सहजि सहजि गुन रमैं : यतीन्द्र मिश्र























पेंटिग : Jean-Léon Gérômesnake-charmer-1870
यतीन्द्र मिश्र कविता और संगीत के संगम के कवि हैं. शास्त्रीय संगीत में उनकी गहरी दिलचस्पी है. हिंदी में ललित कलाओं पर उनका लेखन रेखांकित करने योग्य है. युवा कविता की चौहद्दी में यतीन्द्र मिश्र की कविताएँ संयत, शास्त्रीय और सुघड़ हैं. यतीन्द्र की इन कविताओं में कबीर की अनुगूँज है. एक ऐसा प्रतिस्वर जो मूल के साथ मिलकर समय को पुकारता है. एक ऐसा तनना- बुनना जिसमें खुद कवि का अपना आर्द्र स्वर है विलम्बित में.  

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बाज़ार में खड़े होकर

कभी बाज़ार में खड़े होकर
बाज़ार के खिलाफ़ देखो

उन चीज़ों के खिलाफ़
जिन्हें पाने के लिए आये हो इस तरफ़

ज़रूरतों की गठरी कन्धे से उतार देखो
कोने में खड़े होकर नकली चमक से सजा
तमाशा-ए-असबाब देखो

बाज़ार आए हो कुछ लेकर ही जाना है
सब कुछ पाने की हड़बड़ी के खिलाफ़ देखो

डण्डी मारने वाले का हिसाब और उधार देखो
चैन ख़रीद सको तो ख़रीद लो
बेबसी बेच पाओ तो बेच डालो

किसी की ख़ैर में न सही अपने लिये ही
लेकर हाथ में जलती एक मशाल देखो

कभी बाज़ार में खड़े होकर
बाज़ार के खिलाफ़ देखो.



सम्मोहित आलोक

कविता में जहाँ शब्द रखा है
चिमटे से उठाकर वहाँ अंगारा रख दो

अर्थ के सम्मोहित आलोक में
जहाँ मर्म खुलता दिखता हो
दीवट में उसके थोड़ा तेल भर दो

कुछ पल रुककर
गौर से देखो उस तरफ़

जो झिप रहा
वह नेह भर बाती का उज़ाला है
जो चमक रहा
वह सत्य की दिशा में खुलने वाला रास्ता है.




एक ही आशय में तिरोहित

सत्य का मुख देखते हुए
अपनी सुई में डालता है जुलाहा धागा

संशय की महीन बुनावट से परे
जारी रखता है अपना काम
सिलाई तगाई और टाँकने की शर्तें

सूर्य की ओर ताकते हुए
उड़ती हैं अनगिन सतरंगी चिडि़याँ
बसेरे से दूर अनथक लगी रहतीं
दाने तिनके की आस में

देखने में ये दोनों दृश्य अलग-अलग हैं
मगर भाषा के मानसरोवर में
एक ही आशय में तिरोहित हुए जाते हैं.




ताना-भरनी

प्रेम का ताना
विश्वास की भरनी से

जीवन की बिछावन
तागी थी

न ताना कमजोर था
न ही भरनी थी ढीली

फिर भी बिछावन थी
जो फटती ही चली गयी
कम होता गया
दिन ब दिन उसका सूत

जैसे प्रेम का
विश्वास का दरक गया हो धागा

अब बिछावन है
जो पड़ी है धरती पर
फटेहाल अपना सिर उठाए

जीवन है
चल रहा इसी तरह
गँवा चुका विश्वास
थोड़ा सा प्रेम बचाए.




पनघट

अगर आप इस कविता से
उम्मीद करते हैं यहाँ पानी मिलेगा
तो आप ग़लती पर हैं
तमाम दूसरे कारणों से उभर आयी
प्यास के हिसाब का
लेखा-जोखा भी नहीं मिलेगा यहाँ
मल्हार की कोई श्रुति छूट गयी हो
ऐसा भी सम्भव नहीं लगता

यह कविता का पनघट है
शब्दों की गागर भरी जाती यहाँ
डगर भले ही बहुत कठिन क्यों न हो.




कामना

एक सुई चाहिए
हो सके तो एक दर्जी की उंगलियाँ भी
सौ-सौ चिथड़ों को जोड़कर
एक बड़ी सी कथरी बनाने के लिए

एक साबुन चाहिए
हो सके तो धोबिन की धुलाई का मर्म भी
बीसों घड़ों का पानी उलीचकर
कामनाओं का चीकट धोने-सुखाने के लिए

एक झोला चाहिए
हो सके तो कवियों का सन्ताप भी
अर्थ गँवा चुके ढेरों शब्दों को उठाकर
नयी राह की खोज में जाने के लिए

सुई साबुन पानी और कविता के अलावा
कुछ और भी चाहिए
शायद भाषा का झाग भी
मटमैले हो चुके ढाई अक्षर को चमकाकर
एक नया व्याकरण बनाने के लिए.




कहाँ जाएँगे

हम अपने घर जला देंगे
तो कहाँ जाएँगे?

क्या सुख के लिए
कुछ और तरीके काम आएँगे?

सुस्ताने के लिए एक कथरी
ओढ़ने के लिए वही पुरानी चादर
बिछाने के लिए आधी-अधूरी चटाई

सब बिसराकर किधर जाएँगे?

हम अपने घर जला देंगे
तो क्या पाएँगे?

प्यास बुझाने के लिए वह उदास घड़ा
खाने के लिए काँसे की बरसों पुरानी थाली
पाने के लिए एक भारी लोटे में
जमा होते रहे कुछ अनमने सपने

सब कुछ गँवाकर क्या बचाएँगे?

क्या सुख के लिए
कुछ और रास्ते मिल जाएँगे?

हम अपने घर जला देंगे
तो कहाँ जाएँगे?




विलम्बित में

तुम्हारा सब-कुछ इतना तत्काल है
शायद ही कोई तुम्हें गा सकता हो
विलम्बित में

तुम्हें विलम्बित में ले जाना
संगीत को प्रपात की गरिमा से दूर ले जाना है

जैसे दुनिया अपने होने को
धीरे-धीरे स्थगित किये जाती है
वैसे ही तुम उसका होना
तुरन्त वहाँ सम्भव करते हो

ऐसे में तत्काल को
विलम्बित में बाँधने का विचार ही
झरने के कोलाहल से दूर जाने जैसा लगता है

बहुत सारी चीज़ों को
फटकारकर एक ही बार में
दुरुस्त कर देने वाली तुम्हारी युक्ति देखकर
यही लगता है
जैसे रागों की धैर्य भरी साधना में
क्रान्ति
द्रुत में ही सम्भव है

वहाँ विलम्बित में बाँधने का जतन
उतना ही विस्मय भरा है
जितना तुमको तत्काल से छिटकाकर
अवकाश में पसार देना.




हम पर इतने दाग़ हैं

हम पर इतने दाग़ हैं
जिसका कोई हिसाब ही नहीं हमारे पास
जाने कितने तरीकों से
उतर आए ये हमारे पैरहन पर

रामझरोखे के पास बैठकर
जो अनिमेश ही देख रहा हमारी तरफ
क्या उसे भी ठीक-ठीक पता होगा
कितने दाग़ हैं हम पर?
और कहाँ-कहाँ से लगाकर
लाये हैं हम इन्हें?

क्या कोई यह भी जानता होगा
दाग़ से परे भी जीवन वैसा ही सम्भव है
जैसा उन लोगों के यहाँ सम्भव था
जो अपनी चादर को
बड़े जतन से ओढ़ने का हुनर रखते थे.




बानी

उसने बानी दिया
जैसे रेत में ढूँढ़कर पानी दिया

उसने बानी दिया
जैसे रमैया से पूछकर
गुरु ग्यानी दिया

उसने बानी दिया
जैसे जीवन को नया मानी दिया.
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यतीन्द्र मिश्र : हिन्दी कवि, सम्पादक और संगीत अध्येता हैं. उनके अब तक तीन कविता-संग्रह, शास्त्रीय गायिका गिरिजा देवी, नृत्यांगना सोनल मानसिंह एवं शहनाई उस्ताद बिस्मिल्ला ख़ाँ पर हिन्दी में प्रामाणिक पुस्तकें प्रकाशित हैं. प्रदर्शनकारी कलाओं पर निबन्धों की एक किताब विस्मय का बखानतथा  कन्नड़ शैव कवयित्री अक्क महादेवी के वचनों का हिन्दी में पुनर्लेखन भैरवी नाम से प्रकाशित हुआ है. वरिष्ठ कवि कुँवरनारायण पर एकाग्र तीन पुस्तकों क्रमशः कुँवरनारायण- संसारएवं उपस्थिति’, ‘कई समयों मेंएवं दिशाओं का खुला आकाश, अशोक वाजपेयी के गद्य का एक संचयन किस भूगोल में किस सपने में तथा अज्ञेय काव्य से एक चयन जितना तुम्हारा सच है प्रकाशित है.
साथ ही, फि़ल्म निर्देशक एवं गीतकार गुलज़ार की कविताओं एवं गीतों के चयन क्रमशः यार जुलाहे तथा मीलों से दिन नाम से सम्पादित है.. गिरिजा का अंग्रेजी, ‘यार जुलाहे का उर्दू तथा अयोध्या श्रृंखला  कविताओं का जर्मन अनुवाद प्रकाशित हुआ है.

उन्हें रज़ा पुरस्कार, भारत भूषण अग्रवाल स्मृति पुरस्कार, भारतीय भाषा परिषद युवा पुरस्कार, हेमन्त स्मृति कविता सम्मान सहित भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय की कनिष्ठ शोधवृत्ति एवं सराय, नयी दिल्ली की स्वतंत्रा शोधवृत्ति मिली हैं. साहित्यिक - सांस्कृतिक गतिविधियों हेतु भारत के प्रमुख नगरों समेत अमेरिका, इंग्लैण्ड, मारीशस एवं अबु धाबी की यात्राएँ की हैं. अयोध्या में रहते हैं तथा समन्वय व सौहाद्र्र के लिए विमला देवी फाउण्डेशन न्यास के माध्यम से सांस्कृतिक गतिविधियाँ संचालित करते हैं.
yatindrakidaak@gmail.com   

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  1. जीवन के राग को परिभाषित करती गहन कवितायें।

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  2. Mishra ji Ki in kavitayo mey kathye aur chando ka sehaj sangit hey....subhkamnaye sweekar kijiye Yatender JI.
    Arun ji dhanyavad gitikaye share karne ke liye.

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  3. यतींद्र की यह पुस्‍तक पढ चुका हूँ। कविताऍं अपने रंग में बहा ले जाती हैं। एक गैरिकवसना छवि से संयुक्‍त ये कविताएैं धीर प्रशांत उदात्‍त और शाश्‍वत का समावेशन हैं। बधाई।

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  4. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन मकर संक्रांति की हार्दिक मंगलकामनाएँ - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  5. sahit ke editor yatindra ki kavitai bhi sunder hai ho bhi kayon nave yati ke indra hai.yati aur gati kisi bhi kavita ke lay ki pran hoti hai.

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  6. अद्भुत कवितायें हैं ........अद्भुत कवि हैं यतीन्द्र और इंसान भी बहुत उम्दा हैं ...

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  7. बेहतरीन कविता . शुक्रिया और बधाई , मित्र यतींद्र जी को

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  8. एक से बढकर एक कविताएँ...सच्ची, सरल और गहरी...आत्मावलोकन के प्रश्नों के साथ साथ इनमें प्रत्युत्तर देती कई कामनाएँ और विचार हैं, और इनका बहाव मंद किन्तु निश्चय रूप से बहा ले जाने वाला है.

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  9. कामना ,सम्मोहित आलोक, कहाँ जायेंगे कविताएं विशेष अच्छी लगीं। विराग में राग की तरह हैं ये कविताएं।
    समालोचन शुक्रिया।

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  10. बहुत ही अच्छी कवितायें ........वैसे भी हिंदी में यतीन्द्र मिश्र जैसे कवि बहुत कम ही हैं .................

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  11. गहराई में उतरी बेहद सुन्दर कवितायेँ !

    अनुपमा तिवाड़ी

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