रीझि कर एक कहा प्रसंग : वीरेन डंगवाल

Posted by arun dev on सितंबर 04, 2011


"कविता एक प्रतिसंसार रचती है. जिसमें कई क्षतिपूर्तियां हैं और जो अपने समय का संधान भी करती है. उसमें भविष्य का स्वप्न निहित होता है. अपने समय को समझने की और सम्बोधित होने की एक कोशिश तो कविता में जरूर होनी चाहिए. मेरा मानना है कि कविता की कोई शिनाख्त भी होनी चाहिए.  पता तो चले - कहाँ की कविता है. उसमें परिकल्पित सार्वभौमिकता नहीं होनी चाहिए जो आजकल दिखाई दे रही है, ऐसा मेरा मानना है. उसमें एक स्थानिकता होनी चाहिए. मैं इसी स्थानिकता का अदना कवि हूँ.

विता में कहानी कहने की पुरानी परम्परा है. कटरी के मायने है नदियों के खादर का रेतीला क्षेत्र. उत्तर भारत में यह रामगंगा से शुरू होता हुआ बंदायू, एटा, इटावा तक फैला है. इसकी ग्रामीण व्यवस्था के भीतर अपराध और जरायम का एक समांतर संसार है.

त्तर भारतीय समाज में जो स्थानिक और एथनिक जीवन है, मैं उसकी कविता लिखना चाह रहा था. एक तरह से उसका  बयान है इस कविता में. यह कविता लोक कविता जैसा कुछ नहीं है. इसमें लोक कविता वाली रुमानियत नहीं है. स्वप्न, यथार्थ और मिथक का नए सिरे से एक अनायास मिलाव है यहाँ, एक दिलचस्प मोजैक. इसके भीतर एक नमी से भरी मानवीय उपस्थिति है. मुझे यह कविता बहुत पसन्द है. इसे लिख कर मुझे बहुत तसल्ली हुई. इसमें कहीं प्रेमचंद भी आ गए हैं, तरह तरह से आए हैं. इस कविता में उनका आना मुझे अच्छा लगा है. ."

... वीरेन डंगवाल




लम्बी कविता   
कटरी की रुकुमिनी और उसकी माता की खंडित गद्यकथा               
(क्षुधार राज्ये पृथिबी गोद्योमोय)


मैं थक गया हूं
फुसफुसाता है भोर का तारा
 
मैं थक गया हूं चमकते-चमकते इस फीके पड़ते
 
आकाश के अकेलेपन में.
 
गंगा के खुश्‍क कछार में उड़ती है रेत
 
गहरे काही रंग वाले चिकने तरबूजों की लदनी ढोकर
 
शहर की तरफ चलते चले जाते हैं हुचकते हुए ऊंट
 
अपनी घण्टियां बजाते प्रात की सुशीतल हवा में
 

जेठ विलाप के रतजगों का महीना है
 
घण्टियों के लिए गांव के लोगों का प्रेम
 
बड़ा विस्‍मित करने वाला है
 
और घुंघरूओं के लिए भी.
 

रंगीन डोर से बंधी घंटियां
 
बैलों-गायों-बकरियों के गले में
 
और कोई-कोई बच्‍चा तो कई बार
 
बत्‍तख की लम्‍बी गर्दन को भी
 
इकलौते निर्भार घुंघरू से सजा देता है
 

यह दरअसल उनका प्रेम है
 
उनकी आत्‍मा का संगीत
 
जो इन घण्टियों में बजता है
 

यह जानकारी केवल मर्मज्ञों के लिए.

साधारण जन तो इसे जानते ही हैं.
 


:::

दरअसल मैंने तो पकड़ा ही एक अलग रास्‍ता
 
वह छोटा नहीं था न आसान
 
फ़क़त फ़ितूर जैसा एक पक्‍का यक़ीन
 
एक अलग रास्‍ता पकड़ा मैंने.

जब मैं उतरा गंगा की बीहड़ कटरी में
 
तो पालेज में हमेशा की तरह उगा रहे थे
 
कश्‍यप-धीमर-निषाद-मल्‍लाह
 
तरबूज और खरबूजे
 
खीरे-ककड़ी-लौकी-तुरई और टिण्‍डे.
 

'खटक-धड़-धड़' की लचकदार आवाज के साथ
 
पुल पार करती
 
रेलगाड़ी की खिड़की से आपने भी देखा होगा कई बार
 
क्षीण धारा की बगल में
 
सफेद बालू के चकत्‍तेदार विस्‍तार में फैला
 
यह नरम-हरा-कच्‍चा संसार.
 

शामों को
 
मढ़ैया की छत की फूंस से उठता धुआं
 
और और भी छोटे-छोटे दीखते नंगधड़ंग श्‍यामल
 
बच्‍चे-
कितनी हूक उठाता
 
और सम्‍मोहक लगता है
 
दूर देश जाते यात्री को यह दृश्‍य.
 

ऐसी ही एक मढ़ैया में रहती है
 
चौदह पार की रूकुमिनी
 
अपनी विधवा मां के साथ.
 

बड़ा भाई जेल में है
 
एक पीपा कच्‍ची खेंचने के जुर्म में
 
छोटे की सड़ी हुई लाश दो बरस पहले
 
कटरी की उस घनी, ब्‍लेड-सी धारदार
 
पतेल घास के बीच मिली थी
 
जिसमें गुजरते हुए ढोरों की भी टांगें चिर जाती है.
 

लड़के का अपहरण कर लिया था
 
गंगा पार के कलुआ गिरोह ने
 
दस हजार की फ़िरौती के लिए
 
जिसे अदा नहीं किया जा सका
.

मिन्‍नत-चिरौरी सब बेकार गई
 

अब मां भी बालू में लाहन दाब कर
 
कच्‍ची खींचने की उस्‍ताद हो चुकी है
 
कटरी के और भी तमाम मढ़ैयावासियों की तरह.
 


:::

कटरी के छोर पर बसे
 
बभिया नामक जिस गांव की परिधि में आती है
 
रूकुमिनी की मढ़ैया
 
सोमवती, पत्‍नी रामखिलौना
 
उसकी सद्यःनिर्वाचित ग्रामप्रधान है.
'प्रधानपति' -यह नया शब्‍द है
 
हमारे परिपक्‍व हो चले प्रजातांत्रि‍क शब्‍दकोश का.
 

रामखिलौना ने
 
बन्‍दूक और बिरादरी के बूते पर
 
बभिया में पता नहीं कब से दनदना रही
 
ठाकुरों की सिट्टी-पिट्टी को गुम किया है.
 
कच्‍ची के कुटीर उद्योग को संगठित करके
 
उसने बिरादरी के फटेहाल उद्यमियों को
 
जो लाभ पहुंचाए हैं
 
उनकी भी घर-घर प्रशंसा होती है.
 
इस सब से उसका मान काफी बढ़ा है.
 
रूकुमिनी की मां को वह चाची कहता है
 
हरे खीरे जैसी बढ़ती बेटी को भरपूर ताककर भी
 
जिस हया से वह अपनी निगाह फेर लेता है
 
उससे उसकी सच्‍चरित्रता पर
 
मां का कृतज्ञ विश्‍वास और भी दृढ़ हो जाता है.
 

रूकुमिनी ठहरी सिर्फ चौदह पार की
 
'भाई' कहकर रामखिलौना से लिपट जाने का
 
जी होता है उसका
 
पर फिर पता नहीं क्‍या सोचकर ठिठक जाती है.

:::

मैंने रूकुमिनी की आवाज सुनी है
 
जो अपनी मां को पुकारती बच्‍चों जैसी कभी
 
कभी उस युवा तोते जैसी
 
जो पिंजरे के भीतर भी
 
जोश के साथ सुबह का स्‍वागत करता है
 

कभी सिर्फ एक अस्‍फुट क्षीण कराह.
 

मैने देखा है कई बार उसके द्वार
 
अधेड़ थानाध्‍यक्ष को
 
इलाके के उस स्‍वनामधन्‍य युवा
 
स्‍मैक तस्‍कर वकील के साथ
 
जिसकी जीप पर इच्‍छानुसार 'विधायक प्रतिनिधि'
 
अथवा 'प्रेस' की तख्‍ती लगी रही है.
 

यही रसूख होगा या बूढ़ी मां की गालियों और कोसनों का धाराप्रवाह
 
जिसकी वजह से
 
कटरी का लफंगा स्‍मैक नशेड़ी समुदाय
 
इस मढ़ैया को दूर से ही ताका करता है
 
भय और हसरत से.
 

एवम् प्रकार
 
रूकुमिनी समझ चुकी है बिना जाने
 
अपने समाज के कई जटिल और वीभत्‍स रहस्‍य
 
अपने निकट भविष्‍य में ही चीथड़ा होने वाले
 
जीवन और शरीर के माध्‍यम से
 
गो कि उसे शब्‍द 'समाज' का मानी भी पता नहीं.
 

सोचो तो,
 
सड़ते हुए, जल में मलाई-सा उतराने को उद्यत
 
काई की हरी-सुनहरी परत सरीखा ये भविष्‍य भी
 
क्‍या तमाशा है
 

और स्‍त्री का शरीर !
तुम जानते नहीं, पर जब-जब तुम उसे छूते हो
 
चाहे किसी भाव से
 
तब उस में से ले जाते हो तुम
उसकी आत्‍मा का कोई अंश
 
जिसके खालीपन में पटकती है वह अपना शीश.
 

यह इस सड़ते हुए जल की बात है
 
जिसकी बगल से गुजरता है मेरा अलग रास्ता.


:::

रूकुमिनी का हाल जो हो
 
इस उमर में भी उसकी मां की सपने देखने की आदत
 
नहीं गई
 
कभी उसे दीखता है
 
लाठी से गंगा के छिछले पेटे को ठेलता
 
नाव पर शाम को घर लौटता
 
चौदह बरस पहले मरा अपना आदमी नरेसा
 
जिसकी बांहें जैसे लोहे की थी,
 
कभी पतेल लांघ कर भागता चला आता बेटा दीखता है
 
भूख-भूख चिल्‍लाता
 
उसकी जगह-जगह कटी किशोर
 
खाल से रक्‍त बह रहा है
 

कभी दीखती है दरवाजे पर लगी एक बरात
 
और आलता लगी रूकुमिनी की एडियां.

सपने देखने की बूढ़ी की आदत नहीं गई.
 

उसकी तमन्‍ना ही रह गई:
एक गाय पाले, उसकी सेवा करे, उसका दूध पिए
 
और बेटी को पिलाए
 
सेवा उसे बेटी की करनी पड़ती है.
 

काष्‍ठ के अधिष्‍ठान खोजती वह माता
 
हर समय कटरी के धारदार घास भरे
 
खुश्‍क रेतीले जंगल में
 
उसका दिल कैसे उपले की तरह सुलगता रहता है
 
इसे वही जानती है
 
या फिर वे अदेखे सुदूर भले लोग
 
जिन्‍हें वह जानती नहीं
 
मगर जिनकी आंखों में अब भी उमड़ते हैं नम बादल
 
हृदयस्‍थ सूर्य के ताप से प्रेरित.
 
उन्‍हें तो रात भी विनम्र होकर रोशनी दिखाती है,
 
पिटा हुआ वाक्‍य लगे फिर भी, फिर भी
 
मनुष्‍यता उन्‍हीं की प्रतीक्षा का खामोश गीत गाती है
 
मुंह अंधेरे जांता पीसते हुए.
 

इसीलिए एक अलग रास्‍ता पकड़ा मैंने
 
फ़ितूर सरीखा एक पक्‍का यकीन
 
इसीलिए भोर का थका हुआ तारा
 
दिगंतव्‍यापी प्रकाश में डूब जाने को बेताब.
 

_______ 
(बहुत ही कम आयु में दिवंगत हो गए बांग्ला कवि सुकांत भट्टाचार्य की एक प्रसिद्ध कविता का शीर्षक : ‘क्षुधार राज्ये पृथिबी गोद्योमोय’अर्थात भूख के राज्य में धरती गद्यमय है)
______

वीरेन डंगवाल (५ अगस्त,१९४७, कीर्तिनगर, टिहरी गढवाल)
इसी दुनिया में (१९९१), दुष्चक्र में स्रष्टा (२००२) , स्याही ताल (२००९)
पाब्लो नेरूदा, बर्टोल्ट ब्रेष्ट, वास्को पोपा, मिरास्लाव होलुब, तदेऊष रूज़ेविच आदि की कविताओं का अनुवाद
रघुवीर सहाय  स्मृति पुरस्कार (१९९२), श्रीकांत वर्मा स्मृति पुरस्कार (१९९३)
शमशेर सम्मान (२००२),साहित्य अकादमी पुरस्कार (२००४)
ई पता : virendangwal@gmail.com