परिप्रेक्ष्य : अदम गोंडवी : वह पगडण्डी अदम के गांव जाती है



 अदम गोंडवी : वह पगडण्डी अदम के गांव जाती है

परितोष मणि

अदम गोंडवी नहीं रहे. गज़लों के बहाने आम जनता के प्रति हो रहे अन्याय को प्रतिरोध की आवाज़ देने वाले बेलौस और फक्कड़ गज़लगों ने अपना आखिरी शेर सुना कर महफ़िल से रुखसती ले ली है. उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले के आटा गांव में जन्मे रामनाथ सिंह उर्फ अदम गोंडवी ने यूँ तो महज़ माध्यमिक स्कूल तक ही शिक्षा पाई, लेकिन अपनी रचनाओ के द्वारा ‘’हाशिए के लोगों’’ के ऊपर हो रहे अन्याय और अनाचार के खिलाफ अपने “समय से मुठभेड़’’ में हमेश मुखर रहे.

अदम जनता के रचनाकार थे, उन्हें जन की पीडाओ का प्रतिकार उन्ही की भाषा में करना था, इसीलिए वह समकालीन भरी भरकम काव्य मुहावरों से बिलकुल अलहदा होकर काव्य की नयी ज़मीन के निर्माण में लगे रहे, जिसमे वैचारिकता और जन पक्षधरता के गहरे सरोकार थे. अदम को सिर्फ सामंतवादी और सम्प्रदायवादी विचारों और ताकतों के खिलाफ अपना मोर्चा नहीं खोलना था बल्कि आज़ादी के बाद उगे नव-बाबूवाद और राजनीति के भ्रष्ट बाजीगरो के समन्वयवाद से हो रहे आम जनता के दोहन, और उनके बाजिब अधिकारों से वंचित रखने की सोच का भी उतने आक्रामक तरीके से प्रतिरोध करना था.

                
तुम्हारी फाइलों में गाँवों का मौसम गुलाबी है                 
मगर ये आकंड़े झूठे हैं, ये दावा किताबी है                
लगी है होड़ सी देखो अमीरी-औ-गरीबी में                
ये गाँधीवाद के ढांचे की बुनियादी खराबी है                 
तुम्हारी मेज़ चांदी की, तुम्हारे जाम सोने के                 
यहाँ जुम्मन के घर में आज भी फूटी रकाबी है.

1947 की आज़ादी के वक्त अंग्रेजी सत्ता के हुकूक से कुचली निम्नवर्गीय जनता के आँखों में बेहतर सपने आकार ले रहे थे, लेकिन जो आज़ादी मिली वह सामंती ताकतों, राजनेताओँ और अफसरशाही की जुगलबंदी में कैद होकर रह गयी, और आम जनता के दुःख ,दर्द,भूख जैसे मसायल वैसे ही रह गए, बल्कि और बदतर होते गए. आज़ादी तो मुट्ठीभर लोगो की थी जिनके पास पैसा,पावर और बाहुबल था, अदम की कलम ने इन बंचितो का दुःख देखा और समझा
                   
सौ में सत्तर आदमी फिलहाल जब नाशाद हैं                    
दिल पर रखकर हाथ कहिये देश क्या आजाद है ?

अदम की रचनाओ में दूसरे जनवादी कवियों की तरह महज़ लफ्फाजी और नारे नहीं हैं, उनकी गज़ल उस जनता के श्रम को, उसके दर्द को उसके सिरहाने बैठ कर मह्सूसती है, उसकी झोपड़ी में जा कर उसके जख्मो को साझा करती है, उसे मुखर और प्रतिरोधात्मक बनाती है, सिर्फ दूर से नज़र डाल कर आगे नहीं बढ़ जाती है .            

सब्र की इक हद होती है तबज्जो दीजिये,
गर्म रखें कब तलक नारों से दस्तरख्वान को.

अदम गोंडवी की गज़ले भारतीय समाज की पहचान बन चुकी जाति-वर्ण-मूलक व्यवस्था और उससे पैदा हुई सामाजिक असमानता के दंश को गहरे से रेखान्कित करती रही. धार्मिक अनाचार, धर्मग्रंथो का खोखलापन, कठमुल्लावाद इत्यादि विषयो पर अनेक कवियों की रचना मिलती है,लेकिन अदम जिस साफगोई से समाज को बाटनें के इस ब्राह्मणवादी सोच को कठघरे  में खड़े करते है वह उनकी पक्षधरता का सबूत है.

वेद में जिनका हवाला हाशिए पर भी नहीं,
वे अभागे आस्था,विश्वास लेकर क्या करें
                          
‘हाशिए के लोग’ मुख्यता दलित शोषण का महाख्यान है .ध्यातव्य है,यह तब की रचनाएं है जब तक हिंदी में दलित विमर्श ने अभी कायदे से अपने पंख भी नहीं फैलाये थे. अदम गवईं ताना बाना धारण करने वाले संवेदनशील जनकवि थे,उनको ग्राम्य जीवन की बज़बजाहट, लिजलिजाहट और शोषण के अनगिनत नग्न रूपों को अपनी गज़लों के धारदार नश्तर से चीर देने की निपुणता थी, और ऐसा वही रचनाकार कर सकता है जो उस पीड़ा को ठीक से जानता हो, पहचानता हो या जिसने उसे  भोगा हो. उन्हें वह रचना नाकाफी लगाती थी जो पीड़ा को, अन्याय को दूर से देखती हो, जो ऐसे भावबोध को शाब्दिक वाग्मिता और तर्कजाल की वायवीयता में उलझा कर असली समस्या को नज़रंदाज़ या अमूर्त कर दे. उनका सीधा मानना था साहित्य मानवीय भावबोध को तभी ठीक से व्यक्त कर सकता है, जब कातरता,पीड़ा और संत्रास के रेशे साफ साफ उसमे नज़र आये,--

भूख के एहसास को शेरो-सुखन तक ले चलो,
या अदब को मुफलिसो के अंजुमन तक ले चलो
                                             
शबनमी होठों की गर्मी दे ना पायेगी सुकून,
पेट के भूगोल में उलझे हुए इंसान को
                                          
अदम गोंडवी की गज़ले सदैव उन लोगो की पक्षधरता के साथ रही ‘जिनके हाथो में छाले हैं, पैरों में विवाई है ‘अदम के प्रिय कवि धूमिल हैं और यह अनायास नहीं है. अपने प्रिय कवि की तरह गांव के परिवेश,पहनावे और रहन सहन को जी कर आम जन के प्रति अन्याय और असमानता को लेकर व्यवस्था के प्रति तल्ख़ स्वर. कहने की जरुरत नहीं है की दोनों कवियों की रचनाओ में व्यवस्था, राजनेता, अफसरशाही, सामंतवाद,सम्प्रदायवाद के खिलाफ गुस्सा,पीड़ा और गहरी आक्रामकता का स्वर कमोबेश एक सा है.
                               
हिंदी गज़लों के भावबोध और स्वरुप में दुष्यंत कुमार ने क्रांतिकारी परिवर्तन किये, दुष्यंत ने हिंदी  गज़ल को आशिक-माशूक,जाम –साकी, के पारंपरिक दायरे से बहुत आगे ले जा कर उसे राजनैतिक और सामाजिक पक्षधरता और उससे आम आदमी के जुडाव, और उसके विद्रोह से जोड़ा था,यह बहुत बड़ा परिवर्तन था कम से कम हिंदी में. दुष्यंत के बाद अनेक गज़लकारो ने जैसे बल्ली सिंह चीमा,अदम गौंडवी,कैलाश गौतम इत्यादि ने इसे आम आदमी की आवाज़ के रूप में आगे ले जाने का काम किया.अदम की रचनाओ ने हाशिए के आदमी,पीड़ित,शोषित,दलित को प्रतिरोधात्मक स्वर प्रदान किये .उनके शब्द कोमल आवरणों में लिपटे हुए नहीं थे, बल्कि धधकती आग अपने भीतर समोए रहते थे ,और वह हर उस सामाजिक अन्याय और राजनैतिक दलाली के प्रति तन कर खड़ी रहती थी,जिनसे आम आदमी का सीधा सरोकार था.
       
जो गज़ल माशूक के जलवो से वाकिफ़ हो गयी,
उसको अब बेवा के माथे की शिकन तक ले चलो
                                  या
जुल्फें – अंगडाई – तब्बसुम – चाँद – आईना - गुलाब  
भुखमरी  के  मोर्चे  पर  ढल गया इनका  शबाब
                                         
युवा आलोचक प्रणय कृष्ण ने ठीक कहा है ----अदम गोंडवी ने अपनी गज़लों को जन –प्रतिरोध का माध्यम बनाया.इस मिथक को ध्वस्त किया कि यदि समाज में बड़े जन-आन्दोलन नहीं हो रहे,तो कविता में प्रतिरोध की उर्जा नहीं आ सकती है.उनकी गज़लों ने अँधेरे समय में तब भी बदलाव और प्रतिरोध की ललकार को अभिव्यक्त किया जब संगठित प्रतिरोध की पहलकदमी समाज में बहुत कम रही .   
                                
बुझे चूल्हों से संवाद करती, जनता के नुमाइंदो, संसद का फरेब जानती,विकास के आंकडों के हकीकत को जानती अदम की गज़ले दुनिया के शोरो- गुल में अपनी आवाज़ खो बैठे आम आदमी के पीड़ा ,ज़ख्मो का जीवित दस्तावेज़ हैं. अदम की रुखसती महज़ किसी शायर की रुखसती नहीं,हाशिए के लोगो की आवाज़ का ठिठक जाना भी है.
                           
ग़ज़ल को ले चलो अब गांव के दिलकश नज़ारों में                           
मुसलसल फन का दम घुटता है इन अदबी इदारो में.
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परितोष मणि : लेखक समीक्षक 



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  1. अदम जी जैसे शायर सदियों में पैदा होते हैं जो करनी और कथनी में फर्क नहीं रखते...ऐसे ज़मीन से जुड़े शायर को धन के अभाव के कारण समय से पहले ही दुनिया से रुखसत होना पड़ा...हम निकम्मे राजनीतिज्ञों पर अपनी मेह्नत की कमाई के हिस्से से पञ्च सितारा चिकित्सा सुविधाएँ उपलब्ध करवाते हैं और वहीँ हमारी आवाज़ को शब्द देने वाले शायर को मरने के लिए छोटे से सरकारी हस्पताल में छोड़ देते हैं. गौंडा जैसी छोटी जगह में भीषण बीमारी का इलाज़ संभव नहीं था उनके प्रशंशक ये जानते हुए भी उन्हें भोपाल जैसी बड़ी जगह पर भर्ती नहीं करवा पाए...अब हम उनके देहावसान पर मगर मच्छी आंसू बहा रहे हैं...क्या कमें अपने इस दोगले पन पर जरा भी शर्म नहीं आती?

    नीरज

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  2. अदम जी को विनम्र श्रद्धांजलि .....

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  3. अदम जी को श्रद्धांजलि. उनकी गज़लें ठिठके हुए लोगों का मार्ग प्रशस्त करती रहेंगी .

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  4. तुम्हारी फाइलों में गाँवों का मौसम गुलाबी है
    मगर ये आकंड़े झूठे हैं, ये दावा किताबी है
    लगी है होड़ सी देखो अमीरी-औ-गरीबी में
    ये गाँधीवाद के ढांचे की बुनियादी खराबी है
    तुम्हारी मेज़ चांदी की, तुम्हारे जाम सोने के
    यहाँ जुम्मन के घर में आज भी फूटी रकाबी है.
    *****

    सब्र की इक हद होती है तबज्जो दीजिये,
    गर्म रखें कब तलक नारों से दस्तरख्वान को.

    बहुत ही ज़मीनी सच को सामने रखनेवाला कड़वा सच कहा अदम साहब ने। ऎसे सच के फ़नकारों के साथ वही होता है भाई जो आपने अपने आलेख में बयां किया है..एक चलन हो चला है नाम चलने-चलाने का.. काम को देखने और समझनेवाले बचे ही कहां और कितने हैं..

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  5. (अदम गोंडवी, दुष्यंत कुमार के बाद किसी की ग़ज़ल में यदि क्रांति थी तो वे थे अदम गोंडवी. वे नहीं रहे. उन्हें कई बार प्रत्यक्ष सुनने का अवसर मिला.एक बार धनबाद भी आये थे एक कवि सम्मलेन में.रामनाथ सिंह उर्फ़ अदम गोंडवी को समर्पित एक कविता. शायद कभी प्रत्यक्ष मिलता तो यही कहता जो कविता कह रही है.)




    पता है
    तुम नहीं रहे
    और कोई खबर नहीं बनी
    किसी भी सर्च इंजन में
    तुम्हारा नाम , परिचय
    तुम्हारी कवितायेँ, ग़ज़ल नहीं आती हैं
    तुम किसी लेट्रेरी फेस्टिवल के अतिथि भी नहीं बने
    कहो फिर क्यों बनती कोई खबर

    तुम मंच से कविता कहते थे
    तो सच लगता था
    रोये खड़े हो जाते थे
    मुट्ठियाँ भिंच जाती थी
    लेकिन क्या उस से बदल जाती है
    लोकतंत्र की प्रणाली
    तुमने कहा था
    फाइलों के जाल में उलझी रौशनी
    सालो साल नहीं आएगी गाँव में
    चीख चीख कर गाते रहे तुम
    ग़ज़ल लिखने से बेहतर होता
    मांग लिया होता
    कोई लोकपाल
    कह दिया होता सरकार से
    बनाने को सिटिज़न चार्टर
    तुम भी रहते खबर में
    रोज़ मापा जाता
    तुम्हारा भी रक्तचाप
    एम्बुलेस खड़ी होती
    तुम्हारे मंच के पीछे
    लेकिन तुम तो
    पीछे ही पड़ गए थे
    विधायक के
    जो भुने हुए काजू और व्हिस्की के जरिये
    चाहता था रामराज लाना

    अदम साहब
    तुम तो चले गए
    वे विधायक अब भी हैं
    व्हिस्की और भुने हुए काजू के साथ
    तरह तरह के गोश्त परोसे जाने लगे हैं
    अब भी फाइलों में उलझी है रौशनी
    ठन्डे चूल्हे पर अब भी चढ़ती है
    खाली पतीली
    दीगर बात है कि
    लोकसभा और विधान सभा क्षेत्रो के परिसीमनो के बाद
    बढ़ गई है इनकी संख्या
    कुछ मंत्री बन गए हैं
    और जो मंत्री नहीं बन सके
    बना दिए गए हैं आयोगों और समितियों के सदस्य
    उधर ठन्डे चूल्हों की संख्या भी बढ़ गई है

    यदि आप लिखे होते
    अपने गाँव के पकौड़ो और जलेवियों के बारे में
    या फिर अपने जीवन में आने वाली महिलाओं के बारे में
    थोडा सच थोडा झूठ
    आये होते लोग आपकी भी शोक सभा में
    छपी होती आपकी तस्वीर भी
    किसी अंग्रेजी अखबार में
    लेकिन आपकी गजले तो उतारू थी हाथापाई पर
    इस व्यवस्था के साथ

    एक बात कहूँगा फिर भी
    सिंह साहब
    आपके जाने के बाद भी
    गरजेंगी आपकी ग़ज़लें और
    डरेगी यह व्यवस्था !

    (मेरी यह कविता मेरे ब्लॉग पर भी है...)

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  6. अरुण जी , आपकी कविता सच्ची श्रद्धांजलि ..

    जवाब देंहटाएं
  7. आपकी पोस्ट आज के चर्चा मंच पर प्रस्तुत की गई है
    कृपया पधारें
    चर्चा मंच-737:चर्चाकार-दिलबाग विर्क

    जवाब देंहटाएं
  8. sacchi shrdhanjali...aaj gondvi jee ke baare me bahut kuch jaane ko mila..socha tha gonda me rahta hooon unse jarur milonga..par shayad ye mere nasib me nahi tha...apke sarthak prayas ko pranam aaur godvi ji ko bhavbheene shradhanjali ke sath

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  9. "अदम की रुखसती महज़ किसी शायर की रुखसती नहीं,हाशिए के लोगों की आवाज़ का ठिठक जाना भी है"
    नीरज गोस्वामी जी का गुस्सा भी अपनी जगह जायज है। इस गुस्से का होना भी बहुत जरूरी है। व्यवस्था के खिलाफ इस धिक्कार का कुछ हिस्सा सचमुच हमारे खाते में भी आता है क्योंकि हमारी सुविधापरस्ती और आर्मचेयर लेखन का महासुख भी इसके लिए कम जिम्मेदार नहीं है। अदम की कविता व्यवस्था के साथ-साथ व्यवस्था के पिछलग्गुओं को भी ललकारती है। परितोष ने अदम को बिल्कुल साधकर लिखा है। उन्होंने ठीक नोट किया है कि "अदम को सिर्फ सामंतवादी और सम्प्रदायवादी विचारों और ताकतों के खिलाफ अपना मोर्चा नहीं खोलना था बल्कि आज़ादी के बाद उगे नव-बाबूवाद और राजनीति के भ्रष्ट बाजीगरों के समन्वयवाद से हो रहे आम जनता के दोहन और उनके बाजिब अधिकारों से वंचित रखने की सोच का भी उतने ही आक्रामक तरीके से प्रतिरोध करना था।" यह अदम की राजनीतिक और ब्यूरोक्रेटिक ढांचे की समझ है जो उनकी शायरी को हाशिए के उन तब़कों का प्रतिनिधि बनाती है - वेद में जिनका हवाला हाशिए पर भी नहीं है।

    हम बड़े भारी आइडियोलॉग बने फिरते हैं,हिंदी फिक्शन-पोएट्री में नई जमीन इत्यादि तोड़ने का दावा ठोकते रहते हैं। लेकिन कविता का रुख़ मोड़कर उसे बेवा के माथे के शिकन तक ले जाने का जज्ब़ा हममें बहुत कम है।
    किसी हिंदी लेखक के मरने पर हर बार एक ही तरह के प्रश्न उठाए जाते हैं। एक ही तरह से समूचा हिंदी जगत चिंतातुर होने लगता है। आत्म-भर्तस्ना ही दिवंगत लेखक के प्रति मौलिक श्रद्धांजलि बन जाती है। अकसर किसी शोक पर खुलने वाली ये तल्ख़ सचाइयां क्या हमारे सामने बड़े सवाल नहीं छोड़ जातीं? क्या अदम के नक्शे-कदम उन पदचिन्हों से अलग राह पर जाते हैं जिन पर राजधानी की रंगत चढ़ी है? क्या अदम के साथ खेत-खलिहानों में श्रम एवं संघर्ष की युगों से एक साथ चलने वाली कथा की विरल स्मृतियों का अंत नहीं हो गया? क्या इस ग्लोबल समय में वह पगडण्डी बची रह पाएगी जो अदम के गाँव जाती है और हमारे गाँव भी?

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  10. अदम गोंडवी का जाना कुछ ऐसा रहा कि कह नहीं सकते.... मेरा उनकि रचना से पहला परिचय उनके जाने से महज ३ माह पहले हुआ और ये ३ महीने कभी भुलाये नहीं जा सकते... तुम्हारी फाइलों में गाँव का मौसम गुलाबी है सीधा दिल में बहुत गहरे उतर गया अदम आपका जाना बहुत बहुत दुखी करता है
    @ परितोष जी ... भाई साहब काफी अच्छा लेख है ... अदम साहब पर लिखने को शुक्रिया

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  11. Apne Adm Gondvi ko yad kiya . unki shairi par likha ... iske liye main apka Shukragujar hun.

    Adam par lagatar kam karne ki jaroorat hain.

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