अन्यत्र : त्रिवेंद्रम और कन्याकुमारी



















  


शंकर, समुद्र और उदासियों का सफ़र                          
सरिता शर्मा




'कभी-कभी एक जिंदगी से ज़्यादा अर्थपूर्ण हो सकती हैंउस पर टिप्‍पणियां.कुंवर नारायण की यह पंक्ति यात्राओं के सन्दर्भ में बिलकुल सही लगती है. पूरे जीवन को मुड़कर देखने पर हम पाते हैं कि हमारी भागमभाग की दिनचर्या से अलग पर्यटन के क्षण ही ऐसे होते हैं जब हम कोल्हू के बैल की नियति से कुछ दिन के लिए छुटकारा पाते हैं. बहुत पुरानी चीनी कहावत है- ‘दस हज़ार किताबों को पढने से बेहतर दस हज़ार मील की यात्रा करना है’. मेरी सभी यात्रायें जीवन के महत्वपूर्ण मोड़ों पर हुई हैं. इसलिए अंतर्यात्रा सफ़र को और भी स्मरणीय बना देती है.

सैलानियों का स्वर्ग केरल यह सुनते ही नारियल और केले के पेड़ आँखों के सामने झूमने लगते हैं. हमारा पूरा परिवार विवेकानंद से प्रभावित है जिससे कन्याकुमारी में विवेकानंद शिला जाने का विशेष आकर्षण बचपन से था. अचानक त्रिवेंद्रम और कन्याकुमारी जाने की इच्छा ने सिर उठा लिया. ऊहापोह और अनमनेपन की मनःस्थिति चल रही थी. मेरी नाजुक तबीयत के मद्देनजर मुझे रात की ड्यूटी करने वाले सेक्शन में न भेजने का अनुरोध मान लिया गया. मगर मुझ पर सुधार करने का विश्वास करके उसी सेक्शन में कईयों को सुपरसीड करके इंचार्ज बनाया गया. इस निर्णय से कई वरिष्ठ और साथी नाराज हो गए थे.

मेरी चौधराहट दिखाने की जरा भी मंशा नहीं थी. अपनी सीट पर चुपचाप काम करना पसंद है. मगर कुछ लोगों द्वारा स्वार्थवश बिना अपराध किये कई बार मानसिक आघात दिया जाता है और लोगों को मोहरों की तरह इस्तेमाल किया जाता है. उन्हें इसका तक अहसास नहीं हो पाता है कि इस प्रक्रिया में वे अपना सम्मान गंवा देते हैं. खुद को संशय के घेरे में पाकर मन किया दफ्तर से भाग जाऊं. बहुत लम्बे समय तक यह संभव नहीं था. इसलिए कुछ दिन अपने सपनों के शहर में गुजारना एकमात्र उपाय सूझा. मगर मन नाहीं दस बीस’. हम पर एक समय में एक मनोस्थिति हावी रहती है. काश कई मन होते जिन्हें सुविधानुसार खानों में बाँट सकते. भला यह भी कोई बात हुई आप देश के एक कोने से सुदूर अंतिम छोर पर जाएँ और उदास मन को ढोते फिरें. मगर हम कितनी भी रीजनिंग कर लें, मन एक दिशा में चला गया तो चलता जायेगा. मुड़- मुड़ कर देखना रहना उसकी फितरत है.

तिरुअनंतपुरम में सरकारी गेस्ट हाउस में रुकने की व्यवस्था की.पापा साथ थे. एयर इंडिया से चार घंटे के सफ़र के बाद तिरुअनंतपुरम  हवाई अड्डे  से बाहर निकले तो एक गोल- मटोल टैक्सी ड्राईवर ने कहा हिंदी जानता हूँ. टैक्सी चाहिए’. पापा को वह ड्राईवर शंकर इतना पसंद आया कि बेफिक्र हो गए. शंकर ने तीन दिन घुमाने की पूरी जिम्मेदारी अपने सिर पर ले ली. अपने बारे में उत्साह से बताने लगा कि उसका बेटा लन्दन में पढने गया है. बहुत होशियार है. मुझे संसद में कार्यरत जानकर उसने बेटे को फ़ोन मिलाया और मुझसे बात करवाई. हम रात को 11 बजे गेस्ट हाउस पहुंचे. शहर के कोने में समुद्र किनारे बने गेस्ट हाउस के केयरटेकर को उठाया तो उसी ने फटाफट दाल चावल बना कर दे दिए. दशहरे की छुट्टियाँ होने के कारण वहां काम करने वाले बाकी लोग घर चले गए थे और सफाई करने  से लेकर खाना बनाकर परोसने तक का सारा काम उसे अकेले करना पड रहा था.

शंकर सुबह- सुबह आ गया. उसने रास्ते भर मुकेश के दर्द भरे गाने लगा रखे थे. वह केरल के राजाओं के बारे में बड़े चाव से बताता जा रहा था. हरे- भरे तिरुअनंतपुरम को देख कर मन में यही विचार चल रहा था किराजधानी में नौकरी करना और उसके आसपास प्रदूषणभरी तनावपूर्ण जिन्दगी बिताने का क्या फायदा. कितना अच्छा हो यहीं पर बस जाऊं. चाहे छोटी सी कोठरी हो और कोई सुख सुविधा न हो. समुद्र किनारे घूमो और नारियल के पेड़ों तले बैठ आसमान और समुद्र को निहारते रहो. तिरुअनंतपुरम का अर्थ है- तिरु यानी पवित्र एवं अनंत अर्थात सहस्त्रमुखी नाग तथा पुरम यानी आवास. केरल को एक तरफ अरब सागर के नीले जल तो दूसरी तरफ पश्चिमी घाट की हरी-भरी पहाड़ियों ने अद्भुत नैसर्गिक सौंदर्य प्रदान किया हैकेरल में नारियल एवं ताड़ के वृक्षों की भरमार हैनारियल को ‘केर’ भी कहा जाता हैइन वृक्षों की बहुत अधिक पैदावार के कारण ही इसका नाम केरल पड़ा. हरे-भरे नारियलसुपारीरबड़ और केलों के पेड़ों के बीच बसा है तिरुअनंतपुरम.

सबसे पहले हम कोवलम के रास्ते में परशुराम मंदिर गये जो बहुत प्राचीन है. एक किवदंतियां के अनुसार परशुराम के फरसे की वजह से ही केरल बना . उन्होंने एक बार क्रोधित होकर अपना फरसा होकर फेंका था और समुद्र पीछे हट गया. तभी केरल का आकार फरसे की तरह माना जाता है. कुछ ही आगे बढ़ने पर  मंदिर से बाहर निकलते ही सड़क पर बने पुल के नीचे नारियल के पेड़ों से घिरे बैक वाटर का बहुत सुन्दर दृश्य नजर आता है. उसके बाद   हम द्मनाभभस्वामी मंदिर पहुंचे जोकि भारत के सबसे प्रमुख वैष्णव मंदिरों में से एक है. महाभारत में जिक्र आता है कि बलराम इस मंदिर में आए थे और यहां पूजा की थी. बताया जाता है मंदिर की स्थापना पांच हजार साल पहले कलियुग के पहले दिन हुई थी. 

1733 में त्रावणकोर के राजा मार्तंड वर्मा ने इसका पुनर्निमाण कराया था. मंदिर की वास्तुकला द्रविड़ और केरल शैली का मिला जुला उदाहरण है.कई एकड़ में फैले मंदिर परिसर के गलियारे में पत्थरों पर अद्भुत नक्काशी देखने को मिलती है. मंदिर के बाहर सरोवर है जिसे पद्मनाभ तीर्थ कहते हैं.  इस मंदिर में केवल हिंदू ही प्रवेश कर सकते हैं. पुरुष सफेद धोती पहन कर ही यहां आ सकते हैं. प्रतिदिन हजारों यात्रियों को वस्त्र किराये पर लेने पड़ते हैं. मंदिर में चमड़े का सामान लेकर प्रवेश नहीं कर सकते. उसे बाहर रखवाना पड़ता है. ऐसी शर्तें लगाने से मंदिर की आमदनी बढती जाती है मगर भक्तों की संख्या में कोई कमी नजर नहीं आती. साथ गया गाइड पुजारी ठेलमठेल में लगा रहता है. सबसे अमीर कहलाये जाने वाले मंदिर में हम बस भागते से रहे.

हम शाम को सूर्यास्त देखने कोवलम पहुंचे. कोवलम अपने खूबसूरत बीच और ताड़ के पेड़ों के लिए प्रसिद्ध है. ब्रिटिश मिशनरी जार्ज अल्फ्रेड बेकर ने कोवलम के विकास में अहम भूमिका निभाई. वह कोवलम की सुंदरता से इतना प्रभावित थे कि वह यहीं के होकर रह गए. उनके पिता हेनरी बेकर और मां ऐमीलिया ने ही सर्वप्रथम केरल में शिक्षा की ज्‍योति को जलाया था और आज केरल शिक्षा के मामले में सबसे अग्रणी राज्य है. नीला-स्लेटी रंग का अरब सागर का मनमोहक नजारा अद्भुत है. सामने दो ऊंची पहाड़ियां हैं जो  समुद्र की ओर दोनों  झुकी हुई प्रतीत होती हैं. तट पर बैठ कर दूर तक बिछी रेतपेड़ों की सरसराहटपक्षियों केकलरव और समुद्र के अनंत विस्तार का आनंद लिया. लालिमायुक्त शांत सूरज धीरे- धीरे समुद्र में समाता जा रहा था. कोवलम तट से ऐसा लगता है मानो सामने दूसरे किनारे पर समुद्र का सतह जमीन से ऊंचा है और आसमान से मिल रहा है.

अगले दिन हम कन्याकुमारी की ओर जाते हुए पद्मनाभपुरम पैलेस पहुंचे. यह लकडी तथा ग्रेनाइट पत्थर का महल बडा विचित्र और सुन्दर है.  पैगोडा के आकर का यह महल सत्रहवीं और अठारहवीं शताब्दी की लकडी क़ी दीवारोंखंभों पर उकेरी नक्काशियों तथा अनोखी वास्तुकला के लिये प्रसिध्द है. महल के नीचे एक किलोमीटर लम्बी सुरंग बनी हुई है.  यह महल दोमंजिला है जिसमें कई खंड हैं.यहाँ बहुत बड़ा डाइनिंग हाल है. पुराना फर्नीचर और राजाओं का अन्य सामान संरक्षित है. इसके दरवाजे सिर से टकराते थे. मैं वहां से गुजरते हुए राजपरिवार की कल्पना कर रही थी.क्या उनका कद छोटा था या वे सिर झुका कर चलते होंगे. हैं. इतनी सारी सीढ़ियों से उतरते चढ़ते वक्त राजा और उसका परिवार थक जाता होगा .नन्हें मुन्ने राजकुमार राजकुमारियां इन जीनों पर कई बार लुढके होंगे.

कन्याकुमारी के रास्ते में हम चिल्ड्रन पार्क में स्थित वैक्स म्यूजियम देखने के लिए रुके तो लन्दन के तुसाद म्यूजियम की याद आ गयी. इस संग्रहालय में गाँधी, आइन्स्टाइनचार्ली चेपलिनमाइकल जेक्सन और हमारे कई फिल्म सितारों की विभिन्न परिधानों में सजी 2000 आकृतियां रखी गई हैं. मैंने कई विख्यात हस्तियों की प्रतिमाओं के साथ खड़े होकर फोटो खिंचवाए. माइकल जेकसन, सूमो, शाहरुख़ खान, रजनीकांत, जयललिता, पोप, महमोहन सिंह सबसे पल भर में निकटता स्थापित कर ली.ये आदमकद प्रतिमाएं कितनी सुन्दर और शांत लग रही थी. मोम के ये पुतले कितनी सारी आगामी पीढ़ियों को अपनी ओर आकर्षित करते रहेंगे. दिवंगत विभूतियों की आत्माएं कभी यहाँ आती होंगी तो सैलानियों को देख कर आहें भरती होंगी.

इसके  बाद हम कन्याकुमारी पहुंचे. कहा जाता है कि देवराज इंद्र को गौतम ऋषि द्वारा प्राप्त श्राप से मुक्ति यहाँ मिली थी. यहाँ देवराज इंद्र ने कन्याकुमारी मंदिर के गणपति की प्रतिष्ठा करके पूजा की थी इसलिए इसे 'इंद्रकांत विनायक', 'पापविनाशम 'मंडूक तीर्थकभी कहते हैं. विवेकानंद शिला फेरी में बैठकर जाना होता है. लाइन  इतनी  लंबी थी कि तीन- चार घंटे में भी हमारी बारी आ पाती और रात को तिरुअनंतपुरम गेस्ट हाउस लौटना था. हमने वहीँ किनारे पर बैठकर आसपास के दृश्य देखे. यहां अरब सागर , बँगाल की खाड़ी और हिन्द महासागर मिलते हैं. यहाँ सू्र्यास्त और सूर्योदय दोनो ही सागर मे होते हैं. समुद्रतल से पचास-साठ फुट ऊंची विवेकानंद शिला कन्याकुमारी के पूरब में समुद्र के बीचों बीच स्थित है. यहीं पर देवी का एक पुराना मंदिर है. स्वामी विवेकानंद ने हिमालय से शुरू हुई अपनी यात्रा का समापन यहां किया था. वह किसी नाव या फेरी से नहीं, बल्कि तैर कर उस चट्टान पर पहुंचे थे.

यहीं से वे अमरीका गए थेजहां उन्होंने अपना विख्यात भाषण दिया थाजिससे उन्हें रातोंरात विश्वव्यापी ख्याति मिली. तभी से इस चट्टान को विवेकानंद चट्टान कहा जाने लगा. विवेकानन्द स्मारक के सामने वाली छोटी सी चट्टान पर तमिल संत कवि थिरुवल्लूर की विशालकाय प्रतिमा बनी है. उदासी का वेताल फिर लौट आया. सामने शांत समुद्र और पीछे इन्तजार करता तूफान. रोऊँ मैं सागर के किनारे सागर हंसी उडायेगाने के बोल मन में गूँज रहे थे. जब प्रकृति रौद्र रूप दिखाती है और हमारे ठहरे हुए अस्तित्व में हलचल मचा देती है. फिर ऐसा क्यों होता है कि जब हम विचलित होते हैं तो दुनिया के सब काम यथावत चलते जाते हैं और प्रकृति अपनी इच्छानुसार रंग बदलती है.समुद्र के अथाह जल को देखकर आभास होता है कि इतने विशाल संसार में एक व्यक्ति का अस्तित्व बहुत मायने नहीं रखता. हमारे दुःख सर्वथा निजी और अविभाज्य हैं. 

लौटते समय शंकर ने त्रिवेंद्रम का अन्तरराष्ट्रीय हवाई अड्डा भी दिखाया जहां वह काम कर चुका था. अगली सुबह 6 बजे फ्लाइट थी.रोज की तरह शंकर सही समय पर 4 बजे गेस्ट हाउस पहुँच गया.बहुत उदास था.मेरी बीवी को रात भर नींद नहीं आयी की सुबह कहीं गेस्ट हाउस जाने में देर न हो जाये.अगली बार कम से कम 10 दिन के लिए घूमने आना. आपको कई बीचिज की सैर कराऊंगा.हमारा मन भी इस सुन्दर स्थान और भावुक शंकर से बिछुड़ते हुए भारी हो गया था. उसने चलते हुए अपनी तरफ से खूब सारे केले और केरल की मिठाई भेंट की. कम पढ़ा लिखा व्यक्ति अपनी मेहनत के बल पर भाई बहनों को पालता है और बेटे को उच्च शिखा के लिए लन्दन भेज देता है, ऐसा शंकर प्रेरणा स्रोत बन गया था.

कौन लगता था वह हमारा? हमें साफ सुथरे होटलों में खाने के लिए भेजना, कभी गाड़ी रुकवानी हो तो अपने किसी परिचित के यहाँ ले जाना इतना कौन करता है यात्रियों के लिए. आने के बाद उससे दो-चार बार बात हुई. उसके बेटे शिव ने पिता के फोटो मंगवाए. फिर एक दिन खबर आई कि शंकर की हार्ट अटेक से मृत्यु हो गयी. विश्वास नहीं हो रहा था. बिना अवकाश के दिन भर काम करने वाला व्यस्त व्यक्ति इस तरह कैसे सब कुछ बीच में छोड़ कर जा सकता है? हमारे आशंका से भरे सफ़र में ख़ुशी बनकर आने वाले और फिर हमेशा के लिए चले जाने वाले शंकर के बारे में सोचती हूँ तो टॉमस हार्डी का कथन याद आता है. ‘खुशी दर्दभरे नाटक में एक उपाख्यान  मात्र है.या कह सकते हैं कि उदासी वेताल जैसी है जो जिसे हम कंधे पर आजीवन लादे फिरते हैं. उससे क्षणिक निजात पा लेते हैं. मगर उसके सवालों का उत्तर न दे पाने के कारण फिर उसके शिकार हो जाते हैं.

शंकर से हमारा  जरूर कोई  पूर्वजन्म के आत्मीय का सम्बन्ध रहा होगा. उसका बेटा अब पढाई पूरी करके लन्दन में नौकरी करने लगा है. वहां से लौटने के छह महीने  के भीतर मैंने स्वेच्छा से इंचार्ज की पोस्ट त्याग दी. अब हालात लगभग सामान्य हैं. हालाँकि उस दौरान हुए खट्टे अनुभवों ने कई चीजों से मोहभंग कर दिया. तिरुअनंतपुरम और कन्याकुमारी की यात्रा मन की उदासी और शंकर से मुलाकात के कारण अविस्मरणीय बन गयी.
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सरिता शर्मा
12/08/1964

पत्रकारिता, फ्रेंच, क्रिएटिव राइटिंग और फिक्शन राइटिंग में डिप्लोमा  आदि

कविता संग्रह - सूनेपन से संघर्ष.आत्मकथात्मक उपन्यास: जीने के लिये, अनूदित पुस्तकें : रस्किन बोंड की पुस्तक स्ट्रेंज पीपल,स्ट्रेंज प्लेसिज और रस्किन बोंड द्वारा संपादित ‘क्राइम स्टोरीज का हिंदी अनुवाद.
पत्र पत्रिकाओं में कविताएँ, कहानियाँ, समीक्षाएं आदि प्रकाशित

नेशनल बुक ट्रस्ट में 2 अक्तूबर 1989 से  4 अगस्त  1994 तक संपादकीय सहायक.
सम्प्रति :  राज्य सभा सचिवालय में सहायक निदेशक के पद पर कार्यरत. 
       
sarita12aug@hotmail.com
मोबाइल: 9871948430


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  1. शंकर जैसे इन्सान इस पृथ्वी पर बहुत कम मिलते है।

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  2. एक व्यक्ति में सब समाहित..सुन्दर वृत्तान्त

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  3. 'शंकर, समुद्र और उदासियों का सफर' कितना मर्मस्‍पर्शी यात्रा वृतान्‍त, जो अपनी बुनावट में एक संवेदनशील कथा का अहसास देता है। इस यात्रा संस्‍मरण की खूबी यह है कि इसमें रचनाकार का संवेदनशील मन बोलता है, केरल के ऐतिहासिक और रमणीय स्‍थलों से जुड़ी जानकारियां इतनी सटीक और सजीव कि दुबारा उन्‍हीं स्‍थलों की ओर जाने का मन करे। चाहे परशुराम मंदिर हो, पद्मनाभस्‍वामी मंदिर हो या कोवलम बीच, हर स्‍थल से जुड़ी जरूरी जानकारियां एक सजीव अहसास के साथ यहां दर्ज हैं, और कन्‍याकुमारी की यात्रा, समुद्र के बीचो-बीच बना विवेकानंद स्‍मारक, थिरुवल्‍लूर प्रतिमा और समुद्र का नैसर्गिक सौन्‍दर्य इस यात्रा संस्‍मरण को वाकई स्‍मरणीय बना देता है। इस संस्‍मरण की सबसे बड़ी खूबी है - कार चालक शंकर का आत्‍मीय साथ और उसका जीवन संघर्ष, शंकर के इस जीवन-प्रसंग ने इस संस्‍मरण को वाकई एक खूबसूरत कथा का रूप दे दिया है, जिसके लिए मन सरिता जी के प्रति विनत है।

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  4. भारत में जितना घूमा हूँ , उसके आधार पर कह सकता हूँ कि केरल अन्य राज्यों से कई मायनों में भिन्न और बेहतर है | हरियाली में इसका मुकाबला केवल उत्तर-पूर्व के राज्य ही कर सकते हैं | प्रकृति ने इसे जिस तरह से समुद्री किनारों से नवाजा है , वह तो अद्भुत ही है | हालाकि अंडमान जाने से पहले मैं भी यही सोचता था , कि कोवलम निश्चित तौर पर भारत का श्रेष्ठ समुद्री किनारा है , लेकिन जब से मैंने 'हैवलाक द्वीप का राधानगर बीच' देखा है , मैं कोवलम को दूसरे स्थान पर रखना ही पसंद करूँगा | हां ..गोवा के समुद्री किनारों से तो वह काफी बेहतर है ही | और फिर कन्याकुमारी की तो बात ही अलग है | मैंने वह पूरा एक दिन 'थिरूवल्लूर' की कविताओं को पढने के लिए ही गुजारा |

    इस आत्मीय यात्रा-संस्मरण के लिए सरिता जी को बधाई , और समालोचन का आभार |

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  5. नन्द सर ने बहुत आत्मीय टिप्पणी लिखी है . मर्मस्पर्शी यात्रा वृतांत है . एक साथ दो यात्राएं यहाँ चल रही हैं ..लेखक की अपनी अंतर्यात्रा भी किस सहजता से यहाँ गुम्फित हुई है ..जो इस सैलानी का अपना भरपूर परिचय दे रही है। सरिता के पास गहरी संवेदना के साथ बारीकी से चीज़ों को देखने समझने की सूझ भी है जो किसी भी यात्रा वृतांत के लिए जरुरी होती है। शुभकामनाएँ मेरे सैलानी ..

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  6. मनभावन प्रस्तुति। "काश कई मन होते जिन्हें सुविधानुसार खानों में बाँट सकते" बहुत सुन्दर. केरल कभी चेर वंश का भूभाग था और वही चेर (Cher) केर में परिवर्तित हुआ.

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  7. Shailendra Singh Rathore28/5/13, 11:32 am

    थैंक्स . .... सुंदर यात्रा वृतांत,वैसे भी यात्राएं अपने आप में आत्म-साक्षात्कार है (“The world is a book and those who do not travel read only one page.” )....पर एक अच्छा यात्रा वृतांत भी उतना ही महत्वपूर्ण है ,हम उन शब्दों के सहारे उसे देखते हैं जो पहले 'देखा ' गया है ,और इस देखने में वह फिर से नया हो जाता है ,और इस तरह पाठक के मध्यम से एक दृश्य अभूतपूर्व रूप से अनंत दृश्यों को उत्पन्न करता है .

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  8. Ashish Pandey28/5/13, 11:34 am

    अहा !!सुंदर यात्रा वृतांत !!चूँकि केरल ,पुआर, कन्याकुमारी कई बार जाना हुआ अतः भावसाम्य उपस्थित हुआ ‍‌कोवलम की नैसर्गिक सुंदरता ,बैक वाटर की उपजाऊ संस्कृति ,पद्मनाभम् पैलेस और मंदिर की भव्यता और शैली ,कन्याकुमारी , विवेकानंद राक के वर्णन ने फिर उन्हीं परिदृश्यों में पहुंचा दिया |यह सरिता का सहज चित्रण भावविभोर करता है...समालोचन का आभार इस वृतांत को पढ़वाने के लिए .

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  9. कई बार कुछ यात्रावृतांत पढ़ते पढ़ते आदमी भावुक हो जाता है। शंकर के बारे में इतनी बढिया बातें चल रहीं थी, पर अचानक .... उफ.

    वैसे मैं दो बार त्रिवेंन्द्रम गया हू, पर आफिस के काम से जाना और आना ही हुआ। 22 जून को वहां फिर जा रहा हूं, इस बार परिवार साथ में हैं। काश मेरा भी किसी शंकर से साक्षात्कार हो जाए ।

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  10. बहुत सुन्‍दर और सार्थक रचना आभार
    हिन्‍दी तकनीकी क्षेत्र की अचंम्भित करने वाली जानकारियॉ प्राप्‍त करने के लिये एक बार अवश्‍य पधारें
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  11. सरिता की भाषा, अनुभव एवं संवेदनशीलता इस संस्मरण को कहीं ऊंचा उठा देते हैं... एक साहित्यिक कृति... बधाई सरिता।

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  12. yatra vritaant padhte hue keral kee yaatra par hee nikal pade hain .. yuun lagaa.. sarita ne apne anubhavon ko sundar shilp aur samvednaao ka jaama pahnaaya hai.. shankar ke prti man me udaasi bhar gai..

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  13. सरिता जी ! यात्रायें तो जीवन का पाथेय होती हैं..हम अहर्निश किसी न किसी यात्रा-अंतर्यात्रा पर होते हैं.. आपने साउथ की इस यात्रा में अपनी जिन संवेदनाओं को हमसे साझा किया वह निसंदेह रोचक और आत्मीय हैं.. तथा वहां फिर से जाने को उकसाता भी है.. हादिक बधाई..!

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  14. यात्राएं जीवन देती हैं, बेहद आत्मीय संस्मरण. कोवलम और त्रिवेंद्रम जाकर, बिना देखे भागने को विवश हो चुका हूँ, पर अब नहीं. पक्का. आभार आपका .

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  15. सरिता जी का यह सुंदर यात्रा वृतांत पढ़कर सचमुच् केरल जाने का मन हो आया। बधाई उन्हें।

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  16. Wow such great and effective guide
    Thank you so much for sharing this.
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