मेघ - दूत : मुकुल दाहाल

Posted by arun dev on दिसंबर 02, 2011















मुकुल दाहाल
28 मार्च ma=3/1969, नेपाल

Swansea विश्वविद्यालय से रचनात्मक लेखन में एम. ए.
Nosside International Poetry Prize से 2009 में सम्मानित
Pen Himalaya (2003 - 2009) कविता प्रधान ई-पत्रिका का संपादन
Seemateet Seemanta (Beyond the Last Frontier) शीर्षक से नेपाली में कविता संग्रह प्रकाशित
और इस पShree Bani पुरस्कार

सम्प्रति University of Glasgow, Scotlan,d UK. से रचनात्मक लेखन में Ph.D.
ई पता : mukulnp@hotmail.com


हम अपने पड़ोस को कितना जानते हैं. नेपाल के साहित्यिक समाज के विषय में हम अज्ञानता की हद तक हैं.
मुकुल दाहाल की कविताएँ आधुनिक नेपाल की सांस्कृतिक – राजनीतिक बदलाव की साक्षी हैं. इन कविताओं में परम्परा के टूटने का ध्वंस है, आधुनिकता के अलगाव की पीड़ा है, धीमे ही सही नए बनते नेपाल की आहट है. इन कविताओं में प्रकृति के नरम हाथ अपनी गर्माहट के साथ उपस्थित हैं. अर्से बाद हम नेपाल के किसी कवि से मुखातिब हो रहे हैं. स्वागत.

अपर्णा ने अनुवाद में जम कर मेहनत किया है. अपर्णा की रचनात्मकता का भी यह बसंत  काल है.
















चोरी

तब मैं खासा जवान था जब बनाया था मैंने अपना घर
एक छोटी -सी कुटी आह्लाद की
खड़ी थी मज़बूत घर के सामने जो घर था मेरे पिता का 
रोज़ गिरती थी उस ऊंचे मकान की छाया
आती थी मुझ तक
और रौंद देती थी मेरे छोटे वज़ूद को

रात मैं करता था छेद अपनी ही छत में
निकल पड़ता था चोरी से 
चाँद के उजास का कम्बल ओढ़े
पुकारता था बारिशों को भीग जाने के लिए बौछार में

नहीं जानता था मैं 
क्यों हो जाते थे पिता इस पर यूँ उदास 
छत के उन छिद्रों पर खिन्न 
बरबस क्यों रोक लेना चाहते थे बरसात 
क्यों दीवारें तान दीं थीं उन्होंने अपने जीवन के चारों ओर
जबकि मेरी झोंपड़ी की कोई हद न थी

वे कौनसे ख़याल थे उनके 
जिनसे चमका करते थे उनके बाल और कांपती थी उनकी मूंछ
फिर एक दिन यूँ हुआ
कि सौंप कर मुझे अपनी मूंछ और दाढ़ी 
वे चल दिए लड़खड़ाते कभी न लौटने के लिए अपने घर से
अपने चेहरे पर उगी उस पुरानी घास को 
रोज़ छीलता हूँ मैं
लेकिन फिर -फिर उग आती है वह 

मैं नहीं जानता 
कब मैं चुरा लिया गया था अपनी ही खुशियों के घर से 

हर आनेवाला साल मुझे धकेलता है 
पर मैं पलटकर देखता हूँ प्यार से 
अपनी वही झोंपड़ी .
वहीँ खड़ी है अब भी चुपचाप 
वहीँ, पिता के ऊँचे घर के बगल में

अब दोनों ही खाली हैं 
और करीब आ गए हैं अधिक एक-दूजे के 
पिता की बाँहें  हैं मेरे कन्धों से लिपटी 
और स्मृतियों की हरी दूब फ़ैल गई है ढांपते हुए गज़ों अपना अस्तित्व.




















खिड़की

किये कई यत्न कि बंद रख  सकूँ, पर खिड़की मेरे कमरे की नहीं होगी बंद 
लगता है कभी-कभी 
कि ये बंद भी रहे 
पर भर जाता हूँ आनंद से खुलती है  जब .
प्रत्येक क्षण हवा के साथ चले आते हैं स्मृतियों के झोंके 
और खुल जाती है खिड़की सदा खुली रहने के लिए .
जब भी करता हूँ इसे बंद, नरम हाथ घास के 
आते हैं नाचते हुए खेतों की हवा के साथ, खोलते हैं इसे आहिस्ता.

अगर करता हूँ  इसे अभी बंद 
चली आएगी कहीं से नदी किलोल करती 
और अपने बहते हाथों से खोल देगी खिड़कियाँ  बंद 
छोड़ देगी खुला रहने के लिए .

रेत के किनारों और तलछट से आते हैं 
भीगे और सूखे बिल्लौरी कंकड़ 
यहीं इसी खिड़की से भीतर आते  बिखर जाते हैं मेरे कमरे के फर्श पर 
तब छोड़कर रोज़मर्रा के काम औचक खेलता हूँ इनसे .

जब भी करूँगा इसे बंद 
चला आएगा खेत की कूबड़ पीठ पर तना आम का वही  पेड़ 
खोलेगा इसे 
तूफानी हवाएं झकझोर देंगी टहनियां  
और झड़ जायेंगे पत्ते अनायास कमरे में इधर-उधर .
इन पत्तों से आती है गंध मेरे बचपन की 
और बैठ जाता हूँ खेलने छोड़कर सभी काज

इसी खुली खिड़की से 
देखता हूँ झूलता क्षितिज चावल की चक्की पर 
वहाँ से सविराम आती हैं चक्की की आवाजें, गूंजती हुई 
ढोल और धमाल के साथ घुलती 
और करती हैं जिन्दा मेरी दादी की आवाज़ों को 
वे कपड़े जो घर के पीछे धोकर सुखाये थे उन्होंने 
रस्सी पर सरसरा रहे हैं हवा के साथ

अगर करता हूँ बंद 
तो खोल देते हैं इसे 
धूल के वे नन्हे हाथ जो उठते हैं  कभी 
घर लौटते मवेशियों के खुरों से 

कितना करता हूँ यत्न कि रह जाए ये बंद 
तब चला आता है हठात
समय का पड़ौसी गाँव से कोई 
और खोल देता है इसे .
क्या करूँ !
बहुत यत्न के बाद भी 
अकसर खुली रहती है मेरे घर की ये खिड़की .


आवाज़ों की महासभा

आवाज़ों के बीच 
सुमधुर  ,कर्कश  और तीखी 
आवाज़ों की इस महासभा में 
जो आती हैं बाहर, भीमकाय सीमेंट की दीवारों को तोड़ 
जानता हूँ मैं 
कहीं बीच इनके, मेरी भी आवाज़ उपस्थित है .

पहाड़ियों से गिरते झरने कुछ कह रहे हैं 
आवाजें सडकों पर चलते वेगवान वाहनों की 
दे रही हैं धक्का एक दूसरे को 
आवाज़ आकाश में ऊँचे उड़ते हवाईजहाज़ की 
कर रही है अहम् अपनी ऊंचाई का 

 
मशीनें कारखानों की बड़बड़ा रही हैं   .

कलरव करती चिड़ियों की धुन 
आवाजें पशुओं की 
झनझनाती रात में झींगुरों की आवाजें 
रहती हैं उपस्थित 
जैसे उपस्थित रहती हैं यौवन से भरी औरतें तमाम 

महासभा में 
उपस्थित हैं  सूक्ष्मतर आवाजें संवेदी 
जो उपजती है विश्राम की गति के सबसे छोटे खंड से

अपने में तुष्ट पेटभर आवाजें 
भूखी, सिकुड़ी आवाजें 
और कालातीत आवाजें कला की 
बैठ गई हैं अपनी -अपनी जगह .

आवाज़ों की महासभा में 
महाशक्तियों की आवाज़ उठ रही है समुद्र में ज्वार की तरह 

मैं जानता हूँ यहीं इनके बीच कहीं शामिल है मेरी भी आवाज़ 
लेकिन मैं कर रहा हूँ कोशिश पहचानने की 

कौनसी है मेरी आवाज़ ? 
आखिर कौनसी है मेरी अपनी आवाज़ ?

पीछे छूटे हुए

कि लाया जाना चाहिए था

अपने संग पथ पर

दिन का श्फ्फ़ाक उजाला 
पकड़े हुए हाथों में हाथ
छूट गया था कहीं पीछे आकाश में


कि लाया जाना चाहिए था
वह स्वप्न जो खिलता था नींद में
धीरे से रखकर आँखों में
जो यहाँ तक नहीं ला सका साथ


कि लाया जाना चाहिए था
चेहरे पर मोम से चिपकाये होठों को

लाया जाना चाहिए था
आँखों में चमकती
भोली सी रोशनी को बचाकर

मेरी देह में था कभी बुरुंश के फूल जैसा मांस
झूम उठता था हवा के संग

छूट गया है पथ में
और मेरी त्वचा थी
एक गुलदस्ता
मुरझा चुकी है अब

आह ! कुछ शेष नहीं, निरापद
कि रह गया है पीछे वैभव का वह शालीन महल 
कि आई हैं मेरे साथ
काटती सर्द हवाएं
कि आई है मेरे साथ
जलती हुई धूप
या कि गंधाता स्याह अँधेरा
और चुभती हुई थोड़ी रौशनी

सभी आह्लाद के क्षणों से दूर
खड़ा है महज अब भुतहा किला
नितांत अकेला अपनी अनजानी असंतुलित ज़मीन पर
जिसकी रक्षा में तैनात है
हृदय की कांपती लौ
और यौवन की छूटी मृगमरीचिकाएँ .










खेत

कभी न चल कर भी खेत
गतिमान हैं
शताब्दियों की लम्बी राह पर

शुभ्र बादलों के तोरण
झुके हैं खेतों पर

झरती हैं बूँदें झर-झर
नहलाते हुए
उजले करती हैं खेतों के बदन

नीले आकाश का मुखड़ा झुका हुआ उनपर
बोलता नि:शब्द
और कहीं दूर बहुत दूर से आती रोशनी मिलने के लिए

आती हुई हवाएं खेलती हैं
मिट्टी की गेंद से
लिखते हुए खेत पर
दिन, शाम, भोर और रातें

उभर आती हैं  हरी-हरी पंक्तियाँ

खेत हैं कि कर रहे हैं ठिठोली
पेड़ -पौधों से

और देखते ही रहते हैं आँखों की कोर से
जैसे प्रवाहमान नदी का प्रवाह हो
गतिमान न होकर भी.
निरंतरता का बहाव है खेतों के साथ
सरल, सरस, आनंद के कई रंग हैं खेतों के साथ 
सदैव लिए कंचन सद्भाव की ध्वजाएं
खेत अपने साथ

कभी नहीं बहके हैं ये
चौक, शहर, बाज़ार के रंगीन शोर
और उनके बीच जीते हुए
कभी नहीं बोले ऊँचे स्वर में किसी के खिलाफ .


अचंभित हूँ मैं !
फिर भी, बहुत दूर से आये हैं खेत
सदियों से पूरी कर रहे हैं अपनी दौड़


जीवन का नैसर्गिक मुखड़ा (अकृत्रिम चेहरा)
बहस की छाया से दूर
न पहने है उतावली की पोशाक
होते जा रहे हैं आधुनिक
उत्तर आधुनिक ये.


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“इस अनुवाद में मुकुल ने हर संभव सहायता दी. नेपाली कविताओं के अंग्रेजी तर्ज़ुमे उपलब्ध करवाए और जहाँ अर्थ अंग्रेजी में भी उतना करीब नहीं बैठ रहा था या मुकुल स्वयं संतुष्ट नहीं थे, वहाँ नेपाली शब्दों के हिंदी अर्थ लिखकर भेजे. इस तरह ये काम आसान हो गया . एक कविता खेत में उनके मित्र सुमन पुखरेल ने मदद की.”







अपर्णा मनोज : कविताएँ,कहानियाँ,अनुवाद