परिप्रेक्ष्य : अदम गोंडवी : वह पगडण्डी अदम के गांव जाती है

Posted by arun dev on दिसंबर 22, 2011



 अदम गोंडवी : वह पगडण्डी अदम के गांव जाती है

परितोष मणि

अदम गोंडवी नहीं रहे. गज़लों के बहाने आम जनता के प्रति हो रहे अन्याय को प्रतिरोध की आवाज़ देने वाले बेलौस और फक्कड़ गज़लगों ने अपना आखिरी शेर सुना कर महफ़िल से रुखसती ले ली है. उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले के आटा गांव में जन्मे रामनाथ सिंह उर्फ अदम गोंडवी ने यूँ तो महज़ माध्यमिक स्कूल तक ही शिक्षा पाई, लेकिन अपनी रचनाओ के द्वारा ‘’हाशिए के लोगों’’ के ऊपर हो रहे अन्याय और अनाचार के खिलाफ अपने “समय से मुठभेड़’’ में हमेश मुखर रहे.

अदम जनता के रचनाकार थे, उन्हें जन की पीडाओ का प्रतिकार उन्ही की भाषा में करना था, इसीलिए वह समकालीन भरी भरकम काव्य मुहावरों से बिलकुल अलहदा होकर काव्य की नयी ज़मीन के निर्माण में लगे रहे, जिसमे वैचारिकता और जन पक्षधरता के गहरे सरोकार थे. अदम को सिर्फ सामंतवादी और सम्प्रदायवादी विचारों और ताकतों के खिलाफ अपना मोर्चा नहीं खोलना था बल्कि आज़ादी के बाद उगे नव-बाबूवाद और राजनीति के भ्रष्ट बाजीगरो के समन्वयवाद से हो रहे आम जनता के दोहन, और उनके बाजिब अधिकारों से वंचित रखने की सोच का भी उतने आक्रामक तरीके से प्रतिरोध करना था.

                
तुम्हारी फाइलों में गाँवों का मौसम गुलाबी है                 
मगर ये आकंड़े झूठे हैं, ये दावा किताबी है                
लगी है होड़ सी देखो अमीरी-औ-गरीबी में                
ये गाँधीवाद के ढांचे की बुनियादी खराबी है                 
तुम्हारी मेज़ चांदी की, तुम्हारे जाम सोने के                 
यहाँ जुम्मन के घर में आज भी फूटी रकाबी है.

1947 की आज़ादी के वक्त अंग्रेजी सत्ता के हुकूक से कुचली निम्नवर्गीय जनता के आँखों में बेहतर सपने आकार ले रहे थे, लेकिन जो आज़ादी मिली वह सामंती ताकतों, राजनेताओँ और अफसरशाही की जुगलबंदी में कैद होकर रह गयी, और आम जनता के दुःख ,दर्द,भूख जैसे मसायल वैसे ही रह गए, बल्कि और बदतर होते गए. आज़ादी तो मुट्ठीभर लोगो की थी जिनके पास पैसा,पावर और बाहुबल था, अदम की कलम ने इन बंचितो का दुःख देखा और समझा
                   
सौ में सत्तर आदमी फिलहाल जब नाशाद हैं                    
दिल पर रखकर हाथ कहिये देश क्या आजाद है ?

अदम की रचनाओ में दूसरे जनवादी कवियों की तरह महज़ लफ्फाजी और नारे नहीं हैं, उनकी गज़ल उस जनता के श्रम को, उसके दर्द को उसके सिरहाने बैठ कर मह्सूसती है, उसकी झोपड़ी में जा कर उसके जख्मो को साझा करती है, उसे मुखर और प्रतिरोधात्मक बनाती है, सिर्फ दूर से नज़र डाल कर आगे नहीं बढ़ जाती है .            

सब्र की इक हद होती है तबज्जो दीजिये,
गर्म रखें कब तलक नारों से दस्तरख्वान को.

अदम गोंडवी की गज़ले भारतीय समाज की पहचान बन चुकी जाति-वर्ण-मूलक व्यवस्था और उससे पैदा हुई सामाजिक असमानता के दंश को गहरे से रेखान्कित करती रही. धार्मिक अनाचार, धर्मग्रंथो का खोखलापन, कठमुल्लावाद इत्यादि विषयो पर अनेक कवियों की रचना मिलती है,लेकिन अदम जिस साफगोई से समाज को बाटनें के इस ब्राह्मणवादी सोच को कठघरे  में खड़े करते है वह उनकी पक्षधरता का सबूत है.

वेद में जिनका हवाला हाशिए पर भी नहीं,
वे अभागे आस्था,विश्वास लेकर क्या करें
                          
‘हाशिए के लोग’ मुख्यता दलित शोषण का महाख्यान है .ध्यातव्य है,यह तब की रचनाएं है जब तक हिंदी में दलित विमर्श ने अभी कायदे से अपने पंख भी नहीं फैलाये थे. अदम गवईं ताना बाना धारण करने वाले संवेदनशील जनकवि थे,उनको ग्राम्य जीवन की बज़बजाहट, लिजलिजाहट और शोषण के अनगिनत नग्न रूपों को अपनी गज़लों के धारदार नश्तर से चीर देने की निपुणता थी, और ऐसा वही रचनाकार कर सकता है जो उस पीड़ा को ठीक से जानता हो, पहचानता हो या जिसने उसे  भोगा हो. उन्हें वह रचना नाकाफी लगाती थी जो पीड़ा को, अन्याय को दूर से देखती हो, जो ऐसे भावबोध को शाब्दिक वाग्मिता और तर्कजाल की वायवीयता में उलझा कर असली समस्या को नज़रंदाज़ या अमूर्त कर दे. उनका सीधा मानना था साहित्य मानवीय भावबोध को तभी ठीक से व्यक्त कर सकता है, जब कातरता,पीड़ा और संत्रास के रेशे साफ साफ उसमे नज़र आये,--

भूख के एहसास को शेरो-सुखन तक ले चलो,
या अदब को मुफलिसो के अंजुमन तक ले चलो
                                             
शबनमी होठों की गर्मी दे ना पायेगी सुकून,
पेट के भूगोल में उलझे हुए इंसान को
                                          
अदम गोंडवी की गज़ले सदैव उन लोगो की पक्षधरता के साथ रही ‘जिनके हाथो में छाले हैं, पैरों में विवाई है ‘अदम के प्रिय कवि धूमिल हैं और यह अनायास नहीं है. अपने प्रिय कवि की तरह गांव के परिवेश,पहनावे और रहन सहन को जी कर आम जन के प्रति अन्याय और असमानता को लेकर व्यवस्था के प्रति तल्ख़ स्वर. कहने की जरुरत नहीं है की दोनों कवियों की रचनाओ में व्यवस्था, राजनेता, अफसरशाही, सामंतवाद,सम्प्रदायवाद के खिलाफ गुस्सा,पीड़ा और गहरी आक्रामकता का स्वर कमोबेश एक सा है.
                               
हिंदी गज़लों के भावबोध और स्वरुप में दुष्यंत कुमार ने क्रांतिकारी परिवर्तन किये, दुष्यंत ने हिंदी  गज़ल को आशिक-माशूक,जाम –साकी, के पारंपरिक दायरे से बहुत आगे ले जा कर उसे राजनैतिक और सामाजिक पक्षधरता और उससे आम आदमी के जुडाव, और उसके विद्रोह से जोड़ा था,यह बहुत बड़ा परिवर्तन था कम से कम हिंदी में. दुष्यंत के बाद अनेक गज़लकारो ने जैसे बल्ली सिंह चीमा,अदम गौंडवी,कैलाश गौतम इत्यादि ने इसे आम आदमी की आवाज़ के रूप में आगे ले जाने का काम किया.अदम की रचनाओ ने हाशिए के आदमी,पीड़ित,शोषित,दलित को प्रतिरोधात्मक स्वर प्रदान किये .उनके शब्द कोमल आवरणों में लिपटे हुए नहीं थे, बल्कि धधकती आग अपने भीतर समोए रहते थे ,और वह हर उस सामाजिक अन्याय और राजनैतिक दलाली के प्रति तन कर खड़ी रहती थी,जिनसे आम आदमी का सीधा सरोकार था.
       
जो गज़ल माशूक के जलवो से वाकिफ़ हो गयी,
उसको अब बेवा के माथे की शिकन तक ले चलो
                                  या
जुल्फें – अंगडाई – तब्बसुम – चाँद – आईना - गुलाब  
भुखमरी  के  मोर्चे  पर  ढल गया इनका  शबाब
                                         
युवा आलोचक प्रणय कृष्ण ने ठीक कहा है ----अदम गोंडवी ने अपनी गज़लों को जन –प्रतिरोध का माध्यम बनाया.इस मिथक को ध्वस्त किया कि यदि समाज में बड़े जन-आन्दोलन नहीं हो रहे,तो कविता में प्रतिरोध की उर्जा नहीं आ सकती है.उनकी गज़लों ने अँधेरे समय में तब भी बदलाव और प्रतिरोध की ललकार को अभिव्यक्त किया जब संगठित प्रतिरोध की पहलकदमी समाज में बहुत कम रही .   
                                
बुझे चूल्हों से संवाद करती, जनता के नुमाइंदो, संसद का फरेब जानती,विकास के आंकडों के हकीकत को जानती अदम की गज़ले दुनिया के शोरो- गुल में अपनी आवाज़ खो बैठे आम आदमी के पीड़ा ,ज़ख्मो का जीवित दस्तावेज़ हैं. अदम की रुखसती महज़ किसी शायर की रुखसती नहीं,हाशिए के लोगो की आवाज़ का ठिठक जाना भी है.
                           
ग़ज़ल को ले चलो अब गांव के दिलकश नज़ारों में                           
मुसलसल फन का दम घुटता है इन अदबी इदारो में.
::::


परितोष मणि : लेखक समीक्षक