बहसतलब : रचना और आलोचना का सवाल :३:मोहन श्रोत्रिय

Posted by arun dev on जनवरी 01, 2012



बहसतलब के अंतर्गत रचना और आलोचना के सवाल पर गोपाल प्रधान और जगदीश्वर चुतर्वेदी के वैचारिकी-क्रम को आगे बढ़ा रहे हैं लेखक मोहन श्रोत्रिय. आलोचना के संकट पर विचार करते हुए हिंदी आलोचना की परम्परा के छल-छद्म  को जहां दृष्टि में रखा गया है वही पश्चिमी आलोचना – पद्धति की राजनीति पर भी नज़र है. उनका मानना है कि आलोचना का संकट व्यापक सांस्कृतिक-सामाजिक संकट का लक्षण-भर है, दरम्यान   विचारधारा की अनिवार्यता और उसकी प्रासंगिकता जैसे मुद्दे गंभीरता से उठे हैं. वैचारिक रूप से सघन आलेख.  








 आलोचना संकट में है, बेशक      
मोहन श्रोत्रिय  

इस संकट के कई कारण हैं, पर मुझे जो सर्वाधिक महत्वपूर्ण लगता है, वह है खुलेपन का अभाव. यानि पारदर्शिता का ग़ायब हो जाना. मूल्यांकन के उपकरणों की जांच न किया जाना, और बदलते यथार्थ की जटिलता के अनुरूप नए प्रतिमानों के सूत्रीकरण की ज़रूरत के प्रति उदासीनता. बोले हुए और लिखे हुए के प्रति जवाबदेही  का निरंतर कम होते जाना.

पुरानी उक्ति है कि यदि आप केवल अपना विषय ही जानते हैं, तो सही अर्थों में अपना विषय भी नहीं जानते. सीधे शब्दों में इसका अर्थ यही है कि अपना विषय भी तरीक़े से समझने के लिए विषय के इतर भी बहुत कुछ समझना होता है क्योंकि कोई भी विषय ऐसी चौहद्दी के भीतर क़ैद नहीं होता कि इधर-उधर की थोड़ी सी भी हवा उसे न लग पाए. साहित्य तो इस दृष्टि से इसे अनिवार्य बना देता है कि ज्ञान के अन्य अनुशासनों से प्रत्यक्ष परिचय किए बगैर साहित्यिक आलोचना-कर्म असंभव नहीं तो बहुत मुश्किल अवश्य हो जायेगा क्योंकि साहित्य में मनुष्य के विभिन्न रूप आते हैं या उन्हें आना चाहिए. मनुष्य के अध्ययन के लिए कई पृथक अनुशासन हैं. एक नृतत्वशास्त्री मनुष्य का अध्ययन एक कोण से करता है, जबकि समाजशास्त्री का नज़रिया अलग होता है.

अर्थशात्री जब मांग एवं आपूर्ति की चर्चा करता है तो भी उसके अध्ययन का संदर्भ-बिंदु मनुष्य की ज़रूरतें, और उत्पादकों तथा आपूर्तिकर्ताओं की कारगुज़ारियां भी होती हैं. बदले संदर्भों में पुरानी परिभाषाएं काम की नहीं पाई जातीं तो इन्हें नए ढंग से प्रस्तुत करने की ज़रूरत भी महसूस की जाती है. तो ज़ाहिर है कि जब 'इस' मनुष्य के भावों, अनुभूतियों, अनुभवों और उसके दैनंदिन संघर्षों, टकरावों, भटकावों आदि से साहित्य का कच्चा माल उपलब्ध होगा, और रचनाओं में रूपायित होगा तो यह कैसे संभव है कि बिना इन विविध(चाहे, ऊपर से असंबद्ध-दिखते) विषयों की जटिलताओं से सीधे परिचित हुए, रचना की आलोचना में दाखिल और दीक्षित हुआ जा सकता है, पारंगत होने की तो बात दूर की है.

नवजागरण काल के लेखकों-आलोचकों की बौद्धिक तैयारी की ओर संकेत किया है, गोपाल प्रधान ने, अपने व्यवस्थित आलेख में. महावीरप्रसाद द्विवेदी और आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का उल्लेख भी किया है. आगे, रामविलास जी का भी उल्लेख किया है. बहु-श्रुत और बहु-पठित होने का सिलसिला इनके साथ ही समाप्त नहीं हो जाता, बल्कि आगे भी चलता है. नामवरजी में तो मिलता ही है, थोडा और आगे चलें, तो मैनेजर पांडेय तक भी आता है. पर फिर भी आलोचना का संकट यदि बरकारार रहता है -जो कि सच है- तो उसके कारणों की पड़ताल कहीं -किसी दूसरे तल पर करनी पड़ेगी.

अज्ञेय की एक कविता की पंक्ति है " ये उपमान मैले पड़ गए हैं...."  वह जब 'उपमानों' की बात कर रहे थे तो उनका तात्कालिक संदर्भ काव्य-मुहावरा था. साथ ही वह उपमानों के मैले पड़ जाने का खुलासा भी कर रहे थे एक रूपक के ज़रिए. प्रकारांतर से यह बात आलोचना पर भी लागू होती ही है. क्यों नहीं? यह दूसरी बात है कि अज्ञेय जिस तरह 'कलगी बाजरे की' को सौंदर्य के नए प्रतिमान के रूप में प्रस्तावित कर रहे थे, वह चला नहीं. पर वह एक अलग चर्चा-विमर्श की मांग करता है. हमारा वास्ता यहां आलोचना के संकट से है, तो सोच कर देखें कि हिंदी आलोचना में नए प्रतिमान निर्मित किए जाने का कोई विश्वसनीय प्रयास हुआ भी था क्या! नामवरजी के प्रतिमानों का जितना शोर था, क्या वे एक विश्वसनीय कसौटी बना सके, मूल्यांकन की? उन प्रतिमानों के स्रोत क्या थे? क्या अंग्रेज़ी के "न्यू क्रिटिसिज़्म" से उधार लिए प्रतिमानों की उनकी मार्क्सवादी दृष्टि के साथ कोई संगति बैठ सकती थी? प्रतिमानों का घालमेल उसी किताब में मूल्यांकन के घालमेल के रूप में भी सामने आया. मुक्तिबोध भी "वाह", और विजयदेव नारायण साही तथा उनकी मंडली भी "वाह" ! इसे "विरोधों को साध लेने की कला" कहकर पिंड छुड़ाना चाहें तो बात और है. मुक्तिबोध की कविता तो नए और विश्वसनीय प्रतिमान घड़ने का तमाम समान उपलब्ध करा देती है. वहां नज़र क्यों नहीं गई? "ज्ञानात्मक संवेदन" और संवेदनात्मक ज्ञान" तो दूर तक प्रतिमानों का आधार निर्मित कर सकता था. पर वैसा होना न था. क्योंकि वैसा हो जाने पर चर्चा के केंद्र वे कवि नहीं बन सकते थे, जो बने.

'पाठ' का 'असंदिग्ध' महत्व है, यह ऐसा एक सूत्र है जिस पर अंग्रेज़ी नव आलोचना और मार्क्सवादी स्थापनाओं में कोई विमति नहीं है. पर विमति का न होना सिर्फ़ यहीं तक सीमित है. मार्क्स-एंगेल्स ने जो कुछ भी कहा बाल्ज़ाक के बारे में, और लेनिन ने जो लिखा तोल्सतोय के बारे में वह इस सूत्र के पक्ष में खड़ा होता है. पर इनके निहितार्थों पर भी ध्यान देना ज़रूरी है. यहां विस्तार में जाने का अवकाश नहीं है, इसलिए एक शब्द से ही काम चलाऊंगा, और वह है "यथार्थ". बहुत लोग चौंके थे जब लेनिन ने तोल्सतोय को "क्रांति का दर्पण" कहा था. तोल्सतोय और क्रांति में कोई भी तो मेल नहीं था. तत्कालीन रूसी सामाजिक यथार्थ को तोल्सतोय ने जिस तरह पकड़ा और चित्रित किया, वह 'यथार्थ' क्रांति का उत्प्रेरक बना, अन्य कारकों के साथ. फ्रांस में जिस समय ज़ोला का जलवा शवाब पर था, उस समय यथार्थ की गहरी पकड़ के आधार पर बाल्ज़ाक महत्व को रेखांकित करने का ऐतिहासिक महत्व का काम किया, मार्क्स-एंगेल्स ने. गौर से देखें तो "विचार, विचारधारा" और "वैचारिक आग्रह" संबंधी बहुत-सी नासमझियां भी दर-किनार हो जा सकती हैं. मूल बात यह होनी चाहिए कि "पाठ" आपको ले कहां जा रहा है? अग्रगामी है या पीछे धकेल देने वाला? और इस तरह देखने पर विचार 'विजातीय' अथवा गैर-साहित्यिक दिखना बंद कर देता है. लेकिन यहां यह जोड़ा जाना अप्रासंगिक नहीं माना जाना चाहिए कि 'पाठ' को निरे उस अर्थ में नहीं लिया जा सकता जिस अर्थ में आई. ए. रिचर्ड्स ने प्रस्तावित किया था. पाठ के साथ रचनाकार के जीवन से जुड़े कतिपय पक्ष भी ध्यान देने योग्य तब बन जाते हैं जब अलग-अलग रचनाएं किसी 'फांक' की तरफ़ इशारा करती हों. 'भोक्ता मनुष्य' और 'सर्जक मस्तिष्क' (THE MAN WHO SUFFERS AND THE MIND THAT CREATES) के द्वैत को स्वीकारना कितनी ही बार ग़लत/ सही के भेद को धुंधला कर देता है. और इसी का प्रच्छन्न लाभ वे लेखक लेना चाहते हैं जो किसी भी प्रकार की रचनात्मक जवाबदेही से बचना चाहते हैं.

पश्चिमी प्रतिमानों को उस समय के 'बड़े' मने जाने वाले कवि और कुछेक आलोचकों ने प्रच्छन्न स्वीकृति दी. इन प्रतिमानों के साथ आए "कुंठा", "संत्रास", "आत्म-परायेपन" के भाव और उनकी औचित्य-रक्षा के रूप में घड़े गए "भोगा हुआ यथार्थ" के प्रतिमान की पड़ताल कर लेना भी इस दृष्टि से काफ़ी दिलचस्प होगा, शिक्षाप्रद भी. पश्चिमी जीवन के यथार्थ को भारतीय भूमि पर प्रत्यारोपित करने की ज़रूरत क्यों आन पड़ी? मज़ेदार बात यह है कि दूसरे पैरा में उद्धृत पंक्तियों में अज्ञेय  नया काव्य मुहावरा गढने से शुरू करके भोग हुआ यथार्थ को एक नए प्रतिमान के रूप में प्रतिष्ठा दिलाने की वकालत करने लगते हैं. इसका मक़सद ? यथार्थ के बरक्स एक नई सरणी की प्रस्तुति.जो वास्तविक है वह अवास्तविक बन् जाता है, अगर गहराई से देखें तो पश्चिम के विकसित पूंजीवादी समाजों में कुंठा, संत्रास और आत्म परायापन उस दौर की वास्तविकता हो सकती थी, भारतीय समाज की नहीं, क्योंकि तब तक न ऐसी महानगरीयता ही आई थी, न पारंपरिक साझे जीवन की व्यवस्थाएं चरमराई थीं.

भोगे हुए के नाम पर कुछ भी 'पेला' जा सकता है. हमारे यहां ऐसे लोगों की कमी नहीं रही है जो "नंगे पैर चलने की पीड़ा" को अनुभव करने के लिए "जूतों में कंकड" डाल कर चला करते थे. यह वास्तविक पीड़ा का उपहास भी है, और ग़लत सादृश्य स्थापित करने की कुचेष्टा भी. निर्मल वर्मा की एक कहानी की नायिका प्लेटफॉर्म पर चलती-चलती इस चिंता में घुल और घायल हो जाती है कि उसका उठा हुआ पांव यदि ज़मीं पर नहीं आया तो? और यह 'इतना बड़ा करके दिखाया जैसे यह उसके लिए जीने-मरने का सवाल बन गया हो. यह भाववादी किस्म की पीड़ा लोगों की वास्तविक पीड़ा के बरक्स खड़ी कर दी गई. यह अकारण नहीं था, बल्कि पूरी तरह सुविचारित था. निस्संग भाव से सोचें तो यह प्रतिमान खतरों/ चतुराईयों से भरा था. एक ओर जहां इसका उद्देश्य वस्तुगत यथार्थ से लोगों का ध्यान हटाना था, तो दूसरी ओर लेखकीय जवाबदेही का निषेध करना था.


विचार-शून्य कोई भी काम नहीं होता, मनुष्य का, तो कवि-कर्म/ आलोचना-कर्म भी ऐसा कैसे हो सकता है. टी. एस. इलियट (जो ईसाइयत की पुनर्स्थापना को वैश्विक संकट से उबरने का एक मात्र तरीक़ा बताते थे अपने साहित्येतर लेखन में, पर कविता में कवि-व्यक्तित्व के प्रतिबिम्बन के खिलाफ थे) के निबंध Tradition and Individual Talent की स्थापनाओं को यहां के कलावादी/रूपवादी/प्रयोगवादी कवियों ने जिस तरह कसौटी बना दिया उससे भी आलोचना की वस्तुपरकता को काफ़ी नुक़सान पहुंचा क्योंकि इसे न केवल रचना प्रक्रिया के अनिवार्य अंग के रूप में पेश किया गया, बल्कि आलोचना की कसौटी के रूप में भी प्रस्तावित किया गया. इसे व्यापक मान्यता भी मिली. यह जानना कम दिलचस्प नहीं होगा कि पश्चिम में इलियट को वह मान्यता नहीं मिली जो यहां सहज रूप से मिल गई. डेविड डेशीज़ जैसे आलोचक उन्हें 'छोटे कवियों के बीच बड़ा कवि' (major poets among minor poets) ही मानते थे. (कॉडवेल की तो बात ही अलग है जिन्होंने २९ वर्ष की आयु में मृत्यु से पहले लिख छोड़ी अपनी कृति Romance of Realism में इलियट की मान्यताओं को ऐसे ध्वस्त किया कि उसका खंडन किया ही नहीं जा सका). यह अभी तक रहस्य बना हुआ है कि ऐसे इलियट को यहां विचार के विरोध के प्रबल अस्त्र के रूप में मान्यता देने-दिलाने वाले कवि भी प्रच्छन्न रूप से विचार डाल ही रहे थे कविता में ! अज्ञेय की ये पंक्तियां देखिए :

"अच्छी कुंठारहित इकाई
सांचे ढाले समाज से
अच्छा अपना ठाठ फ़क़ीरी
मंगनी के सुख-साज से."

किसी टिप्पणी की मोहताज नहीं हैं ये पंक्तियां. देख लीजिए इनकी धमक कहां-कहां तक सुनाई पड़ती है! प्रगतिवादी कविता को हाशिए पर डाल देने की सदेच्छा का ही यह परिणाम था यह. आलोचना की जिस सुविज्ञ-सुपठित परंपरा का उल्लेख गोपाल प्रधान ने किया है, उसके संवाहक आलोचक भी इस स्थिति को गड्डमड्ड करने के लिए कम ज़िम्मेदार नहीं हैं, बिना उपयुक्त प्रतिमान सामने रखे हुए आलोचना का खेल चलता रहा. साहित्य में विचारों का वही महत्त्व होना चाहिए जो जीने के लिए वायु का होता है. यह कह देना काफ़ी नहीं होना चाहिए कि 'विचार' साहित्य को 'प्रचार' में बदल देता है. कौनसा साहित्य ऐसा है जो किसी न किसी मूल्य को प्रचारित नहीं करता? साहित्य का कार्यभार/ प्रकार्य(function) क्या है? समाज का दर्पण होना / उसे रूपांतरित करने का उपकरण होना / समाज के आगे 'मशाल' लेकर चलना / पाठकों की रुचियों को परिष्कृत करना / एक बेहतर समाज का सपना सौंपना - ये सब या इनमें से कोई एक भी संभव है क्या बिना विचार के? तुलसी जब मंगलाचरण में ही मानस के शास्त्-सम्मत होंने का विवरण देते हैं तो क्या वे किन्हीं ग्रंथों और मूल्यों का प्रचार नहीं कर रहे होते हैं? मुझे तो लेनिन की यह उक्ति न केवल व्यावहारिक लगती है बल्कि साहित्य-कर्म के लिए सटीक भी : "हर साहित्य प्रचार होता है, किंतु हर प्रचार साहित्य नहीं होता."

उत्तर -आधुनिकता के प्रभाव में विमर्शों का ज़बर्दस्त दौर चला है, हिंदी साहित्य में. मैं कोई ख़ास टिप्पणी नहीं करना चाहता इस पर. वैसे भी जगदीश्वर ने विस्तार से अपनी बात कह ही दी है, इस मुद्दे पर. एक छोटा सा सवाल ज़रूर है, और वह जुड़ा है रवीन्द्र नाथ ठाकुर की एक कहानी "स्त्रीर पत्र" से. यह कहानी हिंदी में 'पत्नी का पत्र पति के नाम' से आई. स्त्री-विमर्श पर इससे बेहतर रचना इस अल्प-ज्ञानी ने तो नहीं पढ़ी, आज तक. काल-क्रम की दृष्टि से देखें तो दुनिया भर में, कहीं भी, स्त्री-मुक्ति/ स्त्री विमर्श की शुरुआत से पहले की रचना है यह. विचार करें : क्या इन विमर्शों ने साहित्य की कोई उल्लेखनीय  सेवा की है." हां, कुछ लोग विमर्श-विशेषज्ञ अवश्य बन गए हैं. समाज की "ऐतिहासिक संरचना" का "वस्तुगत मूल्यांकन" करके यदि रचना-आलोचना-धर्म को विश्लेषित-व्याख्यायित करें तो, जिस रूप में विमर्श चल रहे हैं, उनसे हट कर सार्थक ढंग से काम किया जा सकता है/ प्रोत्साहित किया जा सकता है. पर हां, ध्यान आया : उत्तर-आधुनिकतावाद ने तो इतिहास के अंत की घोषणा कर दी है. यथार्थ की भी. स्मृति की भी. स्वप्न की भी. तो ऐसे में ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य तो किसी भी चीज़ का बचेगा/बनेगा कैसे? और "वस्तुगत" भी तो अपने परे से ही निर्मित होता है!

सही कहा जा रहा है कि आलोचकों/ समीक्षकों ने साहित्य के मूल्यांकन में व्यक्तिगत संबंधों का निर्वहन अधिक किया है. यह अभी भी जारी है. किसी अकेले व्यक्ति पर इसका दोष नहीं मढ़ा जा सकता. जहां बोल कर ही मूल्यांकन हो रहा है, वहां तो 'खुला खेल फ़रुक्खाबादी' है ही. आलोचक जानता है कि उसकी एक टिप्पणी से कोई रचनाकार 'कालजयी' थोड़े ही हो जाएगा, तो चलने दो. क्या फ़र्क़ पड़ता है? एक कवि तो इससे आगे बढ़कर कह ही गए " फ़र्क़ पड़ भी जाए तो भी क्या फ़र्क़ पड़ता है?"  दूसरी तरफ़, रचनाकार दो-तीन ऐसी टिप्पणियों के बूते पर दुनिया भर को ललकारने का अधिकार प्राप्त कर लेता है, कि आलोचक वही जो इन रचनाओं को वैसे ही सराहे वरना वह आलोचक/समीक्षक बनने की अर्हता ही नहीं रखता.

तो मेरी नज़र में यह सिर्फ़ आलोचना का संकट नहीं, एक अर्थ में रचना का संकट भी है. फिर भी उजला पक्ष यह है, कि अनेक समराह साहित्यकार इस संकट की परवाह न करते हुए अपना काम कर रहे हैं. साहित्य, समाज की अधिरचना का हिस्सा होने के नाते सापेक्ष स्वायत्तता का ही दवा कर सकता है. इस अर्थ में, आलोचना का संकट व्यापक सांस्कृतिक-सामाजिक संकट का लक्षण-भर है (symptomatic of the general malaise). समाज में यदि मूल्य-विहीनता का बोलबाला है, तो साहित्य में भी इसका कमोबेश असर तो दिखेगा ही. समाज में अराजकता है, तो साहित्य भी इससे कैसे बचेगा? पूरी तरह तो कभी नहीं. अलग-अलग चेतना-स्तरों पर सक्रिय साहित्यकार फ़र्क़ ला सकते हैं, पर सार्वत्रिक नहीं.

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मोहन श्रोत्रिय
६ दिसम्बर १९४४, भरतपुर, राजस्थान
उच्च शिक्षा जे.एन.यू से 
लेखक, संपादक वक्ता
70 के दशक में चर्चित त्रैमासिक 'क्‍यों' का स्‍वयंप्रकाश के साथ संपादन
राजस्‍थान एवं अखिल भारतीय शिक्षक आंदोलन में अग्रणी भूमिका  
18 किताबों का अंग्रेज़ी से हिंदी में अनुवाद
लगभग 40 किताबों के अनुवाद का संपादन
जल एवं वन संरक्षण पर 6 पुस्तिकाएं हिंदी में तथा 2 अंग्रेज़ी में
कविताओं,कहानियों तथा लेखों के अनुवाद पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित.
ख़ुद की भी कुछ कविताएं तथा लेख यत्र-तत्र प्रकाशित.
'रेकी' पर दो पुस्‍तकें: 'रेकी रहस्‍य' और Decoding Reiki'.
ई पता :mshrotriya1944@gmail.com