रीझि कर एक कहा प्रसंग : वीरेन डंगवाल


"कविता एक प्रतिसंसार रचती है. जिसमें कई क्षतिपूर्तियां हैं और जो अपने समय का संधान भी करती है. उसमें भविष्य का स्वप्न निहित होता है. अपने समय को समझने की और सम्बोधित होने की एक कोशिश तो कविता में जरूर होनी चाहिए. मेरा मानना है कि कविता की कोई शिनाख्त भी होनी चाहिए.  पता तो चले - कहाँ की कविता है. उसमें परिकल्पित सार्वभौमिकता नहीं होनी चाहिए जो आजकल दिखाई दे रही है, ऐसा मेरा मानना है. उसमें एक स्थानिकता होनी चाहिए. मैं इसी स्थानिकता का अदना कवि हूँ.

विता में कहानी कहने की पुरानी परम्परा है. कटरी के मायने है नदियों के खादर का रेतीला क्षेत्र. उत्तर भारत में यह रामगंगा से शुरू होता हुआ बंदायू, एटा, इटावा तक फैला है. इसकी ग्रामीण व्यवस्था के भीतर अपराध और जरायम का एक समांतर संसार है.

त्तर भारतीय समाज में जो स्थानिक और एथनिक जीवन है, मैं उसकी कविता लिखना चाह रहा था. एक तरह से उसका  बयान है इस कविता में. यह कविता लोक कविता जैसा कुछ नहीं है. इसमें लोक कविता वाली रुमानियत नहीं है. स्वप्न, यथार्थ और मिथक का नए सिरे से एक अनायास मिलाव है यहाँ, एक दिलचस्प मोजैक. इसके भीतर एक नमी से भरी मानवीय उपस्थिति है. मुझे यह कविता बहुत पसन्द है. इसे लिख कर मुझे बहुत तसल्ली हुई. इसमें कहीं प्रेमचंद भी आ गए हैं, तरह तरह से आए हैं. इस कविता में उनका आना मुझे अच्छा लगा है. ."

... वीरेन डंगवाल




लम्बी कविता   
कटरी की रुकुमिनी और उसकी माता की खंडित गद्यकथा               
(क्षुधार राज्ये पृथिबी गोद्योमोय)


मैं थक गया हूं
फुसफुसाता है भोर का तारा
 
मैं थक गया हूं चमकते-चमकते इस फीके पड़ते
 
आकाश के अकेलेपन में.
 
गंगा के खुश्‍क कछार में उड़ती है रेत
 
गहरे काही रंग वाले चिकने तरबूजों की लदनी ढोकर
 
शहर की तरफ चलते चले जाते हैं हुचकते हुए ऊंट
 
अपनी घण्टियां बजाते प्रात की सुशीतल हवा में
 

जेठ विलाप के रतजगों का महीना है
 
घण्टियों के लिए गांव के लोगों का प्रेम
 
बड़ा विस्‍मित करने वाला है
 
और घुंघरूओं के लिए भी.
 

रंगीन डोर से बंधी घंटियां
 
बैलों-गायों-बकरियों के गले में
 
और कोई-कोई बच्‍चा तो कई बार
 
बत्‍तख की लम्‍बी गर्दन को भी
 
इकलौते निर्भार घुंघरू से सजा देता है
 

यह दरअसल उनका प्रेम है
 
उनकी आत्‍मा का संगीत
 
जो इन घण्टियों में बजता है
 

यह जानकारी केवल मर्मज्ञों के लिए.

साधारण जन तो इसे जानते ही हैं.
 


:::

दरअसल मैंने तो पकड़ा ही एक अलग रास्‍ता
 
वह छोटा नहीं था न आसान
 
फ़क़त फ़ितूर जैसा एक पक्‍का यक़ीन
 
एक अलग रास्‍ता पकड़ा मैंने.

जब मैं उतरा गंगा की बीहड़ कटरी में
 
तो पालेज में हमेशा की तरह उगा रहे थे
 
कश्‍यप-धीमर-निषाद-मल्‍लाह
 
तरबूज और खरबूजे
 
खीरे-ककड़ी-लौकी-तुरई और टिण्‍डे.
 

'खटक-धड़-धड़' की लचकदार आवाज के साथ
 
पुल पार करती
 
रेलगाड़ी की खिड़की से आपने भी देखा होगा कई बार
 
क्षीण धारा की बगल में
 
सफेद बालू के चकत्‍तेदार विस्‍तार में फैला
 
यह नरम-हरा-कच्‍चा संसार.
 

शामों को
 
मढ़ैया की छत की फूंस से उठता धुआं
 
और और भी छोटे-छोटे दीखते नंगधड़ंग श्‍यामल
 
बच्‍चे-
कितनी हूक उठाता
 
और सम्‍मोहक लगता है
 
दूर देश जाते यात्री को यह दृश्‍य.
 

ऐसी ही एक मढ़ैया में रहती है
 
चौदह पार की रूकुमिनी
 
अपनी विधवा मां के साथ.
 

बड़ा भाई जेल में है
 
एक पीपा कच्‍ची खेंचने के जुर्म में
 
छोटे की सड़ी हुई लाश दो बरस पहले
 
कटरी की उस घनी, ब्‍लेड-सी धारदार
 
पतेल घास के बीच मिली थी
 
जिसमें गुजरते हुए ढोरों की भी टांगें चिर जाती है.
 

लड़के का अपहरण कर लिया था
 
गंगा पार के कलुआ गिरोह ने
 
दस हजार की फ़िरौती के लिए
 
जिसे अदा नहीं किया जा सका
.

मिन्‍नत-चिरौरी सब बेकार गई
 

अब मां भी बालू में लाहन दाब कर
 
कच्‍ची खींचने की उस्‍ताद हो चुकी है
 
कटरी के और भी तमाम मढ़ैयावासियों की तरह.
 


:::

कटरी के छोर पर बसे
 
बभिया नामक जिस गांव की परिधि में आती है
 
रूकुमिनी की मढ़ैया
 
सोमवती, पत्‍नी रामखिलौना
 
उसकी सद्यःनिर्वाचित ग्रामप्रधान है.
'प्रधानपति' -यह नया शब्‍द है
 
हमारे परिपक्‍व हो चले प्रजातांत्रि‍क शब्‍दकोश का.
 

रामखिलौना ने
 
बन्‍दूक और बिरादरी के बूते पर
 
बभिया में पता नहीं कब से दनदना रही
 
ठाकुरों की सिट्टी-पिट्टी को गुम किया है.
 
कच्‍ची के कुटीर उद्योग को संगठित करके
 
उसने बिरादरी के फटेहाल उद्यमियों को
 
जो लाभ पहुंचाए हैं
 
उनकी भी घर-घर प्रशंसा होती है.
 
इस सब से उसका मान काफी बढ़ा है.
 
रूकुमिनी की मां को वह चाची कहता है
 
हरे खीरे जैसी बढ़ती बेटी को भरपूर ताककर भी
 
जिस हया से वह अपनी निगाह फेर लेता है
 
उससे उसकी सच्‍चरित्रता पर
 
मां का कृतज्ञ विश्‍वास और भी दृढ़ हो जाता है.
 

रूकुमिनी ठहरी सिर्फ चौदह पार की
 
'भाई' कहकर रामखिलौना से लिपट जाने का
 
जी होता है उसका
 
पर फिर पता नहीं क्‍या सोचकर ठिठक जाती है.

:::

मैंने रूकुमिनी की आवाज सुनी है
 
जो अपनी मां को पुकारती बच्‍चों जैसी कभी
 
कभी उस युवा तोते जैसी
 
जो पिंजरे के भीतर भी
 
जोश के साथ सुबह का स्‍वागत करता है
 

कभी सिर्फ एक अस्‍फुट क्षीण कराह.
 

मैने देखा है कई बार उसके द्वार
 
अधेड़ थानाध्‍यक्ष को
 
इलाके के उस स्‍वनामधन्‍य युवा
 
स्‍मैक तस्‍कर वकील के साथ
 
जिसकी जीप पर इच्‍छानुसार 'विधायक प्रतिनिधि'
 
अथवा 'प्रेस' की तख्‍ती लगी रही है.
 

यही रसूख होगा या बूढ़ी मां की गालियों और कोसनों का धाराप्रवाह
 
जिसकी वजह से
 
कटरी का लफंगा स्‍मैक नशेड़ी समुदाय
 
इस मढ़ैया को दूर से ही ताका करता है
 
भय और हसरत से.
 

एवम् प्रकार
 
रूकुमिनी समझ चुकी है बिना जाने
 
अपने समाज के कई जटिल और वीभत्‍स रहस्‍य
 
अपने निकट भविष्‍य में ही चीथड़ा होने वाले
 
जीवन और शरीर के माध्‍यम से
 
गो कि उसे शब्‍द 'समाज' का मानी भी पता नहीं.
 

सोचो तो,
 
सड़ते हुए, जल में मलाई-सा उतराने को उद्यत
 
काई की हरी-सुनहरी परत सरीखा ये भविष्‍य भी
 
क्‍या तमाशा है
 

और स्‍त्री का शरीर !
तुम जानते नहीं, पर जब-जब तुम उसे छूते हो
 
चाहे किसी भाव से
 
तब उस में से ले जाते हो तुम
उसकी आत्‍मा का कोई अंश
 
जिसके खालीपन में पटकती है वह अपना शीश.
 

यह इस सड़ते हुए जल की बात है
 
जिसकी बगल से गुजरता है मेरा अलग रास्ता.


:::

रूकुमिनी का हाल जो हो
 
इस उमर में भी उसकी मां की सपने देखने की आदत
 
नहीं गई
 
कभी उसे दीखता है
 
लाठी से गंगा के छिछले पेटे को ठेलता
 
नाव पर शाम को घर लौटता
 
चौदह बरस पहले मरा अपना आदमी नरेसा
 
जिसकी बांहें जैसे लोहे की थी,
 
कभी पतेल लांघ कर भागता चला आता बेटा दीखता है
 
भूख-भूख चिल्‍लाता
 
उसकी जगह-जगह कटी किशोर
 
खाल से रक्‍त बह रहा है
 

कभी दीखती है दरवाजे पर लगी एक बरात
 
और आलता लगी रूकुमिनी की एडियां.

सपने देखने की बूढ़ी की आदत नहीं गई.
 

उसकी तमन्‍ना ही रह गई:
एक गाय पाले, उसकी सेवा करे, उसका दूध पिए
 
और बेटी को पिलाए
 
सेवा उसे बेटी की करनी पड़ती है.
 

काष्‍ठ के अधिष्‍ठान खोजती वह माता
 
हर समय कटरी के धारदार घास भरे
 
खुश्‍क रेतीले जंगल में
 
उसका दिल कैसे उपले की तरह सुलगता रहता है
 
इसे वही जानती है
 
या फिर वे अदेखे सुदूर भले लोग
 
जिन्‍हें वह जानती नहीं
 
मगर जिनकी आंखों में अब भी उमड़ते हैं नम बादल
 
हृदयस्‍थ सूर्य के ताप से प्रेरित.
 
उन्‍हें तो रात भी विनम्र होकर रोशनी दिखाती है,
 
पिटा हुआ वाक्‍य लगे फिर भी, फिर भी
 
मनुष्‍यता उन्‍हीं की प्रतीक्षा का खामोश गीत गाती है
 
मुंह अंधेरे जांता पीसते हुए.
 

इसीलिए एक अलग रास्‍ता पकड़ा मैंने
 
फ़ितूर सरीखा एक पक्‍का यकीन
 
इसीलिए भोर का थका हुआ तारा
 
दिगंतव्‍यापी प्रकाश में डूब जाने को बेताब.
 

_______ 
(बहुत ही कम आयु में दिवंगत हो गए बांग्ला कवि सुकांत भट्टाचार्य की एक प्रसिद्ध कविता का शीर्षक : ‘क्षुधार राज्ये पृथिबी गोद्योमोय’अर्थात भूख के राज्य में धरती गद्यमय है)
______

वीरेन डंगवाल (५ अगस्त,१९४७, कीर्तिनगर, टिहरी गढवाल)
इसी दुनिया में (१९९१), दुष्चक्र में स्रष्टा (२००२) , स्याही ताल (२००९)
पाब्लो नेरूदा, बर्टोल्ट ब्रेष्ट, वास्को पोपा, मिरास्लाव होलुब, तदेऊष रूज़ेविच आदि की कविताओं का अनुवाद
रघुवीर सहाय  स्मृति पुरस्कार (१९९२), श्रीकांत वर्मा स्मृति पुरस्कार (१९९३)
शमशेर सम्मान (२००२),साहित्य अकादमी पुरस्कार (२००४)
ई पता : virendangwal@gmail.com

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  1. '' पता तो चले - कहाँ की कविता है. उसमें परिकल्पित सार्वभौमिकता नहीं होनी चाहिए जो आजकल दिखाई दे रही है, ऐसा मेरा मानना है. उसमें एक स्थानिकता होनी चाहिए.''परिकल्पित सार्वभौमिकता''एवं ''स्थानिकता''के बीच का यही द्वन्द सामान्य पाठक को भ्रमित और आक्रान्त भी करता है!सच है ये कि' अब साहित्य एवं कलाओं में ''अर्थ पूर्ण '' और लोकप्रिय ''के बीच एक जबरदस्त विभाजन है!'
    यह जानकारी केवल मर्मज्ञों के लिए.
    साधारण जन तो इसे जानते ही हैं. ''कह कर वीरेन जी ने इस विभाजन और सत्य को स्पष्ट कर दिया है !'चमत्कारों'की चकाचौंध के बीच इस तरह की कवितायेँ गहरा सुकून देती हैं ...धन्यवाद अरुणजी

    :::

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  2. kavita ne stabdh kar diya hai .. rukmani ki peeda katari mein failti ..
    मैंने रूकुमिनी की आवाज सुनी है
    जो अपनी मां को पुकारती बच्‍चों जैसी कभी
    कभी उस युवा तोते जैसी
    जो पिंजरे के भीतर भी
    जोश के साथ सुबह का स्‍वागत करता है
    .......
    Arun , is post ke liye shukriya.

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  3. स्थानिक का ये मोज़ेक अजब सी स्थिति में ला खड़ा करता है ..
    एक पूरा स्थान मानवीय संवेदनाओं के साथ खुदबुदाता सामने आता है , आपको उद्वेलित करता है .. इसके भीतर की नमी आपके खादर का स्पर्श करती है , हहराती है ...स्तब्ध हैं इसे पढ़कर .

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  4. अनुवाद, कविता रूप में कहानी की अभिव्यक्ति, पढ़कर प्रवाहमय लगा।

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  5. Prajyan Pande4/9/11, 10:18 am

    इसीलिए भोर का थका हुआ तारा
    दिगंतव्‍यापी प्रकाश में डूब जाने को बेताब.
    isase jyaada to kuchh hai hi nahin jise kaha jaaye .. samvedana kii zameen rulaati vismit karati hai

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  6. कटरी की वास्तविकता आज भी ऐसी ही है..
    जंगलराज आज भी यहाँ का शाश्वत सत्य है..
    बहुत ही सुन्दर उकेरा कटरी का चित्र

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  7. रूकुमिनी समझ चुकी है बिना जाने
    अपने समाज के कई जटिल और वीभत्‍स रहस्‍य
    अपने निकट भविष्‍य में ही चीथड़ा होने वाले
    जीवन और शरीर के माध्‍यम से
    गो कि उसे शब्‍द 'समाज' का मानी भी पता नहीं.

    रुक्मणि के माध्यम से न जाने कितनी नारियों कि स्थिति को कह दिया ... नारी के मन कि प्रर्दा को सहजता से और गहनता से कहा है ..अच्छी प्रस्तुति

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  8. Mool Chandra Gautam4/9/11, 11:53 am

    RUKMINI NAM BHALE FOOLAN KI TARAH MASHAHOOR N HO HAKEEKAT HAI KATREE KI

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  9. यहाँ, एक दिलचस्प मोजैक.
    इसके भीतर एक नमी से भरी मानवीय उपस्थिति है

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  10. वीरेन डंगवाल ने अपनी सहज बयानी में अनायास "कटरी की रुकुमिनी और उसकी माता की खंडित गद्यकथा" के बहाने उस सड़ते हुए जल के रूपक में जिस ठंडी तल्‍खी के सुर में उस देहाती यथार्थ को बेपर्दा किया है, वह हमारे निर्मम समय की एक हिला देने वाली सच्‍चाई है। देहात में गरीब और उत्‍पीड़ित वर्ग की स्‍त्री की इस विकल्‍पहीन दशा को बयान करने के लिए जिस भाषिक संवेदना के साहस और उसके निर्वाह की जरूरत है, वह वीरेन जैसे देहाती संस्‍कार वाले संवेदनशील कवि के ही बूते की बात है। वीरेन को सलाम।

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  11. रुक्मणि के माध्यम से न जाने कितनी नारियों कि स्थिति को कह दिया ... नारी के मन कि प्रर्दा को सहजता से और गहनता से कहा है ..बहुत अच्छी प्रस्तुति....

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  12. मेरे देस की कविता ...स्थानिकता प्रत्यक्ष हो गयी|

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  13. oh ! bahut marmik..ek jeevant kavita . jaise sach saamne aakar khada ho gya
    कभी उसे दीखता है
    लाठी से गंगा के छिछले पेटे को ठेलता
    नाव पर शाम को घर लौटता
    चौदह बरस पहले मरा अपना आदमी नरेसा
    जिसकी बांहें जैसे लोहे की थी,
    कभी पतेल लांघ कर भागता चला आता बेटा दीखता है
    भूख-भूख चिल्‍लाता
    उसकी जगह-जगह कटी किशोर
    खाल से रक्‍त बह रहा है

    कभी दीखती है दरवाजे पर लगी एक बरात
    और आलता लगी रूकुमिनी की एडियां.

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  14. तुम जानते नहीं, पर जब-जब तुम उसे छूते हो
    चाहे किसी भाव से
    तब उस में से ले जाते हो तुम
    उसकी आत्‍मा का कोई अंश
    जिसके खालीपन में पटकती है वह अपना शीश.
    मार्मिक और हृदयस्पर्शी रचना .......

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  15. वीरेन डंगवाल ki kavitawo me tajgi hai. khusbu hai. sab rang shmil hai

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  16. कविता में स्वप्न, यथार्थ और मिथक का जिस तरह से मेल हुआ है, वह अद्भुद है।

    इसमें समय के संधान के साथ भविष्य का स्वप्न भी है।

    जीवन की सारी शुष्कता के बावजूद घंटी और घुंघरुओं के लिये जो प्रेम है, जीवन का वह रस बनाए रखता है जिससे जीवन प्रवाहित होता है। बच्चे का बतख की गरदन को इकलौते घुंघरु से सजाना तमाम निराशा के बावजूद जीवन के प्रति गहरी आस्था का संकेत है।

    गहराई से आए सहज प्रतीकों के बारे में कहने के लिये जैसे सारे शब्द भी कम हैं।

    आत्मा का संगीत सुनने के लिये आत्माएं बची ही कितनी हैं।
    मगर कवि आशान्वित है और इसीलिये संगीत सुन पा रहा है।

    वह सफेद बालू के विस्तार में भी नरम, हरा, कच्चा संसार देख पा रहा है। वह महसूस कर पा रहा है रुकुमिनी का दर्द और गरीब विधवा के बेटों की गुमनाम, असमय मृत्यु को। और सारे दर्द के बावजूद जीवटता से जीवन के संघर्ष में जुटी, ताकत से भरी, कभी न हारने वाली उस औरत को।

    समाज के जटिल भेद और रसूखदारों की कुद्ष्टि से जूझते हुए भी अपने सपनों को जीवित बचा पाने की जद्दोजहद के बाद भी प्रकाश में डूब जाने को बेताब है।

    सब कुछ खत्म होने पर भी कविता ही है जो सब कुछ बचाए रखती है।

    समालोचना ने सदा की तरह बहुत ही सार्थक सामग्री प्रस्तुत की है।
    हार्दिक आभार व अनंत शुभकामनाएं।

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  17. वाह !
    ये जानकारी केवल मर्मज्ञों के लिए है ..... साधारण जन तो इसे जानते ही हैं
    ..
    सपने देखने की बूढी की आदत नहीं गयी !

    मेरे लिए एक सर्वथा नया अनुभव रहा इस कविता को पढ़ना
    वीरेन जी को जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएं ..और समालोचन के प्रति आभार एक अच्छी कविता को पढ़वाने के लिए !

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  18. aaj achanak hi apani kavita dekhi aur ittni achee tippaniyan.behad taslli hui varna jan to ise lagbagh kharij kar chuke the.dhanyavaad aur dhanyawvvaad itro.shukriya arun

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  19. छू गयी ह्रदय ये...नहीं ये तो ह्रदयस्थ हो गयी . शुक्रिया अरुण जी

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  20. बहुत शानदार कविता !रुक्मिणी की पीड़ा का मर्मस्पर्शी चित्रण !

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  21. वीरेन जी की बहुत अच्छी कविताओं को आपने यहां शाया किया है. जिसके लिए आपका आभार और बधाई. मैंने अभी हाल ही में वीरेन जी की कविताओं का समग्र मूल्यांकन करने का प्रयास किया है, बनास जन के दसवें अंक में प्रकाशित हुआ है.

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  22. Tewari Shiv Kishore4/9/16, 7:08 pm

    मूल्यवान याद है।वीरेन डंगवाल के साथ उनके घर में पढ़ी थी। मुक्तिबोध की "एक अंतर्कथा" की चर्चा हुई थी [अग्नि के काष्ठ ढूँढ़ती माँ] सुकांत भट्ट के बारे में मैंने कुछ बेवकूफी की बात कही और डंगवाल ने सुधारा। फिर भट्टाचार्य को पूर्वाग्रह छोड़कर पढ़ा। धन्यवाद के रूप में एक कविता देवनागरी में लिखी बंगला में डंगवाल को भेजी।

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  23. आपने इस कविता को आँखों के सामने लाकर बहुत बड़ा काम किया. ऐसी रचनाएँ हमें बूढ़ी हो चली संवेदनाओं के बीच नई शुरुआत करने की ताकत देती हैं, जैसे इस कविता ने एक दिन वीरेन को वही ताकत दी होगी. इसमें क्या कोई शक है कि हमारे पास आज के दिन 'समालोचन' के अलावा क्या कोई साहित्यिक पत्रिका है ? इस कविता में स्थानिकता का जो नया अर्थ-सन्दर्भ वीरेन ने दिया है, यह नई परिभाषा गढ़ता है. मैंने इन सन्दर्भों को छुआ और महसूस किया है. टिहरी के एक गढ़वाली भाषी परिवार में जन्म, युवावस्था नैनीताल और इलाहाबाद के कुमाऊनी और अवधी-भाषी माहौल में, नौकरीपेशा हिस्सा पश्चिमी हिंदी के एक छोर बरेली और कन्नोजी के दूसरे छोर कानपुर में और फिर इसी भटकाव के बीच कटरी के कछारों में. यही तो कहा है उसने इस कविता से जुड़े अपने आत्मकथ्य में : "उत्तर भारतीय समाज में जो स्थानिक और एथनिक जीवन है, मैं उसकी कविता लिखना चाह रहा था. एक तरह से उसका बयान है इस कविता में. यह कविता लोक कविता जैसा कुछ नहीं है. इसमें लोक कविता वाली रुमानियत नहीं है. स्वप्न, यथार्थ और मिथक का नए सिरे से एक अनायास मिलाव है यहाँ, एक दिलचस्प मोजैक. इसके भीतर एक नमी से भरी मानवीय उपस्थिति है. मुझे यह कविता बहुत पसन्द है. इसे लिख कर मुझे बहुत तसल्ली हुई. इसमें कहीं प्रेमचंद भी आ गए हैं, तरह तरह से आए हैं. इस कविता में उनका आना मुझे अच्छा लगा है. . ." यह कविता एक तरह से वीरेन की सम्पूर्ण रचना-यात्रा की, उसकी स्थानीय भाषा-रूपकों के साथ की गयी यात्रा का कितना खूबसूरत कोलाज है.

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  24. Tewari Shiv Kishore5/8/18, 12:21 pm

    यह कविता याद रहेगी। कवि के बरेली वाले घर में पढ़ी। सुकांत की पंक्ति मैं भी व्यवहार कर चुका था, शायद 1968 में एक साप्ताहिक कालम के शीर्षक के रूप में जो मैं नीलकांत के लिए लिखता था। जो भी हो उस दिन मैंने सुकांत के बारे में कोई भारी बेवकूफ़ी वाली बात की। डंगवाल ने सुधारा। वापस आकर जांचा तो उनकी बात सही थी। बतौर धन्यवाद मैंने उन्हें सुकांत की चार कविताएँ और ट्रांसट्रमर की एक कविता भेजी। तब तक ट्रांसट्रमर को नोबेल नहीं मिला था।
    डंगवाल की अधिकतर कविताएं मेरी पढ़ी हुई हैं। यह कविता सबसे प्रिय है।आपने सुंदर चुनाव किया। आप सब के साथ मेरी भी अंजलि।

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