियाँ दबी हैं

उपर शांत बह रहे मटमैले पानी के
नीचे बह चुका है लाल रक्त

यह ट्रक के गुज़रने से थरथराया है पुल
या अनुष्ठानिक शब्दों के अनुनाद से हिल गया है
इसका आंतरिक

जो शब्द हत्या को वैध बनाते थे
वे आज भी हमारी भाषा में गूंज रहे हैं

जैसे कि एक नृशंस हत्या हुई थी को
ऐसे याद रखना कि यहीं पर एक
बलि दी गई थी.



फूल

वसंत से एक पीला फूल तोड़कर मैंने
अगले मौसमों के लिये रख लिया
जहां किताब में था वहां एक पीला धब्बा छोड़कर
वह सूर्य हुआ

इसी तरह उड़हुल का सुर्ख फूल
वर्षा से तोड़कर रख लिया शिशिर के लिये
पहले इससे मौसम का सीना दहका
फिर वह भी सूर्य हुआ

एक और मौसम का अनुभव भी मिलता जुलता ही है
बस फर्क ये कि यहां एक सफेद फूल था

रंगों से अधिक
सूरज का नाता फूलों से है
इसी से रात में फूल
उदास दिखते हैं.




ऐसे ही वसंत में चला जाऊँगा

ऐसे ही वसंत में चला जाऊँगा,
इन्हीं फटेहाल कपड़ों में जूतों की कीचड़ समेत.
परागकणों की धूल में नथुनों की सुरसुराहट रोकता
ढू़ढ़ने लगूंगा कोई रंग
वहाँ खूब पीला नहीं दिखेगा तो
निराश जूते पर
जमी धूल पर
पीला लिखने के लिये झुकूंगा
रूक जाऊँगा.

किसी उदास वृक्ष की तरह ऐसे ही झुका रहूँगा
किसी दूसरे मौसम में सर उठाऊँगा

कोई पत्ता उठाऊँगा आगे की लू भरी दोपहरों से
धूप के दरवाजे में भी ऐसे ही घुस जाऊँगा

कुछ भी नहीं बदलूंगा कुछ बदलेगी
तो कंधों पर गिरती बारिश ही बदलेगी

बारिश से बाहर कभी  नहीं आऊँगा.




हमारे शब्द

वे ज़्यादा से ज़्यादा पहुँचाना चाहते हैं आज का अगले दिन
देर रात छपते हैं अखबार

अभी इस वक्त
अख़बारी काग़ज़ पर धीमे धीमे सूख रहे होंगे
श्रद्धांजलि के  वे शब्द
जो दोपहर हम अख़बार के दफ़्तर दे आये थे.

थोड़ा वे उन शब्दों से अलग थे जो वाकई हमने बोले थे उसी सुबह

छप के थोड़ा अलग वे लगते होंगे

कुछ और वे बदल चुके होंगे
जब हमसे मिलेंगे सुबह के उजाले में
चाय के साथ.

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