मेघ - दूत : मुकुल दाहाल















मुकुल दाहाल
28 मार्च ma=3/1969, नेपाल

Swansea विश्वविद्यालय से रचनात्मक लेखन में एम. ए.
Nosside International Poetry Prize से 2009 में सम्मानित
Pen Himalaya (2003 - 2009) कविता प्रधान ई-पत्रिका का संपादन
Seemateet Seemanta (Beyond the Last Frontier) शीर्षक से नेपाली में कविता संग्रह प्रकाशित
और इस पShree Bani पुरस्कार

सम्प्रति University of Glasgow, Scotlan,d UK. से रचनात्मक लेखन में Ph.D.
ई पता : mukulnp@hotmail.com


हम अपने पड़ोस को कितना जानते हैं. नेपाल के साहित्यिक समाज के विषय में हम अज्ञानता की हद तक हैं.
मुकुल दाहाल की कविताएँ आधुनिक नेपाल की सांस्कृतिक – राजनीतिक बदलाव की साक्षी हैं. इन कविताओं में परम्परा के टूटने का ध्वंस है, आधुनिकता के अलगाव की पीड़ा है, धीमे ही सही नए बनते नेपाल की आहट है. इन कविताओं में प्रकृति के नरम हाथ अपनी गर्माहट के साथ उपस्थित हैं. अर्से बाद हम नेपाल के किसी कवि से मुखातिब हो रहे हैं. स्वागत.

अपर्णा ने अनुवाद में जम कर मेहनत किया है. अपर्णा की रचनात्मकता का भी यह बसंत  काल है.
















चोरी

तब मैं खासा जवान था जब बनाया था मैंने अपना घर
एक छोटी -सी कुटी आह्लाद की
खड़ी थी मज़बूत घर के सामने जो घर था मेरे पिता का 
रोज़ गिरती थी उस ऊंचे मकान की छाया
आती थी मुझ तक
और रौंद देती थी मेरे छोटे वज़ूद को

रात मैं करता था छेद अपनी ही छत में
निकल पड़ता था चोरी से 
चाँद के उजास का कम्बल ओढ़े
पुकारता था बारिशों को भीग जाने के लिए बौछार में

नहीं जानता था मैं 
क्यों हो जाते थे पिता इस पर यूँ उदास 
छत के उन छिद्रों पर खिन्न 
बरबस क्यों रोक लेना चाहते थे बरसात 
क्यों दीवारें तान दीं थीं उन्होंने अपने जीवन के चारों ओर
जबकि मेरी झोंपड़ी की कोई हद न थी

वे कौनसे ख़याल थे उनके 
जिनसे चमका करते थे उनके बाल और कांपती थी उनकी मूंछ
फिर एक दिन यूँ हुआ
कि सौंप कर मुझे अपनी मूंछ और दाढ़ी 
वे चल दिए लड़खड़ाते कभी न लौटने के लिए अपने घर से
अपने चेहरे पर उगी उस पुरानी घास को 
रोज़ छीलता हूँ मैं
लेकिन फिर -फिर उग आती है वह 

मैं नहीं जानता 
कब मैं चुरा लिया गया था अपनी ही खुशियों के घर से 

हर आनेवाला साल मुझे धकेलता है 
पर मैं पलटकर देखता हूँ प्यार से 
अपनी वही झोंपड़ी .
वहीँ खड़ी है अब भी चुपचाप 
वहीँ, पिता के ऊँचे घर के बगल में

अब दोनों ही खाली हैं 
और करीब आ गए हैं अधिक एक-दूजे के 
पिता की बाँहें  हैं मेरे कन्धों से लिपटी 
और स्मृतियों की हरी दूब फ़ैल गई है ढांपते हुए गज़ों अपना अस्तित्व.




















खिड़की

किये कई यत्न कि बंद रख  सकूँ, पर खिड़की मेरे कमरे की नहीं होगी बंद 
लगता है कभी-कभी 
कि ये बंद भी रहे 
पर भर जाता हूँ आनंद से खुलती है  जब .
प्रत्येक क्षण हवा के साथ चले आते हैं स्मृतियों के झोंके 
और खुल जाती है खिड़की सदा खुली रहने के लिए .
जब भी करता हूँ इसे बंद, नरम हाथ घास के 
आते हैं नाचते हुए खेतों की हवा के साथ, खोलते हैं इसे आहिस्ता.

अगर करता हूँ  इसे अभी बंद 
चली आएगी कहीं से नदी किलोल करती 
और अपने बहते हाथों से खोल देगी खिड़कियाँ  बंद 
छोड़ देगी खुला रहने के लिए .

रेत के किनारों और तलछट से आते हैं 
भीगे और सूखे बिल्लौरी कंकड़ 
यहीं इसी खिड़की से भीतर आते  बिखर जाते हैं मेरे कमरे के फर्श पर 
तब छोड़कर रोज़मर्रा के काम औचक खेलता हूँ इनसे .

जब भी करूँगा इसे बंद 
चला आएगा खेत की कूबड़ पीठ पर तना आम का वही  पेड़ 
खोलेगा इसे 
तूफानी हवाएं झकझोर देंगी टहनियां  
और झड़ जायेंगे पत्ते अनायास कमरे में इधर-उधर .
इन पत्तों से आती है गंध मेरे बचपन की 
और बैठ जाता हूँ खेलने छोड़कर सभी काज

इसी खुली खिड़की से 
देखता हूँ झूलता क्षितिज चावल की चक्की पर 
वहाँ से सविराम आती हैं चक्की की आवाजें, गूंजती हुई 
ढोल और धमाल के साथ घुलती 
और करती हैं जिन्दा मेरी दादी की आवाज़ों को 
वे कपड़े जो घर के पीछे धोकर सुखाये थे उन्होंने 
रस्सी पर सरसरा रहे हैं हवा के साथ

अगर करता हूँ बंद 
तो खोल देते हैं इसे 
धूल के वे नन्हे हाथ जो उठते हैं  कभी 
घर लौटते मवेशियों के खुरों से 

कितना करता हूँ यत्न कि रह जाए ये बंद 
तब चला आता है हठात
समय का पड़ौसी गाँव से कोई 
और खोल देता है इसे .
क्या करूँ !
बहुत यत्न के बाद भी 
अकसर खुली रहती है मेरे घर की ये खिड़की .


आवाज़ों की महासभा

आवाज़ों के बीच 
सुमधुर  ,कर्कश  और तीखी 
आवाज़ों की इस महासभा में 
जो आती हैं बाहर, भीमकाय सीमेंट की दीवारों को तोड़ 
जानता हूँ मैं 
कहीं बीच इनके, मेरी भी आवाज़ उपस्थित है .

पहाड़ियों से गिरते झरने कुछ कह रहे हैं 
आवाजें सडकों पर चलते वेगवान वाहनों की 
दे रही हैं धक्का एक दूसरे को 
आवाज़ आकाश में ऊँचे उड़ते हवाईजहाज़ की 
कर रही है अहम् अपनी ऊंचाई का 

 
मशीनें कारखानों की बड़बड़ा रही हैं   .

कलरव करती चिड़ियों की धुन 
आवाजें पशुओं की 
झनझनाती रात में झींगुरों की आवाजें 
रहती हैं उपस्थित 
जैसे उपस्थित रहती हैं यौवन से भरी औरतें तमाम 

महासभा में 
उपस्थित हैं  सूक्ष्मतर आवाजें संवेदी 
जो उपजती है विश्राम की गति के सबसे छोटे खंड से

अपने में तुष्ट पेटभर आवाजें 
भूखी, सिकुड़ी आवाजें 
और कालातीत आवाजें कला की 
बैठ गई हैं अपनी -अपनी जगह .

आवाज़ों की महासभा में 
महाशक्तियों की आवाज़ उठ रही है समुद्र में ज्वार की तरह 

मैं जानता हूँ यहीं इनके बीच कहीं शामिल है मेरी भी आवाज़ 
लेकिन मैं कर रहा हूँ कोशिश पहचानने की 

कौनसी है मेरी आवाज़ ? 
आखिर कौनसी है मेरी अपनी आवाज़ ?

पीछे छूटे हुए

कि लाया जाना चाहिए था

अपने संग पथ पर

दिन का श्फ्फ़ाक उजाला 
पकड़े हुए हाथों में हाथ
छूट गया था कहीं पीछे आकाश में


कि लाया जाना चाहिए था
वह स्वप्न जो खिलता था नींद में
धीरे से रखकर आँखों में
जो यहाँ तक नहीं ला सका साथ


कि लाया जाना चाहिए था
चेहरे पर मोम से चिपकाये होठों को

लाया जाना चाहिए था
आँखों में चमकती
भोली सी रोशनी को बचाकर

मेरी देह में था कभी बुरुंश के फूल जैसा मांस
झूम उठता था हवा के संग

छूट गया है पथ में
और मेरी त्वचा थी
एक गुलदस्ता
मुरझा चुकी है अब

आह ! कुछ शेष नहीं, निरापद
कि रह गया है पीछे वैभव का वह शालीन महल 
कि आई हैं मेरे साथ
काटती सर्द हवाएं
कि आई है मेरे साथ
जलती हुई धूप
या कि गंधाता स्याह अँधेरा
और चुभती हुई थोड़ी रौशनी

सभी आह्लाद के क्षणों से दूर
खड़ा है महज अब भुतहा किला
नितांत अकेला अपनी अनजानी असंतुलित ज़मीन पर
जिसकी रक्षा में तैनात है
हृदय की कांपती लौ
और यौवन की छूटी मृगमरीचिकाएँ .










खेत

कभी न चल कर भी खेत
गतिमान हैं
शताब्दियों की लम्बी राह पर

शुभ्र बादलों के तोरण
झुके हैं खेतों पर

झरती हैं बूँदें झर-झर
नहलाते हुए
उजले करती हैं खेतों के बदन

नीले आकाश का मुखड़ा झुका हुआ उनपर
बोलता नि:शब्द
और कहीं दूर बहुत दूर से आती रोशनी मिलने के लिए

आती हुई हवाएं खेलती हैं
मिट्टी की गेंद से
लिखते हुए खेत पर
दिन, शाम, भोर और रातें

उभर आती हैं  हरी-हरी पंक्तियाँ

खेत हैं कि कर रहे हैं ठिठोली
पेड़ -पौधों से

और देखते ही रहते हैं आँखों की कोर से
जैसे प्रवाहमान नदी का प्रवाह हो
गतिमान न होकर भी.
निरंतरता का बहाव है खेतों के साथ
सरल, सरस, आनंद के कई रंग हैं खेतों के साथ 
सदैव लिए कंचन सद्भाव की ध्वजाएं
खेत अपने साथ

कभी नहीं बहके हैं ये
चौक, शहर, बाज़ार के रंगीन शोर
और उनके बीच जीते हुए
कभी नहीं बोले ऊँचे स्वर में किसी के खिलाफ .


अचंभित हूँ मैं !
फिर भी, बहुत दूर से आये हैं खेत
सदियों से पूरी कर रहे हैं अपनी दौड़


जीवन का नैसर्गिक मुखड़ा (अकृत्रिम चेहरा)
बहस की छाया से दूर
न पहने है उतावली की पोशाक
होते जा रहे हैं आधुनिक
उत्तर आधुनिक ये.


:::::


“इस अनुवाद में मुकुल ने हर संभव सहायता दी. नेपाली कविताओं के अंग्रेजी तर्ज़ुमे उपलब्ध करवाए और जहाँ अर्थ अंग्रेजी में भी उतना करीब नहीं बैठ रहा था या मुकुल स्वयं संतुष्ट नहीं थे, वहाँ नेपाली शब्दों के हिंदी अर्थ लिखकर भेजे. इस तरह ये काम आसान हो गया . एक कविता खेत में उनके मित्र सुमन पुखरेल ने मदद की.”







अपर्णा मनोज : कविताएँ,कहानियाँ,अनुवाद


19/Post a Comment/Comments

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  1. क्या बात है अपर्णा ...लाज़वाब अनुवाद ...आपकी तरह खूबसूरत :)
    लाया जाना चाहिए था
    आँखों में चमकती
    भोली सी रोशनी को बचाकर
    धन्यवाद अरुण जी

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  2. अपने चेहरे पर उगी उस पुरानी घास को
    रोज़ छीलता हूँ मैं
    लेकिन फिर -फिर उग आती है वह ..yahi prem hai
    कवितायेँ सुन्दर हैं.. और अनुवाद भी .. अपर्णा जी का शिल्प और भाषा बहुत कसी हुई है.. लेखक व अनुवादक और प्रस्तुतकर्ता बधाई के पात्र हैं..

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  3. नेपाली कविता का हिंदी अनुवाद ..अरुणदेव जी पढवाने के लिए साधुबाद,अनुबाद कसा हुआ है ,लगता नहीं की अनुबाद है ,कवितायेँ जानी पहचानी सी अनुभूति देंती हैं .अपनी लगती हैं .मस्तिस्क से मन तक फिर अनुभूति तक को शुकून देती हैं ,तीनो को बधाई

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  4. मैं समालोचन को बधाई देना चाहूंगी, इस सराहनीय कदम के लिए....ये सच है नेपाल की साहित्यिक विरासत से हम लोग सर्वथा अनभिज्ञ है, इसने करीबी पड़ोस का साहित्य (जो कभी भी विदेश नहीं बल्कि अपने घर सा लगता है) हमसे यूँ अछूता है, पढ़कर ही जान पाई....मुकुल जी की कविताओं में बसा देसीपन, सुंदर बिम्ब, प्रकृति की बिखरी सुन्दरता अतुलनीय है.....मैंने मूल कवितायेँ तो नहीं पढ़ी पर अपर्णा दी के सुंदर और सहज अनुवाद से कहीं भी नहीं लगा कि कविता अनुदित है! मुझे "चोरी" कविता में पिता-पुत्र के संबंधों को बुनती पंक्तियाँ बहुत सुंदर लगीं, और "पीछे छूटे हुए " में नज़र आई एक कोशिश अपने अतीत को सहेजने की, जो अनचाहे ही पीछे छूटता जाता है.......वैसे सभी कवितायेँ अच्छी हैं.......सुंदर और उत्कृष्ट कविताओं के लिए मुकुल दहाल जी को बधाई......इतने सटीक और सहज संप्रेषित अनुवाद के लिए अपर्णा दी को बधाई और अरुण जी को धन्यवाद्........

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  5. चोरी - मैं नहीं जानता....कब मैं चुरा लिया गया था अपनी ही खुशियों के घर से ;
    आवाज़ों की महासभा - अपने में तुष्ट पेटभर आवाजें......भूखी, सिकुड़ी आवाजें..... और कालातीत आवाजें कला की.... बैठ गई हैं अपनी -अपनी जगह .
    पीछे छूटे हुए ; खेत; खिड़की- इसी खुली खिड़की से.......देखता हूँ झूलता क्षितिज चावल की चक्की पर ....वहाँ से सविराम आती हैं चक्की की आवाजें, गूंजती हुई ......ढोल और धमाल के साथ घुलती ........
    और अन्य कवितायें जिज्ञासा उत्पन्न करती हैं... जिज्ञासा और ज़्यादा पढने की, जानने की...

    जिज्ञासा को समाधान तक पहुंचाना अत्यंत आवश्यक होता है.. यदि अपर्णाजी इन कविताओं का अनुवाद ना करती और अरुणजी इन्हें प्रस्तुत ना करते तो...मुकुल दाहाल एक नाम..जो शायद कभी नहीं सुन पाते.. ना कभी पढ़ पाते उनकी सरल और मनमोहक कविताओं को, जोकि सीधे सीधे बात करती प्रतीत होती हैं.. धन्यवाद!

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  6. अब दोनों ही खाली हैं
    और करीब आ गए हैं अधिक एक-दूजे के
    पिता की बाँहें हैं मेरे कन्धों से लिपटी
    और स्मृतियों की हरी दूब फ़ैल गई है ढांपते हुए गज़ों अपना अस्तित्व.....सेंध लगा रहे जीवन के छोटे बड़े पल पर फिर कही दृढ़ संकल्प का मन पर विधि का विधान इंसानी जीवन के सोचे नहीं बुन सकता है ...लेखनी विधाता की ...बहुत ही ..मार्मिक सजोया है ....इस तरह के शब्दों का विवाचन हम देखने का प्रयत्न कर सकतें है ??????//पर जीवन ये ही है कभी कभी जीवन आपने शावत का सामना करने की हिम्मत देता /नहीं देता है ....बहुत ही पशोपेश की शाब्दिक पक्तियां, पर कटु सत्य ...बहुत शुक्रिया याहं तक लाने का ....!!!!!!!निर्मल पानेरी

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  7. सेतु का काम करते हैं अनुवाद... जुड़ाव की इस प्रक्रिया की कड़ी प्रस्तुत करने के लिए समालोचन को बधाई!
    अपर्णा दी को हार्दिक शुभकामनाएं!आपकी रचनात्मकता और कई नए आयाम पाए!!!

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  8. मुझे लगता है ये कविताएं भी इस अनुवाद से समृद्ध हुई होंगी। अपर्णा जी ने अनुवाद का अनुवाद किया है। इसलिए मूल लेखन की दोगुनी चुनौती झेलती उनकी कलम कितनी सधी रही, भाषिक संवेदना के धरातल अपर्णा जी का यह हस्तलाघव बरबस मोहित करने वाला है। मूल पाठ से दो फर्लांग की दूरी का कहीं कोई अंतराल इस अनुवाद में कोई नहीं महसूस कर सकता। इस तरह का अनुवाद कई बार मूल पाठ की एक समानार्थक सर्जना बन जाती है या उसके भी आगे की कोई नई कृति में ढल जाती है। यह एक प्रकार का “पैरलेलिज्म” है जो अकसर दो भाषाओं के अंतरंग इंटरप्ले से उपजने लगता है। यह दो चुंबकों के बीच का एक अज़ीब खेल होता है जो शायद मुझसे ज्यादा आपको अपर्णा जी बता सकती हैं।
    वाकई अगर कविता में एक ताजादम है तो अपर्णा जी के पास अनुवाद का शुभ्र वैभव।

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  9. आभार ! मुकुल , अरुण और सुमन जी का .. आप सभी की सहायता से दो देशों के बीच ये कार्य सफलता से हो सका . ये अनुवाद का नितान्त नया अनुभव रहा . कवि के साथ सीधा संपर्क अनुवाद को सहज बना सका . अनुवाद का इससे अच्छा और कोई तरीका नहीं हो सकता .. आप यहाँ कवि के मन और मस्तिष्क दोनों से जुड़े होते हैं .. हर नुआंस कवि के अनुरूप सामने आता है .. कवि के मन की परतो...ं से ये सीधा साक्षात्कार था .. मुकुल का ख़ास धन्यवाद .. जब तक पूरा संतोष नहीं हुआ , मुकुल भी बराबर इस अनुवाद में लगे रहे .. मुकुल की मेहनत और प्रतिभा दोनों का ही अभूतपूर्व संगम हुआ है ..आशा है आप सभी मुकुल का भारत में स्वागत करेंगे और उन्हें खूब पसंद किया जाएगा ..
    मुकुल और अरुण को बधाई !

    मेरा अनुरोध अपने उन अहिन्दी भाषी कवियों से है कि वे अनुवादकों के साथ इसी तरह जुड़ें कि भारतीय भाषाओँ का साहित्य कोने-कोने तक पहुँच सके . शुभ दिन

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  10. Mukul Dahal2/12/11, 4:14 pm

    Many many thanks Aparna for your interest in my poetry, hard work, patience and good wishes. It's because of you, I have been honoured to be published in India. Many thanks to Arun Dev for providing space in such an esteemed e-journal.

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  11. Standing Ovation to Aprna Di.
    आती हुई हवाएं खेलती हैं
    मिट्टी की गेंद से
    लिखते हुए खेत पर
    दिन, शाम, भोर और रातें

    उभर आती हैं हरी-हरी पंक्तियाँ.

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  12. अनाम2/12/11, 11:01 pm

    Great to read the Hinidi translations of Mukul Dahal's poems which have been dear to my heart. Thanks Arpana Manoji and Arun Devji for your effort. Nabin chhetri

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  13. आप ने बहुत मेहनत की है . कविता का अनुवाद अनिवार्य रूप से *सहलेखन* का मामला बन जाता है. अन्यथा कविता का अनुवाद एक मिथ ही है . लगभग असम्भव. मुझे नेपाल की सभी भाषाएं अच्छी लगती हैं . तमंग, नेवारी, शेरपा, लामा और खास कर के खश ....... ये भाषाएं जितनी मीठी हैं, उतनी ही ताक़त्वर. और समृद्ध . ज़रा सा ध्यान देंगे तो हिन्दी वाले को यह भाषा अपनी ही लगेगी .यह भाषा मैने मज़दूर भाईयों से यह सीखी है. इन के गीत तो बहुत ही स्तरीय हैं . मुझे नाम याद नही , लेकिन अनगिनत नेपाली कवियों को पढ़ा है. मुकुल की भाषा यद्यपि कुछ ज़्यादा ही सुसंस्कृत है, फिर भी मीठी है

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  14. एक प्रशंसनीय कार्य !

    मुकुलजी और अपर्णाजी दोनो को बधाईँयाँ ।

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  15. अनाम3/12/11, 4:42 pm

    अगर मेरा हिन्दी मे कोइ त्रुटी हो तो माफी चाहता हुँ ।

    मेरी कविताओं पढकर हार्दिक सराहना के लिए सभी आदरणीय पाठकों को धन्यवाद.

    अपर्णा और अरुण (अरूणजी को इस विशिष्ट ब्लग प्रकाशन पर मुझे लाने के लिए) के लिए बहुत बहुत धन्यवाद. अपर्णा ने वाकइ बहुत मेहनत की है. कविताओं का अनुवाद प्रयासों और धैर्य का बहुत मांग करता है. अनुवाद के लिए भाषा की गहरी समझ भी आवश्यक है. मेरा मित्र सुमन पोखरेल जिसने एक कविताकी अनुवाद मे सहायता कि उनको भी हार्दिक आभार ।

    मेरा करीबी दोस्त, कहानी लेखक और अनुवादक कुमुद अधिकारी कई वर्षों से हिंदी में अनुवाद का काम कर रहा है. मुझे आशा है कि वह कुछ और समकालीन नेपाली कवियों के साथ समालोचन मे योगदान करेगा । इस तरह नेपाल और भारत के कवि समुदायों के बीच समालोचन के जरिए एक सुंदर संचार शुरू होगा. मुकुल दाहाल

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  16. कभी नहीं बहके हैं ये
    चौक, शहर, बाज़ार के रंगीन शोर
    और उनके बीच जीते हुए
    कभी नहीं बोले ऊँचे स्वर में किसी के खिलाफ .


    अचंभित हूँ मैं !
    फिर भी, बहुत दूर से आये हैं खेत
    सदियों से पूरी कर रहे हैं अपनी दौड़
    मुकुल दाहाल की कवितायों ने प्रभावित किया ........ लेकिन जैसा आपने लिखा की ये कवितायेँ आधुनिक नेपाल की सांस्कृतिक – राजनीतिक बदलाव की साक्षी हैं............... धीमे ही सही नए बनते नेपाल की आहट है......... मैं इन कवितायों में ऐसी किसी भी बात को पकड़ने में नाकाम रहा ......हो सकता है की ये मेरे पाठक की सीमा हो .......... मगर इन कवितायों में नेपाल का समय दर्ज नहीं हैं ........और अगर ये न बताया जाये की मुकुल दाहाल नेपाल से हैं .......तो कवितायों में ऐसा कोई संकेत मौजूद नहीं .......जो नेपाल के सांस्कृतिक – राजनीतिक बदलाव को चिन्हीत करता हो ........बावजूद इसके ......... कवितायेँ सुंदर हैं और अनुवाद शानदार ......... अरुण जी और अपर्णा जी ..... आपका आभार |

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  17. Aparna Bhagwat7/12/11, 8:24 pm

    Good translation Aparna ! And indeed a fabulous effort to integrate the literature of our neighboring country with that of ours. Loved the poem "Chori" ,for we really do not understand how close we are to our parents until we reach their age and find them not around us. "Peechhe chhute hue" also appealed to me.

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  18. अनाम15/12/11, 5:05 pm

    मुकुल दाहाल की इन कविताअों को पढ़ना एक अाल्हादकारी अनुभव था। अनुवाद भी अच्छे मालूम होते हैं। इन्हें देखकर समकालीन नेपाली कविता के बारे में जिज्ञासा अौर उत्कंठा पैदा होती हैं। प्स्तुति के लिए बधाई।
    असद ज़ैदी

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  19. अनाम20/3/14, 9:35 pm

    बधाइ हो मुकुलजी,
    आप ने इन कविताओं से नेपालकी युवा कविओं का तेवर कैसा है, उसे दिखा दिए है । आपको बहुत बहुत बधाइ .
    पहाडी ठीटो

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