कथा - गाथा : सईद अय्यूब (४)

Posted by arun dev on दिसंबर 16, 2013




























दाढ़ का दर्द                                              
सईद अय्यूब


सईद की कहानियों का वातावरण उत्तर भारतीय कस्बों के निम्नवर्गीय मुस्लिमसमाज के इर्द-गिर्द निर्मित होता है. उर्दू की  किस्सागोई की रवायत से निकटता और भाषा पर पकड़ से उनकी कहानियों में पठनीयता गज़ब की रहती है. एक अजब विद्रूप में कहानियों का अंत होता है जो हमारे समाज की हिस्र शक्तियों के सामने हमारी बेबसी का ही दरअसल एक प्रकटीकरण है.

एक हिन्दुस्तानी मियां  दाढ़ के दर्द के कारण ठीक से अपनी भारतीयता सिद्ध नहीं कर पाते और मारे जाते हैं.  




हर का यह मुहल्ला दो चीजों के लिए मशहूर है. पहली यह कि मुसलमानी मुहल्ला है इसलिए काफ़ी खूंख्वार है और दूसरी यह कि खुद अल्लाह मियाँ भी आ जाएँ, तो इस मुहल्ले को साफ़ नहीं कर सकते. वैसे तो यह मुहल्ला काफ़ी लंबा-चौड़ा है लेकिन शहर की मुख्य सड़क से कटकर इस मुहल्ले में प्रवेश करने पर दायीं तरफ़ जो मस्जिद पड़ती है उससे निकलती बायीं ओर की सड़क के अंतिम सिरे पर रहते हैं हिंदुस्तानी मियाँ. पिछले बीस-पच्चीस वर्षों में नौजवान और फिर जवान हुई पीढ़ी ने तो बस उनको देखा है जैसे उन्होंने उस सार्वजनिक शौचालय को देखा है जो अपने अंदर की सारी गंदगी अपने पिछवाड़े यानी मुहल्ले के मुँह पर उगलता रहता है और जिसकी बदबू बाहर से आने वालों को बहुत दूर से ही इस मुहल्ले का पता दे देती है. लेकिन मुहल्ले वालों के लिए यह कोई परेशानी की बात नहीं है. वे ईद के दिन लगाये जाने वाले इत्र की खुश्बू और इस सदाबहार बू में कोई फ़र्क नहीं करते.

तो पिछले बीस-पच्चीस वर्षों में नौजवान और फिर जवान हुई पीढ़ी नहीं जानती कि हिंदुस्तानी मियाँ और यह शौचालय कब और कैसे इस मुहल्ले में आये. बस उन्हें मालूम है तो दोनों के इस्तेमाल का तरीका. एक रुपये दो और शौचालय का मनमाना उपयोग करो. ठीक उसी तरह, जब मुहल्ले में कोई मज़ेदार घटना न हो तो हिंदुस्तानी मियाँ का मनचाहा उपयोग करो. लेकिन सच पूछो तो इस मुहल्ले के नौजवानों को उस शौचालय या हिंदुस्तानी मियाँ की ज़िंदगी के बारे में पता करने की फुर्सत भी नहीं है. दिन भर क्रिकेट, पतंग, और एक दूसरे से गाली-गलौज और छोटी-मोटी लड़ाइयों जैसी बदनतोड़ मेहनत के बाद जो समय बचता है वह मस्जिद के मुल्ला जी की वजह से ऊपर वाले अल्लाह जी को सौंपना पड़ता है. आखिर को उस दुनिया में ही रहना है और मगफिरत तो अल्लाह जी ही को करनी है और मगफिरत के बारे में तो मुल्ला जी ही को बताना है. वैसे मुल्ला जी दसवीं छोड़, पाँचवी भी पास नहीं हैं.

किसी टटपूंजिए मदरसे के पासआउट. क़ुरान और हदीस पढ़ लेते हैं और उनको समझने का काम अपने खुदा पर ही छोड़ देते हैं. पर दिखते और दिखाते ऐसे हैं जैसे खुदा और उसके रसूल पर पी.एच.डी. कर रखी है और कभी-कभी तो ऐसा लगता है अगर वे नहीं होते तो खुदा और उसके रसूल की जात ही खतरे में पड़ जाती. मुहल्ले का हर नौजवान साल में एक-दो महीने के लिए बाक़ायदा नमाज़ी हो जाता है और जब तक वह नमाज़ पढ़ता रहता है दूसरे बे-नमाज़ियों की ज़िंदगी पर अफ़सोस करता रहता है. हर एक-दो महीने के बाद पुराने नमाज़ियों की जगह कुछ नए नमाज़ी आ जाते हैं और दूसरे नमाज़ियों की तरह,       बे-नमाज़ियों पर अफ़सोस करने लगते हैं और मुल्ला जी की मेहँदी लगी दाढ़ी उसी पुराने अंदाज़ में हिलती रहती है.

लेकिन इस मुहल्ले की पुरानी पीढ़ी, जो दिन भर मुहल्ले की विभिन्न बैठकों (चाय की दुकानों) में बैठकर चाय और पावरोटी खाती रहती है, लोकल उर्दू अखबार जो कभी-कभी कोई ताज़ा खबर भी दे देते हैं, पढ़ती रहती है और मुहल्ले के इक़बाल मियाँ और उनके सपूत बब्बन मियाँ और बब्बन मियाँ के पूत शब्बन मियाँ के करतूतों पर बहस-मुबाहिसा करती रहती है, को अच्छी तरह याद है कि हिंदुस्तानी मियाँ और यह शौचालय मुहल्ले में कब आए क्योंकि दोनों के ही आने से मुहल्ले में जो हलचल हुई, उसको भूलना आसान नहीं है. एक रात अच्छे-भले सोकर जब मुहल्ले के लोग जागे तो एक साथ दो-दो झटके उनका इंतज़ार कर रहे थे. पहला झटका लगा जब सोकर उठने के बाद, वे ज़िंदगी का एक निहायत ज़रुरी काम निपटाने मुहल्ले के बायीं ओर की खाली पड़ी ज़मीन पर पहुँचे.

वर्षों से अपनी पुश्तैनी मिलकियत समझ कर जिस ज़मीन पर मुहल्ले के मर्द और औरतें को-ऑपरेटिव की भावना से एक दूसरे के आस-पास और आमने-सामने बैठकर, एक दूसरे की तरफ देखते हुए भी न देखकर और दूसरे के काम में दखलंदाजी न करते हुए अपना नैसर्गिक काम करते चले आ रहे थे, उसी ज़मीन को चारों तरफ़ से रस्सियों से घेर कर कुछ लोग खुदाई कर रहे थे. ठेकेदार और मज़दूरों द्वारा डाँट कर वहाँ से भगा देने के बाद लोगों ने अपना काम आस-पास के बगीचों और झाड़ियों में निपटाया. जब लोग किसी तरह से अपना-अपना काम निपटा कर वापस आए तो इक़बाल मियाँ के घर के सामने बने हुए हाते से आती हुई कुछ तेज़ और कुछ फुसफुसी आवाजों ने उनके क़दम रोक लिए और जल्दी ही पता चल गया कि यह उनके लिए दूसरा झटका था. हाते के अंदर से एक औरत की तेज़ आवाज़ उभर रही थी-

“मुतपियना के....!जब माँ-बाप ने जनखा ही जना था तो मर्द बनने काहे को चले थे?”
एक मर्द की फुसफुसाती आवाज़- “मैं कहता हूँ चुप...”
“काहें को चुप रहूँ रे गड़ेना...”-तेज़ आवाज़ ने फुसफुसाहट को काटा- “अब एक बार कह दिया कि यहाँ से नहीं जाएँगे तो बस...चलते चलते तो एड़ी में फोड़ा हो गया...”
फुसफुसाहट...
तेज़ आवाज़...
लोगों की उत्सुकता...
तेज़ आवाज़...
फुसफुसी आवाज़ तो ज़्यादा समझ में नहीं आती थी लेकिन तेज़ आवाज़ों वाले डायलाग ज़बरदस्त थे. उनको सुनकर लोगों को फुरफुरी छूट रही थी और अपनी बात-चीत में उस फुरफुरी का मज़ा वे आज भी लेते हैं.

चारों तरफ़ से ईंटो की दीवार से घिरा इक़बाल मियाँ का यह पुराना हाता पिछले साल से वीरान पड़ा था. पहले समदू इसमें सब्ज़ियाँ उगाता था. इक़बाल मियाँ के ननिहाल के गाँव से आया समदू, हट्टाकट्टा नौजवान. दिन भर इस हाते में हड्डीतोड़ मेहनत करके कई तरह की सब्ज़ियाँ उगाना, इक़बाल मियाँ के घर में इस्तेमाल होने के बाद बची हुई सब्ज़ियों को बाज़ार में ले जाकर बेचना और फिर ईमानदारी से सारा हिसाब-किताब इक़बाल मियाँ को देना और बदले में दो वक़्त का खाना और कभी-कभी इक़बाल मियाँ की गालियाँ सुनना उसका फर्ज़ था. लोगों को हैरानी होती थी कि इतना हट्टाकट्टा और मेहनती नौजवान, जिसको दुनिया में हज़ार काम मिल सकते थे, रोटी के चंद टुकड़ों और इक़बाल मियाँ की गालियों पर इतने सालों से यहाँ टिका हुआ था.

खुद इक़बाल मियाँ भी कभी कभी हैरान होते थे और हैरान होने के साथ ही परेशान हो जाते थे कि अगर समदू कभी छोड़ कर चला गया तो...किंतु पिछले साल जब इक़बाल मियाँ की हैरानी मिटी तो वे और ज़्यादा परेशान हो गए. एक दिन, यूँ ही, बिना किसी इरादे के इक़बाल मियाँ टहलते-टहलते हाते की तरफ़ जा निकले. सब्ज़ियों के खेत में समदू कहीं दिखाई नहीं दिया. जिज्ञासावश उन्होंने हाते में बनी हुई, समदू की झोंपड़ी के अंदर झाँक लिया और झाँकते ही उनके होश फ़ाख्ता हो गए. समदू के सोने के लिए बिछी हुई पुआल की एक ओर समदू की लुंगी और इक़बाल मियाँ के पोते शब्बन मियाँ जो लगभग बारह साल के थे ओर पतंगे उड़ाने का जुनून की हद तक शौक रखते थे और समदू जिन्हें अक्सर नई-नई पतंगे बना कर देता रहता था, का हॉफपैंट पड़ा हुआ था और पुआल की दूसरी ओर समदू ओर शब्बन मियाँ. इक़बाल मियाँ दुनिया देखे हुए थे. ना कोई शोर किया न कोई शराबा. बस तब से ही इक़बाल मियाँ का यह पुराना हाता वीरान हो गया था.

इक़बाल मियाँ के आने पर जब लोगों ने हाते में प्रवेश किया तो उन्हें पहली बार हिंदुस्तानी मियाँ के दर्शन हुए. सर पर अंगोछा, बदन पर एक मैला सा कुर्ता, कुर्ते के नीचे मुसलमानी ट्रेडमार्क लुंगी, बिना चप्पलों के धूल भरे पैर, चेहरे पर बकर दाढ़ी और गजब की दीनता लिए हिंदुस्तानी मियाँ सामने थे. उम्र तो खैर कुछ कम रही होगी पर दिखते पचास से ऊपर के थे. लेकिन हिंदुस्तानी मियाँ का जायज़ा तो लोगों ने बाद में लिया क्योंकि जिस दूसरे झटके ने उनके होश उड़ाये थे, वह हिंदुस्तानी मियाँ के सामने, एक साँवली, तीखे नैन-नक्श, लगभग तीस साला, सरापा चंडी बनी हुई औरत के रूप में खड़ा था. इक़बाल मियाँ ने उस औरत पर एक निगाह डाली और उसी वक़्त उस औरत ने भी इक़बाल मियाँ को देखा. दोनों की आँखें मिलीं और तय हो गया कि इक़बाल मियाँ के उस पुराने हाते पर उस औरत का हक़ है. हिंदुस्तानी मियाँ और जमीला वहीँ ठहर गएँ और इक़बाल मियाँ के पुराने हाते पर जमीला का हक़ रोज़-बरोज़ बढ़ता गया यहाँ तक कि इक़बाल मियाँ की पुरानी मेहरी नाराज़ हो गई क्योंकि उसको अपने हिस्से का बंदरबाँट पसंद नहीं आया.

सुगबुगाहट चेमेगोइयों में और चेमेगोइयाँ धीरे-धीरे चाय की दुकानों पर मुस्कुराहटों में नमूदार होकर कहकहों में बदलने लगीं और एक दिन लोगों ने देखा कि इक़बाल मियाँ और बब्बन मियाँ में ठहर गई. लोगों को, बाद में विश्वस्त सूत्रों से पता चला कि अपना हक़ मारा जाता देख, एक दिन मेहरी ने बब्बन मियाँ को कबाड़ वाली कोठरी की तरफ़ धकेल दिया और बब्बन मियाँ ने पहली बार देखा कि इक़बाल मियाँ के पुराने हाते पर जमीला ने किस तरह कब्ज़ा कर रखा था और बस फिर...लेकिन यह फ़साद की जड़ एक दिन खुद-ब-खुद उखड़ गयी और जमीला रात के तीसरे पहर, एक मरी हुई लौंडिया को जन्माने के बाद खुद भी उसके पास चली गयी. लोगों को मालूम था कि वह लौंडिया किसकी थी, गोरा रंग और चेहरे की बनावट एकदम साफ़ बता रही थी, लेकिन इकबाल मियाँ से कौन कहे?

हिंदुस्तानी मियाँ ने अपने और जमीला के बारे में लोगों को कई कहानियाँ सुनाईं जिससे यह तय करना मुशिकल हो गया कि कौन सी कहानी सच्ची है. शुरू में लोगों को हिंदुस्तानी मियाँ से डर भी लगा. कुछ लोगों का ख्याल था कि वह सी.आई.डी. का आदमी है और सरकार ने उसे इस इस्लामी मुहल्ले में यह टोह लेने के लिए भेजा है कि हिंदुस्तान के खिलाफ़ और पाकिस्तान के पक्ष में कहीं कोई साज़िश तो नहीं चल रही. लेकिन कुछ ही दिनों में लोगों को यह विश्वास हो गया कि हिंदुस्तानी मियाँ इस दुनिया के आदमी नहीं हैं. पहले-पहल जब लोगों ने उनसे उनका नाम पूछा तो जमीला का नाम तो उन्होंने बता दिया पर अपना नाम बताने की जगह बोले,-
“याद पड़ता है कि माँ-बाप ने एक थो नाम रखा था पर जान कर का कीजिएगा? आपके मन में जो आवे, वही बुला लीजिए.”

“हरामी” भीड़ में से एक लड़के ने अपने हिसाब से सबसे सुंदर नाम पेश किया.
हिंदुस्तानी मियाँ बोले, “अपने बाप का नाम हमको क्यों दे रहे हो भाई? चलो अब दे ही दिया है तो आज से हमको हरामी ही बुलाना. कम से कम इसी बहाने अपने बाप को कुछ देर के लिए याद तो करोगे.”

हिंदुस्तानी मियाँ का जवाब सुनकर ठहाके का एक बुलंद शोर उठा. लड़का यह देखकर सकपका गया और उठ कर दरवाज़े की तरफ़ भागा जहाँ वह अपने बाप से टकरा गया जो उसी वक़्त हाते हे अंदर आया था और उसने हिंदुस्तानी मियाँ का जवाब सुन लिया था. लेकिन लोग हैरान हुए कि उसने हिंदुस्तानी मियाँ को कुछ कहने के बजाए, लड़के को अपने सर से ऊपर उठाया और ज़ोर से ज़मीन पर पटक दिया. लड़का मरियल कुत्ते सा, काएँ-काएँ करता वहाँ से भागा और उसका बाप उसको रक बार फिर पटकने के नीयत से उसके पीछे हो लिया.

तो जब नाम को लेकर हिंदुस्तानी मियाँ ने अपना सस्पेंस बनाएँ रखा तो लोगों ने अपने सुविधानुसार उनको ‘बुढुऊ’, ‘बुढुआ’ या ‘बुड्ढा’ कहकर बुलाना शुरू कर दिया. हिंदुस्तानी मियाँ ने कुछ सोफियाना मिज़ाज पाया था. कोई कुछ भी कहता, चुपचाप मुस्कुरा कर सुन लेते थे. काम-धाम से कोई मतलब नहीं. जमीला अपनी दोहरी मेहनत के बलबूते जो कुछ भी लाती और पका कर रख देती, अल्लाह का नाम लेकर गटक जाते और इक़बाल मियाँ के हाते के बाहर रोड से मिला हुआ जो पत्थर का चबूतरा था, उस पर अपनी गुदरी बिछा कर सो जाते. लोग उनसे तरह तरह के मज़ाक करते. कभी-कभी इशारों-इशारों में जमीला की करतूतों की बात छेड़ कर मज़ा लेने की कोशिश भी करते लेकिन हिंदुस्तानी मियाँ के चेहरे पर वही नूरानी मुस्कुराहट मौजूद रहती. 

कभी-कभी एक फलसफी की तरह “सब अल्लाह की मर्ज़ी” कहकर मुस्कुराने लगते और मज़ा लेने की कोशिश करने वाले कुढ़ जाते और हिंदुस्तानी मियाँ को माँ-बहन की कोई ताज़ा दरयाफ़्त लफ़्ज़ों से नवाज़ते हुए वहाँ से अपनी-अपनी बैठकों में पहुँच जाते और जब कोई पूछता “क्या हाल-चाल है?” तो खुद “सब अल्लाह की मर्ज़ी” कहकर मुस्कुराने लगते और फिर अचानक चौंक कर, दुकान के लौंडे पर, चाय जल्दी लाने के लिए चिल्लाने लगते. मुहल्ले के ज़्यादातर लोगों ने मानना शुरू कर दिया था हिंदुस्तानी मियाँ का दिमाग चल चुका है लेकिन अब भी कुछ लोग थे जो कहते थे कि “नहीं, वह बहुत घुईयाँ है.”

बच्चों को हिंदुस्तानी मियाँ से ख़ास मुहब्बत थी और जब भी मौक़ा मिलता वे अपनी मुहब्बत का इज़हार करके ही दम लेते. जो भी लड़का हाते की तरफ़ से गुज़रता, “ऐ बुढुआ!” का ज़ोरदार नारा मारता हुआ निकलता. शुरू-शुरू में तो हिंदुस्तानी मियाँ ने इन मुहब्बतों का जवाब देने में थोड़ी हिचकिचाहट दिखाई लेकिन आखिरकार मुहब्बत जोश में आ ही गयी और कुछ दिनों के बाद जब वह जुनून में बदली तो मुहल्ले के लोगों, खासकर बन्ने चाचा ने, जिनको माँ-बहन के रिश्तेदार लफ़्ज़ों के ईजाद करने की अपनी काबिलियत पर गुरुर था, अपने-अपने मुँह सिल लिए और फिर तो बच्चों और हिंदुस्तानी मियाँ के बीच इज़हार-ए-मुहब्बत का एक पुरजोश मुक़ाबला शुरू हो गया. 

बात अब सिर्फ़ “ऐ बुढुआ” कहने तक नहीं रह गई थी, बल्कि कभी-कभी ढेले भी आने लगे. कभी कोई बच्चा पीछे से आकर उनके गंजे सिर पर ‘ठोड़ी’ मार जाता. गर्मियों की रातों में जब वे बाहर चबूतरे पर सो रहे होते, गोबर से भरी हुई हाँडी अचानक उनके मुँह के पास आकर फूटती और जवाब में हिंदुस्तानी मियाँ के मुँह से गोबर से भी सड़ी हुई चीज़ें निकलतीं. तो खैर, इज़हार-ए-मुहब्बत का यह सारा खेल जब-तब चलता ही रहता लेकिन...

लेकिन मुहल्ले वालों को हिंदुस्तानी मियाँ की आदतें भी धीरे-धीरे पता चल रही थीं. वे कोई मज़हबी आदमी नहीं थे. जुमे की नमाज़ के लिए भी मस्जिद जाना गवारा नहीं था. अल्लाह के नाम के सिवा, शायद अपने रसूल का नाम भी ठीक से नहीं ले सकते थे लेकिन पता नहीं क्या बात थी, रमज़ान के तीसों रोज़े बड़ी अकीदत के साथ रखते थे. रमज़ान के महीनों में जब तक साया चबूतरे पर रहता, वहीं बैठकर मन ही मन कुछ बड़बड़ाते रहते. अज़ान होते ही, उसी चबूतरे पर जिस पर कुत्ते और बकरियाँ अक्सर पेशाब किए रहती थीं, अपना अंगोछा बिछा कर नमाज़ शुरू कर देते. उनकी नमाज़ भी देखने की चीज़ होती. कभी बिना रुकू के सिजदे में जा रहे हैं, कभी दो की जगह तीन सिजदें कर रहे हैं, जहाँ नहीं बैठना है बैठ रहे हैं जहाँ बैठना है वहाँ नहीं बैठ रहे हैं, कभी सलाम फेरते हैं, कभी बिना सलाम फेरे ही नई रिक़ात शुरू कर देते हैं और फिर शाम को इफ़्तार के वक़्त जमीला जो कुछ भी दे देती, चुपचाप खा कर और “या अल्लाह” कह कर सो जाते हैं.  

जमीला के मरने के बाद मुहल्ले वाले इफ़्तार के वक़्त कुछ न कुछ उनके चबूतरे पे भिजवा ही दिया करते. कभी-कभी तो यह इतना ज़्यादा होता कि सेहरी के लिए बचा कर रखने के बावजूद भी बच जाता और तब हिंदुस्तानी मियाँ बकरियों और कुत्तों की तलाश में निकल पड़ते और इस काम में उनको ज़्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ती. रमज़ान के रोज़ों के अलावा उनके क्रिकेट के शौक ने भी मुहल्ले वालों को हैरान किया था और इसी शौक़ ने उन्हें हिंदुस्तानी मियाँ का ख़िताब दिलवाया. मुहल्ले के लोगों को विश्वास नहीं होता था कि कोई हिंदुस्तानी मियाँ जैसा आदमी क्रिकेट का ऐसा शौकीन हो सकता है. मुहल्ले के बच्चे जब क्रिकेट खेल रहे होते, हिंदुस्तानी मियाँ चुपचाप, सब कुछ भूलकर देख रहे होते. 

कोई भी क्रिकेट मैच टी.वी. पर आ रहा हो, हिंदुस्तानी मियाँ बेचैन होकर इक़बाल मियाँ के घर के बरामदे में पहुँच जाते और दरवाजे की चौखट से लगकर, परदे को थोड़ा सा खिसका कर मैच के मज़े लूटने लगते. धीरे-धीरे इक़बाल मियाँ के बेटों और पोतों को उनकी आदत हो गयी और वे कभी-कभी हिंदुस्तानी मियाँ से क्रिकेट पर बात भी कर लेते. लेकिन लोगों को जिस बात पर बहुत हैरानी होती थी वह थी हिंदुस्तानी क्रिकेट टीम के प्रति उनका जुनून.

हिंदुस्तानी टीम उनके लिए दुनिया की सबसे बेहतरीन टीम थी और अगर कोई उनके सामने भूले से भी हिंदुस्तानी टीम के खिलाफ़ कुछ कह गया तो फिर तो उसकी खैर नहीं. ख़ास तौर से लोग उनके सामने उस दिन हिंदुस्तानी टीम के खिलाफ़ कुछ कहने से बचते थे जिस दिन हिंदुस्तानी टीम का कोई मैच हो रहा होता था और ख़ास तौर से उस दिन तो कुछ भी नहीं कहते थे जिस दिन हिंदुस्तान और पाकिस्तान की टीमों के बीच मैच हो रहा हो. इन दोनों टीमों के बीच हो रहे मुक़ाबले में तो हिंदुस्तानी मियाँ पागल से हो जाते थे और हिन्दुस्तान की तरफ़ से लगने वाले हर चौके-छक्के और यहाँ तक कि हर रन पर नाचने लगते और पाकिस्तान के गिरने वाले हर विकेट की खुशी यूँ मनाते जैसे वह विकेट उन्होंने ही लिया हो. उस दिन अगर किसी ने गलती से भी उनके सामने किसी पाकिस्तानी खिलाड़ी की तारीफ़ कर दी या हिन्दुतानी टीम की कुछ बुराई कर दी या किसी हिंदुस्तानी खिलाड़ी के खिलाफ़ कुछ कह दिया तो हिंदुस्तानी मियाँ उसको कोसते हुए माँ-बहन पर भी उतर आते और इधर कुछ सालों से, शायद उम्र बढ़ जाने के कारण वे कुछ हिंसक भी हो गए थे और जब-तब अपनी लाठी भी उठा लेते थे. 

शुरू में तो मुहल्ले वालों ने उनके इस ‘हिन्दुस्तान प्रेम’ का खूब मज़ा लिया और जान-बूझ कर उन्हें छेड़ते भी रहे. उसी वक़्त किसी मनचले ने उनका नाम हिंदुस्तानी मियाँ रख दिया और लोग धीरे-धीरे ‘बुढऊ’ या ‘बुढुआ’ को भूलें लगे और बाद में पैदा होने बच्चे तो आज तक यही जानते हैं कि उनका असली नाम हिंदुस्तानी मियाँ ही था. जब से हिंदुस्तानी मियाँ कुछ उग्र होने लगे थे, मुहल्ले वालों ने मैच के दौरान उनके सामने कुछ कहना बंद कर दिया था. मुहल्ले वालों की भरपूर कोशिश होती थी कि वे मैच देखने उनके घर न आएँ, लेकिन जब वे आ जाते थे तो फिर उनको भगाना तो खुदा के बस में ही हो सकता था. लोग लाख गालियाँ देते, घुड़कियाँ देते, हिंदुस्तानी मियाँ के चेहरे पर वही चिर-परिचित मुस्कुराहट. लोग खीज कर टी.वी. बंद कर देते, लेकिन कब तक? आखिर मैच तो उनको भी देखना होता था. जब टी.वी. बंद हो जाती थी हिंदुस्तानी मियाँ हिंदुस्तान-पाकिस्तान के किसी मैच का आँखों देखा हाल सुनाने लगते. हर मैच बुत रोमांचक होता. भारत शुरू से ही हार रहा होता, लेकिन हिंदुस्तानी मियाँ के लफ़्ज़ों में-
“आखिर हिन्दुस्तानों, हिन्दुस्ताने रहे. कोई खिलौना थोड़े न रहे कि जईसे चाहे नचा के खेले. अ जब सातवाँ विकेट भी गिर गया मैं तो एकदम घबरा गया. लगा कि अब ई मैच त गया लेकिन तभी आया अपना शेर कपिल देऊआ और अईसा मार मारा सब पाकिस्तानी लोग के, कि का बतावें....”

और हिंदुस्तानी मियाँ के इस आँखों-देखा हाल सुनने के बजाय लोग मैच ही देखना ज़्यादा पसंद करते और मन ही मन उन्हें गाली देते हुए टी.वी. ऑन कर देते.

इस बार  रमज़ान का महीना जाड़े में आया था. भारी ठिठुरन के बीच हिंदुस्तानी मियाँ हर साल की तरह रोज़े रख रहे थे और अपनी नमाज़ जो उन्होंने पूरी दुनिया से अलग ईजाद की थी, पढ़ रहे थे. लेकिन इस बार का रमजान उनके लिए आसान नहीं था. एक तो हड्डियों तक को सिहरा देने वाली ठंड और ऊपर से कुछ दिन पहले शुरू हुआ दाढ़ का दर्द. शुरू में तो यह एक सिहरन की तरह था और हिंदुस्तानी मियाँ ने सोचा कि शायद ठंड लग गई है. लेकिन धीरे-धीरे इस दर्द ने अपने पैर फैलाये और पिछले दो दिनों से हिंदुस्तानी मियाँ के लिए पानी पीना भी मुहाल हो गया था. मुँह के एक तरफ़ का हिस्सा सूजकर कुछ बाहर निकल आया था और चेहरे पर एक अजीब तरह का खिंचाव पैदा हो गया था. लोगों ने उन्हें कई सलाहें दीं क्योंकि वे मुफ़्त थीं, इफ़्तार के लिए बहुत सारा खाने का सामान दिया क्योंकि इससे अल्लाह खुश होता पर ये नहीं सोचा कि इस दर्द भरे और लटके हुए मुँह से वे क्या खा पाएँगे? 

इस रमज़ान के महीने में भी किसी अल्लाह के बंदे को यह तौफ़ीक नहीं हुई कि दो रूपये की दर्द की दवा ही लाकर दे दे. खैर यह मामला तो अल्लाह और उसके बंदो के बीच का था, वे जाने, हिंदुस्तानी मियाँ को इस दाढ़ के दर्द से अभी ज़्यादा मतलब नहीं था. अभी तो उन्हें मतलब था हिंदुस्तान और पाकिस्तान के बीच चल रहे रोमांचक सीरीज से.
  
तीन मैचों कि इस सीरीज में दोनों टीमों ने एक-एक मैच जीत लिया था और आज तीसरा मैच था. दोनों मुल्कों के अंदर इस मैच को लेकर जो जुनून था, उसके असर से सुबह से ही सड़कें खाली हो गयी थीं. लोगों ने अपनी-अपनी दुकानें बंद कर दी थीं. बच्चों को सुबह जहाँ-जहाँ दर्द हो सकता था हुआ और वे बेचारे स्कूल नहीं जा सके. सरकारी दफ्तरों में ‘कैजुअल लीव’ की वजह से साल की सबसे कम उपस्थिति दर्ज़ की गयी. 

दुआएँ और प्रार्थनाएँ लोगों के ज़ुबान पर थीं. हिंदुस्तानी मियाँ दर्द की वजह से पूरी रात सो नहीं सके थे. सेहरी का वक़्त खत्म होने को था. उन्होंने लोटे से एक घूँट पानी पिया जो एक ठंडे शोले की तरह उनकी दाढ़ से टकराया दर्द की तेज़ लहर ने वही पानी उनकी आँखों में भर दिया. अभी सुबह की अज़ान नहीं हुई थी लेकिन इससे बेखबर, उन्होंने वज़ू के बहाने काँपते हुए हाथ-पैरों पर कुछ पानी मला और सुबह की नमाज़ के लिए खड़े हो गये. पता नहीं कितनी नमाज़ पढ़ी, कितनी दुआएँ माँगी, दुआओं में क्या-क्या माँगा लेकिन जब सुबह लोगों ने उन्हें देखा तो वे उस ठंड में भी बाहर चबूतरे पे अपना अंगोछा बिछाए बैठे थे, हाथ आसमान की तरफ़ उठाये हुए. बाद में कुछ लोगों ने दावा किया कि उस वक़्त उनके मुँह से “या अल्लाह...हिंदुस्तान, या अल्लाह...हिंदुस्तान...जीत” जैसी कुछ आवाज़ निकल रही थी.

ठीक समय पर मैच शुरू हो गया और दो मुल्क अपना सारा पूजा-पाठ, सारा रोज़ा-नमाज़ और दुनिया के सारे काम भूलकर क्रिकेट के जुनून में समा गए. उस वक़्त दोनों देशों का धर्म एक हो गया था- क्रिकेट. उस वक्त भगवान और अल्लाह दोनों देशों के खिलाड़ियों में बदल गए थे और लोगों के टी.वी. सेट इबादातगाहें और प्रार्थना-सभाएँ बन गयी थे. हिंदुस्तानी मियाँ अपने पड़ोसी अज्जू कबाड़ी की दुकान के गेट पर समय से आकर बैठ गए थे. दाढ़ में रह-रह कर उठने वाली दर्द की तेज़ लहर बेचैन किए दे रही थी, आँखों में पानी आ आ जा रहा था. कभी-कभी दर्द हद से बढ़ने पर मुँह से सिसकी सी निकल पड़ती थी पर वे मर्दे मुजाहिद बने डटे हुए थे. किसी हिंदुस्तानी खिलाड़ी के बेहतरीन खेल पर चाहते थे कि तालियाँ बजाएँ लेकिन दर्द था कि हाथों को उठने से पहले ही गिरा देता था. पड़ोसी अज्जू ने एक बार डाँटा भी कि इतनी तकलीफ़ में रोज़ा रखने की क्या ज़रूरत थी और फिर यह सोचकर कि मस्जिद के मुल्ला जी ने बताया था कि रमज़ान में किसी को डाँटना नहीं चाहिए, चुप हो गया. वैसे भी इस वक़्त कोई भी इस तरह के डाँट-डपट में नहीं उलझना चाहता था.

समय बीतने के साथ खेल रोमांचक होता जा रहा था. कुछ पता नहीं चलता था कि ऊँट किस करवट बैठेगा. पाकिस्तान द्वारा एक शानदार स्कोर खड़ा करने के बाद हिंदुस्तान उसका पीछा कर रहा था. समय बीतता जा रहा था, दिन ढलता जा रहा था, इफ़्तार का वक़्त क़रीब आता जा रहा था और मैच का रोमाँच भी बढ़ता जा रहा था. आखिरकार मस्जिद से मग़रिब के अज़ान की आवाज़ आयी, लेकिन उस मुसलमानी मुहल्ले से कुछ ही चेहरे मस्जिद की तरफ़ जाते दिखे. घरों में औरतें इफ़्तार का सामान सजाये बैठीं थीं, लेकिन मर्दों को होश कहाँ? अभी तो तीन गेंद और चार रन बाक़ी हैं तो फिर इफ़्तार कैसे कर सकते हैं? अल्लाह नाराज़ नहीं हो जाएगा? और ये लो, ये लगा चौका और हिंदुस्तान जीत गया. अब लाओ, कहाँ है इफ़्तार....?

हिंदुस्तानी मियाँ की खुशी का पारावार नहीं था. हिंदुस्तान जीत गया था और शायद उनकी सुबह की दुआएँ भी. वे इस जीत की खुशी में अपने चबूतरे से मस्जिद तक ज़रूर जाते, हर किसी से मुस्कुरा कर मिलते और बताते कि हिंदुस्तान कैसे जीता लेकिन कमबख्त यह दाढ़ और उसका दर्द... हिंदुस्तानी मियाँ कहीं नहीं जा सके. चबूतरे पर कोई इफ़्तार का सामान रख गया था. उसमें से किसी तरह से एक खजूर खा कर पानी पिया लेकिन दर्द ने कुछ और खाने से बेबस कर दिया. चुपचाप चबूतरे पर बैठ गए. ऐसा लग रहा था जैसे किसी क़रीबी की मौत हो गयी हो. 

उनकी पकी हुई बकर दाढ़ी के बाल दर्द की हर लहर के साथ हिल रहे थे. अचानक गली दो मोटरसाइकिलों और “भारत माता की जय” की तेज़ आवाजों से गूँजने लगी. दोनों मोटरसाइकिलें मुख्य सड़क से गली में आयी थीं और पाकिस्तान पर हिंदुस्तान की जीत की खुशी में अपने चेहरों पर केसरियाँ पट्टियाँ बाँधे भारत माता की जय-जयकार कर रही थीं. गली में थोड़ा अँधेरा हो चुका था. सड़क पर लगे स्ट्रीट लैम्प की मलगजी सी पीली रौशनी हिंदुस्तानी मियाँ के लटके हुए चेहरे पर पड़ रही थी और उसे और पीला बना रही थी. दोनों केसरियाँ मोटरसाइकिलें हिंदुस्तानी मियाँ के सामने से गुज़रीं. “भारत माता की जय” सुनकर हिंदुस्तानी मियाँ ने अपना चेहरा ऊपर उठाया. एक केसरिया मोटरसाइकिल से उनकी नज़रें मिलीं. हिंदुस्तानी मियाँ ने मुस्कुराने की कोशिश की लेकिन दाढ़ के दर्द की एक तेज़ लहर ने उन्हें कामयाब नहीं होने दिया. मोटरसाइकिलें कुछ आगे बढ़ गयी थीं कि अचानक एक मोटरसाइकिल मुड़ी और हिंदुस्तानी मियाँ के ठीक सामने आकर रुक गयी. हिंदुस्तानी मियाँ ने एक बार फिर मुस्कुराने की कोशिश की पर दाढ़ के दर्द ने  उनकी मुस्कुराहट को उनके लटके हुए चेहरे में मिला दिया. 

मोटरसाइकिल से एक आवाज़ निकली, “बुड्ढे! पाकिस्तान के हारने का ग़म मना रहा है?” हिंदुस्तानी मियाँ ने अचकचा कर उसकी तरफ़ देखा और उसे बताना चाहा कि वे ग़म नहीं बल्कि हिंदुस्तान की जीत की खुशी नहीं मना पा रहे हैं लेकिन दाढ़ के दर्द की वजह से उनके मुँह से सिर्फ़ इतना ही निकल सका, “...वो...बहुत द...र...द...” मोटरसाइकिल व्यंग्य से मुस्कुराई और घुरघघुराते हुए स्वर में बोली, “अच्छा...तो दर्द हो रहा है. पाकिस्तान के हारने का बहुत दर्द हो रहा है न? अगर तुम्हारे दर्द को पाकिस्तान भेज दिया जाए तो कैसा रहेगा?” इस सवाल के साथ ही मोटरसाइकिल में एक हाथ पैदा हुआ, कुछ लोगों ने धायँ जैसी एक आवाज़ सुनी और हिंदुस्तानी मियाँ का दाढ़ का दर्द हमेशा के लिए पाकिस्तान चला गया. 
    
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पेंटिग : सलमान टूर        

सईद अय्यूब की कहानियाँ