सहजि सहजि गुन रमैं : उमेश कुमार चौहान













उमेश कुमार चौहान के चार कविता संग्रह  और मलयालम से हिंदी में अनुवाद की एक किताव प्रकाशित है. अपनी इस लम्बी कविता में कवि ने ऊसर शब्द का अर्थविस्तार करते हुए उसे वर्तमान सभ्यागत नैतिक संकट से जोड़ा है और बंजर होते मानवीय सम्बन्धों को भी देखा परखा है. 
इधर हिंदी कविता से खेत, किसान, खेती के तौर तरीके और अनुभव गायब हैं. कविता में इसकी वापसी स्वागतयोग्य है.   



गणेश पाइन


ऊसर जमीन भी बन सकती है फिर से उपजाऊ           
उमेश चौहान


(1)

धरती पर जिसको भी
जहाँ भी मिली कोई उर्वर जमीन
वहीं पर ही बो दी उसने
अपनी मनचाही फसल
कहाँ बोऊ अब मैं
उगने को आतुर अपने सपने?

एक ही रास्ता बचा है अब
खारापन कम करके
फिर से उपजाऊ बनाया जाय
किसी बेकार पड़ी ऊसर जमीन को
और बो दी जाय उसमें
अपने सपनों की मनचाही फसल।



(2)

आज जो जमीन पड़ी है ऊसर
कल तक यही उपजाऊ थी
अतीत की कुछ गलतियाँ -
सब कुछ चुपचाप सह लेने की आदत
उर्वरता का बेहिसाब दोहन
क्षमता का मनमाना शोषण -
जिनके चलते इसके सीने पर जमता चला गया
वाष्पित आँसुओं का ढेर सारा खारापन।

लवणों की कठोर दीवार के नीचे
अभी भी बची है मिट्टी की नैसर्गिक उर्वरता
अभी भी किसी तेजाब से गलाई जा सकती है
यह अभेद्य क्षारीय दीवार
अभी भी यह ऊसर जमीन बन सकती है उपजाऊ।



 (3)

एक हरा-भरा उपजाऊ खेत
आज ऊसर में तब्दील हो गया है,
जरूर सींचा होगा इसे साल दर साल
किसी गरीब मजदूर ने
खाली पेट अपने पसीने से
और इत्र से नहाया होगा रोज़ इसका निठल्ला जमींदार,
जरूर रेशमी चादर बिछाकर सोई होगी बरसों घर की मालकिन
रोज़ शाम उस मजदूर की बीबी से
अपने बेकारी से थके नितंबों को दबवाती हुई,
जरूर लगी होगी इस खेत को उनकी हाय
जो बरसों से इसे जोतते, बोते, सींचते, गोड़ते और काटते हुए भी
अपने किसान होने का दावा भी नहीं कर सकते
गल्ले के किसी सरकारी खरीद-केन्द्र पर।

अब और कोई चारा नहीं
अगर बनाना है इस ऊसर खेत को फिर से उपजाऊ
तो सौंप देना होगा इसे छीनकर उन निकम्मे लोगों से
सर्जना को आतुर मेहकतकश हाथों में
वे जरूर बना देंगे इसे फिर से उपजाऊ
भले ही उन्हें सींचना पड़े इसे अपने खून से भी।



(4)

फसल लहलहाने की आशा नहीं की जा सकती
यदि मिट्टी के सीने पर नमक की जकड़न हो
ऊपर से चाहे जितनी तरलता दी जाय उसे
और चाहे उसमें डाली जाय
कितने भी पोषक तत्वों से भरी खाद
सब कुछ व्यर्थ ही हो जाएगा
तुलसी बाबा कह ही गए हैं
'ऊसर बीज बये फल जथा'

उपाय तो एक ही है बस कि
चीरा जाय धरती का सीना
गलाया जाय बरसों का जमा नमक
और बहाकर दूर ले जाया जाय उसे नालियों के सहारे
जैसे गुरदे बहा देते हैं खींचकर
शरीर का सारा अपशिष्ट मूत्र की शक्ल में।

जरूरी है अब कि मुक्त किया जाय मिट्टी को
इस खारेपन की त्रासदी से
ताकि उम्मीद की जा सके कि
धरती पर फिर से लहलहा सकती है
हमारे मनचाहे सपनों की फसल।




(5)

पृथ्वी की उत्पत्ति भले ही अभी भी एक रहस्य हो
किन्तु ऊसर की उत्पत्ति के बारे में कुछ भी रहस्य्मय नहीं
धरती पर रेगिस्तान भले ही बनते हों जलवायु-परिवर्तनों से
लेकिन ऊसर जमीन तो पैदा होती है
उर्वर व सिंचित प्रदेशों में ही।

गहरा नाता होता है ऊसर भूमि का
अतीत में किए गए उसकी उर्वरता के दोहन से
गनीमत यही है कि
स्थायी नहीं होती धरती की यह अक्षमता
उपचारित किए जाने पर कभी भी बन सकती है
कोई भी ऊसर भूमि उपजाऊ।



(6)

क्षुद्र श्रेष्ठता के अहसास और मशीनीकृत सोच ने ही
दुनिया में पनपाया है पूंजीवाद और
सिमटा दी है कुछ ही हाथों में सारी औद्योगिक व व्यावसायिक शक्ति
इसी ने बनाया है दुनिया की कुछ कौमों और देशों को सुविधा-संपन्न
तथा कुछ को ऊसर सा शोषित और उपेक्षित
लेकिन स्थायी नहीं होता है कौमों का यह ऊसरपन
करुणा में डूबी भूमि की अपारगम्य कठोर सतह के नीचे दबी
मिट्टी की एक उथल-पुथल और उसका कुछ स्वभाव-परिवर्तन ही काफी है
इतिहास को दोबारा लिखे जाने हेतु हमें मजबूर कर देने के लिए।

सम्पन्नता की माल्ट से युक्त
साम्राज्यवाद की शराब के नशे में झूमती कौमो!
सावधान हो जाओ!
मिट्टी की प्रकृति के बारे में
तुम्हारी यह बेखबरी ही
एक दिन तुम्हें मजबूर कर देगी
दुनिया की सारी ऊसर बना दी गई कौमों को
उनसे छीना गया उपजाऊपन वापस लौटाने के लिए।



(7)

समय का खारापन सिमट आने पर
मन का खेत भी हो जाता है ऊसर
और फिर नहीं लहलहाती उसमें
विचारों की कोई भी पोषक फसल।



(8)

मस्तिष्क में पैदा हुआ ऊसरपन भी
दूर किया जा सकता है
थोड़े से तेजाबी विचारों का घोल
धीरे-धीरे पेवश्त कर
जड़ता की अभेद्य परत में छिपी
सिकुड़ी-सूखी शिराओं में
जैसे पहाड़ी शिला से छिटका हुआ कोई पत्थर
नदी के तीव्र प्रवाह में
धीरे-धीरे घिसता हुआ
एक दिन बन जाता है
पूजा-गृह में रखा जाने वाला सुघड़ शिवलिंग।



(9)

कण-कण शोषित
प्रतिबन्धित और उपेक्षित
परित्यक्त, निराश, निरर्थक
हूँ पड़ी गले तक भरे आर्द्रता
होठों पर पपड़ी मोटी
उद्यत हूँ कोख सजाने को
सूखापन दूर भगाने को
अँगड़ाई लेने को आतुर
हैं रुँधी नसें सब मेरी
समझो अब मेरी पीड़ा
अब फाड़ो मेरी छाती
ठंडा जो रक्त जमा है
उसको पिघलाकर पी लो
कुछ गर्म लहू टपकाओ!
बरसों से भीतर सुप्त पड़ी
उर्वरता पुनः जगाओ!
आओ! अब बो दो अपने सपने
मेरे सपाट सीने में
सुस्थिर भविष्य का अपना
उपवन अब यहीं सजा दो!
ऊसरपन मेरा छीन पुनः
उपजाऊ मुझे बना दो!

___________________________________________________________
उमेश कुमार सिंह चौहान
9 अप्रैल, 1959 को लखनऊ (दादूपुर) 
एम. एससी. (वनस्पति विज्ञान), एम.. (हिन्दी), पी. जी. डिप्लोमा (पत्रकारिता व जनसंचार)। वर्ष 1986 से भारतीय प्रशासनिक सेवा (केरल कैडर) में कार्यरत

गाँठ में लूँ बाँध थोड़ी चाँदनी ( 2001) ,दाना चुगते मुरगे ( 2004 ),जिन्हें डर नहीं लगता (2009 ) जनतंत्र का अभिमन्यु ( 2012)मलयालम के कवि श्री अक्कित्तम अच्युतन नम्बूदिरी की कविताओं का हिन्दी-अनुवाद ‘अक्कित्तम की प्रतिनिधि कविताएं’ शीर्षक से वर्ष 2009 में ही भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित। मलयालम की अन्य तमाम कविताओं के हिन्दी-अनुवाद भी विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित
वर्ष 2009 में भाषा समन्वय वेदी, कालीकट द्वारा अभय देव स्मारक भाषा समन्वय पुरस्कार तथा 2011 में इफ्को द्वारा राजभाषा सम्मान प्रदान किया गया
सम्प्रति : भारत सरकार के खाद्य मंत्रालय में संयुक्त सचिव  
डी-I/ 90, सत्य मार्ग, चाणक्यपुरी, नई दिल्ली110021 (मो. नं. +91-8826262223),
ई-मेल: umeshkschauhan@gmail.com

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  1. स्वागत उमेश जी का . मानवीय संबंधों को गंभीरता से देखती कविता ..समय का खारापन सिमट आने पर ,मन का खेत भी हो जाता है ऊसर ..हमारे समय का बयान है यहाँ ..

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  2. अनाम20/3/13, 11:08 am

    Sarita Sharma says उमेशजी की कवितायें हमें समय के अहम् सरोकारों से अवगत करते हुए सचेत करती रहती हैं.शहर में रहकर भी उनकी संवेदना कुंद नहीं हुई है.मेरे सामने एक डिबेट है जिसमें नदीमुल हक़जी ने कहा है-'ख्वाहिशों से नहीं गिरते फूल झोली में, वक्त की शाख को हिलाना होगा. कुछ नहीं होता अंधेरों को बुरा कहने से, अपने हिस्से का चिराग खुद जलाना होगा.'

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  3. उमेश चौहान एक अलग तरह के कवि हैं. उनकी कविताएँ पढ़ने के साथ ही साथ उनको सुनने के भी कई अवसर मिले हैं. समकालीन कवियों में उनका स्वर अलग से इसलिय पहचाना जा सकता है कि खेत-खलिहान वाले समाज का चित्रण जिस विविधता, सच्चाई और गहराई से वे करते हैं, वहाँ तक बहुत ही कम कवियों की पहुँच है. उमेश जी जिस पद पर हैं, उस पद का थोड़ा सा भी प्रयोग करके कविता के क्षेत्र की आज की गलाकाट प्रतियोगिता में कहीं बहुत आगे होते पर अपनी भलमनसाहत, सादगी और कर्तव्यनिष्ठा से भरे हुए उमेश जी हिंदी साहित्य में चुपचाप अपना योगदान दिए चले जा रहे हैं.

    उनको पढ़ना जितना रुचिकर है, खुद उनसे उनकी कविताएँ सुनना उससे भी कहीं अधिक रुचिकर है. आप कविता के क्षेत्र में लगभग भुलाई जा चुकी या अब तक एक विधा के रूप में अमान्य विधाओं में भी काम कर रहे हैं चाहे वह आल्हा हो या कुछ और. 'ऊसर' पर लिखी गयी उनकी यह कविता उनके शानदार कवि-व्यक्तित्व का नमूना भर है. उनको हिंदी कविता में जो स्थान मिला है, वे उससे कहीं बहुत अधिक के कवि हैं. उन्हें व समालोचन को बहुत बहुत बधाई व शुभकामनाएँ!

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  4. इस नाउम्मीद वाले समय में उम्मीद भरी इन कविताओं को पढ़ना अच्छा लगा | बधाई उमेश जी को |

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  5. धन्यवाद अपर्णा जी! सईद भाई, आपकी टिप्पणी तो मन में तमाम संतुष्टि व लिखने की एक नई प्रेरणा भर गई।

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  6. उमेश जी को जितना पढ़ पाया हूं उनकी कविता मुझे प्रिय लगी है....एक साथ पढ़ने का अवसर नहीं मिला अब तक...जल्‍द मिलेगा...और फिर उन पर अधिक कुछ कहने का भी

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  7. Suresh Chandra27/3/13, 9:05 pm

    समय का खारापन सिमट आने पर...
    मन का खेत भी हो जाता है ऊसर...
    और फिर नहीं लहलहाती उसमे...
    विचारों की कोई भी पोषक फसल... ... ... किसी भी समझ के लिए पहले ये समझ ज़रूरी है... मुझ जैसे के लिए सर्वप्रथम... इसका तोड़ कहीं कहीं संभव नहीं दिखता, पर असंभव भी नहीं... एक 'धनी' लेखक, उमेश जी... आपका धन्यवाद... साझा करने हेतु... !!

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  8. शानदार कविताएँ...
    मेरी बधाइयाँ
    ... प्रांजल धर

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